राजनीति
अनिवार्य विपरीतता और उनके मनगढ़ंत तर्क
आशुचित्र- अभिव्यक्ति की आज़ादी और असहमति रखने का अधिकार लोकतंत्र के अभिन्न अंग हैं लेकिल झूठ, विनाश और संस्थागत विध्वंस नहीं।
राजनीतिक व्यवस्था में कुछ ऐसे हैं जिन्होंने सोचा था कि वे शासन करने के लिए पैदा हुए हैं। वहीं कुछ ऐसे भी लोग हैं जो सत्ता में जो भी सरकार रही हो उनकी परवाह किए बिना प्रभावी पदों पर प्रवेश करने में सफल रहे हैं। कुछ जो वामपंथ और कट्टर-वामपंथ से वैचारिक सहमति रखते हैं उन्होंने स्पष्ट रूप से नई सरकार को अस्वीकार्य किया। इसलिए विपरीत बाध्यकारी नाम का एक नया वर्ग उभरा। विपरीत या विरोधियों का मानना ​​है कि यह सरकार कुछ भी अच्छा नहीं कर सकती है इसलिए इस सरकार के हर कार्य का विरोध होना चाहिए। उन्होंने शिक्षा और सार्वजनिक नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण गरीबों को देने का प्रस्ताव में कई दोष निकले और मुझे लोकसभा में टिप्पणी करने के लिए मजबूर कर दिया कि यह इतिहास का पहला उदाहरण था जहाँ कम्युनिस्ट गरीबों के समर्थन के लिए उठाए गए कदम में बाधा डाल रहे थे। काले धन के खिलाफ उठाए गए कदमों को “कर आतंकवाद” के रूप में वर्णित किया गया। नकद जो काले धन का स्रोत था और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता था उसे कम करने के लिए नोटबंदी की खोज की गई थी। आधार जो पैसे बचाने के लिए एक साधन बन गया और यह सुनिश्चित करता है कि बचे हुए पैसे गरीबों के लिए खर्च किए जाएँ, उसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उल्लंघन के आधार पर इसे कोर्ट में घसीटा गया। इस देश के टुकड़े-टुकड़े करने वाले नारों को मुक्त भाषण के रूप में संरक्षित किया गया। सेना द्वारा किए गए सफल सर्जिकल स्ट्राइक पर तो एक नियमित या एक संदिग्ध प्रक्रिया के रूप में जम कर सेना की काबिलियत पर शक किया।
विपरीत बाध्यकारियों के पास झूठ का निर्माण में ज़रा-सी भी हिचक नहीं है। देश के सामान्य हितों के खिलाफ जाने पर भी वे तर्क-वितर्क कर सकते हैं। वे भ्रष्टाचार के खिलाफ धर्मयुद्ध को स्वांग कह सकते हैं। जब भी स्थितियाँ उनके अनुकूल हो वे दोहरे मापदंड अपना सकते हैं। आइए अब मैं इन्हें विशिष्ट उदाहरणों के साथ स्पष्ट करता हूँ-
जस्टिस लोया केस
विपरीत बाध्यकारियों द्वारा सार्वजनिक स्थान पर आरोपित प्रत्येक तथ्य का निर्माण उनके द्वारा स्वयं किया गया था। हृदयाघात से न्यायाधीश की स्वाभाविक मृत्यु हुई थी। स्ट्रोक के समय और अस्पताल में उनके साथ एकमात्र व्यक्ति थे जो कि उनके साथी न्यायाधीश थे। किसी भी बाहरी व्यक्ति के पास कोई संपर्क नहीं था और फिर भी मैत्रीपूर्ण वेबसाइटों, सोशल मीडिया अभियानों, फर्जी जनहित याचिकाओं और बेबुनियाद कटाक्ष पर कार्रवाई की गई। मौत का कारण हत्या की साजिश में बदल दिया गया था। अभियान पूरी तरह से महीनों तक चला। विपरीत बाध्यकारियों में सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश और दिल्ली उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश शामिल थे। तथ्यात्मक