राजनीति
स्वराज्य द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का साक्षात्कर – भाग 2: “विपक्ष के पास मुझे हटाने के अलावा कोई एजेंडा नहीं है
मोदी साक्षात्कार

प्रसंग
  • प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वराज्य को दिए गए एक साक्षात्कार में 2019 में एनडीए के खिलाफ महागठबंधन की राजनीतिक चुनौतियों, एनडीए की अपने सहयोगियों की समस्याएं, कश्मीर संकट, प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में सत्ता का तथाकथिक संकेन्द्रण और भारतीय जनता पार्टी में प्रतिभावान लोगों की कमी सहित कई विषयों पर चर्चा की

30 जून को स्वराज्य को दिए गए एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री मोदी ने 2014 में यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (यूपीए) से सत्ता प्राप्त करने के बाद नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) सरकार द्वारा सामना की गई चुनौतियों, आर्थिक सुधारों को लेकर उनका दृष्टिकोण, विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों का निजीकरण, भारतीय बैंकिंग को पटरी पर लाने में किए गए प्रयास, 2019 में एनडीए के खिलाफ महागठबंधन की राजनैतिक चुनौतियों, एनडीए की अपने सहयोगियों की समस्याएं, कश्मीर संकट, प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में सत्ता का तथाकथिक संकेन्द्रण और भारतीय जनता पार्टी में प्रतिभावान लोगों की कमी सहित कई विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए।

प्रस्तुत है साक्षात्कार का दूसरा और अंतिम भागः

महागठबंधन का कोई और एजेंडा नहीं है, केवल मोदी को हटाना है

स्वराज्यः आइए हम अर्थव्यवस्था से राजनीति की ओर बढ़ते हैं। 2019 की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है और विपक्ष के महागठबंधन की काफी चर्चाएं हैं। क्या आप 1977 और 1989 में हुए इस तरह के गठबंधन की अल्पकालीन सफलता को देखते हुए इस तरह के गठबंधन के गठन से चिंतित हैं?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः भाजपा विकास और सुशासन के मुद्दों पर चुनाव लड़ती है।

विभिन्न मापदडों पर – अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, सामाजिक न्याय, विदेश नीति – हमारी सरकार ने अच्छा प्रदर्शन किया है। 2014 के बाद से देश के सभी हिस्सों के लोगों ने हमें आर्शीवाद दिया है। हमको राज्य दर राज्य मिले जनादेश ऐतिहासिक हैं। अतः हमें विश्वास है कि लोग फिर से हम पर भरोसा करेंगे।

महागठबंधन की 1977 और 1989 से तुलना करना गलत है। 1977 में गठबंधन का उभय-निष्ठ उद्देश्य हमारे लोकतंत्र को बचाना था जो आपातकाल की वजह से बड़े खतरे में था। 1989 में बोफोर्स से जुड़े बेलगाम भ्रष्टाचार ने पूरे देश को आहत किया था।

आज ये गठबंधन राष्ट्रीय हित के लिए प्रेरित नहीं हैं बल्कि खुद को राजनीति में बनाए रखने और सत्ता हासिल करने के लिए है। मोदी को हटाने के अलावा उनका और कोई एजेंडा नहीं है।

स्वराज्यः जब गठबंधन की राजनीति की बात आती है तो ऐसा लगता है कि विपक्ष भाजपा से भी एक कदम आगे है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः देश के लोगों को यह जरूर जानना चाहिए कि कांग्रेस गठबंधन की राजनीति के बारे में क्या विचार रखती है। 1989 में उनकी पार्टी पचमढ़ी में मिली, जहाँ कांग्रेस अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी ने गठबंधन की राजनीति को एक “अस्थायी अवस्था” के रूप में संदर्भित किया और पार्टी ने एक-पक्षीय शासन की अपनी इच्छा व्यक्त की।

पचमढ़ी के अहंकार की वजह से कांग्रेस अब अपने सहयोगियों की तलाश में मारी-मारी फिर रही है। वे अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं जिसको मैं ‘अस्तित्व की लड़ाई’ कहता हूँ। यह सब भारत के लोगों की वजह से है जिन्होंने कांग्रेस की मनमानी को नकार दिया।

प्रत्येक गठबंधन को एक ठोस कारक और नेतृत्वधारी पार्टी की जरूरत होती है, लेकिन देखा जाए तो आज की तारीख में कांग्रेस महज एक क्षेत्रीय पार्टी बनकर रह गई है। वे पंजाब, मिजोरम और पुडुचेरी में ही सत्ता में हैं। दिल्ली, आंध्र प्रदेश और सिक्किम विधानसभाओं में उनका कोई प्रतिनिधि नहीं है। उत्तर प्रदेश और बिहार में उनकी ‘ताकत’ से सभी अवगत हैं। तो फिर इस गठबंधन का मजबूत कारक कौन है ?

भारत के लोगों को यह भी पता है कि कांग्रेस अपने सहयोगियों के साथ कैसा व्यवहार करती है। उन्हें दूसरों को धोखा देने और बेइज्जत करने के लिए जाना जाता है फिर चाहे वह चौधरी चरण सिंह जी और एचडी देवगौड़ा जी जैसे कृषि नेता हों, चंद्रशेखर जी जैसे समाजवादी नेता हों या यहाँ तक कि चाहे वह एक मंत्री के रूप में वी पी सिंह जी हों। अपने स्वार्थ के लिए कांग्रेस हर चीज को बलिदान कर सकती है।

