राजनीति
रघुराम राजन की राजनीति

आशुचित्र- आखिरी बार आपने रघुराम राजन को सोनियानोमिक्स की आलोचना करते हुए कब देखा था?

रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (आरबीआई) के गवर्नर रघुराम राजन की इस घोषणा के एक-दो दिन बाद कि वे दूसरी अवधि (टर्म) में कार्य नहीं करेंगे, तब इकोनॉमिक टाइम्स के परामर्श संपादक और जाने-माने समीक्षक स्वामीनाथन अय्यर ने दावा किया था कि राजन को जाने देकर सरकार ने बहुत बड़ी गलती की है और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश में सामूहिक एक्सोडस (निकासी) से एक भयावह स्थिति की बात की थी। “10 अरब डॉलर बाहर चले जाएँगे, या हो सकता है कि 100 अरब। शेयर बाज़ार ध्वस्त हो जाएगा, मुद्रा बाज़ार में हलचल मच जाएगी और भारत को बहुत बुरी तरह से नुकसान पहुँचेगा।”

इसके करीब भी कुछ नहीं हुआ। दूसरे आरबीआई गवर्नर भी आए और गए। और राजन के मामले की तरह ही बाज़ार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

शांति के कुछ समय बाद राजन मीडिया के समक्ष गरमा रहे हैं। और इस बार अपक्षपातपूर्ण होने का उनका ढोंग कोई गुप्त बात नहीं है।

एक टेक्नोक्रैट द्वारा नरेंद्र मोदी सरकार को अपमानित करने के प्रति कोई रोष नहीं है। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी युग में नकारे गए अवशेषों के विपरीत राजन एक पक्के खिलाड़ी हैं। मनमोहन सिंह की व्यवस्था के समय एक प्रतिभाशाली विद्वान एक चापलूस आर्थिक सलाहकार था (और बाद में आर्थिक सलाहकार का प्रमुख)। 2013 के अंत में वे आरबीआई के गवर्नर बन गए।

यह कोई आश्चर्यजनक बात नहीं होगी कि मोदी सरकार के आगमन की हवा भाँप कर एक पक्षपातपूर्ण आराम की नौकरी से उन्होंने खुद एक स्वतंत्र संस्था में स्थानांतरण की माँग की होगी। और अगर यह सत्य है तो उनकी लोकतांत्रिक बुद्धिमत्ता की जय।

भारत के केंद्रीय बैंक के संचालन में वे अचानक साहस जुटाकर भारतीय अर्थव्यवस्था के निदान-विशेषज्ञ बन गए। विडंबना यह है कि राजन एक अर्थाशास्त्री व प्रधानमंत्री के अधीन विकसित किए और भरे गए थे जिनके 2008 से वे सलाहकार थे।

संयोगवश, यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (यूपीए) के साथ उनका संबंध पब्लिक सेक्टर बैंकों की बढ़ती अनर्जक परिसंपत्तियों (एनपीए) के साथ बढ़ा। उनके पास हर समस्या का समाधान है लेकिन वे तब क्या कर रहे थे जब उनके पास इनका निपटारा करने का अवसर था।

आरबीआई में उनके कार्यकाल के दौरान उन्होंने लगातार खतरे की घंटी की बात कहकर सरकार को शर्मसार किया जिसके वे स्वयं भी अंग थे। इस विषय में प्रचलित राय विभाजित हो सकती है, कुछ मान सकते हैं कि वे बेहतरी के लिए उपदेश-मंच को सृजनात्मक तरीके से चला रहे थे और कई इसे उनका अव्यवसायिक रवैया मान सकते हैं लेकिन उनकी बातचीत का प्रभाव सरकार पर पड़ता है। हालाँकि सरकार एक वाचाल बैंकर, जो मोदी-आलोचकों की मीडिया के हाथों की कठपुतली है, की बात से ज़्यादा अचंभित नहीं हुई।

कांग्रेस-समर्थक न्यूज़ चैनलों में उनकी उपस्थिति ने वर्तमान सरकार से उनके खराब व्यवसायिक संबंधों को सिद्ध कर दिया है। पिंक प्रेस के चीयरलीडर्स जिन्होंने राजन को वित्तीय उपदेशक तब ही माना जब वे उनका प्रधानमंत्री पर हमला करने के लिए प्रयोग कर सकते था, इससे राजन की छवि को और नुकसान पहुँचा है। लेकिन दो साल पहले विनम्रतापूर्वक कहे जाने के बाद कि उनकी सेवाओं की अब आवश्यकता नहीं है, वे गुटबाज़ों का मनोरंजन करने के लिए आते रहते हैं। जिन्हें राजन से सहानुभूति है, वे उन्हें एक उपयोगी मूर्ख की तरह देखकर प्रसन्न होते हैं। राजन भी स्थापना के मूर्खों का प्रयोग अपने हित के लिए करते होंगे। अवश्य ही वे उनसे अधिक होशियार हैं।

