राजनीति
सबरीमाला विवाद: हिंदुओं के लिए पराजय के अलावा और कुछ नहीं

प्रसंग
  • यह साफ है कि सबरीमाला मंदिर में युवा महिलाओं के प्रवेश को जबरन थोपने में केरल सरकार कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगी।
  • दो भागों वाले लेख के पहले भाग में, लेखक का कहना है कि उच्चतम न्यायालय के फैसले ने घटनाओं की एक विनाशकारी श्रंखला कैसे शुरू की है जिसमें किसी की जीत नहीं हुई, लेकिन हार कई लोगों की हुई और यह हारे हुए लोग हैं केरल की ज्यादातर हिंदू महिलाएँ।

सबरीमाला एक ऐसा मामला है जिसमें जीत तो किसी की नहीं हुई लेकिन हार कई लोगों की हुई। हारने वालों में सबसे ज्यादा वफादार हिंदू महिलाएँ हैं, खासकर केरल की, जिनकी धारणाओं को एक लापरवाह राज्य के द्वारा पैरों तले कुचल दिया गया। यह घटनाओं की एक विनाशकारी श्रंखला रही है, जिसके असल महत्व को हम अभी तक समझ नहीं पाए। हालाँकि, यह एक परिवर्तनकारी समय महसूस होता है, खैर अभी तक इस बारे में कुछ पता नहीं है कि यह मामला कैसे निपटेगा।

चूँकि 28 सितंबर को उच्चतम न्यायालय का फैसला ही इस समस्या की बड़ी वजह है लेकिन इसकी एक प्रबल और एक मूल वजह भी है। हम इन तीन अलग-अलग वजहों को तीन अलग-अलग साझेदारों के रूप में भी देख सकते हैं, जिसमें से कोई भी प्रशंसा का पात्र नहीं है: उच्चतम न्यायालय, केरल की कम्यूनिस्ट सरकार और भाजपा की केन्द्र सरकार।

उच्चतम न्यायालय

इसकी सबसे बड़ी वजह जनहित याचिका है जिसे न्यायालय ने बिना सोचे समझे स्वीकार कर लिया था, क्योंकि याचिका दाखिल करने वालों के पास कोई ऐसा स्पष्ट अधिकार नहीं था कि उनकी याचिका पर सुनवाई की जाए। उनमें से न तो कोई केरल का हिन्दू था और न ही पवित्र अयप्पा की भक्त महिला, जिसके पास अपनी प्रजनन आयु 10 से 50 वर्ष के बीच में मंदिर में जाने की एक वैध इच्छा होती। इसके बजाय, इस याचिका को दिल्ली के कई वकीलों द्वारा दायर किया गया था (बाद में मामला समझ में आने के बाद उन पाँच में से चार वकीलों ने अपना मन बदल लिया, लेकिन अदालत ने उन्हें याचिका वापस नहीं लेने दिया, शायद तकनीकी कारणों से, शायद अपने आप को बेहतर जाहिर करने की नियत के कारण)।

जनहित याचिका की पूरी प्रक्रिया के बारे में बहुत सारी चिंताएँ हैं, जिसमें एक अति प्रचलित वजह को सीधे अदालत से जोड़ा जा सकता है और वह है भारत के लिए इसकी अनोखी स्थिति। उदाहरण के तौर पर देखा जाए तो, अमेरिका के उच्चतम न्यायलय में इस प्रकार के मामलों को संवैधानिक मामला मानकर स्वीकार किये जाने से पहले निचली अदालतों और अपील अदालतों आदि में सालों का सफर तय करना पड़ता है। दूसरी ओर भारत में, कोई भी अपने मतलब से, बहुत सारे पैसे खर्च करके एक मशहूर वकील कर सकता है और उच्चतम न्यायालय में सीधे एक जनहित याचिका दाखिल करवा सकता है और समाज पर एक बड़े पैमाने पर होने वाले प्रभाव को नकारते हुए कुछ ही महीनों में अदालत से अपने पक्ष में फैसला ले सकता है। खैर यह ‘जन हित’ में तो बिलकुल भी नहीं है, यह मुक़दमेबाजों के लिए सिर्फ एक हथियार है।

