राजनीति
2019 चुनावों में जीत के लिए मोदी के नाम में अनुपस्थित “म” मैसेज है, न कि मशीन
आशुचित्र- मोदी तब ही सफल होंगे जब वे अपने संदेश को रूपांतरित कर उसे जीएँगे और सामान्य वाकपटुता से पीछे हटे बगैर इसका उपयोग करेंगे।
अगर चुनावी पंडितों को यह लगने लगा है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) को 2019 में बड़े चुनावी उलटफेर का सामना करना पड़ेगा तो इसका संबंध सरकार के प्रदर्शन या गैर-प्रदर्शन से कम है बल्कि यह स्पष्टता की कमी है कि वे क्यों फिर से चुने जाने की मांग क्यों कर रहे हैं। हालाँकि विपक्ष का अपना संदेश स्पष्ट है- कोई भी लेकिन मोदी नहीं क्योंकि उनके हिसाब से मोदी के विजय रथ का टायर अब पंचर हो चुका है और वह लंगड़ा कर चल रहा है।
जहाँ चुनाव में वोट मोदी या उनके खिलाफ होगा, वहीं मोदी सक्रिय नज़र नहीं आ रहे। इसका मतलब यह नहीं है कि प्रधानमंत्री रोज़ाना बैठकों को संबोधित नहीं कर रहे हैं लेकिन इससे भी बड़ी अलौकिक सच्चाई यह है कि 2014 वाला मोदी गायब है।
अपनी चुनावी भविष्यवाणियों को पूरा करने के लिए पंडित नौकरियों और विकास जैसे जीविकोपार्जन मुद्दों के अलावा जाति, नेतृत्व छवि और संगठनात्मक ताकत जैसे कारकों को अत्यधिक महत्त्व देते हैं। इसलिए उनकी वर्तमान गणना इस बात के इर्द-गिर्द घूम रही है कि क्या मोदी की छवि और अमित शाह की चुनावी मशीन बड़े चुनाव से पहले डगमगा रही है। मोदी उत्साह को बढ़ाने के लिए खुद अपने बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते रहे हैं लेकिन किसी को यकीन नहीं है कि वे सफल होंगे।
पार्टी के अधिकांश प्रवक्ता 2019 में जीतने की पार्टी की क्षमता पर बहुत विश्वास नहीं कर रहे हैं। यह तथ्य है कि कुछ पहले के मज़बूत समर्थक भी नोटा (उपरोक्त प्रत्याशियों में से किसी को न चुनना) की वकालत कर रहे हैं जो मोदी के लिए चिंता का कारण होना चाहिए। आप ऐसा चुनाव नहीं जीत सकते हैं जहाँ आपके समर्थकों में उत्साह की कमी हो। यह कुछ ऐसा है जिसे मोदी को व्यक्तिगत रूप से उन्हें खुद संबोधित करना होगा न कि नमो ऐप की फ़िल्टर प्रक्रिया या अमित शाह की पार्टी मशीन के माध्यम से। मोदी को अपने संदेश पर ध्यान केंद्रित करके मशीन से बड़ा उभरना होगा।
कई कारक चुनावी सफलता में योगदान देते हैं लेकिन एक असाध्य घटक नेता की स्वयं की जादुई छवि और मतदाताओं को परेशान करने वाले मुद्दों को शीर्ष पर रखने की उनकी अपनी समझ है जो उन्हें दूसरों से अलग बनाता है। एक मोदी बनाम बाकी वाले इस चुनाव में निर्णायक इस बार मोदी की जादुई छवि होगी ना कि शाह की चुनाव मशीन होगी।
चुनाव मशीनों से नहीं बल्कि संबंधित पार्टियों या उनके नेताओं द्वारा जनता को दिए संदेश और अपील से जीते जाते हैं। पार्टी असहमत हो सकती है लेकिन इस बार मोदी का संदेश कमज़ोर और विकृत नज़र आ रहा है। इस बार ऐसा कुछ नहीं है जिस पर मतदाता आसानी से अपना ध्यान केंद्रित कर सके।
2014 में मोदी खुद बदलाव का संदेश दे रहे थे इसलिए उनका कैडर उत्साही था और वे बहुमत से जीते। 2015 में अरविंद केजरीवाल और नीतीश कुमार ने खुद को संदेश बनाया जिसमें पहले ने 2014 में समय से पहले इस्तीफा देने में अपनी गलती के लिए माफी मांगी और दूसरे ने खुद को एक ऐसे नेता के रूप में स्थान दिया जो धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों पर काम करता है और एक व्यापक प्रतिनिधित्व जातियाँ और वर्ग में स्वीकार्य है।
