राजनीति
बंगाली उप-राष्ट्रवाद को हवा देना बंगाली लोगों, बंगाल और देश के लिए एक बड़ा खतरा

प्रसंग
  • बंगाल के शासक सत्ता पर अपनी पकड़ कायम रखने के लिए बंगाली उप-राष्ट्रवाद को हवा देते रहे हैं। राजनीति का यह कपटी खेल न केवल भारत की अखंडता के लिए बल्कि बंगाल और बंगालियों के लिए भी गंभीर खतरा पैदा करता है।

चार दशकों से अब तक, बंगाल के शासक सत्ता पर अपनी पकड़ कायम रखने के लिए बंगाली उप-राष्ट्रवाद को हवा देते रहे हैं। सन् 2011 से कम्यूनिस्टों और तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल और बंगालियों तथा शेष देश के बीच एक बंटवारा करा दिया है। ‘हम’ बनाम ‘वे’, इसमें ‘हम’ बौद्धिक और सांस्कृतिक रूप से ‘वे‘ से श्रेष्ठ है। ‘हम’ बनाम ‘वे’ एक ऐसी कहानी है जिसे पीढ़ियों तक भोले-भाले बंगालियों को सुनाया गया है और उनका ब्रेनवॉश किया गया है। एक और झूठी कहानी – कि नई दिल्ली द्वारा बंगाल को उपेक्षित किया गया है और इसके साथ ‘सौतेला व्यवहार’ किया गया है – के साथ मिलकर राजनीति का यह कपटी खेल न केवल भारत की अखंडता के लिए बल्कि बंगाल और बंगालियों के लिए भी गंभीर खतरा पैदा करता है।

इस रणनीति को शुरू करने वाले कम्यूनिस्टों ने इस कपट से सत्ता में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए इसे एकदम उचित पाया। लगातार झूठे प्रोपेगंडा के माध्यम से, जिसमें दुनिया भर के कम्यूनिस्ट पारंगत हैं, 1970 के मध्य से बंगालियों को यह भरोसा दिलाया गया कि वह शेष भारत की अपेक्षा बेहतर समुदाय से हैं, विशेष रूप से उत्तर भारत के सत्ताधारी उन्हें दबाना और अधीन करना चाहते हैं। बंगाल के गौरवशाली अतीत – पुनर्जागरण काल – को लगातार दोषपूर्ण और बंगाल की श्रेष्ठता की गलत और झूठी धारणा को लागू करने के लिए विकसित किया गया था। बंगालियों को यह विश्वास दिलाया गया था कि वे वैचारिक, बौद्धिक और सांस्कृतिक रूप से देश के अन्य राज्यों के लोगों से कहीं बेहतर हैं।

यह इरादा गहराई से राजनीतिक था। एक समाजशास्त्री बिभास देबनाथ कहते हैं कि “विकास, रोजगार सृजन, आय में वृद्धि, निवेश आकर्षित करने और बुनियादी ढांचे के विनिर्माण पर वाम मोर्चा पूरी तरह से विफल रहा था। इसे लोगों के दिमाग को गहरी निराशा और संकट से भटकाना था। इसलिए, सरकार (वामपंथी) की कई असफलताओं पर से जनता का ध्यान भटकाने के लिए उनको एक बेहतर बंगाली पहचान की अफीम दी गई थी। इसके साथ, वामपंथियों ने बंगाली जनता के बीच गरीबी की महिमा, ‘सादा जीवन उच्च विचार‘ का नजरिया और धन के प्रति घृणा, उद्यमशीलता तथा उद्यमवृत्ति को स्थापित किया। अन्य राज्यों के लोगों, खासकर हिंदी भाषी उत्तरी और पश्चिमी राज्यों के, को धन के लोभी, कुबेर-भक्त और सांस्कृतिक तथा बौद्धिक रूप से नीचा चित्रित किया गया था। बंगाल में रहने वाले बुरी तरह से पिछड़े बंगालियों को इस तरह यह विश्वास दिलाया गया था कि उनकी गरीबी, बेरोजगारी, औद्योगिक और आर्थिक गिरावट, विखंडित बुनियादी ढांचा और उनके चारों ओर व्याप्त उदासीनता का माहौल सांसारिक मामला (मोह माया) था और उनकी बौद्धिक तथा सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक स्थिति अधिक महत्त्वपूर्ण थी।”

