राजनीति
ओडिशा में विकल्प का नहीं है अभाव- पढ़ें पूरे राज्य की चुनावी रिपोर्ट

आशुचित्र- दशकों बाद ऐसा हुआ है कि ओडिशा में विकल्प का अभाव नहीं है। अब एक विकल्प है और यह स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर भी है।   

पिछले कुछ दशकों में ओडिशा के 2019 के चुनावों में सर्वाधिक गहमागहमी है। राज्य की ओर राष्ट्र का ध्यान पहले की तुलना में काफी अधिक है और इससे सत्ताधारी पार्टी पर दबाव बनता भी नज़र आ रहा है।

27 मार्च को बीजू जनता दल (बीजद) ने लोकसभा प्रत्याशियों की दूसरी सूची निकाली और ओडिशा का चुनावी रण पिछले कुछ दशकों में बहुत ही भयंकर हो गया है। आईएएस, आईपीसएस, कानूनी संबंधित व्यक्ति, अभिनेता, राजसी वंश वाले, न्यूज़ रूम योद्धा, स्वयं सहायता समूह (एएचजी) के सदस्य और अन्य का मिश्रण दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है। लोकसभा और विधानसभा चुनावों के साथ आयोजन से अनिश्चितताएँ बढ़ती जाती हैं और परिस्थिति को गतिशील बनाए रखती हैं।

वास्तविकता में यह चुनावी घटनाक्रम बीजद के संस्थापक सदस्य बैजयंत पांड्या के 9 माहों के अवकाश के बाद भाजपा में सम्मिलित होने से शुरू हुआ। और इसके बाद कई सांसदों ने दल बदलना शुरू किया, बीजद की नाव को छोड़कर भाजपा की नाव पर सवार हो गए। इसका मुख्य कारण टिकट वितरण से असंतोष था। इस सूची में नबरंगपुर के पूर्व सांसद बालभद्र माझी और कंधमाल की सांसद प्रत्युशा राजेश्वरी सिंह भी हैं। हाल ही में पूर्व भाजपा सदस्य और बालासोर से तीन बार भाजपा सांसद रह चुके खरबेला स्वाइन पुनः पार्टी में सम्मिलित हो गए। इसके बाद माझी उनके पूर्व क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी बनाए गए और स्वाइन को कंधमाल से भाजपा का टिकट दिया गया।

टिकट वितरण को विस्तार से समझने से पूर्व, 2014 चुनाव परिणामों का अवलोकन करते हैं।

ओडिशा 21 सांसदों को संसद में भेजता है और पिछली बार 21 में से 20 सांसद सत्ताधारी पार्टी बीजद के थे। अकेले भाजपा सांसद थे जुअल ओराम जो सुंदरगढ़ से आदिवासी बहुल सीट 18000 मतों के अंतर से जीते थे। 11 सीटों पर कांग्रेस और 9 सीटों पर भाजपा द्वितीय स्थान पर रही थी।

ओडिशा के चुनावी क्षेत्र को मोटे तौर पर तटवर्ती और दक्षिण-पश्चिमी बेल्ट में बाँटा जा सकता है। हर क्षेत्र में बराबर सीटें हैं लेकिन पश्चिमी (और दक्षिणी) जिलों में आदिवासियों की संख्या अधिक है। पश्चिमी जिलों की बोलियाँ तट पर बोली जाने वाली उड़िया से भिन्न हैं। खनिज भंडारों के होने के बावजूद पश्चिम ओडिशा पर तटवर्ती क्षेत्रों से कम ध्यान दिया जाता है और फलस्वरूप यहाँ विकास दर कम है। ये उन कारणों में से एक है जिसके लिए पश्चिमी ओडिशा के पृथक राज्य की मांग कर रहा है।