पाँच साल बाद 2019 में मोदी का संदेश 2014 की तरह नहीं हो सकता है क्योंकि हमें इस बात को शामिल करना होगा कि इस बीच मतदाताओं ने वास्तव में क्या अनुभव किया। इस संदेश में दो बातों पर ध्यान केंद्रित करना होगा- पहला यह कि अब तक मोदी ने क्या दिया है और दूसरा यह कि अगले पाँच वर्षों में वे क्या देने का वादा करेंगे। इसका मतलब यह है कि पहले कार्यकाल की सफलताओं और असफलताओं को भविष्य के वादों के साथ बिना किसी बाधा या चूक के बुना जाना चाहिए।
एक बेईमान प्रयास की तुलना में जहाँ नौकरियों और आय के श्रेष्ठ होने का झूठा दिखावा है, वहाँ मोदी की एक ईमानदार स्वीकृति बेहतर है जिसमें मोदी की कुछ पहलों ने काम भले ही नहीं किया हो फिर भी मतदाता मोदी के प्रति विश्वास बनाए रख सकते हैं। अगर नारा “साफ नीयत, सही विकास” है तो ‘नीयत’ को सही मानना गलत होगा यदि उम्मीदवार अपनी विफलताओं की ज़िम्मेदारी नहीं उठाना चाहता।
जब हम इस तर्क को इसकी अनिवार्यता से काट देते हैं तो यह एक बात पर खरा उतरता है कि इस बार मोदी को अपनी नियति को खुद ही संभालना है और इसे पार्टी या प्रचार मशीन पर नहीं छोड़ना चाहिए जो शाह वैसे भी चला लेंगे। मोदी को अपने बड़े संदेश पर ज़ोर देना होगा क्योंकि मशीन खुद का ख्याल रख सकती है। यहाँ प्रशांत किशोर या प्रवीण चक्रवर्ती जैसे डाटा विश्लेषक और रणनीतिकार की बात नहीं हैं जो अपनी पार्टियों के लिए चुनाव जिताते हैं और यहाँ तक ​​कि बात शाह की भी नहीं जो अपने पन्ना प्रमुखों और बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं के साथ चुनाव जितातें हैं। चुनाव में विजय मुख्य रूप से मोदी के प्रभावी संदेश पर निर्भर करता है जिसमें उनकी शारीरिक भाषा भी शामिल है।
मोदी को जिन विषयों पर ध्यान देना चाहिए वे निम्नलिखित हैं-
एक, साफ़ नीयत कीमत मागती है और सही विकास एक अंतराल के बाद ही आएगा। मोदी को सरल शब्दों में यह समझाने की आवश्यकता है कि नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) ने क्यों आज अर्थव्यवस्था और लोगों के सामने दिक्कतें खड़ी की हैं लेकिन थोड़े ही दिनों बाद वही लंबे समय तक फायदा भी देते रहेंगे। कर अनुपालन में सुधार और काले धन को खत्म करने का कोई भी प्रयास कम समय में हर किसी के लिए दिक्कतें बढ़ा देता है पर यह सिर्फ कुछ समय के लिए ही होता है। वृद्धि तभी आ सकती है जब अनुपालन दृष्टिकोण में इस विवर्तनिक बदलाव से राजस्व वास्तव में उच्च राजस्व में बदला जा सकता है जिसका उपयोग निवेश, विकास और नौकरियों को बढ़ावा देने के लिए किया जा सकता है।
दूसरे कार्यकाल की संभावना के साथ पहले कार्यकाल को जोड़ते हुए मतदाताओं को यह बताना होगा कि पहला कार्यकाल भले ही उनके लिए व्यवधानों का कारण बना लेकिन दूसरा कार्यकाल उन्हीं के बलिदान का फल होगा जो उन्होंने पहले कार्यकाल में दिया था। मतदाता जानते हैं कि विपक्ष के पास बेहतर जवाब नहीं है और इसलिए शायद वे एक ऐसे नेता पर भरोसा करेंगे जो सच्चाई को छिपाता नहीं है और जो दिखावा नहीं करता है कि कोई समस्या नहीं है। राजनेताओं को सीमाओं या विफलता को स्वीकार करना कठिन लगता है लेकिन जोखिमों के बावजूद मोदी आंशिक विफलता को एक लाभ में बदल सकते हैं क्योंकि इससे कम से कम साफ नीयत का दावा सही साबित होगा। पूरी तरह से सही विकास दूसरे कार्यकाल में पूरा हो सकता है और इसकी झलक पहले से ही दिखाई दे रही है।
दूसरा विषय जो साफ दिखाई दे रहा है कि राहुल गांधी का “चौकीदार चोर है” का चुनावी रोना कहीं न कहीं निरंतर पुनरावृत्ति के माध्यम से कुछ ध्यान खींचता प्रतीत हो रहा है। मोदी ने वास्तव में इस ओर इशारा किया है कि चोरों को अपनी डकैती जारी रखने के लिए पहले चौकीदार को हटाने की ज़रूरत है। इस विषय को केंद्रीय बनने की ज़रूरत है और भारतीय जनता पार्टी को नारा देना चाहिए कि “उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे”।