देबनाथ आगे कहते हैं कि “बौद्धिक रूप से श्रेष्ठ तथा ‘राजनीतिक रूप से जागरूक’ बंगाली की धन और अमीरी तथा भौतिक वस्तुओं के लिए आतुरता को अशिष्ट तथा अनुचित माना जाता था। गरीबी में ही खुश रहना स्वीकार्य मानदंड बन गया था और समृद्धि की तलाश को केवल एक बौद्धिक-नीच गैर-बंगाली लोगों की हरकत के रूप में देखा गया।” इसको खुले और गुप्त दोनों रूपों में ही प्रसारित किया गया, खुले तौर पर राजनीतिक प्रचार के माध्यम से और गुप्त रूप से स्कूलों, कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों में वामपंथी शिक्षकों द्वारा लगातार ब्रेनवॉश के माध्यम से। कम्यूनिस्टों ने 1960 के दशक की शुरुआत से बंगाल के शैक्षिक संस्थानों में घुसपैठ शुरू कर दी थी और समय के साथ वाम मोर्चा में अपने 34 साल के विनाशकारी शासन को शुरू किया जो सन् 1977 तक बंगाल को बर्बाद करता रहा, उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अच्छी पैठ बना ली थी।

शैक्षिक कक्षाओं के अलावा, यह भी प्रोपेगंडा चलता रहा जिसमें फिल्मों, रंगमंच तथा साहित्य के माध्यम से लोगों का ब्रेनवॉश किया जाता रहा। शैक्षिक क्षेत्र के साथ, कम्यूनिस्ट लोग रचनात्मक कलाओं के क्षेत्र को भी अपनी विशेष जागीर बनाने में कामयाब रहे। लगभग सभी फिल्मकार, साहित्यकार, कलाकार, कवि और लेखक वामपंथी थे या उनका वामपंथ की तरफ झुकाव था। इस तरह से फिल्मों, उपन्यासों, कविताओं, लघु कथाओं और गीतों सभी में गरीबी की महिमा का बखान किया गया तथा धन और पूँजी की भर्त्सना की गई। और इस मिथक को भी कायम रखा गया कि बंगाली बौद्धिक और सांस्कृतिक रूप से अपने साथी देशवासियों से बेहतर थे। उदाहरण के लिए, गैर-बंगालियों को फिल्मों और उपन्यासों में धन और भौतिक लाभों के असभ्य खोजी के रूप में चित्रित करके गैर-बंगालियों की ‘भिन्नता’ को हाईलाइट किया जाता था। हालाँकि गरीब बंगाली व्यक्ति को हमेशा एक महान आत्मा के रूप में दिखाया जाता था।

इस कपटी प्रोपेगंडा के साथ-साथ सत्तारूढ़ कम्यूनिस्ट हमेशा यह भी कहते रहे कि केंद्र सरकार बंगाल के साथ ‘सौतेला व्यवहार’ कर रही है। वाम मोर्चा भी शासन और कई अन्य मामलों में अपनी विफलता को छिपाने के लिए इसी में शामिल हो गया। सुरीन्द्र सिंह, जो कलकत्ता यूनिवर्सिटी में राजनीतिक अर्थशास्त्र पढ़ाया करते थे, कहते हैं कि “सत्तारूढ़ कम्युनिस्टों के लिए अपनी विफलताओं और अकर्मण्यता को छिपाने का सबसे आसान तरीका केंद्र सरकार को दोष देना था। हर सार्वजनिक मंच पर, वामपंथी नेता और पार्टी कार्यकर्ता बंगाल को वित्त न मुहैया कराने और बंगाल के बदले अन्य राज्यों का पक्ष लेकर बंगाल को उपेक्षित करने के लिए केंद्र सरकार को दोषी ठहराते और अपशब्दों का प्रयोग करते। यह अलग बात थी कि यह निरा झूठ था और इसमें रत्ती भर भी सच्चाई नहीं थी। तथ्य यह है कि वाम मोर्चा, ज्योति बसु और फिर बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में, साल दर साल अधिकांश केंद्रीय आवंटन का उपयोग करने में असफल होता रहा और उन्होंने अपना पूरा ध्यान सत्ता में अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखने पर केंद्रित किया।” केंद्र द्वारा बंगाल की उपेक्षा के उकसावे ने बंगाली श्रेष्ठता के प्रोपेगंडा में और इज़ाफा किया और इसे एक प्रसंग भी दिया कि – दिल्ली में (अधिकतर) हिंदी भाषी शासक बंगालियों की बुद्धिमता और कौशल से जलते थे इसीलिए उन्होंने बंगाल के साथ भेदभाव किया और इसे उपेक्षित रखा।