सबरीमाला के बारे में उच्चतम न्यायालय के लिए जो सबसे सरल बात रही होगी वह होगी यथास्थिति कायम रखना। हालाँकि, निःसंदेह रूप से मौजूदा धुन तथा मीडिया द्वारा प्रभावित अदालत ने एक ऐसा फैसला सुनाना पसंद किया जो बुद्धिमत्ता से बिलकुल विपरीत है – कठोर लेकिन गैर-तरफदार होने के बजाय यह कठोर लेकिन एकतरफा है और इसमें जमीनी स्थिति को ध्यान में नहीं रखा गया।

विचार करने पर तो यह सबसे बड़ी वजह मालूम होती है; अदालत को यह जनहित याचिका खारिज कर देनी चाहिए थी, लेकिन उसने इसे एक ‘लिंग-अधिकार’ के रूप में देखा और शायद #MeToo के चलते न्यायाधीश भी यह दिखाने के लिए उत्सुक हैं कि इस नए फैशन के संबंध में वे राजनीतिक रूप से किस तरह सही हैं।

28 सितंबर को उच्चतम न्यायालय ने एक बेमेल फैसले में कहा था कि कुछ भी हो लेकिन महिलाओं को स्वतंत्र रूप से प्रवेश की अनुमति दी जानी चाहिए। लिंग समानता पर हल्का सा ध्यान देने से दो बातें पता चलती हैं – (1) अदालतों पर पाश्चात्य धुन और निमित्त का हानिकारक प्रभाव था (2) संभावना कि किसी भी तर्क पर सुनवाई करने से पहले ही अदालत ने अपना मन बना लिया था।

इस संभावना में दो चीज़ें नज़र आती हैं। तत्काल हंगामा खड़ा हुआ और हज़ारों की संख्या में केरल की सामान्य हिंदू महिलाएँ, दिखावे के ‘पीड़ित’ जिन्हें इस फैसले से राहत दी गई, ने सड़कों पर व्यापक विरोध किया क्योंकि उन्हें लगा कि कि बाहरी लोगों ने उनकी आस्था और परंपराओं पर हमला किया था।

उन्होंने कहा कि जब तक वे 50 साल की नहीं हो जातीं वे #ReadyToWait (इंतजार करने के लिए तैयार) थीं। सड़कों पर उतरी मध्यम वर्ग की हजारों साधारण माताओं और दादीयों को देखकर सबक लेना चाहिए था।

लेकिन अदालत ने उनको नजरअंदाज करना बेहतर समझा और यह जानते हुए भी कि 5 और 6 नवंबर को दीवाली के लिए मंदिर खुलेगा, 13 नवंबर को समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई करना निर्धारित किया। अगर प्रक्रिया सही थी तो समीक्षा याचिका की सुनवाई दीवाली से पहले ही होनी चाहिए थी, क्योंकि अगर एक बार कोई युवा महिला मंदिर में प्रवेश कर जाती है और परंपराओं का उल्लंघन हो जाता है तो मान्यताओं का हमेशा के लिए विनाश हो जायेगा जो भक्तों के लिए कष्ट का विषय होगा।

दरअसल, अक्टूबर में मंदिर के खुलने वाले दिन और इस महीने की शुरुआत में वहाँ पर देखने में युद्ध जैसा माहौल लग रहा था और दंगे को नियंत्रित करने की स्थिति में बड़ी संख्या में तैनात पुलिसकर्मी कुछ महिला कार्यकर्ताओं की रक्षा कर रहे थे जो न तो तीर्थयात्री थीं और न ही पूजा करने की नियत से वहाँ आई थीं। वे वहाँ पर एक मुद्दा बनाने के लिए आई थीं। इससे भक्तों के बीच गंभीर चिंता पैदा हुई जो बड़े विरोध प्रदर्शनों की वजह बनी और अराजकता फैली।

