राजनीति
भाजपा और राम मंदिर- पार्टी मूल से दूर करती लोक सभा बहुमत

आशुचित्र- लोक सभा बहुमत के बावजूद मोदी सरकार ने हिंदू मुद्दों के लिए बहुत कम कार्य किया है। यह मात्र राम मंदिर के निर्माण के विचार पर अटकी नज़र आ रही है।

विश्व हिंदू परिषद तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस विकल्प का समर्थन कर रहे हैं कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण हेतु सरकार अध्यादेश लेकर आए, जिससे मोदी सरकार किनारे पर आ गई है। यदि सरकार अध्यादेश लेकर आती है तो भी उसे निंदा झेलनी पड़ सकती है और यदि नहीं लेकर आती है तो भी उसे निंदा झेलनी पड़ सकती है।

केवल अध्यादेश ला देने से मंदिर निर्माण संभव नहीं है। राम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण हेतु यदि सरकार अध्यादेश ले भी आएगी तो भी यह ज़रूरी नहीं कि उसे राज्यसभा में भी पास कर दिया जाए। यदि ऐसा हो भी जाता है तो फ़िर से सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का विकल्प रहेगा, इससे स्थितियाँ फिर पहले जैसी निर्मित हो जाएँगी।

अधिक से अधिक भाजपा के पास यही विकल्प है कि वो प्रदर्शित करे कि उसने अध्यादेश लाने के लिए सर्वश्रेष्ठ प्रयास किए हैं। लोकसभा चुनावों के पूर्व उसके पास, इस प्रकार की माँगों के लिए यही उपयुक्त विकल्प रहेगा।

एक अन्य सत्य यह भी है कि यदि मंदिर का निर्माण किसी के विरुद्ध जाकर किया अथवा उन मुस्लिम दलों का समर्थन हासिल किए बगैर किया, जो इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे चुके हैं, तो भविष्य में यह आतंकी गतिविधियाँ तथा असामाजिक घटनाओं की संभावनाएँ निर्मित कर देगा। ऐसा एक आम हिंदू कतई नहीं चाहेगा।

तीसरा सत्य यह है कि सत्ता में कायम भाजपा के लिए समझौते की राह निकालने की संभावना कम है जब तक कि ऐसा करने के लिए असंबद्ध तीसरे पक्ष की ओर से ज़ोर न दिया गया हो। अन्यथा इसे हमेशा हिंदू द्वारा अल्पसंख्यकों को दबाने के रूप में देखा जाएगा।
बहुमत होने के बाद भी मोदी सरकार ने हिंदू एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए बहुत काम कार्य किया है। राम मंदिर का निर्माण तो दूर, यह इसके विचार में भी भ्रमित नज़र आ रही है। राम मंदिर के मुद्दे को जितना आगे भाजपा बढ़ाएगी, उतना इसका विरोध होगा। कांग्रेस नेता सी.पी. जोशी ने कहा था कि केवल एक कांग्रेस का प्रधानमंत्री ही राम मंदिर का निर्माण करवा सकता है। उनकी बात एक विकल्प देती है। यदि कांग्रेस चाहे तो इस मुद्दे पर ईमानदारी से दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता कर सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि कांग्रेस को कभी भी मुस्लिम समुदाय की आवाज़ दबाता हुआ नहीं देखा गया है। यदि विकल्प होता है कि राम मंदिर के निर्माण का श्रेय भाजपा या कांग्रेस में से किसे दिया जाए तो मुस्लिम समुदाय कांग्रेस के लिए मोटे तौर पर समझौता करना स्वीकार कर सकता है।

एक हिंदू पार्टी के रूप में विख्यात भाजपा को आवश्यकता है कि वो खुद को कांग्रेस से अधिक धर्म निरपेक्ष प्रदर्शित करे। यही एक कारण हो सकता है कि बहुमत मिलने के बाद भी अपने कोर क्षेत्रों में भाजपा ने कम कार्य ही किया है।

यही कहा जाता है कि जितना बड़ा पार्टी का आधार होगा, उसकी नीतियाँ उतनी कम विस्तृत होंगी तथा उसे भिन्न प्रकार के मतदाताओं की अभिलाषाएँ ध्यान में रखनी होंगी। वहीं यदि मतदाताओं का आधार सीमित है तो उन्हें खुश रखना तथा अधिक ताकत रख पाना आसानी से संभव होता है।

यदि केरल की बात करें तो यहाँ इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ज्यादा ताकत रखती है। राज्य में मुस्लिम आबादी 27 प्रतिशत होने के बाद भी मुस्लिम लीग धर्मनिरपेक्ष कांग्रेस से अधिक ताकत रखती है। इसका कारण है कि कांग्रेस उतनी मज़बूती से निर्णय नहीं ले पाती। यही बात केरल कांग्रेस तथा क्रिश्चियन समुदाय के राजनेताओं पर भी लागू होती है क्योंकि उनकी जवाबदेही सीमित मतदाताओं को होती है।

अगर भाजपा की बात की जाए, तो भाजपा का मुख्य हिंदू वोट बैंक लगभग 15-20 प्रतिशत है। यदि भाजपा अपना आधार विस्तृत करने की बजाय इस खेमे को खुश रखेगी तो शायद अधिक ताकतवर रह सकती है।
भाजपा का आधार, लोकसभा सीटों की संख्या में लगभग 100-180 सीट है। यदि इन क्षेत्रों में वह अपना वर्चस्व बनाए रखती है तो उसकी शक्ति में वृद्धि होगी। भविष्य में किसी भी गठबंधन में भाजपा इतनी सीटों के साथ एक महत्त्वपूर्ण पार्टी बनकर रहेगी। अर्थात् भाजपा अपने प्रमुख मुद्दों पर कार्य कर सकती है, चाहे वह राम मंदिर का मुद्दा हो या परिवर्तन रोकने का या फिर कुछ और। यदि वह अपने समर्थकों के इस खेमे को खुश रखेगी तो भले ही उसे सब कुछ न मिल सके लेकिन कुछ बेहतर अवश्य मिलेगा।

लोकसभा की 282 सीटों पर भाजपा, सभी प्रकार के मतदाताओं की सभी अभिलाषाएँ पूरी करने को बाध्य है और इसी कारण वह अपने प्रमुख वोटबैंक को खुश रख पाने में नाकाम हो रही है। अपनी प्रमुख 100-180 सीटों पर वर्चस्व कायम कर लेने के बाद गठबंधन के इस दौर में, भाजपा किसी भी अन्य राजनीतिक पार्टी से अधिक ताकतवर बन सकती है तथा कई मुद्दों पर अन्य राजनीतिक पार्टियों पर दबाव बना सकती है।

भले ही भाजपा, संसद में अनुपात के आधार पर प्रतिनिधित्व का समर्थन करे तो भी लहर के अनुसार 20 से 30 प्रतिशत मत हासिल कर वह 110 से 170 सीटें आसानी से जीत सकती है। इस वजह से या तो वो एक ताकतवर विपक्ष के रूप में अथवा सरकार में एक अहम भूमिका निभा सकती है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।