2011 में सत्ता में आने वाली तृणमूल कांग्रेस ने न केवल इस रणनीति को अपनाया, बल्कि इसे और भी खतरनाक बना दिया। तृणमूल ने न केवल इस प्रोपेगेंडा को कायम रखा है कि बंगाली लोग अन्य भारतीयों से अलग और बेहतर हैं, बल्कि पार्टी ने पिछले कुछ वर्षों में बंगाली हिंदुओं को देश के अन्य हिंदुओं से अलग प्रदर्शित करने के लिए भी एक अभियान शुरू किया है। तृणमूल अध्यक्ष ममता बनर्जी और उनके कई वरिष्ठ सहयोगी हालिया समय में बंगाली हिंदुओं की विशिष्टता को बढ़ावा देने के लिए आतुर रहे हैं। तृणमूल प्रोपेगेंडा के तहत, बंगाली हिंदू काली पूजा का उत्सव उसी समय मनाते हैं जब देश के बाकी हिस्सों के हिंदू दीपावली मनाते हैं। बंगाली हिंदू गणेश महोत्सव नहीं मनाते और जब देश के बाकी हिस्सों में देशवासी होली खेलते हैं तब बंगाली हिंदू ‘डोलयात्रा’ मनाते हैं। बंगाली हिंदू दुर्गा पूजा का त्योहार मनाते हैं जिसे ऐसे पेश किया गया कि इस पर सिर्फ बंगाल का ही अधिकार है। तृणमूल कांग्रेस के नेता कहते हैं कि भगवान राम वास्तव में बंगाली हिंदुओं के लिए श्रद्धेय नहीं हैं और इस प्रकार बंगाल में राम मंदिर मुद्दे का कोई महत्व नहीं है। तृणमूल प्रोपेगेंडा तंत्र कहता है कि सरस्वती पूजा भी बंगाल का एकाधिकार है। बंगाली जनता को संदेश- वे (बंगाली हिंदू) अन्य समुदायों के सह-धर्मानुयायियों से अलग हैं।

एक बार फिर, बंगाली हिंदुओं के बीच विशिष्टता की भावना उत्पन्न करने का उद्देश्य गहन राजनीतिक और भयानक है। भाजपा ने राज्य में बंगाली हिंदुओं का ध्यान अपनी ओर खींचना शुरू कर दिया है और इस पर तृणमूल की चिंता लाज़मी है। बंगाली हिंदुओं और देश के बाकी हिस्सों, खासकर उत्तर, मध्य और पश्चिम भारत (अधिकांश भाजपा नेता देश के इन्हीं हिस्सों से हैं), के हिंदुओं के बीच मतभेद पैदा करने के इरादे के साथ तृणमूल यह भेद पैदा करने की कोशिश कर रही है। तृणमूल का मानना है कि अगर बंगाली हिंदुओं में स्वयं को अलग महसूस करने की भावना जन्म ले लेती है तो भाजपा का तथाकथित हिंदुत्व एजेंडा बंगाली हिंदुओं के बीच अधिक आकर्षक नहीं हो पाएगा। बनर्जी स्वयं भी हाल ही की सार्वजनिक बैठकों में बंगाली हिंदुओं की इस ‘विशिष्टता’ पर प्रकाश डालती रही हैं।

बंगाल के वर्तमान शासकों द्वारा बंगालियों को अलग करने के लिए किए गए दुर्भावनापूर्ण प्रयास केवल धर्म तक ही सीमित नहीं हैं। कुछ महीने पहले, तृणमूल के सोशल मीडिया योद्धाओं ने पोस्ट और कमेंट्स के जरिये मराठाओं को 18वीं सदी के मध्य में बंगाल पर बार-बार हमला करने वाले और लूटने वाले डाकुओं के एक गिरोह के रूप में पेश किया। यह वही समय था जब शिवाजी महाराज के राज्याभिषेक का वार्षिकोत्सव (जून के अंत में) होता है, जिसे संघ परिवार द्वारा हिंदू साम्राज्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। पिछले साल तृणमूल ने यह आरोप लगाते हुए, कि पड़ोसी राज्य ओडिशा बंगाल की पारंपरिक मिठाई पर स्वामित्व अधिकारों का दावा कर रहा है, बंगालियों के बीच रसगुल्ला पर उन्माद को बढ़ावा दिया। उन्होंने अपने दावे, कि बंगाल को रसगोला के लिए भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग मिल रहा है, के लिए जश्न मनाया और इस तथ्य को अनदेखा किया कि उनकी सरकार ने इसके लिए आवेदन किया था और इसे ‘बंगलार रसगोला’ का टैग मिला था। इस वर्ष, विश्व बौद्धिक संपदा संगठन की वर्षगांठ पर बंगाल में बनी मिठाइयों को ‘बंगलार रसगोला’ जीआई टैग प्रदान किया गया और तृणमूल सरकार ने इस दिन को ‘रसगोला दिवस’ घोषित किया तथा तृणमूल के सोशल मीडिया योद्धाओं ने “बंगाल के मिष्ठान अविष्कार” पर ओडिशा द्वारा दावा करने पर निशाना साधा। यह बंगाली-उड़िया में दरार डालने के लिए तृणमूल द्वारा बहुत सूक्ष्म लेकिन भयानक प्रयास था।

