राजनीति
इन 10 बातों से तय होगा कि छत्तीसगढ़ में किसे मिलेगी जीत
इन 10 बातों से तय होगा कि छत्तीसगढ़ में किसे मिलेगी जीत

प्रसंग
  • कई कारकों की एक जटिल पारस्परिक उठापटक ही यह तय करेगी कि छत्तीसगढ़ राज्य विधानसभा चुनाव कौन जीतेगा। आइये यहाँ पर 10 कारकों पर चर्चा करते हैं 

पहले भाग में हमने छत्तीसगढ़ में चुनावी नतीजों को प्रभावित करने वाले पाँच कारकों का विश्लेषण किया था। अब आइये आखिरी भाग में हम इस साँप-सीढ़ी के खेल पर प्रभाव डाल सकने वाले कुछ अन्य कारकों पर नजर डालते हैं। यहाँ पर अजीत जोगी-मायावती गठबंधन ने त्रिकोणीय प्रतियोगिता बना दी है। मतदान एजेंसियों के लिए यह राज्य एक बुरा सपना रहा है।

  1. कृषि संकट

राज्य की 80 फीसदी आबादी किसानों की है। भले ही रमन सिंह को राज्य में कृषि की किस्मत बदलने का श्रेय दिया जाता है लेकिन एक तथ्य यह भी है कि पिछले साढ़े तीन सालों में राज्य में 1300 से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की है। इंडिया टुडे-एक्सिस सर्वे में 40 फीसदी उत्तरदाताओं ने बताया कि राज्य चुनाव में कृषि संकट तीसरा सबसे बड़ा मुद्दा है। भारतीय जनता पार्टी को उम्मीद है कि 2100 करोड़ रुपये की लागत के धान बोनस तिहार (योजना) से किसानों का दर्द कुछ कम हो जाएगा। 2018-19 के लिए केन्द्र सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थम मूल्य, जिसमें किसानों को 50 फीसदी लाभ देने का दावा किया गया है, भी किसानों के लिए काफी मददगार साबित होगी।

  1. सामाजिक कल्याण योजनाओं का प्रभाव

संचार क्रांति योजना (एसकेवाई) के तहत ग्रामीण इलाकों की करीब 55 लाख महिलाओं को स्मार्टफोन वितरित किए जाने का लक्ष्य रखा गया है। इस योजना का उद्देश्य महिलाओं को डिजिटलीकरण से जोड़ना और उनको सशक्त बनाना है। सरस्वती चक्र योजना के तहत गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) के परिवारों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की लड़कियों को 1.5 लाख साइकिलें वितरित की गई हैं। पंडित दीनदयाल श्रम अन्न सहायता योजना के तहत लाखों दैनिक मजदूरों को किफायती दर पर भोजना परोसा जाता है। आयुष्मान भारत योजना से राज्य के 40 लाख परिवारों को फायदा मिलने की उम्मीद है। राज्य और केंद्र की सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं के माध्यम से भाजपा ने समाज के प्रत्येक वर्ग का कल्याण सुनिश्चित किया है। पार्टी का दावा है कि राज्य के हर घर के कम से कम एक व्यक्ति को ही इसकी किसी न किसी योजना से फायदा मिला है।

  1. पार्टियों की जमीनी रणनीति

यह तो सभी लोग मानते हैं कि राज्य में भाजपा (35 लाख कार्यकर्ताओं के साथ) एक बड़ा और मजबूत संगठन है, कांग्रेस भी अपनी ऐसी ही स्थिति बनाने के लिए बेताब हो रही है। भूपेश बघेल और टी. एस. सिंह देव ब्लॉक और मंडल स्तर पर पार्टी की संरचना में फिर से दम फूंकने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा के पन्ना प्रमुख की राह पर चलते हुए कांग्रेस भी बूथ प्रबंधकों की अपनी फ़ौज बना रही है। दोनों पार्टियों ने अपने राजनीतिक संदेशों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए सैकड़ों व्हाट्सएप्प ग्रुप बनाए हैं और साइबर लड़ाकुओं का जत्था तैयार किया है।

