राजनीति
2019 में विजय के लिए मोदी को नया अवतार अपनाना होगा

आशुचित्र-

  • 2014 के वादों का उल्लेख 2019 में किया जाना आवश्यक है, भले ही उनमें कुछ कमी रह गई हो।
  • जानें कैसे मोदी अपनी असफलताओं को उजागर करके बता सकते हैं कि वे उनके सुधार के लिए क्या कर रहे हैं।

2019 में चुनाव का मंच खुला हुआ है। विपक्ष से नरेंद्र मोदी को कड़ी प्रतिस्पर्धा मिलेगी यह तय है। मोदी सरकार ने अच्छा आर्थिक प्रदर्शन नहीं किया है, यह विवाद का विषय है लेकिन कुछ अर्थशास्त्री रोज़गार और वृद्धि को संकट नहीं मानते हैं।

विपक्ष तो इसका विरोध करेगी ही लेकिन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में भी यह स्पष्ट नहीं है कि मोदी उनके तुरूप के इक्के हैं। यह आम मुद्दा है जो भाजपा और एनडीए के लिए प्रभावी सिद्ध होगा और अगर अमित शाह और मोदी इसे सही समय पर नहीं समझ पाए तो 2019 में उन्हें बहुत हानि पहुँचेगी, भले ही यह हानि हार की सीमा तक न हो।

अगर गुजरात के मुख्यमंत्री से 2014 तक कोई मोदी का राजनीतिक जीवन देखेगा तो एक तथ्य पाएगा कि उन्होंने हर पाँच वर्ष में खुद को एक नया स्वरूप प्रदान किया है। 2002 में वे हिंदुत्व आइकन थे। 2007 में उन्होंने खुद को विकास के प्रणेता के रूप में प्रस्तुत किया, 2012 में वे एक व्यापारी-सहायक मुख्यमंत्री बन चुके थे जिन्हें विदेशी मीडिया ने भी सराहा। 2014 में उन्होंने विकास स्वरूप को रूपांतरित करते हुए सबका साथ, सबका विकास  का नारा दिया और गरीबों के मसीहा बन गए।

2019 में मोदी को स्वयं को फिर से नया स्वरूप देना होगा। 2014 में उन्होंने अच्छे दिन  का वादा किया था और भारतीयों ने इस पर विश्वास किया था। 2019 में उनका आँकलन इस वादे के आधार पर किया जाएगा। कुछ क्षेत्रों (समावेशी बैंकिंग के लिए जन धन, गरीबों को डाइरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (सीधा लाभ), हर घर तक बिजली व गैस पहुँचाना) में उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा, उन्होंने वह भी किया जिसकी अर्थशास्त्री और व्यापारी अपेक्षा कर रहे थे (वित्तीय सावधानी (फिस्कल प्रूडेंस), घटती महंगाई, कर से राजस्व आय में वृद्धि, एक दिवालियापन संहिता और परिवर्तनकारी वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी))।

लेकिन यह महसूस होता है कि किसी चीज़ की कमी है। कृषि क्षेत्र में मज़दूरी भत्ता व उत्पाद मूल्य में कमी, रोज़गार और आमदनी वृद्धि में कमी से शहरी असंतोष, और भाजपा का मूल समर्थक- व्यापार समुदाय जीएसटी के कारण उखड़ा हुआ है। कर राजस्व में वृद्धि की चाह लोगों को “कर आतंकवाद” की याद दिला रही है, हालाँकि यह निर्धारितियों का अनावश्यक शोषण है या कर अनुपालन के लिए आवश्यक, यह वाद-विवाद का विषय है। जिन्हें कर देने की आदत नहीं है, उन्हें यह आतंकवाद लग सकता है।

