भारती / राजनीति
2024 में तीसरे मोर्चे की सरकार बनने की संभावना पर क्या कहता है गणित

क्या एक संगठित विपक्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी को लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने से रोक सकता है? इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए कुछ आँकड़ों का विश्लेषण करते हैं। वास्तविकता में कांग्रेस के अलावा कोई भी विपक्षी पार्टी अकेले 30 से अधिक लोकसभा सीटें नहीं जीत सकती है।

भले ही पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में क्रमशः तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (द्रमुक) एक भारी विजय प्राप्त कर लें लेकिन वे अपने क्षेत्र तक ही सीमित हैं। पश्चिम बंगाल में 42 लोकसभा सीटें हैं जिनमें से 22 टीएमसी ने 2019 में जीती थीं।

यदि हम सकारात्मक दृष्टिकोण भी रखें और 2021 के विधानसभा चुनावों में पार्टी का अच्छा प्रदर्शन देखें, तब भी 2024 में टीएमसी 30 से अधिक सीटें नहीं जीत सकती है। ऐसे ही तमिलनाडु में 39 लोकसभा सीटें हैं।

2021 की जीत के आधार पर यदि हम देखें जहाँ अन्नाद्रमुक की सीटों में भारी गिरावट हुई है, तो द्रमुक काफी सीटें जीत सकती है लेकिन तब भी अन्नाद्रमुक का सुपड़ा तो नहीं ही साफ होगा। साथ ही, लोकसभा और विधानसभा चुनावों को भिन्न-भिन्न मुद्दे प्रभावित करते हैं।

उदाहरण स्वरूप, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ ने नवंबर-दिसंबर 2018 में कांग्रेस को चुना लेकिन इसके पाँच माह बाद ही 2019 के लोकसभा चुनावों में भारी मात्रा में भाजपा को वोट दिया। राजस्थान की सभी 25 लोकसभा सीटें भाजपा जीती, मध्य प्रदेश की 29 में से 28 और छत्तीसगढ़ की 11 में से 9।

टीएमसी और द्रमुक के अलावा और कौन-सी क्षेत्रीय विपक्षी पार्टी है जो तीसरे मोर्चे के आँकड़ों में बड़ा योगदान दे? 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता की परीक्षा लेंगे।

लेकिन मायावती वोटकटवा की भूमिका में हो सकती हैं और सपा व कांग्रेस के गठबंधन की संभावना नहीं दिखा रही और ऐसी बहु-कोणीय प्रतियोगिता का लाभ भाजपा को 2022 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनावों, दोनों में मिलेगा।

ओडिशा में बीजू जनता दल (बीजद) को धीरे-धीरे भाजपा घेर रही है। केरल में वामपंथ, तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) और आंध्र प्रदेश में वाइएसआर कांग्रेस या तो कोई फर्क लाने के लिए बहुत छोटे हैं या बीजद जैसी पार्टी तीसरे मोर्टे से दूर भी रह सकती है, इस आशा में कि मोदी सरकार का सहयोग मिले।

अब हम आ जाते हैं महाराष्ट्र पर जहाँ शिवसेना स्वयं को सिद्ध करना चाहती है। राज्य में 48 लोकसभा सीटें हैं। यदि शिवसेना एनसीपी और कांग्रेस के साथ गठबंधन में लड़ती है तो यह काफी सीटें जीत सकती है क्योंकि तब भाजपा और महा विकास अघाड़ी (एमवीए) गठबंधन के बीच द्वि-कोणीय प्रतियोगित ही होगी।

इस प्रकार सकारात्मक दृष्टिकोण से तीसरे मोर्च की प्रमुख पार्टियों के आँकड़े यह होंगे— टीएमसी- 30, द्रमुक- 25, सपा- 10, शिवसेना- 20। कुल- 85 सीटें। एनसीपी, टीआरएस, वामपंथ, बीजद, राजद और जेडीएस की मिलाकर 50 सीटें और जोड़ लीजिए। तीसरे मोर्चे का आँकड़ा- 135 सीटें।

अब कांग्रेस को देखिए। मज़बूत क्षेत्रीय पार्टियों, जैसे महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी तथा तमिलनाडु में द्रमुक, से गठबंधन करके कांग्रेस भाजपा को हराने के लिए अपनी सीटों का त्याग करेगी। इसके बाद कांग्रेस के पास कुछ ही सीटें बच जाती हैं।

पंजाब, राजस्थान, केरल, कर्नाटक और छत्तीसगढ़ के अलावा कांग्रेस का अस्तित्व कहीं अधिक रहा नहीं है। 2019 के लोकसभा चुनाव में यह 52 सीटें जीती थी जिसमें से सर्वाधिक इसे केरल से- 15 सीटें मिली थीं। संभावना बहुत कम है कि यह दोहराया जाएगा।

तीसरे मोर्चे के अनुमानित 135 के साथ कांग्रेस के 2019 के 52 भी जोड़ दो, तब भी आँकड़ा 272 की बहुमत से काफी दूर है। हालाँकि, भाजपा को यहाँ आत्मसंतुष्ट होने की आवश्यकता नहीं है। नौकरी वाले मध्यम-वर्ग, ग्रामीण कामगारों, कुछ किसानों और प्रवासी श्रमिकों के बीच इसका आधार घटा है।