कानून और व्यवस्था की इन समस्याओं और विरोध प्रदर्शन करने वाली महिलाओं की भावनाओं से अदालत पर कोई प्रभाव न पड़ा, जब 13 नवंबर को उन्होंने बंद कमरे में समीक्षा याचिकाओं को स्वीकार कर लिया, तो अदालत अपने पहले के फैसले पर कायम न रही, जिस पर जमीनी तथ्यों का विश्लेषण करते हुए कायम रहा जा सकता था। इसके विपरीत, इन समीक्षा याचिकाओं को उन्होंने 22 जनवरी तक के लिए स्थगित कर दिया, सबरीमाला का सीजन इससे पहले ही समाप्त हो रहा है। उन्होंने साफ तौर पर कहा था कि 28 सितंबर को आने वाले फैसले में कोई स्थगन नहीं था। दूसरे शब्दों मे कहा जाए तो वे केरल सरकार को यह संकेत दे रहे थे कि सरकार महिला कार्यकर्ताओं को लाने की अपनी योजनाओं को आगे बढ़ाए, और शायद समीक्षा याचिका पर कोई गौर नहीं किया जायेगा।

निष्पक्ष पर्यवेक्षक को यह पूछने के लिए मजबूर होना पड़ा कि उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में जो फैसला दिया था उसमें कोई पैटर्न था? आमतौर पर संदिग्ध जनहित याचिकाओं के चलते। जलीकट्टू पर प्रतिबंध लगाया गया, दहीहांडी पर प्रतिबंध लगाया गया, दीवाली में पटाखे पर प्रतिबंध लगाया गया – ये सभी वैज्ञानिक साक्ष्य पर आधारित नहीं थे, लेकिन इन सभी का नतीजा था कि हिंदू प्रथाओं को नीचा दिखाया गया। एक धारणा यह है कि अदालत नरेन्द्र मोदी सरकार पर शायद राजनीति एजेंडे के साथ निशाना साध रही है। जहाँ हिन्दू भावनाएँ संपार्श्विक क्षति हैं।

केरल सरकार

एक मुख्य कारण है, जो हिंदुओं (और केवल हिंदुओं को ही) तथा विशेषकर सबरीमाला मंदिर के प्रति उत्तरोत्तर केरल सरकारों का द्वेषभाव है। 1950 के दशक की बात करें तो ईसाईयों द्वारा चारों ओर के जंगल पर कब्जा करने के लिए मंदिर (जहाँ उस समय कम ही लोग जाते थे) में आग लगा दी गई थी। इस पर तत्कालीन मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता सी केशवन ने प्रत्युत्तर दिया, “ठीक है। अंधविश्वास का एक और घर जला दिया गया।”

उत्तरोत्तर कांग्रेस और कम्युनिस्ट सरकारों ने मंदिर के साथ सौतेला व्यवहार कायम रखा है। यह मंदिर सरकारों के लिए आमदनी का जरिया रहा है, जैसा कि 1980 के दशक में और बाद में तीर्थयात्रियों की संख्या तेजी से बढ़ी और अब 40 मिलियन प्रतिवर्ष है जो कि संभवतः संसार की सबसे बड़ी तीर्थयात्रा है। सरकारें दान के राजस्व का पूरा पैसा हजम करती रहीं और उन्होंने सुविधाओं में सुधार करने के लिए कुछ भी नहीं किया।

यह अविश्वसनीय है कि तीर्थयात्रियों के लिए सुविधाओं के सुधार पर एक भी पैसा खर्च किए बिना उनसे कितना धन – लगभग सैकड़ों करोड़ प्रतिवर्ष – लूटा गया। यहाँ तिरुपति के विपरीत कोई संगठन नहीं है: प्रवेश पाने के लिए तीर्थयात्री पास खरीद नहीं सकते और कई लोग भगवान की एक झलक पाने के लिए कतार में 10-12 घंटे लगकर इंतजार करते हैं, वहाँ बहुत कम शौचालय और बाथरूम हैं जो काफी दूर हैं, धूप और बारिश से बचने के लिए पर्याप्त छाया नहीं है (नवंबर से जनवरी का मौसम अपेक्षाकृत ठंडा रहता है और पूर्वोत्तर मानसून सक्रिय रहता है)।