कुछ महीने पहले, जब असम के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की दूसरी सूची प्रकाशित की गई थी और लगभग 40 लाख लोग – जिसमें अधिकतर बंगाली भाषा बोलने वाले हिंदू और मुसलमान शामिल थे – इस सूची से बाहर रखे गए थे, तब बनर्जी ने असम और असम के लोगों का खुलकर विरोध किया था। उन्होंने और उनके मंत्रियों ने असमिया और बंगालियों के बीच संघर्ष का इतिहास याद दिलाया था और आरोप लगाया था कि असम के लोग असम से बंगालियों को खदेड़ने का प्रयास कर रहे थे। ओछे राजनीतिक उद्देश्य के लिए असमिया-बंगाली विभाजन करने का यह प्रयास बहुत बुरा था। उनका लाभ – वह बंगालियों (हिंदुओं और मुसलमानों) की समर्थक और संरक्षक के रूप में उभरीं और एनआरसी अद्यतन प्रक्रिया का जोरदार विरोध करते हुए अपने अल्पसंख्यक समर्थन सिद्धांत को प्रबल किया। दो हफ्ते पहले, बंगाल की मुख्यमंत्री ने बंगाल-झारखंड सीमा पर पुलिस निगरानी, चेकपोस्ट और सीसीटीवी कैमरों की स्थापना का आदेश दिया था और उन्होंने आरोप लगाया था कि बंगाल में परेशानी पैदा करने के लिए भाजपा झारखंड से कुछ शरारती तत्व लेकर आ रही है। आशयित संदेश – एक कठिन परिस्थिति वाले बंगाल को हिंदी-भाषी राज्य से खतरे की आशंका है और वह बंगाल के हितों की संरक्षक हैं, जैसा कि कम्युनिस्टों ने बनर्जी से पहले स्वयं को प्रदर्शित किया था।

तृणमूल नेता प्रायः भाजपा को “बाहरी लोगों” (गैर-बंगाली), जो बंगाल और बंगालियों को नहीं समझते हैं, की पार्टी के रूप में चित्रित करते हैं। भाजपा में शामिल होने वाले बंगालियों पर एक तृणमूल नेता ने हाल ही में बंगाली पहचान छोड़ने और गैर-बंगाली आचरण करने का आरोप लगाया था। कम्युनिस्टों द्वारा शुरू की गई और तृणमूल द्वारा संचालित की गई इस मेगा परियोजना के अनुसार, बंगाल और बंगाली देश के बाकी हिस्सों के लोगों की तरह नहीं हैं, और बंगाली लोगों की यह विशिष्टता एक राजनीतिक शासन, जो दिल्ली के शासकों के साथ हमेशा विवादों में उलझा रहता है, का निरंतर समर्थन करने के लिए एक कारण होना चाहिए।

चूंकि लम्बी अवधि के लिए इस ओछी परियोजना से गंभीर और प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और इसलिए इस षडयंत्र का तत्काल भंडाफोड़ होना आवश्यक है कि बंगाली लोगों को यह विश्वास दिलाने के लिए उनका ब्रेनवॉश किया गया: कि वे अन्य भारतीयों से श्रेष्ठ हैं, कि उनके हितों को भारत भर के राजनीतिक दलों द्वारा साधा और संरक्षित नहीं किया जा सकता, कि बंगाली हिंदू अपने सह-धर्मनिष्ठ व्यक्तियों से अलग हैं और यह कि बंगाल पिछड़ गया है और दलदल में फिसल गया है क्योंकि इसके सत्तारूढ़ राजनेता इस तरह की बकवास को बढ़ावा दे रहे हैं।