यही मतभेद है जो ओडिशा के 2019 के चुनावों को निर्धारित करेगा। यह निश्चित है कि पश्चिमी ओडिशा में भाजपा ने अपनी जगह बना ली है। इसकी पुष्टि इस बात से की जा सकती है कि पहली बार ऐसा हुआ है कि नवीन पटनायक ने अपने गृह क्षेत्र हिंजली के अलावा बारगढ़ जिले के बीजेपुर से भी चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है। प्रत्याशी चुनने में धर्मेंद्र प्रधान की मनमानी, बीजद नेतृत्व में स्पष्ट असुरक्षा की भावना और राज्य कांग्रेस का असमंजस 2019 के चुनावों को और जटिल बनाते हैं।

तटवर्ती जिलों की लड़ाई

2014 के चुनावों में भाजपा तटवर्ती जिलों में बुरी तरह हारी थी। बालासोर, भुवनेश्वर और ढेंकानाल अपवाद रहे थे जहाँ यह दूसरा स्थान बना पाई थी। लेकिन फिर भी इन जिलों में भी हार का अंतर 1.3 से 1.9 लाख मतों का रहा था।

पारंपरिक रूप से तटीय ओडिशा बीजद का गढ़ रहा है। पुरी, कटक, केंद्रपारा, जगतसिंहपुर और अस्का में बीजद ने 2014 में 2-3 लाख मतों के अंतर से जीत दर्ज की थी। इन सभी क्षेत्रों में भाजपा तीसरे स्थान पर रही थी।

तटीय जिलों में बीजद के वोट शेयर पर एक नज़र डालते हैं-

हर चुनाव क्षेत्र में बीजद का मत प्रतिशत 40 से अधिक रहा और 11 में से छह स्थानों पर यह आँकड़ा 50 प्रतिशत से अधिक भी रहा। भाजपा का प्रदर्शन सभी जगहों पर खराब रहा और 11 में से आठ जिलों में इसक मत प्रतिशत 25 से भी कम था।

जहाँ भाजपा को मज़बूत करने, बीजद से असंतुष्ट नेताओं को लेने और नए चेहरों को लाने से भाजपा के लिए बेहतर अवसर खुले हैं लेकिन इन जिलों में वास्तविक आँकड़े लड़ाई को अत्यंत चुनौतीपूर्ण बनाते हैं। बीजद ने लोकसभा चुनावों में महिला प्रत्याशियों को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का वादा किया है। ओडिशा की महिलाओं में नवीन पटनायक लोकप्रिय हैं और यह प्रयास उनकी छवि के साथ जाता है। बीजद छह महिला उम्मीदवारों के नाम घोषित कर चुकी है और आश्चर्य की बात नहीं है कि इनमें से चार सुरक्षित तटीय जिलों से हैं- अस्का, जगतसिंहपुर, भद्रक और जयपुर। किसी भी पार्टी के लिए ये सीटें जीतना बहुत मुश्किल है और इसलिए समझ में आता है कि इनमें से तीन सीटों के प्रत्याशियों की घोषणा अभी तक भाजपा ने क्यों नहीं की। नवीन पटनायक द्वारा चुनी गई एक एसएचजी सदस्या प्रमिला बिसोई के सामने अस्का में भाजपा ने अनीता प्रयदर्शिनी को उतारा है। अनीता गंजम के वरिष्ठ नेता रामकृष्ण पटनायक की पुत्री हैं।

इस चुनाव में एक महत्त्वपूर्ण लड़ाई केंद्रपारा में लड़ी जाएगी। भाजपा ने पूर्व बीजद नेता बैजयंत पांड्या को उनके गृह क्षेत्र से खड़ा किया है। 1998 से केंद्रपारा बीजद का गढ़ रहा है और 1950 के दशक से कांग्रेस यह सीट नहीं जीत पाई है। पांडा के विरुद्ध ओलीवुड अभिनेता और राज्य सभा सांसद अनुभव मोहंती खड़े हुए हैं। पूर्व में पांडा ने स्थानीय बीजद नेताओं के प्रतिरोध का सामना किया है और उनपर शारीरिक हमले भी हुए हैं। उनकी व्यक्तिगत सत्यनिष्ठा इस बात को प्रमाणित करेगी कि उन्होंने अपने क्षेत्र को काफी समय दिया है और अपनी ऊर्जा से सींचा है। लेकिन पार्टी से उनका उग्रता से निकलना मुख्यमंत्री को व्यक्तिगत रूप से केंद्रपारा पर ध्यान देने के लिए विवश करेगा और उनकी कोशिश रहेगी कि वहाँ बीजद का ही शासन रहे। यह देखने योग्य प्रतिद्वंद्व होगा और कांग्रेस के वोट किस तरफ जाते हैं इसपर भी निर्भर करेगा।

