राजनीति
‘दक्षिण भारत के संघटित राज्यों’ के विरुद्ध नैतिक और तार्किक पहलू

प्रसंग
  • केंद्र से राज्य तक वित्तीय संसाधनों का हस्तांतरण लगातार रस्साकशी बना हुआ है, लेकिन दक्षिण भारत के संयुक्त राज्यइसका समाधान नहीं है।
  • अर्थशास्त्र और विद्वेष के आधार पर यूएसएसआईको मिथ्या समझना गलत होगा।

आयरिश कनाडाई लेखक एम्मा डोनोगुए (‘हूड’और‘रूम’ की लेखिका) ने एक बार कहा,”पहचान की राजनीति कमजोर है, एक लेखक के रूप में आप किसी एक समूह के लिए बोलना  नहीं चाहते। डोनोगुए पहचान की राजनीति की आवाजों में से एक हैं। जबकि राजनीति में पहचान की राजनीति एक या दूसरे रूप में अभी भी स्वयं राजनीति के रूप में मौजूद है, मानव अवलोकन के सभी क्षेत्रों में, भाषण और व्यापकता में, इसकी परिपूर्णता आज के दौर मे निश्चित रूप से उच्च होनी चाहिए।

1947 के बाद से विभिन्न समूहों द्वारा भारत में भी प्रचलित पहचान की राजनीति को महामारी माना जा रहा है। ऐसा 2014 के आम चुनावों में मोदी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय लोकतंत्रीय गठबंधन को विपक्ष द्वारा ठुकराने के बाद समझा जा रहा है।जुलाई 2016 के इस आलेख में, जो केरल बाढ़ के बाद चर्चा में  फिर से वापस आया, दक्षिण भारतीय राज्यों को केंद्र से बेहतर सहायता पाने के लिए हाथ मिलाकर शामिल होने के लिए कहा गया है, जो पहचान की राजनीति के पेशावरों की कई विभाजक आवाजों में से एक है। इसके मामले का समर्थन करने के लिए यह लेख निम्नलिखित बिंदुओं पर मंथन करता हैः

  1. दक्षिण भारतीय राज्यों ने अपने उत्तर भारतीय प्रतिरूप की तुलना में सभी मानव विकाससूचकांकों पर बेहतर प्रदर्शन किया है।
  2. करों केभुगतान के माध्यम से अच्छा योगदान देने के बावजूद, दक्षिण भारतीय राज्यों के साथ लंबे समय से केंद्र सरकारों द्वारा सौतेला व्यवहार किया जाता रहा है।
  3. दक्षिण भारतीय राज्यों को “संयुक्त राज्य के दक्षिण राज्य” (इसे अब ‘यूएसएसआई’ के रूप में संदर्भित किया जाता है) में हाथ मिलाकर संघ की तरह केंद्र सरकार पर दबाव डालने की जरूरत है ताकि वे उनके अच्छे प्रदर्शन के लिए उन्हें अर्थदंड देना बंद कर सकें और उन्हें करों का उचित हिस्सा दें।

हालांकि इस लेख में ये कहा गया है कि दक्षिणी राज्य उत्तरी राज्य को माली मदद देते हैं, जो सच्चाई से कोसो दूर है; ये ऐसे किसी भी मान्यता का प्रसार नहीं करता ।

 

इस दावे पर अगर तर्क करने का कोई और प्रयास किया जाए तो यह स्वीकार करना होगा कि ऐसी परिस्थिति में जहां ऐसे दावे डेटा और सबूत पर आधारित होते हैं,’दक्षिण भारत के संयुक्त राज्य’ (यूएसएसआई) के लिए मामला नैतिक और व्यावहारिक रूप से मान्य है।

लेख के बुनियादी आधार के बारे में चर्चा शुरू करने से पहले आइए इन दो मुद्दों पर बात करें।

सबसे पहले यू एसएसआई के विचारों में मतभेद के बारे में बात करते हैं जिसमें कई राज्यों को शिकायत है कि उन्हें उनका हिस्सा नहीं मिलता, जो अस्वीकार करने जैसा नहीं है। मैं महाराष्ट्र का रहने वाला हूँ; आपकी बात को सुनने के बाद ही मैं कुछ कह रहा हूँ।

दूसरा बहुत ही व्यावहारिक मुद्दा है- कि ऊपर दिए गए लेख में एकीकरण के लिए चिह्नित पाँच राज्यों में से दो, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना ने वर्तमान में केंद्र से विशेष श्रेणी की स्थिति (एससीएस) की मांग की है। यहाँ तक कि तेलुगू देशम पार्टी, जो आंध्र प्रदेश पर शासन कर रही है, इस मांग पर एनडीए गठबंधन से बाहर हो चुकी है। एससीएस के आवंटन के पीछे कुछ प्रमुख मानदंड, जैसे कम संसाधन/ आर्थिक और आधारभूत संरचना का पिछड़ापन और राज्य के वित्त की अव्यवहार्यपूर्ण प्रकृति हैं। एक अन्य मंच पर लेखक ने चर्चा करते हुए एक टैगलाइन के साथ लेख लिखा है। टैगलाइन इस प्रकार है – ‘आंध्र प्रदेश छिन्न-भिन्न हो गया है, उसका खजाना खाली हो गया है और उसे एक विराम की जरूरत है’।