वहाँ भयानक दाँतों वाले, कूड़े-करकट में लोटते हुए जंगली सुअर हैं, पूरा इलाका कीचड़, गोबर, प्लास्टिक, फूल और मानव अपशिष्ट के साथ अव्यवस्थित है। कचरे के डिब्बों के पास सोते हुए और सुअरों के पास सोते हुए छोटे बच्चों के दृश्य सामने आए। ये वे लोग हैं जो पास या दूर से आए हैं, जिन्होंने 41 दिन की तपस्या की थी, उन्हें हर चीज के लिए अधिक पैसे खर्च करने पड़े और नीलक्कल स्टेशन से 20 किलोमीटर दूर पंबा तक पैदल ही जाना पड़ा और फिर मंदिर तक पहुँचने के लिए 4-5 किलोमीटर खड़ी चढ़ाई चढ़नी पड़ी। केवल भारत में ही तीर्थयात्रियों को ऐसे कष्ट उठाने पड़ते हैं।

वास्तव में मंदिर क्षेत्र अपनी वाहक क्षमता पार कर चुका है क्योंकि दशकों से यहाँ कोई निवेश नहीं किया गया है। स्पष्ट रूप से यहाँ भक्ति नहीं बल्कि वीभत्स की भावना उत्पन्न होती है, बहादुर तीर्थयात्रियों की सहन-शक्ति चौंकाने वाली है।

यहाँ की स्थितियाँ सुधारना संभाव्य से परे नहीं है लेकिन इसे पैसे की जरूरत है और उससे भी महत्वपूर्ण है ‘इच्छा’। सरकार तीर्थयात्रियों द्वारा दिया गया धन सरकारी निधि में मिला देती है। इच्छा गायब है। यह विडंबनापूर्ण है कि इस वर्ष जब पिनाराई विजयन सरकार अपने उद्देश्यों के लिए भीड़ को नियंत्रित करना चाहती थी तो वह सन्निधानम में प्रेमासक्ति को कम करने की एक प्रणाली बनाने में सक्षम रही। लेकिन इन वर्षों में वे भीड़-नियंत्रण क्यों नहीं कर सके?

केवल कम्युनिस्ट ही नहीं बल्कि उनकी भरोसेमंद कांग्रेस भी इसकी विरोधी है। केरल में, कांग्रेस ईसाई हितों को दर्शाती है, जिसमें पश्चिमी घाट की वन्य भूमि को निजी स्वामित्व वाली ईसाई संपत्तियों में रूपांतरित करना शामिल है, विशेष रूप से बागानों और रिसॉर्ट्स के रूप में। ऐसा ही एक उदाहरण है जब पिछले कांग्रेस मुख्यमंत्री ने कहा था कि उन्होंने सबरीमाला के लिए प्रस्तावित रेल मार्ग का समर्थन नहीं किया क्योंकि इस परियोजना से ईसाई भूमि को हानि पहुँचेगी !

17 नवंबर के बाद केरल सरकार द्वारा उठाए गए कदम, जब इस अवधि के लिए मंदिर फिर से खोल दिया गया, चौकाने वाले हैं। उन्होंने सन्निधानम, जो अब तक मंदिर परिसर का एक पवित्र स्थान रहा है, में पुलिस को जूते पहनने का आदेश दिया, वहाँ पुलिस की चौंकाने वाली तस्वीरें सामने आईं कि पवित्र मंदिर के सामने पुलिस कर्मियों ने डोरी पर रेनकोट सूखने के लिए डाले थे। धारा 144 लागू की गई जिसने सभी तीर्थयात्रियों को प्रतीक्षा कक्ष खाली करने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने पूरे क्षेत्र में पानी मारा था ताकि कोई चादर न बिछा सके और लेट न सके।

इसके अलावा, एक और हरकत हुई जिसका उद्देश्य सिर्फ लोगों को उकसाना हो सकता था कि मंदिर की 18 पवित्र सीढ़ियों पर कुछ पुलिसकर्मी मंदिर की ओर पीठ किए हुए खड़े थे जहां तक मुझे ज्ञात है, कार्यवाहक तंत्री ही एकमात्र व्यक्ति है जो पारंपरिक इरुमुडी के बिना उन सीढ़ियों पर चढ़ने का हकदार था। यह परंपरा का घोर उल्लंघन है।