स्वराज्यः लेकिन ऐसा लगता है कि वे अब एक महागठबंधन में एकजुट होने वाले हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः विपक्ष में कोई महागठबंधन नहीं है, वहाँ केवल प्रधानमंत्री बनने की महादौड़ चल रही है। राहुल गांधी कहते हैं कि वह प्रधानमंत्री बनने के लिए तैयार हैं, लेकिन तृणमूल कांग्रेस इससे सहमत नहीं है। ममता जी प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं लेकिन वाम दल इसके खिलाफ है। समाजवादी पार्टी सोचती है कि उनका नेता दूसरों की तुलना में प्रधानमंत्री बनने का सबसे ज्यादा हकदार है। पूरा ध्यान सत्ता की राजनीति पर है न कि लोगों की प्रगति पर।

मोदी के प्रति घृणा एकमात्र कारण है जिसने विपक्ष को बांध रखा है और ऐसा नहीं है कि उन्होंने 2014 में और आने वाले कई राज्य चुनावों में महागठबंधन करने की कोशिश नहीं की थी। नतीजे सभी के सामने हैं।

इन दलों के नेताओं की आपसी नापसंदगी और अविश्वास कितने दिनों तक इनको साथ रखने में कामयाब हो सकता है? वह पश्चिम बंगाल और केरल जैसे विभिन्न राज्यों में एक-दूसरे के खिलाफ प्रत्यक्ष और द्वेशपूर्ण मुकाबले में शामिल हैं। पिछली दफा इन दलों ने जब उत्तर प्रदेश (1993) में एक सरकार का गठन किया था, तब उनकी सरकार दो साल भी नहीं चल सकी थी। इस तरह की अस्थिरता हमारे राष्ट्र की वृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।

स्वराज्यः लेकिन उन्होंने हाल ही में कर्नाटक में सरकार बनाई है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः संभवतः जो कुछ भण्डार में है उसका एक ट्रेलर कर्नाटक में देखा जा सकता है। चुराए हुए जनादेश से एक सरकार का गठन किया गया लेकिन इसके बावजूद कलह जारी रही। आप उम्मीद करेंगे कि मंत्री विकास के मुद्दों को हल करने के लिए एक दूसरे से मिलें लेकिन कर्नाटक में वे केवल कलह के समाधान के लिए एक दूसरे से मिलते हैं। विकास के ऊपर किसी का ध्यान नहीं है।

किसी भी चुनाव में गैर-वैचारिक और मौकापरस्त गठबंधन से अराजकता फैलना निश्चित है।

अगला चुनाव एक तरफ शासन और विकास तथा दूसरी तरफ अराजकता के बीच एक चयन होगा।

स्वराज्यः विपक्ष की राजनीति लगातार विकसित होगी लेकिन जब एनडीए की बात आती है तो चीजें ठीक नज़र नहीं आ रहीं। 2014 में भाजपा को एक ऐतिहासिक बहुमत प्राप्त हुआ और एनडीए को अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ स्कोर मिला लेकिन सहयोगियों की स्थिति भाजपा जैसी नहीं है। क्या आज की एनडीए एक कमजोर एनडीए है?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः आपका सवाल दो दशक देर से है! ऐसा लगता है कि आप 90 के दशक में जी रहे हैं, जब एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सवाल था, क्या सहयोगी अटल जी के पास आयेंगे? क्या अन्य पार्टियाँ कभी भाजपा का समर्थन करेंगी? 1996 में भाजपा सरकार तो नहीं बना सकी लेकिन दो साल बाद, अटल जी के नेतृत्व में एक विस्तारित एनडीए ने छह साल तक देश की सेवा की।

आज, चीजें पहले से बहुत बेहतर हैं। एनडीए 20 दलों का एक विशाल और खुशहाल परिवार है। यह विभिन्न राज्यों में मजबूत गठबंधनों का नेतृत्व कर रहा है। अन्य कौन से गठबंधन के पास इतनी प्रभावशाली सदस्यता है और कौन इतने सारे राज्यों में सेवारत है?

मैं आपको 2014 के चुनाव प्रचार अभियान की फिर से याद दिलाना चाहता हूँ जब कुछ लोगों ने पूछा था कि, “क्या मोदी को भी सहयोगी मिल सकते हैं?” तथ्य यह था कि उस समय हमारे पास 20 से अधिक पार्टियों का गठबंधन था !

हां, यह सच है कि 2014 में भाजपा के लिए जनादेश काफी विशेष था। उस समय हम अपने दम पर आसानी से सरकार बना सकते थे। लेकिन हमने ऐसा नहीं किया, इसके बजाय हमने एनडीए सहयोगियों को साथ लिया और उन्हें सरकार का हिस्सा बनाया।

आप यह जरुर समझें कि हम भाजपा में एनडीए की तरफ कैसा रुख रखते हैं। एनडीए हमारी मजबूरी नहीं है। यह विश्वास का एक सूत्र है। एक विशाल और विविध एनडीए भारत के लोकतंत्र के लिए अच्छा है।

हमारे जैसे देश में, क्षेत्रीय आकांक्षाओं का सम्मान करना सबसे महत्वपूर्ण है। एनडीए भारत भर में इन आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है।

स्वराज्यः भाजपा पर आते हैं, यह अपने सामाजिक आधार को विस्तारित करने के लिए क्या कर रही है? आपके कुछ पुराने आधार, जैसे व्यापारी, जीएसटी से नाखुश थे। आपको अक्सर एक हिन्दी-बेल्ट पार्टी के रूप मे देखा जाता है…

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः भाजपा के पास एक संकीर्ण सामाजिक आधार है, यह लोगों के एक चुनिंदा समूह द्वारा बनायी गयी एक पुरानी मिथक है। हमें ब्राह्मण-बानिया पार्टी कहा जाता था, इसके बाद यह कहा गया कि हम एक शहरी पार्टी हैं और फिर हमें उत्तर भारत की पार्टी भी कहा गया। यह बात पूरी तरह गलत है।