हाल ही में केंद्रीय रेल मंत्री पीयुष गोयल ने इस बात की ओर संकेत किया था। राजन के लिए उन्होंने कहा, “वे राजनीतिक करियर की ओर रुख कर रहे हैं, जिसकी वे जल्द ही घोषणा करेंगे।” राजन के निर्दयी उपलक्ष्यों के बावजूद, प्रधानमंत्री समेत अन्य वरिष्ठ नेता उनके विषय में सम्मानजनक बाते ही कहते हैं। मोदी, जो इस बात पर यकीन करते हैं कि उनके धक्का दिए बिना विरोधी खुद ही गड्ढे में गिर जाएँगे, ने न सिर्फ राजन पर व्यक्तिगत हमलों को अनुपयुक्त बताकर इसका तिरस्कार किया है बल्कि राजन की राष्ट्रभक्ति पर सवाल उठाते खुद की पार्टी के सांसद सुब्रमणियन स्वामी का विरोध भी किया है। जब राजन ने पद त्यागा था, तब वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी राजन के विषय में अच्छी बातें ही कही थीं लेकिन हाल ही में उन्होंने भी राजनीति की दृष्टि से सही तरीके से राजन पर पलटवार किया। लेकिन गोयल की टिप्पणी इस बात की ओर संकेत कर रही है कि पार्टी उनके उपदेशों का खंडन करेगी।

राजन की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा समझकर गोयल ने सही निसाना लगाया है। क्या राजन यह सोच रहे हैं कि यदि 2019 में कांग्रेस सरकार आती है तो वे राहुल गांधी के वित्त मंत्री बन सकते हैं? पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम पर कई मामलों में जाँच चल रही है तो उनका गणित गलत नहीं है। अगर गांधी चुनाव जीते और वे एक टेक्नोक्रैट को इस पद पर लाने का सोच रहे हैं जिससे उनके डरपोक निवेशकों को राहत मिले तो राजन उपयुक्त व्यक्ति हैं।

मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना और इससे पूर्ववर्ती सरकारों के प्रति उनका रवैया विरोधाभास उत्पन्न करता है। सोनियानोमिक्स पर उनकी रणनीतिक चुप्पी सब बयान करती है। वे राहुल गांधी को उपदेश देते हुए नज़र नहीं आते हैं जो अपनी सत्ता लालसा के लिए देश की वित्तीय व्यवस्था के प्रति गैर-ज़िम्मेदाराना हो रहे हैं। गांधी के वित्तीय विचारों, जिनमें कर्ज़माफी और मनरेगा से रोज़गार के अलावा और कुछ नहीं है, के प्रति राजन की चेतावनी कहाँ है। यह आश्चर्यजनक नहीं है। मीडिया से लेकर शिक्षाविदों और सक्रिय कार्यकर्ताओं तक, क्या कांग्रेस समर्थकों की कार्य प्रक्रिया एक-सी नहीं है- कांग्रेस से बातचीत में डॉ जेकिल बन जाएँ और भाजपा के साथ डॉ हाइड?

उनकी दुर्जेय विद्वता और नीति स्थापना में दशक भर के उनके अनुभव से यह अपेक्षा की जाती है कि जिसमें वे आजकल आनंद ले रहे हैं, उन आलोचनाओं और कथनीय समाधानों से आगे बढ़कर वे कुछ सुझाव दें। हाल ही में उन्होंने प्रख्यात भारतीयों और प्रवासी भारतीय अर्थशास्त्रियों के साथ मिलकर “भारत के लिए आर्थिक रणनीति” शीर्षक से कुछ दस्तावेज़ जारी किए। ये दस्तावेज़ धर्मोपदेश देते हैं और कोई प्रयोगात्मक समाधान नहीं सुझाते।

एक जन प्रबुद्ध की दृष्टि से राजन के पास आर्थिक बातचीत के लिए बहुत कुछ है पर अब वक्त है कि वे अपने अपक्षपातपूर्ण होने का चोगा त्याग दें।