राजनीति
ऐसा लगता है, टीम मोदी के पास राहुल गांधी की फूट डालने वाली रणनीति का कोई जवाब नहीं है
राहुल गांधी की फूट डालने वाली रणनीति

प्रसंग
  • मोदी और भाजपा के लिए चुनौती स्पष्ट है। उन्हें विघटनकर्ता को विघटित करने की रणनीति की जरूरत है।
  • दुर्भाग्यवश, मोदी और भाजपा ने इन्हें कमजोर करने वाले कारकों और कांग्रेस की चुनौती को खत्म करने के बारे में कोई बड़ी समझ नहीं दिखाई है।

दो हालिया चुनाव भविष्य का एक संकेत हैं, जिसमें एक राहुल गांधी की लोकप्रियता में तेज वृद्धि दिखा रहा है और दूसरा यह संकेत दे रहा है कि इस दिसंबर राजस्थान, एमपी, छत्तीसगढ़ में होने वाले चुनावों में भाजपा इन तीनों राज्यों को पूरी तरह खो सकती है। जहाँ राज्य स्तर पर विरोधी लहर समेत इन रुझानों के लिए कई कारक जिम्मेदार हैं, वहीं बड़ा मुद्दा यह है कि सरकार की उपलब्धियों को पेश करने में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अपने मीडिया विशेषज्ञों की तुलना में विपक्षी दलों के आयोजक या विचार-प्रणेता (विशेष रूप से राहुल गांधी के) राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार की विफलताओं के बारे में अपने वर्णन के संदर्भ में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रधानमंत्री की भारी व्यक्तिगत लोकप्रियता को देखते हुए सूचना युद्ध हारने का मतलब है कि भाजपा की जनसंपर्क प्रणाली (पीआर) ठीक से काम नहीं कर रही है।

जहाँ कांग्रेस को पता नहीं था कि 2014 में उन्हें किस चीज ने नुकसान पहुँचाया था, वहीं आज नरेंद्र मोदी सरकार यह पता लगाने को उत्सुक हो रही है कि उनके संदेशों में क्या चूक है, या लोग सरकार के प्रदर्शन को किस तरह समझते हैं।

जब सरकार को शासन के अपने रिकॉर्ड का बचाव करना हो तो विपक्षी पार्टी के लिए सरकार पर हमला करना हमेशा आसान होता जा रहा है, वहीं ताजा संकेत यह हैं कि कांग्रेस मोदी के प्रभाव को नाकामयाब करने में कामयाब रही है। मूर्खतापूर्ण कृत्यों, जैसे प्रधानमंत्री को संसद में गले लगाने से लेकर बेशर्मी से झूठ बोलने तक, के माध्यम से राहुल गांधी सरकार को विचलित करने में कामयाब रहे हैं। कांग्रेस पार्टी की गंदी चालें अपना काम शुरू कर रही हैं।

राहुल गांधी के हमलों के तीन पैंतरे हैं।

पहला, जनता का ध्यान मोदी और उनकी उपलब्धियों से हटाओ और कॉंग्रेस पार्टी के स्वयं के घोटालों से भी, जिनमें राजवंश के लोग शामिल रहे हैं जैसे – नेशनल हेराल्ड, वाड्रा रियल एस्टेट कैपर्स इत्यादि)।

कैंब्रिज एनालिटिका, जो कि एक विवादास्पद फर्म है और जिस पर फेसबुक एवं अन्य सोशल डाटा का उपयोग करके चुनाव परिणामों को प्रभावित करने के प्रयास का आरोप लगाया गया है, को मनाने के लिए कॉंग्रेस पार्टी द्वारा किए गए प्रयासों पर काफी हो-हल्ला हुआ है, जबकि मोदी और भाजपा को पछाड़ने के लिए कॉंग्रेसी रणनीति के ज़्यादातर तत्व कोई रॉकेट साइन्स नहीं हैं। ये पीआर कंपनियों द्वारा पहले भी इस्तेमाल किए जा चुके हैं। यह विवादास्पद ब्रिटिश पीआर फ़र्म बेल पॉटिंगर के तरीकों कि तरह ही है जो संदिग्ध ग्राहकों के लिए काम करने का इतिहास रखती है। हेक्टर मैकडॉनल्ड, जिन्होंने अपनी किताब ट्रुथ: हाउ द मैनी साइड्स टू एव्री स्टोरी शेप अवर रियलिटी में इस बारे में लिखा था, के अनुसार, जब पिछले दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति जैकब जूमा घोटालों में फंसे थे, खासतौर पर उन घोटालों में जिनमें गुप्ता परिवार भी शामिल था, तब उन्होने बैल पोत्तिंगर कि सहायता ली थी जुमा को इस संकट से उबारने के लिए। यह किताब ऐसे कई उदाहरण देती है कि कैसे राजनेता मुख्य विषय से ध्यान हटाने के लिए कुछ तथ्यों के साथ वैकल्पिक सच्चाइयों का इस्तेमाल करते हैं।