हमारी पार्टी एक ऐसी पार्टी है जो सभी सामाजिक समूहों से समर्थन खींचती है। हमारा सामाजिक आधार बहुत व्यापक है। कुछ पार्टियां हैं जो केवल परिवारों द्वारा संचालित होती हैं और यही पार्टियाँ हैं जो कुछ ही सामाजिक समूहों से अपनी ताकत प्राप्त करती हैं।

1984 में, जब हमने केवल दो सीटें जीती थीं तो उनमें से एक सीट दक्षिण से थी और दूसरी पश्चिम से (दोनों गैर-हिंदी बोलने वाले राज्य)।

चूंकि आपने मुझसे भाजपा और पार्टी के सामाजिक आधार के बारे में पूछा है, इसलिए आपको गुजरात में भाजपा के प्रदर्शन का अध्ययन करना चाहिए। लगातार और सिलसिलेवार ढंग से हम वहां जीत रहे हैं। इस बार भी हमने 49 प्रतिशत वोटों के साथ जीत दर्ज की है। एक पार्टी का 27 साल तक राज्य की सत्ता में रहना सामान्य नहीं है।

स्वराज्यः लोगों के बीच एक सोच यह है कि उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में भाजपा कमजोर हो रही है, जहां आपने 2014 में और फिर 2017 के विधानसभा चुनावों में कई सीटें जीती थीं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः इस मुद्दे पर, आपको हमेशा दो तरह के विचार मिलेंगे: एक, हवा  अभी भी बरक़रार है। दूसरा, हवा बहुत लंबे समय पहले ख़त्म हो चुकी है।

आप सभी राजनीति के अनुभवी समीक्षक हैं। मैं इसे आपकी बुद्धिमत्ता पर छोड़ता हूं, और इस विषय पर आप अपनी राय विकसित कीजिए।

मेरे पास साझा करने के लिए एक छोटी सी कहानी है। 1998 के गुजरात चुनावों से पहले भाजपा ने गुजरात के कुछ स्थानीय चुनावों में बहुत अच्छा प्रदर्शन नहीं किया था। बहुत से लोगों ने मुझसे पूछा कि क्या हम विधानसभा चुनावों में जीत हासिल कर पाएंगे। प्रारंभ में, मैंने प्रसंग की व्याख्या करने की कोशिश की और यह भी समझाया कि कैसे एक स्थानीय चुनाव की गतिशीलता विधानसभा चुनाव से अलग होती है। लेकिन, आखिर में मैंने चुनाव की प्रकृति, हमारे प्रयासों, और एक बड़ी छवि इत्यादि के बारे में विवरणयुक्त एक छोटा फ़ोल्डर बनाया। जिसने भी मुझसे पूछा, मैंने उसे वह फ़ोल्डर दे दिया और कहा, आप इसका अध्ययन करें और फिर मेरे पास आएं।

1998 में जब चुनाव हुआ, तो भाजपा ने गुजरात में शानदार दो-तिहाई बहुमत के साथ सरकार बनाई!

स्वराज्य: जब हम चुनावों की बात करते हैं, तो क्या आपको लगता है कि एक राष्ट्र, एक चुनाव का आपका विचार निकट भविष्य में अमल में आएगा? इस पर कोई भी आपका समर्थन क्यों नहीं कर रहा है?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः सबसे पहले, ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ का विषय नरेंद्र मोदी का विचार नहीं है। यह एक ऐसा मुद्दा है जो बहुत सारे लोगों द्वारा अलग अलग समय में उठाया गया है। श्री प्रणव मुखर्जी और श्री लालकृष्ण आडवाणी जैसे प्रतिष्ठित राजनेताओं ने इसके बारे में बात की है। हाल ही में, श्री नवीन पटनायक ने भी इस विचार का समर्थन किया है।

बल्कि, यदि आप 1947 के बाद के भारतीय इतिहास को याद करें, तो सभी राज्यों में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ आयोजित किए गए थे, जिसका मतलब है कि ऐसा होने के लिए पूर्ववर्तिता भी है।

क्या आप जानते हैं कि भारत में एक आम मतदाता सूची नहीं है… जिसका अर्थ यह है कि संसदीय और विधानसभा चुनावों के लिए सूची तथा स्थानीय स्तर के चुनावों के लिए सूची भिन्न- भिन्न हैं।

चुनावों का बार-बार होना और जिस तरह से इनका प्रसार या बिखराव है, इसका अर्थ है कि इसे बार-बार अपडेट रखने के लिए संसाधनों को समर्पित करना, वह भी बिना किसी गारंटी के कि इस सूची का इस्तेमाल इस मतदान के बाद अगले मतदान में किया जायेगा।

मतदाताओं को यह जांचते रहना होता है कि उनके नाम सूची में हैं या नहीं। एक उभय-निष्ठ मतदाता सूची और समकालिक चुनाव इसे परिवर्तित कर देंगे। यहां तक कि त्रुटियों और चूक की गुंजाईश में भी काफी हद तक कमी आएगी।

स्वराज्य: इस विचार के क्या फायदे हैं?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः जनता के सेवक के रूप में, हमारी मुख्य भूमिका अच्छे शासन को सुनिश्चित करना और उन लोगों की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करना है जिन्होंने हमारे ऊपर विश्वास जताया है।

चुनावों के एक साथ न होने के कारण चुनावी आचार संहिता के लम्बे मॉडल के साथ-साथ चुनाव प्रचार अभियानों की अवधि की बारम्बार आवृत्ति होती है, जिसके कारण विकास के निर्णयों में देरी होती है।

चुनाव के दौरान की सम्पूर्ण प्रक्रिया में बहुत सारे संसाधन शामिल होते हैं। अलग-अलग समय पर चुनावों के आयोजन का अर्थ है राजकोष पर एक भारी बोझ।

चुनावों के लिए उचित सुरक्षा उपायों की आवश्यकता होती है। संयुक्त चुनाव का मतलब होगा कि हमारे कर्मचारी चुनाव में ड्यूटी पर कम समय व्यतीत करेंगे और अपने संबंधित राज्यों में अधिक समय, बेहतर व्यवस्था और सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित कर पाएंगे।