2014 में मोदी की लहर के बावजूद ओडिशा के शहरी क्षेत्र भुवनेश्वर और कटक पर बीजद का ही शासन रहा। इसके लिए भाजपा दो अद्वितीय व्यवसायिकों को लेकर आई है- एक प्रशासनिक अधिकारी और एक पुलिस अधिकारी। जानी मानी अधिकारी अपराजिता सारंगी भुवनेश्वर से भाजपा की उम्मीदवार हैं और ओडिशा के डीजीपी प्रकाश मिश्रा को कटक से उतारा गया है। इन दोनों ने जनता के मस्तिष्क पर अपनी छाप छोड़ी है और इनके चरित्र पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।

लेकिन कटक और भुवनेश्वर को भी बीजद का ही गढ़ माना जा सकता है जहाँ इसे लगभग 50 प्रतिशत मत मिले थे। कटक में भर्तृहरि महताब वर्तमान सांसद हैं और 1998 से उनके पास यह सीट है। पूर्व सांसद के प्रभाव में कमी देखते हुए बीजद ने नए प्रत्याशी प्रसन्ना पटसनी (चिकन बाबा के नाम से जाने जाने वाले) को उतारा है। सारंगी के विरुद्ध पूर्व मुंबई पुलिस कमिशनर अरूप पटनायक लड़ेंगे।

पूरी में बीजद की ओर से कानून के खिलाड़ी पिनाकी मिश्रा भाजपा के संबित पात्रा के विरुद्ध लड़ेंगे। मिश्रा के पास तीन कार्यकालों के लिए पुरी सीट रही है, एक बार कांग्रेस सांसद के रूप में और जो बार बीजद सांसद की तरह। पात्रा वाकपटु हैं और कुछ क्षेत्रों में लोगों को आकर्षित कर सकते हैं (विशेषकर चिलिका और नयागढ़) लेकिन मिश्रा के साछ लड़ाई चुनौतीपूर्ण होगी।

इस ज़ोन में दूसरी सीट बालासोर की है जहाँ वर्तमान बीजद सांसद रबींद्र कुमार जेना वरिष्ठ भाजपा नेता और पूर्व संघ प्रचारक प्रताप चंद्र सारंगी के विरुद्ध लड़ेंगे। हालाँकि सारंगी सबसे योग्य उम्मीदवार माने जा रहे थे लेकिन पूर्व भाजपा नेता व बालासोर से तीन बार सांसद रह चुके खरबेला स्वाइन के पुनः पार्टी में आने से कुछ विवाद हुआ। माना जा रहा है कि बालासोर से उन्हें खड़ा करना बेहतर हो सकता था लेकिन उन्हें कंधमाल से उतारा जा रहा है। लेकिन बालासोर कभी भी बीजद का गढ़ नहीं रहा है और 1998 से तीन बार भाजपा और एक-एक बार कांग्रेस व बीजद द्वारा जीता जा चुका है। जेना से चिट फंड घोटाले के संबंध में सीबीआई ने पूछताछ की है और उनकी जीत पर भ्रष्टाचार के आरोप के काले बादल भी मंडरा रहे हैं।