बेल का उद्देश्य यह था कि किस तरह से लोगों का ध्यान जुमा-गुप्ता घोटाले से हटाया जाए और जो उन्होने जातीय हिंसा तो फैलाकर किया – जिसकी वजह से नेल्सन मंडेला के प्रभावशाली नेतृत्व पर भी असर डाला। बेल ने “आर्थिक नस्लवाद”, जो कहता था कि अल्पसंख्यक श्वेत आबादी अभी भी देश के अधिकांश आर्थिक संसाधनों (जिसे “व्हाइट मोनोपोली कैपिटल” का लेबल दिया गया था) को नियंत्रित करती है, की अवधारणा पर लोगों का ध्यान खींचने का प्रयास किया था। बेल ने नस्लीय विभाजन का समर्थन करने वाले डाटा और शोध को हर जगह प्रसारित किया और इस्स विचारधारा को उत्तर-नस्लवादी दक्षिण अफ्रीका में कोई भी आसानी से स्वीकार कर सकता था। डाटा झूठा नहीं था लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में मंडेला द्वारा बड़ी मेहनत से फैलाया गया नस्लीय सद्भाव बिखर गया था।

ठीक ऐसा ही कॉंग्रेस भी कर रही है, चाहे यह दक्षिण बनाम उत्तर की समस्या को हवा देना हो या फिर भाजपा शासित राज्यों से जुड़ी जाति संबंधी हिंसक घटनाओं को उकसाकर हिन्दू-दलित विभाजन को बढ़ावा देना हो।

अंतिम लक्ष्य यह है कि ध्यान भटकाने वाले मुद्दों को हवा देकर मोदी के गरीब-समर्थक दृष्टिकोण और कोंग्रेसी राजवंश के घोटालों से लोगों का ध्यान हटाया जाय। अब तक तो यह प्रभावी होता हुआ प्रतीत होता है।

दूसरा, मोदी के आस पास के लोगों पर निशाना साधो, इस उम्मीद के साथ कि कुछ तो असर मोदी पर भी पड़ेगा। मैकडॉनल्ड की पुस्तक में उन्होंने उल्लेख किया है कि रुडी ग्यूलियानी का रिपब्लिकन राष्ट्रपति पद के नामांकन कैसे उनके विपक्षियों द्वारा विफल किया गया था, जिसमें मीडिया ने उनके करीबी लोगों के अल्पदोषों को लोगों के बीच खूब फैलाया था: उनके एक करीबी सहयोगी पर कोकेन बांटने का आरोप लगाया गया था, जबकि एक अन्य को वेश्यावृत्ति के धंधे से और एक तीसरे सहयोगी को कर चोरी से जोड़ा गया था। हालांकि ग्यूलियानी का इस सब से कोई लेना-देना नहीं था लेकिन इससे उनका नामांकन डालना व्यर्थ हो गया क्योंकि मतदाताओं के दिमाग में उनकी छवि उनके आस-पास के लोगों के तथाकथित दुष्कर्मों के साथ उभर चुकी थी।

ठीक ऐसा ही कॉंग्रेस को समर्थन देने वाली मीडिया कर रही है जैसे – अमित शाह के बेटे जय शाह के व्यावसायिक सौदों में कमजोर कड़ियों पर निशाना साधना, एक फर्म, जिससे पीयूष गोयल सम्बद्ध थे, की पीरमल को बिक्री पर रोना पीटना और शौर्य डोवाल द्वारा इंडिया फ़ाउंडेशन की अध्यक्षता का मुद्दा उछालना इत्यादि। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के बेटे डोवाल इस दक्षिणपंथी थिंकटैंक को चलाते हैं और कुछ समाचार रिपोर्टों में उन पर  हितों के टकराव का आरोप लगाया था क्योंकि फ़ाउंडेशन के साथ मंत्रियों की संबद्धता थी।

रणनीति स्पष्ट है: चूंकि प्रधानमंत्री की विश्वसनीयता अपने आप में अभेद्य है इसलिए उनके आस-पास के लोगों पर निशाना साधो। अब तक यह प्रयास सफल तो नहीं हुआ है लेकिन कम से कम लुटियन्स मीडिया का पूर्वाग्रहित भाग इन “खुलासों” के बारे में अति प्रसन्न है। यह तथ्य, कि सिर्फ मोदी-विरोधी मीडिया को ही इसमें कुछ सार नज़र आता है, स्वयं अपनी कहानी बयां करता है।