मेरा विचार यह भी है कि वर्तमान रूप में चुनाव अभियान चक्र संघीय ढांचे को कमजोर करता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि चुनाव से पहले का अभियान अक्सर आक्रामक प्रकृति का हो जाता है और केंद्र और राज्यों के दल अक्सर एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होते हैं।

चुनाव के लिए एक विशिष्ट समय समर्पित करके, चुनाव के बाद की अवधि देश भर में सभी निर्वाचित सरकारों के लिए शासन और विकास हेतु पूरे कार्यकाल की उपलब्धता को सुनिश्चित करती है।

इस प्रकार, लोकसभा और विधान सभा चुनावों को एक साथ आयोजित करने से संसाधनों की कम बर्बादी होगी और यह भारत की प्रगति के उभयनिष्ठ प्रयास के लिए सहकारी संघवाद की भावना में एक साथ काम करने की स्वस्थ संस्कृति को शक्ति प्रदान करेगा।

मैं आपके जैसे मीडिया संगठनों, नीति में रूचि रखने वालों और युवाओं से इस विषय के बारे में अधिक से अधिक चर्चा करने के लिए कहता हूँ और प्रभावी फ्रेमवर्क्स के साथ आने के लिए कहता हूँ जिसके माध्यम से यह विचार चलन में लाया जा सके।

माओवादी खतरा, उत्तर-पूर्व विद्रोह और जम्मू-कश्मीर में प्राथमिकताओं पर विचार

स्वराज्य: अब क्या हम राजनीति से आंतरिक सुरक्षा की तरफ बढ़ सकते हैं? क्या माओवाद के खतरे को कम करने वाली सरकार की नीतियां काम कर रही हैं?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः चूंकि आपने आंतरिक सुरक्षा के बारे में पूछा था, सबसे पहले मैं अपने बहादुर सुरक्षा बलों को सलाम करना चाहूँगा जो हमेशा मुस्तैद रहते हैं तथा 125 करोड़ भारतीयों के लिए शांति के साथ-साथ समृद्धि भी सुनिश्चित कर रहे हैं। आप इस तथ्य से हमारी सुरक्षा स्थिति का पता लगा सकते हैं कि यूपीए के तहत आम तौर पर बार-बार होने वाले आतंकवादी हमले अब एक इतिहास हैं।

यदि पिछले चार वर्षों में माओवादी हिंसा की घटनाओं के आंकड़ों की बात करें तो इससे प्रत्येक भारतीय को खुश होना चाहिए। प्रभावित राज्यों में माओवादी हिंसा में 20 प्रतिशत की गिरावट आई है और इसके साथ ही साल 2013 की तुलना में 2017 में इससे जुड़ी मौतों की संख्या में 34 प्रतिशत गिरावट आई है।

भौगोलिक रूप से भी माओवादी हिंसा के प्रभाव में काफी हद तक कमी आई है।

स्वराज्य: लेकिन क्या यह केवल सुरक्षा और सेना के बारे में ही है या विकास के बारे में भी है?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः यह सच है कि माओवादी हिंसा ने मध्य और पूर्वी भारत के कई जिलों की उन्नति को  ठप कर दिया था। इसीलिए 2015 में, हमारी सरकार ने माओवादी हिंसा को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए विस्तृत “राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना” तैयार की। हिंसा को बिल्कुल भी बर्दाश्त न करने की नीति के साथ-साथ हमने इन क्षेत्रों के गरीब जनों के जीवन में एक सकारात्मक बदलाव लाने के लिए आधारभूत ढांचे और सामाजिक सशक्तिकरण को बड़े पैमाने पर गति प्रदान करने पर भी ध्यान केंद्रित किया है।

अद्वितीय विकास प्रचुर मात्रा में लाभांश प्राप्त कर रहा है।

माओवाद-प्रभावित लगभग 34 जिलों में करीब 4,500 किलोमीटर सडकों का निर्माण पहले ही किया जा चुका है। पहले इस तरह की गति और इस पैमाने पर कार्य का होना कल्पनीय भी नहीं था।

कनेक्टिविटी में और अधिक वृद्धि के लिए लगभग 2,400 मोबाइल टॉवर स्थापित किए गए हैं और इसके अलावा 4,072 अतिरिक्त टॉवरों को मंजूरी दे दी गई है।

जब हमने कार्यालय संभाला, तब हमें पता चला कि माओवादी हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित 35 जिलों में से 11 जिलों में कोई केन्द्रीय विद्यालय नहीं था। अब आठ नए केन्द्रीय विद्यालय और पांच नए जवाहर नवोदय विद्यालय बच्चों को गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान कर रहे हैं।

ये बड़े आवासीय विद्यालय, विज्ञान, आईटी शिक्षा और अतिरिक्त पाठ्यक्रम गतिविधियों के अनुरूप प्रशिक्षित शिक्षकों और उत्कृष्ट आधारभूत संरचना से सुसज्जित हैं। युवाओं की आकांक्षाओं को पूरा करने हेतु इन स्थानों पर 15 आईटीआई और 43 कौशल विकास केंद्र स्थापित किए गए हैं।

माओवाद-प्रभावित क्षेत्रों में बैंकों तक पहुंच सीमित थी। अप्रैल 2015 और दिसंबर 2017 के मध्य माओवादी हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित 35 जिलों में लगभग 430 नई बैंक शाखाएं और 1,045 एटीएम खोले गए हैं।