प्रधानमंत्री जानते हैं कि गांधी परिवार कई संदिग्ध कार्यों (नेशनल हेराल्ड, अगस्ता वेस्टलैंड, एट अल) के लिए दोषी है और उन्हें अनुचित राजनीतिक नौटंकी के बिना इन विषयों पर ज़ोर देने की ज़रूरत है। उन्हें सरल शब्दों में यह समझाने की ज़रूरत है कि गाँधी विस्तृत परिवार और प्रमुख पार्टी समर्थकों जैसे रॉबर्ट वाड्रा से लेकर पी चिदंबरम के बेटे कार्ति तक ने गलत काम किया है। ‘मिशेल मामा’ भले ही मज़ाकिया लग सकता है लेकिन बड़े पैमाने पर मतदाताओं को इसका कोई मतलब नहीं पता है। उन्हें अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ आरोपों की व्याख्या करनी होगी न कि उनका केवल सिर्फ मखौल उड़ाना होगा।
तीसरा विषय स्पष्ट रूप से शुरू की गई योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करना है और जो दूसरे कार्यकाल में फलित होंगी। ये जन-धन बैंक खाते, उज्ज्वला गैस कनेक्शन सब्सिडी योजना, अंतिम गाँव के सुदूर गाँवों का विद्युतीकरण, स्वच्छ भारत के तहत ग्रामीण शौचालय-निर्माण, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में घर-निर्माण के लिए ब्याज सबवेंशन, आयुष्मान भारत चिकित्सा बीमा योजना हो सकते हैं और किसानों या मध्यम आय वर्ग के लिए भविष्य में लाभ की योजनाएँ जिन्हें 1 फरवरी के अंतरिम बजट में घोषित किया जा सकता है।
लेकिन महत्त्वपूर्ण बिंदु यह है कि मतदाता को समझाना होगा कि सरकार परिवर्तन से नहीं बल्कि सरकार में निरंतरता से पूर्ण लाभ होगा क्योंकि सरकार बदलने से वह बाधित होगा जो कुछ पहले से चल रहा है। बेशक यह इस संदर्भ में है कि मोदी को खुद को स्थिर नेता के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए जहाँ पर दूसरी पसंद एक अव्यवस्थित गठबंधन है जिनको अर्थव्यवस्था में जो कुछ भी अच्छा हो रहा है उसे बाधित करेंगे।
इन विषयों के आसपास मीम और कार्टून विकसित किए जा सकते हैं और पार्टी एक मिनट की फिल्मों और वीडियो में वास्तविक लाभार्थियों के बारे में सकारात्मक कहानियाँ भी बता सकती है जिन्हें प्रचार सामग्री के रूप में व्यापक रूप से प्रचारित किया जा सकता है।
मोदी तब ही सफल होंगे जब वे अपने संदेश को रूपांतरित कर उसे जीएँगे और सामान्य वाकपटुता से पीछे हटे बगैर इसका उपयोग करेंगे।
मोदी के लिए सबसे बड़ी चुनौती आंतरिक है कि उन्हें पार्टी मशीन और अपनी ही पार्टी के भीतर की मंडली से मुक्त होना होगा और पार्टी कार्यकर्ताओं और वैचारिक समर्थकों से सीधे बात करनी होगी, उन्हें आश्वासन देना होगा कि उनके लिए अभी और भविष्य में दरवाज़ें खुले रहेंगे। यह संदेश वह है जो अमित शाह की पार्टी मशीन में विभिन्न तत्वों को बूथ तक उत्साहपूर्वक ले कर आएगा। अपनी वैचारिक बिरादरी के लिए उन्हें यह आश्वासन देना होगा कि उनके दूसरे कार्यकाल में उनके एजेंडे के कुछ तत्व शामिल होंगे जो प्रकृति में नकारात्मक रूप से सांप्रदायिक नहीं होंगे।
मोदी को यह संदेश मतदाता तक खुद पहुँचाना चाहिए और वे सिर्फ पार्टी मशीन पर निर्भर ना रहें। मोदी में ‘म’ की अनुपस्थित एक मैसेज है जो अब तक भ्रमित और रक्षात्मक है और प्रधानमंत्री के हाव-भाव से उनकी पार्टी की संभावनाओं के बारे में चिंता का संकेत मिलता है। मतदाता अपनी इच्छानुसार मतदान करेगा लेकिन उसे कम से कम यह जानना चाहिए कि प्रधानमंत्री के पास सुनाने लायक संदेश है।