ब्रह्मपुर कांग्रेस का गढ़ माना जाता है जिसे पार्टी आपातकाल विरोधी लहर में भी बचाने में सक्षम रही थी। यह सीट इतनी सुरक्षित मानी जाती थी कि पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने 1996 में वहाँ से चुनाव लड़ा था। ओलीवुड अभिनेता सिद्धांत महापात्रा बीजद की ओर से 2009 और 2014 में चुनाव जीत था। लेकिन इस बार उन्हें टिकट नहीं मिला है और उनके स्थान पर यह सीट कांग्रेस प्रत्याशी चंद्रशेखर साहू को दी गई है जिन्हें सिद्धांत ने दो बार हराया था। 2004 में साहू ब्रह्मपुर से कांग्रेस सासंद रहे थे और बीजद में सम्मिलित होकर उन्होंने सिद्धांंत की जगह ले ली है। भाजपा ने यहाँ अपने प्रवक्ता भृगु बक्षीपात्रा को खड़ा किया है और कांग्रेस नए चेहरे चंद्रशेखर नायडू को लेकर आई है जो ओड़िया तक नहीं बोल सकते हैं (वे तेलुगु बोलते हैं जो क्षेत्र की जनसांख्यिकी के बारे में बताता है)।

इस क्षेत्र में अंतिम सीट है ढेंकानाल जो 2004 से बीजद सांसद तथागत सतपती के पास है। चार बार सांसद रह चुके सतपती ने चुनाव न लड़ने का निर्णय लिया है और बीजद ने अभी तक यहाँ से अपने उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है।

पश्चिमी हवाओं में बदलाव?

जहाँ तटीय जिलों में बहुत सारे बड़े नाम वाले नेता हैं, वहीं असली युद्ध पश्चिमी और दक्षिणी 10 जिलों में होगा। 2014 के चुनावों ने राज्य के तटीय, मध्य और पश्चिमी जिलों का भेद स्पष्ट कर दिया था। भाजपा भले ही जीत न दर्ज कर पाई हो लेकिन पश्चिमी बेल्ट में इसकी मज़बूत पकड़ देखने को मिली थी। बारगढ़ में यह 11,000 मतों के कम अंतर से हारी थी और निकटवर्ती संबलपुर में 30,000 मतों से। क्योंझर, बलांगिर, मयूरभंज और कालाहांडी जिलों में यह द्वितीय स्थान पर रही थी। एकमात्र सीट जिसपर यह जीत दर्ज कर पाई, वह भी पश्चिमी ओडिशा की ही थी।

तबसे महानदी में बहुत पानी बह चुका है (भाजपा शासित छत्तीसगढ़ के साथ बढ़ते तनाव के बीच)। 2014 में भाजपा ओडिशा में पतवारविहीन थी। इसका संगठनात्मक आधार कमज़ोर था और एक भी जाना-माना चेहरा इसके पास नहीं था जो नवीन पटनायक की लोकप्रयिता के सामने खतरा बन सके। बीजद के साथ लंबे समय की संधि और उके बाद अलगाव ने भाजपा के आधार को कम कर दिया था, उन जिलों में भी जहाँ इसका दबदबा था। 2019 में बढ़त बनाने के लिए पार्टी को मज़बूत करना एक कठिन और अति महत्त्वपूर्ण कार्य था। भाजपा के लिए बड़ा बदलाव 2017 में जिला परिषद चुनावों के रूप में आया। भाजपा ने पश्चिमी ओडिशा में बड़ी बढ़त बनाई और 36 से अपने आँकड़े को 306 तक पहुँचाया। हालाँकि स्थानीय निकाय चुनावों से लोकसभा चुनावों का अंदाज़ा लगाना विवेकपूर्ण नहीं है लेकिन इससे यह स्पष्ट होता है कि भाजपा ने अपने संगठन को मज़बूत किया है और खेल परिवर्तित करने के लिए पश्चिमी ओडिशा को लक्ष्य किया है।