मैंने स्वयं कई अवसरों पर छत्तीसगढ़, झारखंड और पश्चिम बंगाल की यात्रा की है। 14 अप्रैल (अम्बेडकर जयंती) को आयुष्मान भारत (जिसमें प्रत्येक चयनित परिवार का 5 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा किया जाता है) के पहले चरण की शुरुआत बस्तर, सबसे ज्यादा माओवाद प्रभावित जिलों में से एक, जिले से की गयी थी।

स्वराज्यः क्या वामपंथी चरमपंथ (Left Wing Extremismएलडब्ल्यूई) के तहत क्षेत्र वास्तव में सिकुड़ गया है?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः कोई भी क्षेत्र स्वयं को एलडब्लूई-प्रभावित क्षेत्र कहलाना पसंद नहीं करता। यह स्थानीय आबादी की मानसिकता पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। परिवर्तित जमीनी वास्तविकताओं के आधार पर एलडब्ल्यूई प्रभावित इलाकों की सूची से 126 जिलों में से 44 जिलों को हटा दिया गया है। ये वो जिले हैं जिनमें पिछले चार वर्षों से कोई भी अहिंसा नहीं दिखी है।

सरकार की नीतियों, विकास पर जोर और किसी भी हिंसा के लिए शून्य सहनशीलता के कारण 2014 से 2017 तक लगभग 3,380 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है। 2010 से 2013 तक, यह संख्या लगभग 1,380 थी।

भारत, जोकि महात्मा गांधी, भगवान बुद्ध और भगवान महावीर का देश है, अहिंसा और भाईचारे का समृद्ध इतिहास रखता है।

लोगों की समस्याओं का समाधान विकास हो सकता है, हिंसा नहीं। और यही कारण है कि हमारा दृष्टिकोण (किसी भी तरह की हिंसा और अशांति के लिए कोई सहनशीलता न रखते हुए) हिंसा से ग्रस्त क्षेत्रों के विकास के लिए अद्वितीय संसाधनों को समर्पित करना है।

स्वराज्यः जबकि हम सुरक्षा के बारे में बात कर रहे हैं तो हम आपकी व्यक्तिगत सुरक्षा का भी सवाल उठाना चाहते हैं। आपके शुभचिंतक आप के इन रोड शो को देखकर बहुत बेचैन महसूस करते हैं और अब उनकी संख्या में बढ़ोत्तरी ही हो रही है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः जब भी मैं यात्रा करता हूं, मैं देखता हूं कि प्रत्येक आयु समूह और समाज के हर वर्ग से बहुत से लोग मेरा अभिवादन और स्वागत करते हैं।

मैं उनके इस स्नेह और परवाह को देखकर उनसे दूर अपनी कार में बैठा नहीं रह सकता। यही कारण है कि मैं हमेशा नीचे उतर जाता हूं और अधिक से अधिक लोगों को नमस्कार करता हूं तथा उनसे रूबरू होता हूं।

मैं शहंशाह या एक शाही शासक नहीं हूं जो उनकी गर्मजोशी से अप्रभावित रहूँ। लोगों के बीच होने से मुझे बहुत ताकत मिलती है।

स्वराज्यः जम्मू-कश्मीर में आपकी कल्पनानुसार गठबंधन नहीं चला। अब वहां राज्यपाल शासन है, तो राज्य के लिए क्या उद्देश्य है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीःकश्मीर में हमारा लक्ष्य अच्छा शासन, विकास, जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व है।

स्वराज्यः क्या हितधारकों से बातचीत होगी?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः हमने एक वार्ताकार नियुक्त किया है और वह कई लोगों के संपर्क में हैं। वह अंदरूनी क्षेत्रों की यात्रा कर रहे हैं और से लोगों के साथ जुड़ रहे हैं।

स्वराज्यः भाजपा ने राजनीतिक रूप से पूर्वोत्तर में अपने पांव पसार लिए हैं, लेकिन क्या अब यहाँ सुरक्षा की स्थिति बेहतर है?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः पूर्वोत्तर की सुरक्षा व्यवस्था में काफी सुधार हुआ है। पिछले 20 सालों में पहली बार 2017 में, हमारे पास विद्रोह से संबंधित हताहतों तथा नागरिकों और सुरक्षा बलों के बीच टकराव की सबसे कम घटनाएं थीं!

त्रिपुरा और मिजोरम विद्रोह से लगभग मुक्त हैं। मेघालय में, 31 मार्च 2018 से सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम को सभी क्षेत्रों से हटा दिया गया था और अरुणाचल प्रदेश में अब केवल आठ पुलिस स्टेशन ही शेष हैं।

हमने पूर्वोत्तर में हमारे भाइयों एवं बहनों की रक्षा के लिए हर सम्भव प्रयास किए हैं। इस पूरे क्षेत्र में पुलिस के बुनियादी ढांचे को मजबूत बनाया जा रहा है। जहाँ भी जरूरत है, वहाँ अतिरिक्त भारतीय रिजर्व बटालियन्स को भेजा जा रहा है।

यह बेहद दर्दनाक है जब भटके हुए युवाओं को हिंसा के रास्ते पर ले जाया जाता है। हम इन युवाओं को मुख्यधारा में वापस लाना चाहते हैं ताकि वे भारत के विकास में योगदान दे सकें। पूर्वोत्तर में, हमारी एक आत्मसमर्पण-सह-पुनर्वास योजना है। अप्रैल 2018 में हमने इस योजना में संशोधन किया ताकि जो युवा भटककर आतंकवाद की तरफ चले गए थे, वे मुख्यधारा में वापस आ जाएं।

जैसा कि मैंने माओवादी हिंसा के संदर्भ में बताया, विकास पर जोर से समृद्ध लाभांश प्राप्त हो रहा है।

पूर्वोत्तर की देखभाल करने वाला मंत्रालय इस क्षेत्र के सर्वांगीण विकास को सुविधाजनक बनाने में पूरी तरह से तल्लीन है। बल्कि यहाँ एक सिस्टम है जो वास्तव में प्रत्येक 15 दिन में एक मंत्री या वरिष्ठ अधिकारी का पूर्वोत्तर दौरा सुनिश्चित करता है। मैंने स्वयं इस क्षेत्र का लगभग 30 बार दौरा किया है।