रोजगार में कमी का नुकसान भाजपा को हर जाति, वर्ग और क्षेत्र के वोट बैंक में झेलना होगा। मोदी इस बात को जानते हैं। इसलिए ही 2024 के चुनावों से पहले कैबिनेट का विस्तार और भारी फेरबदल करके एससी, ओबीसी, क्षेत्रीय नेताओं और महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया गया है।

पवार का साया

इन सब समस्याओं के ऊपर एनसीपी नेता शरद पवार की चुनौती भी है। उन्होंने एमवीए सरकार की रचना की है और रिमोट उनके हाथ में ही है- शिवसेना और कांग्रेस, दोनों जानते हैं कि एनसीपी ने समर्थन खींचा और सरकार गिरी।

भाजपा के साथ भतीजे अजीत पवार के लघु अवधि के गठबंधन की स्मृति अभी हल्की नहीं पड़ी है। पवार परिवार को ऐसी राजनीति खेलने के लिए जाना जाता है। हालाँकि सहकारिता मंत्रालय की स्थापना, जिसका नेतृत्व गृह मंत्री अमित शाह करेंगे, में एक गूढ़ संदेश निहित है-

महाराष्ट्र की सहकारी समितियों पर कांग्रेस-एनसीपी के प्रभुत्व के दिन अब गए। एनसीपी और कांग्रेस के कोष के रूप में काम करने वाली सहकारी समितियों पर पवार परिवार की पकड़ को सहकारिता मंत्री शाह ढीला करेंगे।

महाराष्ट्र और गुजरात में मज़बूत सहकारी समितियाँ रही हैं जैसे अमूल लेकिन नए मंत्रालय के प्रभाव को महाराष्ट्र की राजनीति में सर्वाधिक महसूस किया जाएगा। राज्य में 2 लाख से अधिक सहकारी समितियाँ हैं जिनसे 5 करोड़ से अधिक सदस्य जुड़े हुए हैं।

इसमें कृषि, बैंक, चीनी और दुग्ध सरकारी समितियाँ सम्मिलित हैं। सहकारी बैंकों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कई एनसीपी व कांग्रेस नेताओं का अधिकार रहता है। 2022 की शुरुआत में बीएमसी चुनाव होने हैं और 2024 में लोकसभा चुनाव, ऐसे में सहकारिता मंत्रालय का गठन किसी चाणक्य नीति से कम नहीं है।

आँकड़ों के अलावा तीसरे मोर्चे के साथ नेतृत्व की भी समस्या है। कांग्रेस भले ही सिमट गई है लेकिन विपक्षी पार्टियों में उसे ही सर्वाधिक सीटें मिलेंगी। मोदी को सत्ता से हटाने के लिए वह महाराष्ट्र मॉडल अपना सकती है और किसी क्षेत्रीय राजनेता को प्रधानमंत्री बनाने के लिए तैयार हो सकती है, यदि आँकड़े सही बैठते हैं तो।

10 जनपथ में यह तर्क दिया जा रहा है कि यदि कांग्रेस के समर्थन से 1996-98 में देवे गौड़ा और आईके गुजराल प्रधानमंत्री बन सकते हैं तो 2024 में एक तीसरे मोर्चे की सरकार में कोई क्षेत्रीय नेता क्यों प्रधानमंत्री नहीं बन सकता है?

कांग्रेस इस सरकार को रिमोट कंट्रोल से चला सकती है और जब चाहे गिरा सकती है जैसा इसने देवे गौड़ा और आईके गुजराल सरकारों के साथ किया था। हालाँकि एक समस्या है- 1996-98 में कांग्रेस के पास 140 सीटें थीं और गठबंधन पर इसका प्रभुत्व था लेकिन अब ऐसा नहीं है।

1996 से अब तक के ढाई दशकों में भारतीय राजनीति सेंटर-लेफ्ट से सेंटर-राइट विचारधारा पर आ गई है। 1996 में 165 सीटों वाले संयुक्त मोर्चा गठबंधन में वामपंथ की 44 और समाजवादी जनता दल की 46 सीटें थी जिसे बाहर से 140 सीटों वाली कांग्रेस का समर्थन मिल रहा था।

इससे सरकार 305 की सहज बहुमत से चल रही थी, जब तक कि कांग्रेस ने इसे दो बार नहीं गिराया। तब से राष्ट्रीय रूप से वामपंथ में भारी गिरावट आई है, केरल को छोड़कर। समाजवादियों को भी कम ही लोग पूछ रहे हैं।

कांग्रेस इस राष्ट्रीय विचार को न समझते हुए वाम विचारधारा की ओर और झुक गई है। परिणाम सबके सामने है- पिछले दो लोकसभा चुनावों में 44 और 52 सीटें। यदि कांग्रेस मोदी से प्रधानमंत्री पद छीनना चाहती है तो इसे सेंटर रहना होगा। यदि ऐसा नहीं होता तो तीसरे मोर्चे का प्रयोग शुरू होने से पहले ही समाप्त हो जाएगा।

मिन्हाज़ मर्चेंट लेखक एवं प्रकाशक हैं। इस लेख का अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री ने किया है।