लेकिन एक लोकतंत्र में कोई मुद्दा, मुद्दा होता है, भले ही अर्थशास्त्री या सत्ताधारी पार्टी इससे सहमत न हों। इसका अर्थ यह है कि मोदी को इन मुद्दों से सीधे तौर पर निपटना चाहिए और यह नहीं मानना चाहिए कि ये मुद्दे वास्तविक नहीं हैं। आप यह मान सकते हैं कि आपकी साफ नीयत  है और आप सही विकास  करना चाह रहे हैं लेकिन हो सकता है आपके मतदाता इससे पूर्णतः सहमत न हों।

किसी मुद्दे को मानना और उससे बेहतर तरीके से निपटने का वादा करना, किसी गलती को मानना और उसे सुधारने के लिए विश्वास प्रकट करना, अपनी उपलब्धियों को विनम्रता से गिनाना और अपने किए गए कार्यों को मतदाताओं की दृष्टि से बताना, एक अच्छे राजनीतिक संवाद के अंग हैं। जो हमने विगत विधानसभा चुनावों में देखा वह कांग्रेस के छः दशकों के कार्य की आलोचना थी, गांधी वंश और उसके भ्रष्टाचार पर हमला तथा मोदी के नम्र मूल का बखान। ये वास्तविक मुद्दे नहीं हैं, भले ही ये बहस के लिए अच्छे हों।

अब राहुल गांधी और विपक्ष के किसानों की कर्ज़माफी जैसे विनाशकारी कदम उठाने के दबाव में मोदी को किनारे किया जा रहा है और दोनों रूपों में ही उनकी हार है, अगर वे कर्ज़माफी को मंज़ूरी देते हैं तो वे वित्तीय अन्याय करेंगे और जिस वित्तीय संरचना के लिए उन्होंने इतनी मेहनत की है, वे उसे नष्ट कर देंगे, और अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो उन्हें किसान-विरोधी दृष्टिकोण से देखा जाएगा।

मतदाता ये सब जानते हैं और उन्हें यह याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है। बस उन्हें एक विश्वसनीयता चाहिए कि जिन असफलताओं की ओर विपक्ष संकेत कर रहा है, उनसे अगली बार बेहतर तरीके से निपटा जाएगा।

इसलिए यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि मोदी उनके 2014 के वादों के विषय में किस तरह से अपनी बात रखते हैं और यदि वे पूरे नहीं हुए हैं तो वे यह बताएँ कि 2019 में उन्हें कैसे पूरा किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, मतदाता मोदी को नए अवतार में देखना चाहते हैं, ऐसे नहीं कि वे सारी समस्याएँ सुलझा दें परंतु ऐसे कि वे कड़े प्रयास कर रहे हैं और अपनी असफलताओं से सीख रहे हैं। अगर यह विश्वास जताया जाता है तो कई मतदाता मोदी का साथ देंगे। 2014 में अरविंद केजरीवाल को असंवेदनशील माना जा रहा था जब उन्होंने अपने कार्यकाल के मध्य दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और जनता ठगा-सा महसूस कर रही थी लेकिन मात्र अपनी गलती स्वीकारने से  2015 में उन्होंने बेहतरीन वापसी की थी।

2014 के वादों का उल्लेख 2019 में किया जाना आवश्यक है, भले ही उनमें कुछ कमी रह गई हो। और ऐसे ही उन्हें विपक्ष के सवालों का जवाब भी देना चाहिए जैसे राफेल सौदे या बड़े व्यापारियों के साथ पक्षपात करने के विषय में।

निम्न तरीकों से मोदी अपनी असफलताओं तथा उनके लिए किए गए अपने प्रयासों के बारे में बता सकते हैं-