मोदी का साक्षात्कार 2स्वराज्यः पूर्वोत्तर भी बाकी भारत से बेहतर तरह से जुड़ा रहा है…

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः कनेक्टिविटी एक क्षेत्र के विकास को बढ़ावा देती है। यह हमारी सरकार थी जिसने त्रिपुरा, मिजोरम और मेघालय को भारत के रेलवे मानचित्र पर रखने का गौरव प्राप्त किया।

इसके अलावा, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम और त्रिपुरा देश के ब्रॉड-गेज (बड़ी लाइन) मानचित्र पर मौजूद हैं।

कुछ हफ्ते पहले, तीन दशकों में पहली कामर्शियल फ्लाइट अरुणाचल प्रदेश पहुंची। सड़क नेटवर्क का विस्तार किया जा रहा है और जल-मार्गों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

केंद्र, जैविक खेती में पूर्वोत्तर की क्षमता का उपयोग करने के लिए इसे संसाधन उपलब्ध करा रहा है। सिक्किम ने इस क्षेत्र में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया है और अन्य राज्य भी इस क्षेत्र की समृद्ध क्षमता तक पहुँच रहे हैं।

विकास पर जोर के साथ सुरक्षा की एक सुधरी हुई स्थिति लोगों को हिंसा और अस्थिरता के खतरों पर आश्वस्त कर रही है। यह राज्य के युवाओं की आकांक्षाओं को भी पूरा कर रही है।

प्रधानमंत्री कार्यालय की उत्प्रेरक भूमिका, सरकार के पास ‘प्रतिभा की कमी‘ और कांग्रेस की आपातकाल संस्कृति‘

स्वराज्यः चलिए अब बात करते हैं सरकार की। ऐसा कहा जाता है कि हाल के वर्षों में यह सबसे सशक्त पीएमओ है? एक कार्यालय के हाथ में सभी शक्तियों का संकेंद्रण हमारे राष्ट्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीःआपके प्रश्न का उत्तर आपके प्रश्न में ही निहित है। अगर वर्तमान पीएमओ की तुलना पिछले पीएमओ के साथ की जाए, तो मुझे नहीं लगता कि कोई भी इसे अधिक निर्णायक और शक्तिशाली देखकर आश्चर्यचकित होगा। हर कोई जानता है कि यूपीए सरकार के तहत चीजें कैसे चलती थीं। पीएमओ को सुशासन का अच्छा चालक होने के बजाय राजनीतिक के खेल तक सीमित कर दिया गया था। और जब भी राजनीति को प्रमुखता मिलती है तो शासन एक द्वितीयक वस्तु होता है।

इस एनडीए सरकार के अंतर्गत ऐसी कोई गलतफहमी या अनुचित वरीयता नहीं है। प्रत्येक संस्थान को और शासन के हर स्तर को वह सब करने के लिए सक्षम और सशक्त बनाया गया है जिसके ये उत्तरदायी हैं। पीएमओ भी अनिवार्य स्पष्टता, निर्णायकता और सुगमता, जो कि सरकार के लिए सुशासन और विकास के अपने वादे को पूरा करने के लिए आवश्यक हैं, प्रदान करने के अपने उत्तरदायित्व का निष्ठापूर्वक और प्रभावी रूप से निर्वहन करता है।

स्वराज्य: यह स्पष्टीकरण बहुत आम है …

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः सामान्योक्तियों से परे जाने के लिए, किसी को भी हमारी सरकार की प्रणाली की अंतर्निहित संरचना को समझना चाहिए। प्रत्येक कार्यालय की भूमिका और जिम्मेदारियां व्यवसाय के नियमों के आवंटन में स्पष्ट रूप से निर्धारित की जाती हैं। पीएमओ का शासनादेश प्रधानमंत्री को सचिवीय सहायता प्रदान करता है। मंत्रालय अपने संबंधित कार्यक्षेत्रों और उपक्रमों में शासन एजेंडा चलाते हैं, जबकि समस्तरीय कार्यालय जैसे नीति अयोग, कैबिनेट सचिवालय और पीएमओ क्रॉस-सेक्टरल, दीर्घकालिक, बड़ी तस्वीर का परिप्रेक्ष्य प्रदान कर सकते हैं।

इसलिए, उत्प्रेरक एजेंट के रूप में कार्य करते हुए, पीएमओ ‘टीम इंडिया’, -एक टीम जिसमें न केवल हमारे केंद्रीय मंत्रालय शामिल हैं, बल्कि प्रत्येक राज्य सरकार भी शामिल है, के विभिन्न सदस्यों के एजेंडा और प्राथमिकताओं को सुगम, समन्वयित और समेकित करता है। हमारी प्रगति पहल का ही उदाहरण ले लीजिए, जिसमें तकनीक का उपयोग करके हम हर महीने सभी केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य सरकारों और यहां तक कि जिला प्रशासनों को समस्याओं को हल करने और पुराने मुद्दों और चुनौतियों, जो दशकों से चली आ रही हैं, को एक ही मंच पर ले आते हैं। क्या आप इसे केंद्रीकरण और हस्तक्षेप, या निर्णायक हस्तक्षेप मानेंगे जो सक्रिय और सक्षम बनाता है?

