राजनीति
परीक्षा पर चर्चा 2.0- मिलेनियल्स में मोदी की अनोखी पहुँच की संरचना
सुहास - 30th January 2019

आशुचित्र- परीक्षा पर चर्चा 2.0 को सत्र उन लोगों को जवाब था जो पूछते हैं कि मोदी युवाओं में लोकप्रिय क्यों हैं?

कहा जाता है कि आयु मात्र एक संख्या है। लेकिन जीवन और राजनीति में उम्र मायने रखती है। कई बार वृद्ध राजनेता युवाओं पर से अपनी पकड़ खो देते हैं क्योंकि युवाओं को वे नए विचारों के स्रोत के रूप में प्रतीत नहीं होते हैं। हालाँकि जब नरेंद्र मोदी और मिलेनियल्स (सहस्त्राब्दी के आसपास जन्मे बच्चे- यानि 90 के दशक और 21वीं सदी की शुरुआत में) की बात की जाए, तो उम्र उनके संबंधों में खलल डालती नहीं नज़र आती।

यदि आपको कोई संदेह है तो परीक्षा पर चर्चा 2.0 को वीडियो देख लें और वह गूंज सुनें जब उन्होंने ‘पबजी’ (वीडियो गेम) शब्द का प्रयोग किया था। हालाँकि कुछ यह मान सकते हैं कि यह गूंज इस लोकप्रिय गेम के लिए थी लेकिन ऐसा नहीं है। यह गूंज उस उत्साह के लिए थी जो मिलेनियल्स को यह जानकर हुआ कि प्रधानमंत्री को पबजी गेम के बारे में पता है।

एक 68 वर्षीय के लिए मिलेनियल्स के साथ रॉकस्टार की भाँति संबंध स्थापित करना एक ऐसी कला है जिसपर राजनीति में अधिक चर्चा नहीं हुई है। वक्ता और श्रोताओं में लगभग 50 वर्षों का अंतर था लेकिन इसका प्रभाव देखने को नहीं मिला।

मोदी विद्यार्थियों से उन्हीं की भाषा में बात करते हैं। वे युवा खिलाड़ियों को ट्वीट भी करते हैं। वे सोशल मीडिया पर वाइरल फिटनेस ट्रेंड का भागीदार भी बने थे। परीक्षा का सामना करने वाले विद्यार्थियों के लिए वे एक पुस्तक लिखते हैं। वे आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, बिग डाटा, इंटरनेट ऑफ थिंग्स की बात करते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में मोदी बाकी राजनेताओं से हटकर हैं।

मोदी के अग्रणी होने को हम इस बात से समझ सकते हैं कि उनके विरोधी राहुल गांधी अभी भी 70 के दशक के समान उद्योग-विरोधी, आकांक्षाएँ न रखने वाले और गरीबी का राग जपने वाले राजनेता हैं। बेंगलुरु में माउंट कार्मल कॉलेज के विद्यार्थियों से उनका एक विफल संपर्क याद आता है जब वे राजनीतिक बाण छोड़ रहे थे लेकिन विद्यार्थियों को आकर्षित करने के लिए उन्होंने एक भी बात नहीं कही।

कुछ सप्ताहों में मुख्य चुनाव हैं और मोदी परीक्षाओं का सामना करने वाले बच्चों से बात कर रहे हैं, उन्हें बड़ा सोचना का प्रोत्साहन दे रहे हैं और दूसरी तरफ नेहरू के वंशज तथाकथित न्यूनतम आय की बात कर रहे हैं।

विद्यार्थियों से अपने संवाद के दौरान मोदी ने पबजी, प्लेस्टेशन, अपेक्षाओं, करियर विकल्पों और अवसाद से लड़ने जैसे मुद्दों पर बात की। इसके विपरीत अरविंद केजरीवाल, जो राहुल गांधी की ही तरह मोदी से उम्र में कई वर्ष छोटे हैं को अभिभावकों से यह कहते देखा गया कि यदि वे अपने बच्चों से प्यार करते हैं तो उन्हें ही वोट दें और मोदी को तब वोट दें यदि ऐसा नहीं है।

परीक्षा पर चर्चा 2.0 में स्कूल जाने वालों से लेकर स्नातक तक के विद्यार्थी उपस्थित थे। विदेशों में पढ़ रहे कई भारतीय युवा भी इस समारोह में उपस्थित थे। शिक्षक और अभिभावक भी मौजूद थे। मोदी ने उनके प्रश्नों का जवाब दिया और उन्हें जीवन के गुर सिखाए जिन्हें एक मिलेनियल ‘लाइफ हैक्स’ कहता है।