अगर यूएसएसआई समर्थक वर्ग आंध्र प्रदेश और तेलंगाना को अपने साथ मिलाना चाहता है तो उन्हें पहले इस परस्पर विरोध को समाप्त करना होगा। क्या आंध्र प्रदेश और तेलंगाना अल्प संसाधन आधार से त्रस्त हैं और इसलिए केंद्र से विशेष राहत चाहते हैं, या वे एक शक्तिशाली और अनोखे गठबंधन का हिस्सा हैं,जो उत्तर भारत के टैक्स के संगत भाग को टैक्स मनी में मिला देता है। अगर यह केंद्र सरकार से राहत चाहते हैं तो निश्चित रूप से यूएसएसआई को इन दोनों राज्यों को इनके कम अपेक्षित मूल सिद्धांत के अनुरूप बने रहने के लिए छोड़ देना चाहिए। यदि ऐसा नहीं है तो इन राज्यों में वर्तमान विवादों को सुलझाने की जरूरत है, समृद्ध होने के बावजूद भी वे अपने संसाधनों के एक बड़े भाग पर तर्क करने के लिए केंद्र पर दबाव डालने का प्रयास क्यों कर रहे थे।

गुणवत्ताहीन आश्रितों के विरोधियों का तर्क इतना घिसा पिटा है जितनी कि पहचान की राजनीति। वैचारिक विभाजन के तरफ के लोग योग्यता को ठप्पे के रूप में या विशेषाधिकार के प्रमाण के रूप में सफलता को देखते हैं। यह कम से कम इन परिस्थितियों में स्वीकार है लेकिन वांछनीय नहीं है। साथ ही जिस प्रकार तर्क दिए जा रहे हैं वह स्वीकार नहीं है।

लेखक, जो यहाँ दक्षिण भारत के विकास को प्रदर्शित कर रहा है, इसके सफल शासन और सक्षम नीति बनाने के एक प्रमाण की बात पर तर्क देता है,“ उच्च वर्ग आरक्षण के कारण अपनी योग्यता में होने वाली हानि के लिए शोरगुल मचा सकते हैं लेकिन वास्तविक रूप में भारत ने सामाजिक रूप से स्वीकृत जातिवाद के कारण हजारों वर्षों के लिए योग्यता और मानव क्षमता का एक परिमाण खो दिया है, जिसका कोई पूर्वानुमान नहीं था।”

विवरण पर आधारित स्थिति का ऐसा परिवर्तन वामपंथियों के लिए नया नहीं है। आपको भी एक बार योग्यता और अच्छी शासन प्रणाली के परिणामस्वरूप समृद्धि और विकास सूचकांक का दावा करने के दुस्साहस पर आश्चर्य करना होगा और फिर दूसरे रूप में अत्याचार तथा खोए हुए अवसरों के प्रमाण  में इसका प्रयोग करना होगा। इन तार्किक असमानताओं के अतिरिक्त,यूएसएसआई के मामले में चार समस्याएं हैं- अंतरंगता, नैतिक खतरे, अस्थिर झुकाव और प्रतिशोध। आइए अब इनके बारे में जानते हैं।

आधुनिक दुनिया में पहचान की राजनीति का लगभग हर आंदोलन अंतरंग संपत्ति पर धाक जमा चुका है। अंतरंगता एक दर्शन है जो कि वामपंथियों द्वारा लोकप्रिय की गई है , यह लोग पहचान की राजनीति के सबसे मुखर ध्वजवाहक हैं और प्रत्येक मानव कर्म को दमनकारी नजर से देखते हैं। यूएसएसआई के मामले में केंद्र,उत्तर भारत की शांति के साथ सौतेला व्यवहार करता है और दक्षिण के टैक्स देने वाले राज्य इसके शिकार हैं। सोच के इस तरीके के साथ समस्या यही है कि एक बार अगर इसे शुरू कर दिया तो रोकना मुश्किल है।

इसलिए यदि समृद्ध राज्यों का समूह गरीब राज्यों के साथ कदम मिलाकर नहीं चल सकता है, तो क्या उस समूह के सबसे अमीर राज्य द्वारा चार अन्य राज्यों को आर्थिक सहायता दी जानी चाहिए? इसके अलावा, शहर राज्य के टैक्स के एक बड़े भाग का भुगतान करते हैं, तो उन्हें छोटे शहरों और गांवों को आर्थिक सहायता क्यों देनी चाहिए?प्रत्येक राज्य में विपक्ष द्वारा इन दोषपूर्ण नीतियों का शोषण किया जाना निश्चित है।यह उत्पीड़न राजनीति केवल तभी समाप्त हो सकती है जब ऐसी संरचना आंतरिक रूप से नष्ट हो।