मैं आपको हेल्थकेयर का एक और उदाहरण देता हूँ। आज भारत इस क्षेत्र में एक परिवर्तन देख रहा है। भारत की प्रगति को स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, महिला और बाल विकास मंत्रालय, रसायन और उर्वरक मंत्रालय, आयुष मंत्रालय, पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के शानदार टीमवर्क द्वारा शक्ति प्रदान की जा रही है। पीएमओ कई अलग-अलग मंत्रालयों और विभागों को समायोजित करने और एक साथ लाने में सहायता प्रदान करता है। पहले विभागों के अकेले-अकेले काम करने से आपस में सूचना का आदान-प्रदान नहीं था लेकिन अब हम एक साथ काम करने की वज़ह से समाधान की तरफ काम कर रहे हैं|

कुल मिलाकर, कुछ चुनिन्दा ‘ताकतवर’ व्यक्तियों की सनक और पसंद पर चलने वाला पूर्ववर्ती शासन निर्णायक रूप से एक संस्थागत और लोकतान्त्रिक शासन प्रक्रिया, जो हमारे संविधान में हमारे दूरदर्शी पूर्वजों द्वारा निर्धारित नियमों पर अक्षरशः काम कर रही है, से प्रतिस्थापित कर दिया गया है।

इस पीएमओ में 125 करोड़ लोग हमारे ‘आलाकमान’ हैं।

स्वराज्य: ऐसा लगता है जैसे आपके मंत्रालय में प्रतिभा की कमी है … कुछ मंत्री अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहे हैं …

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः यह एक गलत धारणा है। सिर्फ इसलिए कि केवल कुछ मंत्रियों और मंत्रालयों द्वारा इनके कार्यों को मुख्य पृष्ठों या प्राइम-टाइम बहस पर दिखाया गया तो उन्हें प्रतिभाशाली माना जाता है और दूसरों को इसके विपरीत समझा जाता है। पारंपरिक मानसिकता मंत्रालयों को एक ही तराजू में तोलती है और उनके मूल्य के बारे में अनुमान लगाती है।

हालांकि, इस सरकार की कार्य संस्कृति अलग है। मैं कुछ उदाहरणों के साथ अपनी बात रखना चाहूंगा।

चलिए अब बात करते हैं ग्रामीण आवास के बारे में। यह एक ऐसा क्षेत्र नहीं है जो शहरों या डिजिटल दुनिया से जुड़ा हो।

पिछले चार वर्षों में ग्रामीण इलाकों में एक करोड़ से ज्यादा घरों का निर्माण हुआ है। यह एक बड़ी संख्या है। करोड़ों भारतीय जिनके सिर पर छत नहीं थी, अब उनके पास खुद के घर हैं।

अब आपको ग्रामीण आवास पर काम कर रही टीम द्वारा किए गए कार्यों के बारे में बताते हैं, यूपीए ने अपने पिछले चार वर्षों में 2010 से 2014 तक 25 लाख घर बनवाए थे। एनडीए सरकार ने जो निर्माण करवाया है यह उसका एक चौथाई हिस्सा है। यह कार्य एक ऐसे व्यक्ति ने किया है जिसे कई मीडिया वाले ‘गैर प्रतिभाशाली’ कहेंगे।

मैं आपको सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय का एक और उदाहरण देना चाहूंगा।

पारंपरिक बुद्धिमत्ता से पता चलता है कि इस मंत्रालय में “ग्लैमर” नहीं है और इसलिए यह उतनी खबरें नहीं बनाता, जितनी इसे बनानी चाहिए, लेकिन मैं आपको इस विभाग द्वारा किए गए असाधारण कामों की एक झलक दिखाता हूं।

इस साल, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदायों के कल्याण के लिए बजट आवंटन 95,000 करोड़ रुपये था और ओबीसी के कल्याण के लिए बजट में 41 प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई थी।

यह इस ‘गैर प्रतिभाशाली मंत्री’ के अंतर्गत था कि हमारी सरकार को अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति अधिनियम में सबसे मजबूत संशोधन लाने का गौरव प्राप्त हुआ।

भारत सरकार, डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर से जुड़े पांच उल्लेखनीय स्थानों को ‘पंचतीर्थ’ के रूप में विकसित कर रही है। राजधानी दिल्ली के 26, अलीपुर रोड पर महापरिनिर्वाण भूमि और 15, जनपथ पर डॉ. अम्बेडकर इंटरनेशनल सेंटर – मुझे इन दो मामलों में शिलान्यास करने और इन इमारतों का उद्घाटन करने का गौरव प्राप्त हुआ।

दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 ने दिव्यान्गता के प्रकारों को 7 से बढाकर 21 तक कर दिया है। पहली बार, एसिड अटैक के पीड़ितों को इस सूची में शामिल किया गया है। अधिनियम में 6 से 18 वर्ष की आयु के दिव्यांग बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा के अधिकार के प्रावधान हैं।

सरकारी नौकरियों के लिए दिव्यान्गों के लिए आरक्षण 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 4 प्रतिशत कर दिया गया है। यह हमारे दिव्यांग भाइयों और बहनों के लिए कई और अवसर लाएगा।

पिछले चार वर्षों में, मंत्रालय ने 7,200 से अधिक शिविरों की मेजबानी की है जिसके कारण 11 लाख दिव्यांगों को सहायता मिली है।

विकलांगों के लिए प्रतिष्ठा और समानता के अवसर सुनिश्चित करने के लिए सुगम्य भारत अभियान के तहत भरपूर कोशिश की गई है। इन सक्रिय प्रयासों के फलस्वरूप, सरकारी भवनों तक पहुँच को सुलभ बनाने की गति बेमिसाल है। इसी प्रकार सभी 34 अंतरराष्ट्रीय और 48 घरेलू हवाई अड्डे अभिगम्य हो गए हैं, इसी तरह ए1, ए और बी श्रेणी के 709 रेलवे स्टेशन में से 644 स्टेशन भी अब अभिगम्य हैं।

ये सभी काम अन्य विभागों के साथ वैचारिक आदान-प्रदान और समन्वय के सम्बन्ध में मंत्रालय की सक्रिय भूमिका के कारण पूरे हुए हैं।

इस साक्षात्कार में भी मैंने कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति के बारे में विस्तार से बात की है … एक ‘गैर-प्रतिभाशाली’ मंत्री के अंतर्गत विभाग ने, मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजनाओं जैसी भविष्य की पहलों की शुरुआत की है जो करोड़ों किसानों की मदद कर रही हैं।

मैंने ये केवल तीन उदाहरण दिए हैं … मुझे अपने सभी सहयोगियों और उनके काम पर गर्व है।

स्वराज्य: इस तरह की कुछ अतिवादी धारणायें पनप रही हैं कि भाजपा के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संस्थानों की पवित्रता का लोप हो रहा है। इस पर आप क्या जवाब है?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः आपने स्वयं इन धारणाओं के लिए सही शब्द का उपयोग किया है – अतिवादी!

