राजनीति
वक्त है बदलाव का- क्या 2019 में भी जनता चाहेगी बदलाव

प्रसंग
  • 2019 का लोकसभा अभियान अब शुरू है और गेंद अब भाजपा के पाले में है।

मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव 2018 के लिए कांग्रेस का नारा था- “वक्त है बदलाव का”। इन चुनावों में मतदान करने वाले पाँचों राज्य अलग-अलग तरीकों से इसी विषय पर केंद्रित थे।

छत्तीसगढ़ और मणिपुर में मौजूदा सरकारों की हार हुई है। तेलंगाना के मतदाताओं ने स्वयं बदलाव  की अवधारणा को ही पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया। कोई भी एग्ज़िट पोल राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश, तीनों राज्यों में जन भावनाओं को नहीं पकड़ सका।

राजस्थान का परिणाम अपेक्षित था, लेकिन जितना अपेक्षित था उतना नहीं आया। कांग्रेस ने अपने खाते में 99 सीटें सुरक्षित कीं। राजस्थान में इस धारणा से चुनाव लड़ा गया था कि राज्य में कांग्रेस सूपड़ा साफ कर रही है। न सिर्फ कांग्रेस, बल्कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने भी पूरी तरह से इस पर यकीन किया। लोकप्रिय दृष्टिकोण यह था कि यह चुनाव कांग्रेस के पक्ष में 150-50 वाला होगा। कांग्रेस दो दशकों में अपनी मजबूत लहर के माध्यम से मुश्किल से आधा रास्ता पार कर सकी है जिससे लगता है कि राज्य में भाजपा की वापसी का विकल्प है।

अंत में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस को बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के समर्थन की जरूरत होगी, जैसा कि 2008 में हुआ था। भाजपा शायद स्वयं के और इसके आंतरिक विरोधाभासों, जो इसके प्रशासन को शीघ्रता से और पर्याप्त मजबूती से प्रेरित करने में असमर्थ थे, के कारण हार गई। जयपुर क्षेत्र से बाहर और राज्य के उत्तरी क्षेत्र में, पार्टी की कांग्रेस के साथ कांटे की टक्कर थी।

वसुंधरा राजे दूसरी बार भी उसी घिसे-पिटे राजस्थान भाजपा मुद्दे पर घिरी थीं कि संगठनात्मक तंत्र राजे को स्वीकार नहीं कर रहा है, लेकिन उनके स्थान पर किसी और को रखने में भी असमर्थ है। क्या राजस्थान चुनाव बदलाव का चुनाव था? जी हाँ- यह भाजपा पार्टी तंत्र के लिए राजे पर उसका दृष्टिकोण बदलने के लिए एक चुनाव था। ऐसा नहीं हुआ, और कांग्रेस को लाभ मिला।

वास्तव में, मध्य प्रदेश का चुनाव सबसे दिलचस्प था। कांग्रेस सरकार अस्थाई सरकार होने की संभावना है। मतदाताओं ने स्पष्ट रूप से शिवराज सिंह चौहान को अस्वीकार नहीं किया है। यहाँ बदलाव का संदेश विभिन्न तरीकों से प्रकट हुआ है।

पहला भाजपा के लिए है। चुनाव प्रचार कांग्रेस के पिछले दोषों और भाजपा के हारने पर क्या होता है, इसके बारे में भविष्य के प्रश्न चिह्नों पर किया गया। राज्य में आगे क्या होना है इस पर बात ही नहीं हुई। इसमें कोई संदेह नहीं है कि चौहान ने मुख्यमंत्री के रूप में असाधारण काम किए हैं। उन्होंने मध्यप्रदेश के साथ न्याय किया है। उनका चुनाव प्रचार कांग्रेस की स्पष्ट कमी के बजाए उनके भविष्य के एजेंडे पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकता था।

दूसरा संदेश भी भाजपा के लिए था। विधायकों के खिलाफ उच्च स्थानीय सत्ताविरोध था। पार्टी के कई नाम 1990 के दशक से चुनाव लड़ रहे हैं जब राज्य में पार्टी का विस्तार हुआ था। परिस्थितियाँ बदल गई हैं, मतदाता प्रोफाइल बदल गई है, लेकिन प्रतिनिधि का चेहरा नहीं बदला। कई पुराने नामों को खदेड़ दिया गया और कई नाम गायब हो गए। पार्टी ने अपने मौजूदा विधायकों में से केवल 25 प्रतिशत विधायक ही बदले- यह पर्याप्त निर्ममता नहीं थी।

तीसरा संदेश, जो भाजपा के लिए ही था, भी आत्मनिरीक्षण का विषय था। पार्टी ने यहाँ उतना अच्छा नहीं किया है जितना कि इसने परंपरागत रूप से भोपाल, इंदौर, जबलपुर और उज्जैन क्षेत्रों में किया है। 1989, जब पार्टी ने राज्य में अपनी छाप छोड़ी थी, से शहरी क्षेत्र पार्टी के मुख्य आधार-स्तंभ रहे हैं। हैदराबाद, जयपुर, रायपुर जैसे कुछ प्रमुख शहरों में पार्टी की हार भविष्य के लिए एक अच्छा संकेत नहीं है। पार्टी को इसके मूल आधार, वेतनभोगी वर्ग, मध्यम आमदनी वाले कार्यालय जाने वाले लोगों और व्यापारियों को सांत्वना देने की जरूरत है और ऐसा जल्द होना चाहिए।