  1. नए मतदाता

जबकि भाजपा की रणनीति रमन सिंह सरकार के तहत की गई महत्वपूर्ण उपलब्धियों को सामने लाना है, वहीं इसे नए मतदाताओं की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिन्होंने, जैसा कि भाजपा प्रचार करती है, दिग्विजय और जोगी के अंधे युग को न ही देखा है और न ही उन्हें याद है। अनुमान लगाया गया है कि राज्य में लगभग 79 लाख मतदाता ऐसे हैं जो 18-25 वर्ष के आयु वर्ग के हैं। जबकि इन मतदाताओं ने सामान्य तौर पर 2014 के लोकसभा चुनावों में तथा हाल ही में हुए छत्तीसगढ़ के चुनावों में भाजपा को मतदान किया है, वहीं छत्तीसगढ़ में इन युवा मतदाताओं का कांग्रेस को भारी समर्थन मिला है।

  1. विधायकों के खिलाफ स्थानीय सत्ता विरोध

आईबीसी 24 सर्वेक्षण के अनुसार, 56 प्रतिशत उत्तरदाता विधानसभा सदस्यों (विधायकों) से नाखुश हैं। इससे पार्टी, जिसमें विधानसभा से अपेक्षाकृत अधिक सदस्य हैं, के प्रदर्शन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जैसा कि गुजरात और कर्नाटक में यह साबित हो चुका है। सत्ता विरोध पर हावी होने के लिए भाजपा की अन्यत्र कहीं रणनीति यह रही है कि वर्तमान विधायकों की एक बड़ी संख्या को टिकट न दिया जाए। लेकिन अजीत जोगी-मायावती गठबंधन की उपस्थिति का मतलब है कि टिकट से इनकार करने से उम्मीदवार विद्रोह कर सकते हैं, जो गठबंधन का टिकट प्राप्त कर सकते हैं और पार्टी की संभावनाओं पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। इसके अलावा, 2013 में लगभग 60 प्रतिशत सीटों के उम्मीदवारों में बदलाव देखने को मिला, जो वर्तमान विधायकों के प्रदर्शन से असंतोष के उच्च स्तर को दर्शाता है।

  1. कुल मतदान प्रतिशत और नोटा

2003 में छत्तीसगढ़ में भाजपा मतदान में 60.2 प्रतिशत से 71.3 प्रतिशत की वृद्धि के साथ सत्ता में आई थी। 2013 में, मतदान फिर से 5.3 प्रतिशत बढ़कर 75.3 प्रतिशत हो गया। भाजपा के वोट शेयर में वृद्धि दर्ज की गई जो 2003 में 39.3 प्रतिशत से बढ़कर 2013 में 42.3 प्रतिशत हो गई।

अब तक उच्चतम नोटा स्कोर का रिकार्ड छत्तीसगढ़ के नाम है। छत्तीसगढ़ में, कुल 4.6% मतदाताओं ने नोटा या उपर्युक्त में से कोई भी नहीं चुना। नोटा ने 12 सीटों पर जीत के लिए वोटों के अंतर से अधिक वोट प्राप्त किए। कांग्रेस ने इन 12 सीटों में से सात सीटों को खो दिया।

  1. भ्रष्टाचार, मूल्य वृद्धि और बेरोजगारी

सीएमएस-इंडिया करप्शन स्टडी 2017 के मुताबिक, 56 प्रतिशत परिवारों ने राज्य की सार्वजनिक सेवाओं में भ्रष्टाचार में वृद्धि का अनुभव किया है। राष्ट्रीय औसत 43 प्रतिशत है। वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री बाबू लाल अग्रवाल को गंभीर रिश्वत के आरोपों का सामना करना पड़ रहा है। सेक्स स्कैंडल ने भी सरकार को हिलाकर रख दिया है। चालीस प्रतिशत लोग राज्य में बेरोजगारी को एक बड़ा मुद्दा मानते हैं। बेरोजगारी समाशोधन केद्रों में ढाई लाख लोग पंजीकृत हैं। इंडिया टुडे-एक्सिस सर्वे में अठारह प्रतिशत उत्तरदाताओं ने एक प्रमुख चुनाव मुद्दे के रूप में मूल्य वृद्धि पर प्रकाश डाला है। पिछले कुछ हफ्तों से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में निरंतर वृद्धि देखी जा रही है जो परिवारों के बजट को बिगाड़ रही है। ये मूलभूत आवश्यकताओं के मामले भारत में अधिकतर चुनावों को प्रभावित करते हैं।

