राजनीति
मंदिर भगवान का लेकिन शासन कोर्ट का- जगन्नाथ पुरी के पुजारी न्यायालय के आदेश के कारण प्राण त्यागना चाहते हैं

पुजारियों के वंशगत अधिकार समाप्त करने एवं किसी भक्त को दान के लिए विवश न करने के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के चार महीनों बाद जगन्नाथ मंदिर के पुजारी नरसिंह पुजपांडा ने मुख्य न्यायाधीश को एक याचिका समर्पित की है कि वे अपना जीवन समाप्त करना चाहते हैं।

“मैं उनसे भीख माँगकर कहता हूँ कि यह प्रथा हज़ारों साल पुरानी है। न्यायालय और सरकार हमारी आय का एकमात्र साधन रोकने का प्रयास कर हैं। हम आय के बिना कैसे जीयेंगे?”, पुजपांडा ने अपनी याचिका में कहा कि मंदिर में भक्तों से दान-दक्षिणा उनकी आय का एकमात्र साधन थी, हिंदुस्तान टाइम्स  ने रिपोर्ट किया।

कटक आधारित वकील मृणाली पदी की याचिका के बाद न्यायालय ने 12 सुधार प्रस्तावों के साथ निर्देश दिया था कि भक्तों की ओर से आए दान पर सेवकों का अधिकार नहीं होगा बल्कि वह मंदिर के ‘हुंडी’ में जमा किया जाएगा। इसके साथ ही इसने प्रवेश से भक्तों के लिए एक बाध्य पंक्ति प्रणाली का सुझाव दिया था जिससे मंदिर प्रबंधन में पारदर्शिता आए।

इसी पुजारी ने मार्च में खुद की बलि देने की चेतावनी दी थी जब उड़ीसा उच्च न्यायालय ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को रत्न भंडार की परिस्थिति की जाँच करने की अनुमति दे दी थी। इस भंडार में भगवान जगन्नाथ और उनके भाई-बहन के आभूषण व दुर्लभ वस्तुएँ सुरक्षित रखी हैं।

हालाँकि मंदिर प्रबंधकों ने शीर्ष न्यायालय की बात मानकर बाध्य पंक्ति प्रणाली 1 अक्टूबर से प्रयोगात्मक आधार पर शुरू कर दी है।

न्यायालय के निर्देश से मंदिर प्रशासन में राज्य हस्तक्षेप को जगह मिल गई है। इससे दोनों के बीच मतभेद शुरू हो चुका है जहाँ पुजारी उनके पारंपरिक अधिकारों की रक्षा करना चाहते हैं।