अन्य 10 जिलों पर एक नज़र डालते हैं-

2014 में दो दक्षिणी आदिवासी जिलों- कोरापुत और नबरंगपुर में बीजद और कांग्रेस के बीच करीबी मुकाबला देखा गया था। नबरंगपुर में बीजद मेंत्र 2000 मतों के अंतर से जीती। यही दो प्रत्याशी इस बार भी आमने-सामने हैं लेकिन अंतर यह है कि बालभद्र माझी जो सांसद थे, वे इस बार भाजपा की टिकट पर लड़ रहे हैं। 2009 में इस क्षेत्र से कांग्रेस के प्रदीप माझी जीते थे। परिवर्तन की लहर देखते हुए संभवतः बालभद्र माझी को बीजद ने टिकट नहीं दिया। इससे अब यह लग रहा है कि इस बार कांग्रेस ओडिशा से एक लोकसभा सीट तो जीत ही लेगी।

जहाँ नबरंगपुर पार्टी के हित में है, वहीं कोरापुत में चीज़ें बदल गई हैं। पूर्व कांग्रेस नेता, नौ बार के सांसद और ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री गिरिधर गामंग 2015 में भाजपा में सम्मिलित हो गए थे। जिले में दूसरी बड़ी चीज़ है भाजपा में जयराम पंगी का आना। पंगी पोटांगी से दो बार विधायक रह चुके हैं और 2009 में लोकसभा के लिए चुने गए थे। पंगी कोरापुत से 1980 से चुनाव लड़ते आए हैं और अधिकांश बार गिरिधर गामंग से चुनाव हारे हैं। 2019 में पंगी कोरापुत से भाजपा के टिकट पर लड़ रहे हैं और उनके विरुद्ध होंगी वर्तमान बीजद सांसद झीना हिकाका की पत्नी कौशल्या हिकाका। इन दो बड़े नेताओं के आने से कोरापुत में भाजपा की जीत की संभावना बढ़ गई है।

जहाँ कोरापुत भाजपा के लिए सुरक्षित होती जा रही है, वहीं इसकी तीन सुरक्षित सीटों में कड़ा मुकाबला देखने को मिलेगा। बारगढ़, सुंदरगढ़ और संबलपुर में भाजपा का 2014 में अच्छा मत प्रतिशत था और इसके बाद यहाँ संगठन मजबूत भी हुआ है। वरिष्ठ भाजपा नेता, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक और बजरंग दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुभाष चौहान ने 2014 में भाजपा के लिए 3.72 लाख मत जीते थे। वे 11,000 मतों के अंतर से हारे थे। क्षेत्र में हिंदुत्व की आवाज़ चौहान बारगढ़ में अवसर मिलने के लिए आशावान थे और इस बार अपनी जीत की भी उम्मीद कर रहे थे।

लेकिन धर्मेंद्र प्रधान के एक आश्चर्यचकित करने वाले कदम में उन्हें टिकट नहीं दिया गया और भाजपा के लिए सुरक्षित लग रही बारगढ़ की सीट सुरेश पुजारी के पास चली गई जिन्होंने 2014 में संबलपुर से चुनाव लड़ा था। परेशान होकर 30 साल के संबंध के बाद भाजपा छोड़ते हुए चौहान अश्रुप्रोत हो गए लेकिन उन्होंने साफ किया कि संघ से उनका संबंध सदा के लिए है।

घटनाक्रम के रोमांचक मोड़ पर भाजपा ने चौहान से मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के विरुद्ध लड़ने को कहा। िसके जवाब में चौहान ने कहा कि भाजपा के मुख्यमंत्री प्रत्याशी धर्मेंद्र प्रधान का पटनायक के विरुद्ध लड़ना बेहतर होगा।