उन्होंने तीर्थयात्रियों को गिरफ्तार करना शुरू किया जो सभी पारंपरिक तपस्या के बाद आए थे: फायरब्रांड हिंदू ऐक्य वेदी नेता शशिकला टीचर, भारतीय जनता पार्टी की विधायक उम्मीदवार सुरेन्द्रन। कई तीर्थयात्रियों को गिरफ्तार कर लिया गया और उनकी भावनाओं को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। पुलिस से झड़प में एक तीर्थयात्री घायल हो गया। अयप्पा स्तुति का जाप करने वाले लोगों को पुलिस द्वारा खदेड़ दिया गया था।

वहीं दूसरी ओर मुंबई से आई, भीड़ को उत्साहित करने वाली एक महिला की सुरक्षा के लिए एक स्थानीय हवाई अड्डे पर पुलिस का सैलाब आ गया। सरकार की सहानुभूति किधर है, यह जानने में संशय नहीं है। इस समय वे तीर्थयात्रियों के साथ अपराधियों और आतंकवादियों जैसा बर्ताव कर रहे हैं (एक ईसाई नाम वाले कम्युनिस्ट मंत्री ने तीर्थयात्रियों को आतंकवादी कहा था)।

यह सब एक सीधे से एजेंडे के संकेत हैं- मंदिर की पवित्रता भंग करना। केरल सरकार पवित्रता नष्ट करने, प्रत्येक नियम भंग करने और इसे श्रद्धा की वस्तु नहीं अपितु तिरस्कार की वस्तु बनाने की योजना बना रही है। ऐसा लगता है कि वे मंदिर को पवित्रता से रहित स्थल में बदलकर इसकी धार्मिक परंपरा और तीर्थयात्रा को नष्ट करना चाहते हैं। यह एक धर्म का दूसरे धर्म पर एक मध्ययुगीन हमले की तरह है, कम्युनिस्ट लोग हिंदुओं का अस्तित्व मिटा देना चाहते हैं।

एक कम्युनिस्ट सरकार के लिए यह करना काफी स्वाभाविक होगा, लेकिन यह बाधारहित पूजा करने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन भी है। तथ्य यह है कि इस हमले के खिलाफ कोई अपील नहीं दिखाई देती, क्योंकि अदालतें ही विरोधी हैं। इन परिस्थितियों में, यह काफी हद तक संभव है कि कुछ उत्तेजना पैदा करने वाले एजेंट प्रकाश में आ सकते हैं। योजना संभावित रूप से, सैन्य उपकरणों का उपयोग करके मंदिर को भौतिक रूप से नष्ट करने के बहाने हिंसा के साथ ब्लूस्टार जैसी स्थिति बनाने की हो सकती है।

मैंने कभी भी सबरीमाला जैसा तिरस्कार किसी भी धार्मिक स्थल के साथ नहीं देखा है। यह एक लोकतांत्रिक देश में अविश्वसनीय बात है। एक प्राचीन मंदिर, जिसके पवित्र, निहत्थे और शांतिप्रिय तीर्थयात्रियों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है, के खिलाफ संपूर्ण राज्य की शक्ति लगा दी गई है। यह साफ है कि सबरीमाला मंदिर में युवा महिलाओं के प्रवेश को जबरन थोपने में केरल सरकार कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगी। गाँधी के सत्याग्रह आन्दोलन की तरह अन्यायपूर्ण कानूनों का शांतिपूर्वक विरोध करने वाले केरल के हिंदू नागरिकों के लिए उनकी नफरत एकदम स्पष्ट है। इससे ‘रंगभेद’ और ‘तबाही’ जैसे शब्द मन में उठने लगते हैं।

राजीव श्रीनिवासन रणनीति और नवोन्मेष पर लिखते हैं, इस पर वह बेल लैब्स और सिलिकॉन वैली में काम कर चुके हैं। इन्होंने कई भारतीय प्रबंधन संस्थानों में नवोन्मेष की शिक्षा प्रदान की है। आईआईटी मद्रास और स्टैनफोर्ड ग्रेजुएट स्कूल ऑफ़ बिजनेस में वह 20 वर्षों तक एक रूढ़िवादी समीक्षक रह चुके हैं।