एक गंभीर समस्या जो मुझे सबसे अधिक परेशान करती है वह है नैतिकता। सभी धार्मिक आवेशों को छोड़कर,यूएसएसआई के लिए यह तर्क अनिवार्य रूप से टैक्स खजानों में अंशदान द्वारा निर्धारित सरकारी संसाधनों पर दावे के बारे में है।यह उत्पादकता के आधार पर द्वितीय श्रेणी के नागरिकों का एक वर्ग बनाने की बुनियाद रखता है।यह विडंबना है कि इस आर्थिक सक्षमता की जड़ों को नाज़ीवाद में वापस देखा जा सकता है, हालांकि  इस बात का ध्यान रखते हुए कि कितने और नाजीवाद की भेंट चढ़ेंगे क्योंकि नाजीवाद ने विकलांगता और कमजोरी को नैतिक दोष के रूप में देखा।

यूएसएसआई के सदभ मे तर्क करना बहुत आसान है। यदि आप विशेष हितों  का संघ बनाने के लिए भौगोलिक निकटता को वैध मानते हैं तो अन्य विशेष हित के समूहों को गठित होने से कौन रोकता है। यूएसएसआई द्वारा किए गए दोनों तर्क – गरीब महिला सशक्तिकरण के परिणामस्वरूप तेजी से बढ़ती जनसंख्या और अधिकतम कर योगदान, धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ जा सकती है।।ऐसे मे हम एक देश के रूप में इस सब पर प्रतिक्रिया कैसे दे सकते हैं।

क्या जाति के रूप में पुरुष समूह बना सकते हैं और सरकार से यह मांग कर सकते हैं कि वह उनपर अधिक पैसा खर्च करे? क्या देश के 1,000 शीर्ष व्यक्तिगत आयकरदाता एक साथ मिलकर सरकार से यह मांग कर सकते हैं कि उनके पैसे का उपयोग गरीबों को मुफ्त शिक्षा देने के लिए न किया जाए? अगर हम तर्क वितर्क ही करते रहेंगे तो इन स्थितियों को कैसे रोक सकते हैं?

एक और व्यावहारिक स्तर पर,यूएसएसआई समर्थकों ने इस संभावना के बारे में नहीं सोचा कि देश के भीतर एक प्रकार का संघ बनाना केवल उसी तरह के संगठनों को गठित कर सकेगा जो उदासीन तरीके से कार्य  करेगे। क्या होगा यदि भारत के संगठित गैर-दक्षिण भारतीय राज्यों का गठन किया जाए?क्या होगा यदि इस तरह के निकाय मांग करें कि सशस्त्र बलों और अर्धसैनिक बलों के राज्यानुसार डेटा तैयार किए जाए। जिन राज्यों ने पर्याप्त श्रम शक्ति में योगदान नहीं दिया गया है, उन्हें  अनिवार्य रूप से भर्ती के लिए कार्यकलापों जैसे मसौदे आयोजित करने के लिए मजबूर होना पडेगा?

इतिहास गवाह है कि गरीब लोग सशस्त्र बलों में भर्ती के मामले में असमान रूप से पीड़ित हैं। क्या ऐसे मामले में यूएसएसआई के सदस्य अपने गरीबों को समझाने के इच्छुक हैं अगर उन पर एक मसौदा लगाया गया हो? उद्योग वहीं के होने के कारण दक्षिण टैक्स के खजाने में योगदान दे रहे हैं, जो पूरे देश में अपने उत्पादों / सेवाओं को बेचते हैं। यूएसएसआई आर्थिक लाभ का फायदा उठाने की इच्छा रखता है, यदि अन्य,अधिक जनसंख्या वाले राज्य का फैसला है कि उन्हें उपभोक्ता लाभ का फायदा उठाना चाहिए और यूएसएसआई से संबंधित राज्यों पर जुर्माना, सेस और कर लगाना चाहिए?अगर महाराष्ट्र सभी दक्षिण भारतीय भाषाई फिल्मों पर 300 प्रतिशत मनोरंजन कर लगाने का फैसला करता है तो ‘बाहुबली 3’ बनाने वाले उत्पादक कहने के लिए कितने पैसे कमाएंगे?

यह केवल अपरिहार्य नहीं है बल्कि पूरी तरह से अवांछनीय भी नहीं है कि केंद्र से राज्य तक वित्तीय संसाधनों का हस्तांतरण राज्यों और केंद्र और राज्यों के खुद के बीच एक रस्साकस्सी बना हुआ है। यह गंभीर मुद्दा है जो राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ-साथ कूटनीति दोनों के मामले में नेतृत्व का परीक्षण करता है।

इस बात को सुनिश्चित करने के लिए कि आपको बेहतरीन परिणाम मिले, पेशेवरों से राय लेना समझदारी है।अर्थशास्त्र और पड़ोसी राज्य के लोगों को गलत समझने की वजह से हम अपना नुकसान नहीं कर सकते।

लेखक निवेश सेवाओं में पेशेवर और उपन्यासकार हैं। उनके नवीनतम उपन्यास द डार्क रोडको जुगर्नॉट प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया था।