तीसरा, “सुप्रेस्सिओ वेरी सजेशन फालसी” जिसका मतलब है  सच्चाई का दमन झूठ फैलाने के बराबर होता है। कांग्रेस पार्टी का तीसरा पैंतरा है झूठे आरोप लगाना और वास्तविकता को दबाना। रणनीति के इस भाग की शुरूआत 2015 में हुई जब राहुल गांधी ने संसद में “सूट-बूट-की-सरकार” कहकर हंसी उड़ाई। 2014 के चुनाव से पहले इस तरह की शूट-एंड-स्कूट (मारो और भागो) रणनीति का प्रदर्शन अरविंद केजरीवाल ने किया था, जब उन्होंने मोदी को अडानी और अंबानी का बंधक होने की बात कही थी लेकिन उस समय मोदी के वादों से मुग्ध मतदाता इस तरह के आरोपों को कुछ खास तवज्जो देने के लिए तैयार नहीं थे। तब से एनडीए सरकार ने बड़े व्यवसायों के लिए कोई स्पष्ट पक्ष नहीं दिखाया है और बल्कि इंडिया आईएनसी परेशान हुई है कि प्रधानमंत्री को उनके साथ बातचीत करने की परवाह नहीं है, लेकिन आरोपों की बौछार फिर भी लगातार जारी है। इस प्रक्रिया में वास्तविकता यह है कि यह कांग्रेस थी जो अपने घनिष्ठ व्यवसायियों (राडिया टेप्स में उस आवाज को याद कीजिये जिसमें कांग्रेस को “अपनी दुकान” कहा गया है) का साथ दे रही थी और अब निष्क्रिय सी हो गयी है।

राफेल सौदे में बड़ी-बड़ी रिश्वतों के आरोप इस कीचड़ उछालने वाली रणनीति का ही एक हिस्सा हैं। बिना किसी सबूत के राहुल गांधी एक ऐसे सौदे, जो बिना किसी मध्यस्थ के सरकार से सरकार के बीच हुआ है, पर संदेह पैदा करने में कामयाब रहे हैं। बोफोर्स मामले में सोनिया गांधी के मित्र ओटावियो क्वात्रोची माल के साथ धरे गए थे; जबकि इस मामले में कोई ठोस सबूत नहीं है लेकिन फिर भी इसे राजनीतिक मुद्दा बनाया जा रहा है।

दूसरी तरफ, सरकार कि बड़े उद्योगपतियों के खिलाफ बड़ी उपलब्धियां यह हैं कि दिवाला और दिवालियापन संहिता एवं अन्य मजबूत उपायों ने बड़े व्यवसायियों को अपने मूल व्यवसायों को बंद करने के लिए मजबूर कर दिया है ( जैसे – रुईस, जयप्रकाश, जीएमआर, जीवीके और अंबानी वगैरह उन लोगों में से हैं जिन्हें अपने घाटे वाले व्यवसायों को बंद करना पड़ा था)और उन्हे कोई खास तवज्जो नहीं मिल रही।

मोदी के शासनकाल में विजय माल्या या निर्वाण मोदी जैसे फरार व्यवसायियों के बारे में ढ़ोल पीटकर कांग्रेस अपने शासनकाल में हुए घोटालों और ऋण अपराधों से पीछा छुड़ाकर इन्हें मोदी युग के गले मढ़ने में सफल हुई है। इस बीच इस तथ्य, कि सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों ही नेशनल हेराल्ड मामले में जमानत पर बाहर हैं, को मोदी सरकार द्वारा अत्याचार करने रूप में चित्रित किया जा सकता है। और यह कि, जब हमें कांग्रेस पार्टी या सोनिया एवं राहुल से एक स्पष्टीकरणयुक्त वक्तव्य नहीं मिला है कि क्यों उन्होंने नेशनल हेराल्ड, जिसके पास कुछ हज़ार करोड़ की संपत्ति का स्वामित्व है, का स्वामित्व कॉंग्रेस पार्टी के फंड का इस्तेमाल कर अपने स्वामित्व वाली एक निजी कंपनी को हस्तांतरित किया।

एक अन्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला शामिल है जिसने एससी/एसटी अत्याचार अधिनियम के कुछ प्रावधानों को हटाया था। जबकि संसद ने इस अधिनियम में संशोधन पारित करके इस फैसले को उलट दिया है, वहीं कांग्रेस पार्टी और विपक्ष इस धारणा को व्यक्त करने में कामयाब रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय ने भाजपा सरकार के कारण ऐसा किया था।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि राहुल गांधी की टीम ने मोदी के रास्ते में अड़ंगा लगाया है।

मोदी और भाजपा के लिए चुनौती स्पष्ट है। उन्हें विघटनकर्ता को विघटित करने की रणनीति की जरूरत है। दुर्भाग्यवश, मोदी और भाजपा ने इन्हें कमजोर करने वाले कारकों और कांग्रेस की चुनौती को खत्म करने के बारे में कोई बड़ी समझ नहीं दिखाई है।

जगन्नाथन स्वराज के संपादकीय निदेशक हैं। वह @TheJaggi पर ट्वीट करते हैं।