सत्यापन के बिना झूठ का समर्थन करने में उन्हें कोई संकोच नहीं हुआ। आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय की तीन जजों की बेंच ने मामले में किए गए हर दावे को खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति धनंजय चंद्रचूड़ की खंडपीठ की ओर से फैसला सुनाया गया। सोशल मीडिया पर उनकी आलोचना हुई। यदि मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा द्वारा फैसला दिया गया होता तब क्या होता? विपरीत बाध्यकारियों द्वारा उनके खिलाफ विपत्ति का एक और दुष्चक्र शुरू कर दिया जाता।
राफेल मामला
राफेल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट की खरीद को विपरीत बाध्यकारियों द्वारा मनगढ़ंत झूठ का एक और मामला है। यह एक ऐसा सौदा है जहाँ देश के हज़ारों करोड़ रुपये बचाने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को श्रेय दिया जाना चाहिए। कांग्रेस ने एक दशक से अधिक की देरी से राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता किया था। लड़ाकू विमानों के खरीद मूल्य के रूप में नकली और मनगढ़ंत आँकड़े सार्वजनिक डोमेन में डाले गए। एक सादे विमान के रूप में फ़्लाइंग इंस्ट्रूमेंट और हथियारबंद विमान के बीच के भेदों को दूर करने की कोशिश की गई। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष हर तथ्य को लाया गया। न्यायालय ने चुनौती को अस्वीकार कर दिया। खरीद की आवश्यकता, विमान की गुणवत्ता, मूल्य निर्धारण, प्रक्रिया और ऑफसेट जैसे सभी मुद्दे न्यायालय द्वारा स्वीकार किए गए। विरोधी झूठे साबित हुए और फिर भी झूठ के अभियान को रोकने के बजाय उन्होंने निर्णय को गलत साबित करने के लिए एक कथित टाइपोग्राफिक त्रुटि पर भरोसा करना शुरू कर दिया। लॉबिस्ट और ऐसे लोग जो लंबे समय तक राष्ट्रवादी बने रहे वो भी विपरीत बाध्यकारियों में शामिल हो गए हैं। हालाँकि अदालत का फैसला अंतिम होना चाहिए था लेकिन विरोधी यहीं बंद नहीं हुए। उन्होंने इसे फिर से इस मुद्दे को संसद में उठाया। वे संसद में बहस हार गए और फिर भी झूठ नहीं रुका।
सीबीआई का मुद्दा
लुटियन की दिल्ली में जो भी राज्य के मामलों के ज़रा भी परिचित व्यक्ति होगा उसे पता होगा कि पिछले कुछ वर्षों में हमारी जाँच एजेंसियों के कुछ लोगों के पास खुद के लिए एक कानून बन गया है। जो सीबीआई के अंदर फुसफुसाहट रही थी वो किसी भी तरह से असामान्य है। संप्रभु सरकार का कर्तव्य है कि जाँच एजेंसियों में ऐसे प्रत्येक व्यक्ति में सफाई सुनिश्चित करना। सरकार केवल उनकी जवाबदेही और अखंडता से चिंतित थी। विरोधियों ने प्रश्नवाचक पक्ष को चुना। स्वायत्तता हमेशा एक महान लगने वाला विचार है। जवाबदेही की अनुपस्थिति में एक जाँच एजेंसी एक राक्षसी बन सकती है। किसी भी सूचित व्यक्ति को ईमानदारी से अपने आप से एक सवाल पूछना चाहिए- “विनीत नारायण के मामले में फैसले के बाद दो साल का कार्यकाल निर्धारित किया गया है और इसके बाद हुए वैधानिक संशोधनों के कारण केंद्रीय जाँच एजेंसियों के प्रमुखों की गुणवत्ता में सुधार हुआ है या बिगड़ गया है?” दो नज़रिये उत्तर के रूप में मुश्किल हो सकते हैं।