केंद्र सरकार की योजनाओं के बारे में जल्द ही दुख भरी खबर लिखी जाएगी कि इन्हें मत नहीं मिल रहे हैं। मध्य प्रदेश में, भाजपा विंध्य क्षेत्र में कई सीटों पर बरकरार रही, जहाँ यह अपेक्षाकृत कमजोर रही है। इस क्षेत्र ने भी बदलाव के लिए मतदान किया- इसने अपने पूर्व कांग्रेस विधायकों को बदल दिया। भाजपा नए मतदाताओं को आकर्षित करती हुई दिखी।

बदलाव का अंतिम संदेश नोटा मतदाताओं के लिए था। कई मतदाताओं ने नोटा बटन पर क्लिक किया, उन्होंने ऐसा केवल इसलिए नहीं किया कि वे बदलाव चाहते थे बल्कि इसलिए भी किया क्योंकि वे चाहते थे कि कोई भी उनका प्रतिनिधित्व न करे। जिसके चलते भाजपा ने कुछ सीटों को नोटा वोटों से भी कम मार्जिन के साथ खो दिया। वे मतदाता जो चाहते थे कि कोई उनका प्रतिनिधित्व न करे, उन्हें नई कांग्रेस सरकार मिल रही है। यह राजस्थान के बारे में भी सच है।

तो भाजपा मध्य प्रदेश में कैसे हार गई? इसका जवाब तीन रुझानों में निहित है। पश्चिम में जनजातीय क्षेत्र (बड़वानी, धार, झाबुआ, खरगोन और रतलाम) और पूर्व में (बालाघाट, डिंडोरी, मंडला और शहडोल) ने पार्टी के खिलाफ मतदान किया। इसके बाद शहरी सीटों का नुकसान हुआ- दो भोपाल सीटें (भोपाल मध्य, भोपाल दक्षिण पश्चिम), तीन इंदौर सीटें (दिपालपुर, इंदौर -1, सनवर), और एक जबलपुर सीट (पूर्व) – जो सभी महत्त्वपूर्ण हैं। अंत में, कमल नाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया दोनों ने अपने स्वयं के क्षेत्रों को आश्वस्त किया कि वे ही अगले मुख्यमंत्री बनेंगे। छिंदवाड़ा और नरसिंगपुर क्षेत्रों ने कमल नाथ के लिए मतदान किया, जबकि सिंधिया ने चंबल क्षेत्र में प्रभावशाली समर्थन अर्जित किया।

इस नतीजे से क्या है 2019 का अर्थ?

पहले तो, 2014 से कांग्रेस ने पहली बार भाजपा को सीधे टक्कर दी है और तीन राज्यों में भी ऐसा किया है। यह पार्टी को प्रोत्साहित करेगा, जिससे अब 2019 लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल गाँधी का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ मुख्य प्रतिद्वंदी के रूप में उतरना लगभग तय है। उनके पास संभावित महागठबंधन सहयोगियों को साथ लेने या उन्हें छोड़ने की पहले से कहीं ज्यादा शक्ति होगी। विडंबना यह है कि, राहुल गाँधी की उन्नति अन्य बड़े नामों को सावधान कर सकती है क्योंकि अखिलेश यादव, ममता बनर्जी और मायावती जैसे नेताओं को यह तय करना होगा कि क्या वे दूसरे दर्जे के छोटे पदों पर रह सकते हैं या नहीं।

दूसरा, 2019 के लिए लड़ाई उतनी सरल नहीं है। अब यह कहना पर्याप्त नहीं है कि राजस्थान में 75 विधानसभा सीटें जीतने से केवल कुछ लोकसभा सीटों का नुकसान होगा। अब कांग्रेस मोदी सरकार के खिलाफ अपना जाल बिछाएगी। मीडिया में, कार्यकर्ता क्षेत्र में और ‘अधीनस्थों की रक्षा’ के लिए वैश्विक नेटवर्क में, मोदी सरकार के विरोधी मौके का फायदा उठाने के लिए एक साथ आएँगे। मोदी सरकार को कुछ हटकर सोचना चाहिए- चुनाव प्रचार में कौन से शीर्ष 2-3 मुद्दे होंगे? केंद्रीय कार्यक्रमों पर डाटा सूप ने आज तक नैरेटिव के लिए अच्छा काम किया है, लेकिन भाजपा के लिए एक और बदलाव पर काम करने का समय है।

तीसरी, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मोदी सरकार को यह तय करना होगा कि वह 2019 के संघर्ष में किसके वोट चाहती है। सरकार को हमेशा यह प्रदर्शित करना होगा कि देश में हर एक के लिए सब कुछ है। लेकिन पुनर्निर्वाचन की माँग करने वाली पार्टी को अपने मतदाताओं को बरकरार रखने और आकर्षित करने के लिए मानक विभाजन, लक्ष्यीकरण और स्थिति निर्धारण अवधारणा को लागू करना होगा। सरकार ने कहा है, अब पार्टी के लिए बात करने का समय है।

2019 का लोकसभा अभियान अब शुरू है और गेंद अब भाजपा के पाले में है।

आशीष चंदोरकर सार्वजनिक नीति, राजनीति और वर्तमान मामलों पर लिखते हैं। वह पुणे से हैं। इनका ट्विटर हैंडल @c_aashish है।