जहाँ अपेक्षाएँ अच्छी होती हैं और हमें उपलब्धि की ओर प्रोत्साहितत करती हैं, लेकिन उन्हें बच्चे की क्षमताओं के परिप्रेक्ष्य में रखना चाहिए नहीं तो वे अवास्तविक हो जाएँगी, मोदी ने कहा। ये शब्द एक ऐसी दुनिया में आवश्यक हैं जहाँ एक ही बच्चे से गायन, वादन, नृत्य, वाद-विवाद, प्रश्नोत्तरी, तीन भाषाओं का ज्ञान, निबंध लेखन व गणित और विज्ञान जैसे विषयों में भी उत्तीर्ण होने की अपेक्षा की जाती है।

बच्चे से साँस लेने की भी अपेक्षा होती है यदि उसे इन गतिविधियों से समय मिले तो। मैं इस प्रतिस्पर्धी दुनिया में बच्चों से बेहतर बनने की अपेक्षा कर रहा हूँ। लेकिन यह बी सत्य है कि कई अभिभावक उत्तेजना और अवसाद की कीमत पर ये अपेक्षाएँ रखते हैं। मोदी ने पते की बात कही, “अपने बच्चे के रिपोर्ट कार्ड को अपना विज़िटिंग कार्ड (पहचान पत्र) न बनाएँ।”

सही करियर (पेशे) को चुनकर विद्यार्थियों को बड़ा लक्ष्य करना चाहिए लेकिन उन्हें छोटे-छोटे लक्ष्यों में विभाजित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि लक्ष्य ऐसा होना चाहिए जो “पहुँच में हो लेकिन पकड़ में नहीं।” वे यह कहना चाह रहे थे कि हमारे लक्ष्य वास्तविक और हमारी पहुँच में होने चाहिए लेकिन वे ऐसे भी नहीं होने चाहिए जिन्हें आसानी से प्राप्त किया जा सकता है, नहीं तो इसे प्राप्त करने का उत्साह कम हो जाएगा।

“आपके माता-पिता जो कहते हैं, उसका तुरंत विरोध न करें बल्कि सुनने का प्रयास करें।”, मोदी ने एक बच्चे को सलाह दी जिसने पूछा था कि माता-पिता से बेहतर संवाद कैसे स्थापित किया जाए। सुनने से विश्वास बढ़ता है, सुनने के बाद उसपर विचार करें और यदि आप उससे असहमत हैं तो बाद में जाकर शांति से इस बात को व्यक्त करें, दशकों से लोगों और दलों से संबंध स्थापित करने वाले व्यक्ति मोदी ने बताया।

जब पूछा गया कि कैसे वे अपने प्रसिद्ध लेकिन थका देने वाली कार्य-सारणी का प्रबंधन करते हैं तो उन्होंने जवाब दिया कि क्या आपने कभी अपनी माता को थकते हुए देखा है। जैसे आपकी माँ आपके परिवार से अपनत्व के कारण कभी नहीं थकती हैं, वैसे ही मैं अपने राष्ट्र से यह अपनत्व महसूस करता हूँ, उन्होंने कहा।

“दबाने की जगह व्यक्त करें”, उन्होंने विद्यार्थियों से कहा जब किसी ने पूछा कि अवसाद होने पर व घर की याद आए तो क्या करें। उन्होंने अभिभावकों को यह भी समझाया कि अवसाद के लिए पेशेवर सहायता लेने से कतराएं नहीं। चार लोग क्या कहेंगे, यह ख्याल मन से निकाल दें और अपने बच्चे के स्वास्थ्य व विचारों को प्राथमिकता दें, उन्होंने कहा।

मोदी ने शिक्षकों को संबोधित करते हुए पठन-पाठन को रुचिपूर्ण बनाने की बात कही, सभी छात्रों पर समान ध्यान दिया जाए और बच्चों में अवसाद के लक्षण दिखने पर उनपर गौर किया जाए।

कुल मिलाकर परीक्षाओं पर यह पूरे पारिस्थितिकी तंत्र से एक प्रभावशाली जोशपूर्ण वार्ता रही क्योंकि सिर्फ विद्यार्थी ही नहीं हैं जो परीक्षाओं का सामना करते हैं, बल्कि अभिभावक और शिक्षक भी इससे जुड़े हुए हैं। इससे यह भी समझा जा सकता है किमोदी मिलेनियल्स को पसंद क्यों हैं- वे आकाक्षाओं की बात करते हैं, वे युवा सम्मेलनों व हैकाथनों (हैंकिंग प्रतिस्पर्धा) में जाते हैं और अपने रेडियो शो पर उन्हें संबोधित कर 2000 में पैदा हुए युवाओं का निर्वाचन लोकतंत्र में स्वागत करते हैं। उनका संदेश सटीक और मिलेनियल्स से संबंध स्थापित करने वाला है और सबसे महत्त्वपूर्ण, वे जानते हैं कि चुनावी खेल को इससे बाहर रखना है।