1. रोज़गार की कमी- मोदी उन रोज़गारों की सूची प्रस्तुत कर सकते हैं जो स्पष्ट रूप से दिख रहे हैं (लॉजिस्टिक्स, ब्यूटी पार्लर, शिक्षा, स्वास्थ्य, लघु नगरीय सेवाएँ इत्यादि)। वे बता सकते हैं कि जब पुराने कानून नए रोज़गार उत्पन्न करने से रोक रहे हैं ऐसे में नए लाभकारी रोज़गार उत्पन्न करने में समय लग रहा है। वे प्रशिक्षु अधिनियम में संशोधन, निश्चित अवधि के लिए मजदूरों से अनुबंध तथा नियोक्ताओं को अधिक मजदूरों को काम देने के लिए प्रोत्साहित करते हुए सामाजिक सुरक्षा हेतु आर्थिक सहायता देने के प्रावधान बता सकते हैं।

2. काला धन वापस लाने का वादा- मतदाताओं का मोदी द्वारा उन्हें 15 लाख रुपए या 5,000 रुपए देने की बात कहने पर विश्वास होना मायने नहीं रखता। मोदी को यह जताने की आवश्यकता है कि उनके द्वारा किए गए प्रयास धीरे-धीरे फल दे रहे हैं। वे इन तीन काला धन योजनाओं- 2015 की विदेशी संपत्ति सर्व-क्षमा योजना, 2016 की घरेलू संपत्ति सर्व-क्षमा योजना, विमुद्रीकरण के समय लागू की गई प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना तथा पुरानी प्रकाशित आय से वसूला गया अतिरिक्त कर तथा धन की जानकारी बता सकते हैं। वे बता सकते हैं कि इन सभी से प्राप्त हज़ारों करोड़ का धन उज्जवला योजना अथवा दूर के इलाकों में बिजली उपलब्ध कराने में या किसी गरीब कल्याण योजना में लगाया गया है। वे बता सकते हैं कि काला धन वापस लाना एक लंबी प्रक्रिया है जिसमें अन्य देशों की सरकार का हस्तक्षेप भी होता है तथा यह निरंतर तभी हो सकता है जब लोग मोदी को फिर से चुनें अन्यथा धूर्तों को फिर से शासन मिल जाएगा।

3. अंबानी-अदाणी से जुड़ी अफवाहें या फिर मोदी द्वारा केवल बड़े व्यवसायियों को सहयोग देने की खबरें- मोदी को यह बताना होगा कि वे ऋण न चुकाने वालों को तथा बदमाशों को पुन: घेरे में लाए हैं। वे बता सकते हैं कि अनिल अंबानी अपना दूरसंचार का व्यवसाय खो चुके हैं तथा ऐसा ही टाटा समूह के साथ भी हुआ है। रुइआ, जयप्रकाश समूह, जीएमआर, जीवीके तथा अन्य भी ऋण न चुका पाने के कारण अपने व्यवसाय खो चुके हैं। वहीं ऐसा कांग्रेस के कार्यकाल में कभी नहीं हुआ। वे बता सकते हैं कि किस तरह से विजय माल्या जैसे फ़रार लोगों का व्यवसाय देश में बंद पड़ा है। इससे स्पष्ट है कि कोई भी कानून नहीं तोड़ सकता है। वे बता सकते हैं कि संयुक्त प्रगतशील गठबंधन (यूपीए) सरकार मुकेश अंबानी की गैस के लिए आठ डॉलर प्रति एमएमबीटीयू चुकाने के लिए तैयार थी। वहीं एनडीए ने बहुत ही कम कीमत अदा की है। यह भले ही अर्थशास्त्र की नज़र में बुरा हो लेकिन राजनीतिक मंच पर अच्छा हथियार साबित होगा।

4. विमुद्रीकरण तथा जीएसटी से नुकसान- मोदी को ग्रामीण तथा शहरी लोगों की पीड़ा बताने की आवश्यकता है। इसके साथ ही वे बता सकते हैं कि अतिरिक्त कर वसूली से सरकार सामाजिक सुरक्षा सुविधाओं में आसानी से निवेश कर सकती है। वे बता सकते हैं कि आयुष्मान भारत जैसी योजनाएँ इस सीधी कर वसूली के कारण ही संभव हो सकी हैं।