आज विरोधियों ने प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति पर एक और हमला किया है जिसने सीबीआई प्रमुख को स्थानांतरित कर दिया। समिति के समक्ष एकमात्र प्रश्न यह था कि क्या सीबीआई प्रमुख के स्थानांतरण के लिए आधार के रूप में कोई सामग्री उपलब्ध थी? प्रथम दृष्टि से तो सीवीसी की रिपोर्ट ने पर्याप्त और प्रासंगिक सामग्री प्रदान किया। समिति सीवीसी निष्कर्षों के खिलाफ एक अपीलीय मंच नहीं है। यदि उसी को चुनौती दी जानी थी तो इसे केवल न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। समिति सीवीसी की रिपोर्ट को नजरअंदाज नहीं कर सकती थी।
नामांकित न्यायाधीश जिन पर समिति के सदस्य होने पर हितों के टकराव को लेकर हमला किया गया था जो कि था ही नहीं और जिस व्यक्ति के पास वास्तविक हितों का टकराव था और जिसे बैठक में भाग लेने से बचना चाहिए था वह अभियुक्त बन गया। विपक्ष में सबसे बड़ी एकल पार्टी के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष याचिका दायर की जिसमें दावा किया गया कि सीबीआई चीफ एक ईमानदार व्यक्ति थे और गलत तरीके से और दोषपूर्ण प्रक्रिया के माध्यम से गलत तरीके से निकाले गए। निष्कासित प्रमुख के लिए प्रचारक होने के नाते वह जाहिर तौर पर समिति में अपनी बेगुनाही या अपराध के बारे में निर्णय नहीं ले सकते थे। वे पक्षपात का जीता जागता उद्धारण हैं। किसी भी माननीय व्यक्ति को आने आपको इस मामले से खुद तो अलग कर लेना चाहिए था। एक पक्षपाती व्यक्ति के रूप में उसका असंतोष गैर-आस्तिक है। फिर भी संघर्षरत व्यक्ति सबसे अधिक सम्माननीय न्यायधीश पर हितों के टकराव का आरोप लगा रहे हैं।
न्यायाधीशों पर
एक साल पहले सर्वोच्च न्यायालय के चार माननीय न्यायाधीशों द्वारा संबोधित एक प्रेस कांफ्रेंस ने भारत के न्यायिक संस्थानों इतना अधिक नुकसान पहुँचाया है जिसकी कोई परिकल्पना नहीं कर सकता है। इसने न्यायाधीशों के बीच चल रही अंदरुनी गुटबाज़ी और लड़ाई को जनता के बीच ला कर रख दिया। उच्चतम न्यायालय में प्रैक्टिस करने वाले अतिरिक्त-साहसी वकीलों का एक समूह है जैसा कि हर दूसरे न्यायालयों में होता है। उनकी रणनीति न्यायालय पर हर बार भारी पड़ने की है। वे मामलों से बाहर निकलने की धमकी देते हैं और वे अपनी राजनीतिक ताकत का इस्तेमाल न्यायाधीशों पर दबदबा बनाने के लिए करते हैं और और राजनीतिक क्षमता में महाभियोग की गति को आगे बढ़ाते हैं। वे न्यायाधीशों पर सार्वजनिक रूप स टिप्पणी करते हैं। वे कोर्ट को डराने के लिए मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। खुद को ऐसे बेहूदे सार्वजनिक आचरण में शामिल होते देख भी न्यायाधीश खुद को दूसरों द्वारा ऐसे आचरण को रोकने के लिए अधिकार क्षेत्र का उपयोग करने में असमर्थ पाते हैं। आखिरी, मुख्य न्यायाधीश पर अनिवार्य विरोधियों द्वारा जम कर हमला किया गया था। एक मिसाल को अब वैध कर दिया गया है। उनके उत्तराधिकारियों को इसी तरह के व्यवहार से बच पाना मुश्किल होगा। न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए खतरा सार्वजनिक दबावों से भी उत्पन्न हो सकता है जो विरोधी न्यायाधीशों पर लगाने की पूरी कोशिश करते हैं।