2014 में भाजपा एकमात्र सुंदरगढ़ की सीट पर जीती थी। जुअल ओराम इस क्षेत्र से चार बार विधायक रह चुके हैं लेकिन इस बार यहाँ कड़ा प्रतिद्वंद्व होगा। सुदरगढ़ के सात विधानसभा क्षेत्रों में से भाजपा केवल राउरकेला की सीट पर ही जीती थी। लेकिन असंतोष के कारण विधायक दिलीप रे ने पिछले दिसंबर में पार्टी छोड़ दी। भाजपा की परेशानियों को बढ़ाते हुए वरिष्ठ आदिवासी नेता जॉर्ज तिरकी, जिनकी बिरमित्रापुर विधानसभा क्षेत्र पर पकड़ है, कांग्रेस में सम्मिलित हो गए। इस त्रिकोणीय युद्ध में तिरकी जुअल ओराम के सामने होंगे। तीसपरी प्रत्याशी पूर्व कांग्रेस मुख्यमंत्री हेमानंद विस्वाल की पुत्री सुनीता बिस्वाल हैं।

एकमात्र बीजद सांसद जिन्हें पश्चिमी ओडिशा से पुनः टिकट मिला है, वे हैं बोलंगिर से कलिकेश सिंहदेव। यहाँ फिर से राजसी परिवार के बीच द्वंद्व है। कलिकेश अपनी भाभी और बोलंगगिर से तीन बार सासंद रहीं संगीता सिंहदेव के विरुद्ध लड़ेंगे। संबलपुर जहाँ 2014 में भाजपा 36,000 मतों से हारी थी, वहाँ बीजद ने सरकार के पूर्व कार्य सचिव नलिनी कांता प्रधान को खड़ा किया है। प्रधान के कार्यकाल में राज्य भर में सात पुल गिरे थे और टेंडरिंग प्रक्रिया पर सवाल उठे थे। लेकिन बीजद ने उनके विरुद्ध कार्रवाई करने की बजाय उन्हें लोकसभा टिकट से नवाज़ा।

पश्चिमी ओडिशा में एक और बड़ा चुनाव कंधमाल में होगा जहाँ मीडिया संबंधित, समाजसेवी और व्यापारी अच्युत सामंत बीजद की टिकट पर भाजपा के खरबेला स्वाइन के विरुद्ध चुनाव लड़ेंगे। बालासोर से तीन बार भाजपा सांसद रह चुके स्वाइन पार्टी में 10 साल के अंतराल के बाद लौट आए हैं। पति हेमेंद्र चंद्र सिंह की मृत्यु के बाद बीजद की टिकट पर उप-चुनाव लड़ने वाली प्रत्युशा राजेश्वरी सिंह को 61 प्रतिशत मत मिले थे। लेकिन अच्युत सामंत को उनकी जगह टिकट दिया गया जिसके बाद वे भाजपा में सम्मिलित हो गईं।

चुनाव के पहले अपने आखिरी दाँव के रूप में बीजद कालिया योजना लेकर आई जो लघु और सीमावर्ती किसानों को 25,000 रुपये की वित्तीय सहायता और भूमिहीन परिवारों को घरेलु सहायता देती है। नवीन पटनायक ने ग्रामीण क्षेत्रों में अपने आधार को मज़बूत किया है, विशेषकर ग्रामीण महिलाओं के बीच जहाँ कालिया योजना चुनावों से पूर्व एक दम सही निशाना रही।

लेकिन मुख्यमंत्री की लोकप्रियता, लोकप्रिय योजनाओं की पकड़ और राज्य के कुछ क्षेत्रों में गढ़ होने के बावजूद इस बार बीजद परेशान लग रही है। यह इस तथ्य से स्पष्ट होता है कि तीन सांसदों को छोड़कर 18 घोषित सीटों पर बीजद ने प्रत्याशी को बदला है। इसमें भद्रक और भुवनेश्वर के वरिष्ठ नेता भी हैं।

अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि खुद संघर्षरत भाजपा क्या सत्ताधारी पार्टी के शासन में सेंध लगा पाएगा। लेकिन चुनावी मौसम की शुरुात में ओडिशा में एक चीज़ तो साफ है। दशकों बाद ऐसा हुआ है कि विकल्प का अभाव नहीं है। अब एक विकल्प है और यह स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर है।