5. कृषि क्षेत्र के ऋण माफ़ करना- मोदी को यह बताना चाहिए कि कई राज्य किसानों के ऋण माफ़ कर चुके हैं तथा अब केंद्र से इसकी माँग कर रहे हैं। यह गैर-वाजिब तथा किसानों के लिए हानिकारक है। वे बता सकते हैं कि जब किसान ऋण चुकाना बंद कर देंगे तो बैंक उन्हें ऋण देना बंद कर देंगे। यदि ऋण माफ़ करने में अधिक पैसा खर्च किया गया तो सड़क, शीतकालीन भंडार, फसल बीमा सब्सिडी तथा खरीदी के लिए सरकारी कोष में पैसे की कमी हो जाएगी। वहीं भारतीय मतदाता यह समझ पाने में सक्षम हैं कि एक राजनेता द्वारा कही गई सच्चाई किसी के बेतुके वादों से अधिक महत्त्व रखती है।

6. निजीकरण– मोदी तथा भाजपा यह बता सकती है कि किस तरह से कुछ लोगों की अधिक तनख़्वाह वाली नौकरियों के लिए एयर इंडिया कर दाताओं के 30,000 करोड़ रुपए खत्म कर रही है। वे बता सकते हैं कि किस तरह से एयर इंडिया को बेचकर गरीबों को दस गुना अधिक रोज़गार दिए जा सकते हैं। यह अर्थशास्त्रियों की निजीकरण की बातों को मतदाताओं की इच्छा बना देगा तथा बेहतर राजनीति और बेहतर अर्थशास्त्र का माहौल बनाएगा।

बहुत सारे अन्य बिंदुओं पर चर्चा की जा सकती है लेकिन हम यहाँ विराम लेंगे और देखेंगे कि किस तरह मोदी खुद को पुन: विकसित कर सकते हैं तथा 2019 के लिए क्या संदेश रख सकते हैं?

इसका उत्तर- साफ नीयत  के नारे के एक भाग में प्राप्त होता है जिसके लिए मतदाता भी विश्वास करने की इच्छा रख रहे हैं। कुछ लोग सोचते हैं कि मोदी भ्रष्टाचारी हैं लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि “चौकीदार चोर है” विपक्ष के द्वारा दिया गया नारा है। यदि मोदी लोगों से बेतुके वादे करने से मना करते हैं तो यह लोगों को अधिक विश्वसनीय लगेगा। उन्हें लोगों से विकास को लेकर वार्ता करनी होगी।

सहज ज्ञान के विपरीत एक विचार है कि मतदाता मुफ़्त की चाहत रखते हैं। क्या यह समय नहीं है कि मोदी कैनेडी की बात का प्रयोग करें- यह मत पूछो की देश तुम्हारे लिए क्या कर सकता है बल्कि यह कि तुम देश के लिए क्या कर सकते हो। यदि मोदी मतदाताओं से पूछेंगे कि वे देश के लिए क्या कर सकते हैं तो ध्यान मुफ़्त की चीज़ों से हटकर बेहतर अर्थशास्त्र की ओर हो जाएगा। यह मतदाताओं की उदासीनता को खत्म करेगा तथा राजनेताओं पर विश्वास बढ़ाएगा।

साफ नीयत  की टैगलाइन सही विकास  को प्रदर्शित करते हुए- “चलो, देश के लिए कुछ करें” अथवा “चलो, अब देश की सोचें” हो सकती है।” इसका संदेश होगा कि हम विकास के लिए हर संभव प्रयास करेंगे लेकिन मतदाताओं को भी उनके हिस्से का कार्य करना होगा।

राजनेताओं को इतना कुटिल भी नहीं होना चाहिए कि वे सोचने लगें कि मतदाताओं के पास उनके स्वार्थ पूरा करने से बड़ा कोई उद्देश्य नहीं है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।