पिछले दो वर्षों में कॉलेजियम की कार्यवाही और बातचीत विश्वासपूर्वक एक विशेष समाचार पत्र (एक विपरीत बाध्यकारी) में रिपोर्ट की गई है जिससे एक अंतरसंबंध को साफ रेखांकित करता है। अगर कानून मंत्री वरिष्ठता के सिद्धांत को लागू करते हैं जैसा कि उन्होंने पिछले साल सुप्रीम कोर्ट में एक नियुक्ति के मामले में किया था तो विरोधी इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला कहते हैं। जब विरोधियों ने अंतर-वरिष्ठता का मुद्दा उठाया जैसा कि हाल ही में हुआ था यह संस्था की स्वतंत्रता के लिए उनका धर्मयुद्ध बन गया। कमाल का दोहरा मापदंड है।
भारतीय रिज़र्व बैंक की बहस
आरबीआई ने इस देश की सेवा बहुत अच्छे से की है। यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य का प्रदर्शन करती है। अतीत के कई उदाहरण हैं जहाँ सरकार और आरबीआई की अलग-अलग राय रही हैं।
हाल के महीनों में सरकार ने दृढ़ता से महसूस किया है कि अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों को ऋण और तरलता समर्थन की आवश्यकता है। दोनों को एक साथ निचोड़ने से अंततः इस क्षेत्र को नुकसान होगा और साथ ही साथ विकास की रफ्तार को भी चोट पहुँचेगी। उन क्षेत्रों में से कुछ से संबंधित आँकड़े हालिया में सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का समर्थन करते हैं। बाज़ार में प्रत्येक हितधारक सरकार की स्थिति के पक्ष में है लेकिन विरोधियों ने ऋण और तरलता के मुद्दे को भी आरबीआई  की स्वायत्तता की अवहेलना से जोड़ दिया। आखिरकार सरकार केवल स्वायत्त आरबीआई को संबोधित कर रही थी और इसे उन मुद्दों को हल करने के लिए कह रही थी जो उसके अधिकार क्षेत्र में हैं।
मैं ऐसे कई उदाहरण और दे सकता हूँ। स्वतंत्र भाषण और असहमत होने का अधिकार लोकतंत्र के महत्त्वपूर्ण घटक हैं लेकिन झूठ, तोड़फोड़ और संस्थागत विनाश को किसी भी तरह से जायज़ नहीं ठहराया जा सकता है। स्वायत्तता के नाम पर अर्थव्यवस्था में धन की चोरी करने के लिए अभियान चलाना, संवैधानिक स्वतंत्रता के नाम पर भ्रष्टाचार को सही ठहराना, न्यायाधीशों पर हमला करना जब फैसला अनुकूल नहीं है और वहीं न्यायाधीश लोया की मृत्यु और राफेल सौदे के मामले में विनिर्माण तथ्यों का निर्माण करना अनिवार्य अंतर्विरोधों की निचली मानसिकता का संकेत देते हैं।
राष्ट्र सकारात्मक मानसिकता वाले लोगों और एक राष्ट्रीय शक्ति वाले लोगों द्वारा बनाए जाते हैं न कि अनिवार्य अंतर्विरोधों द्वारा। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गांधीजी ने जिन विभिन्न कार्यों में गलती की क्या वमपंथियों को यह नज़र नहीं आता? एक संप्रभु निर्वाचित सरकार को कमज़ोर करना और जिनके चुनाव जीतने तक की उम्मीद नहीं है उन्हें मज़बूत करना केवल लोकतंत्र का विनाश करना है।
अरुण जेटली भारत सरकार में केंद्रीय वित्त मंत्री हैं।