  1. विकास एवं आर्थिक वृद्धि

रमन सिंह को राज्य को विकास के रास्ते पर लाने और राज्य में खराब आर्थिक स्थितियों को दर्शाने के लिए प्रयोग किये जाने वाले “बीमारू” टैग को हटाने का श्रेय दिया जाता है। स्वतंत्र रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने 2013 से 2017 तक पाँच वर्ष की अवधि के लिए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि, मुद्रास्फीति और वित्तीय स्थिति के तीन मानकों पर 16 बड़े राज्यों को रेट किया है। छत्तीसगढ़ कुल मिलाकर चौथे स्थान पर है और केवल गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश से नीचे है। राज्य ने औसत सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि 7.2 प्रतिशत दर्ज की है, जो भारत की सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत से अधिक है। लगभग 16 प्रतिशत के सबसे कम ऋण-जीडीपी अनुपात और 3 प्रतिशत के वित्तीय घाटा-जीडीपी के अनुपात के साथ राज्य वित्तीय प्रदर्शन के मामले में तालिका में सबसे ऊपर है।

  1. नक्सलवाद

अंबिकापुर और बस्तर राज्य के नक्सल प्रभावित क्षेत्र हैं। रमन सिंह के कार्यकाल के अंतर्गत नक्सली गतिविधि के कारण मौतें 2010 में 327 से घटकर 2017 में 169 हो गईं। माओवादियों में घबराहट और प्रासंगिकता खोने के डर के कारण वर्ष 2018 में हमलों की संख्या बढ़ी है। छत्तीसगढ़ का दक्षिणी क्षेत्र, जिसमें 13 सीटें हैं और माओवादी गतिविधियों से सबसे अधिक प्रभावित है, ने वर्ष 2013 में राज्य औसत से अधिक 5.5 प्रतिशत लोगों ने नोटा को चुना था।

  1. जोगी फैक्टर

चुनाव लड़ने के लिए अजीत जोगी ने मायावती के साथ गठबंधन किया है। यह गठबंधन राज्य की  44 प्रतिशत एससी-एसटी आबादी और 39 आरक्षित सीटों पर नजर गड़ाए हुए है। वर्तमान में, इन आरक्षित सीटों में से 20 भाजपा के पास और 19 सीटें कांग्रेस के पास हैं। यह देखा जाना बाकी है कि कौन सी पार्टी यहाँ दांव मारती है। प्रत्यक्ष रूप से इसका लाभ भाजपा को होना चाहिए क्योंकि भाजपा विरोधी वोट गठबंधन और कांग्रेस के बीच विभाजित हो जाएंगे।

क्या कहते हैं ओपीनियन पोल?

एबीपी-सी वोटर ओपीनियन पोल ने 90 में से 54 सीटें जीतकर कांग्रेस की जीत की भविष्यवाणी की है जबकि इंडिया टुडे-एक्सिस पोल ने भाजपा की जीत की भविष्यवाणी की है क्योंकि 50 फीसदी उत्तरदाताओं ने राज्य सरकार से संतुष्टि जताई है। सार्वजनिक भविष्यवाणी मंच क्राउडविज्डम ने भाजपा को 43, कांग्रेस को 40, जोगी की कांग्रेस को 5 और बहुजन समाज पार्टी को 2 सीटें मिलने का अनुमान लगाया है और त्रिशंकु विधानसभा की ओर इशारा किया है।

कम शब्दों में कहा जाए तो, कारकों की एक जटिल पारस्परिक उठापटक यह तय करेगी कि आखिरकार छत्तीसगढ़ में जीत किसकी होती है। चुनाव का पटाखा अभी स्टोर में ही रखा है।

अमिताभ तिवारी एक पूर्व कॉर्पोरेट और निवेशबैंकर हैं जो अब राजनीति और चुनावों में अपनी विशेष रुचि ले रहे हैं। उपरोक्त विचार इनके व्यक्तिगत हैं। इनका ट्विटर हैंडल @politicalbaaba है।