हाल ही में, देश ने आपातकाल की 43वीं बरसी मनाई। यह प्रेस की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संस्थानों की पवित्रता और लोकतंत्र पर हमला था। हमारे कई वरिष्ठ नेताओं ने आपातकाल के आघात को सहन किया क्योंकि वे इन अधिकारों हेतु लड़ने के लिए खड़े हुए थे।

वास्तव में, हमारे कुछ नेता, जिनमें पदस्थ कैबिनेट मंत्री, विभिन्न राज्यों के मंत्री शामिल थे, आपातकाल के दौरान जेल गए और लाठियां खायीं। यह दर्शाता है कि हम लोकतांत्रिक मूल्यों और स्वतंत्रता को कितना संजोते हैं। इसलिए भाजपा के अंतर्गत संस्थानों की क्षति के बारे में ऐसी बातें मुझे बेतुकी और गलत लगती हैं। यह किसी भी तरह से हमारी मूल्य प्रणाली नहीं है।

वास्तव में, यदि आप 1947 के बाद के भारतीय इतिहास को देखें, तो पता चलता है कि यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ही है जिसने हमारे लोकतंत्र, न्यायपालिका और मीडिया को बार-बार विकृत किया है।

1959 की शुरुआत में, जब भारत को गणराज्य बने हुए एक दशक से भी कम समय हुआ था, नेहरू सरकार ने केरल में लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार को खारिज कर दिया था। कांग्रेस सरकार द्वारा लगाए गए अनुच्छेद 356 पर कई बार किया गया एक विस्तृत अध्ययन इस बात का एक सिहरन भरा दृश्य प्रस्तुत करेगा कि उन्होंने हमारे लोकतंत्र के साथ कैसे खिलवाड़ किया। श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने स्वयं 50 से अधिक बार अनुच्छेद 356 लगाया और वह भी निर्बल आधारों पर। अगर एक परिवार को कोई एक विशेष राज्य सरकार पसंद नहीं आई, तो सभी संसाधन इसे बर्खास्त करने या गिरा देने के लिए समर्पित थे।

स्वराज्य: लेकिन वह युग तो खत्म हो गया है …

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः कांग्रेस पार्टी की संस्कृति आपातकाल की संस्कृति है, जो यकीनन 1947 के बाद सबसे काली अवधि थी। मीडिया, अदालतों और सरकार की शक्तियों को सत्ता की राजनीति और एक लोकतांत्रिक मानसिकता के लिए बंधक बना दिया गया था।

पिछले सात-आठ वर्षों में घटी घटनाओं को भी देखें। कांग्रेस ने हर संभव संस्थान को बदनाम करने के लिए सारी हदें तोड़ दीं। मोदी से नफरत करते-करते वे भारत से नफरत करने लगे।

चाहे कांग्रेस सत्ता में हो या विपक्ष में, उसके पास हर मौके के लिए अलग-अलग तरकीबें हैं, लेकिन फिर भी संस्थानों के लिए अनादर प्रतीत हो रहा है। सत्ता में, उनके नेताओं ने सेना प्रमुख और सीएजी (नियंत्रक और महालेखा परीक्षक) को सिर्फ इसलिए प्रताड़ित किया क्योंकि उन्होंने कांग्रेस का हुकुम नहीं माना।

विपक्ष में, उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक के लिए भारतीय सेना का मज़ाक उड़ाया। वे हमारे अन्य सुरक्षा बलों में कमियां ढूंढते हैं। अब वे प्रतिष्ठित रेटिंग एजेंसियों पर भी हमला करते हैं जो भारत के बारे में आशावादी हैं, वे आरबीआई को बदनाम करते हैं … अब वह अदालतों के पीछे पड़े हैं।

भारत की चुनावी प्रक्रिया पर उनका हमला खतरनाक है। 2009 में या विभिन्न राज्यों में जीतने पर उन्हें ईवीएम में खराबी नहीं दिखाई पड़ी। इस आत्‍मविश्‍लेषण के बजाय, कि हर राज्य में जनता उन्हें क्यों नकार रही है, कांग्रेस चुनावी प्रक्रिया में खामियां निकलने में मग्न है। इस तरह की विचार प्रक्रिया को कोई क्या कह सकता है?

जैसा कि मीडिया के लिए मैंने बार-बार कहा है कि मीडिया द्वारा रचनात्मक आलोचना हमारे लोकतंत्र को मजबूत करती है तथा और भी अधिक रचनात्मक आलोचना का स्वागत है। सोशल मीडिया के आगमन ने वास्तव में हमारी चर्चाओं को और अधिक लोकतांत्रिक बना दिया है। जहाँ इससे पहले सिर्फ कुछ ही स्व-नियुक्त विशेषज्ञों को समस्याओं के बारे में बात करते हुए देखा जाता था, वहीँ अब भारत कोई भी एक आम नागरिक एक ट्वीट या एक फेसबुक पोस्ट के माध्यम से स्वयं को व्यक्त कर सकता है। यह सोशल मीडिया की शक्ति है।

हमारा लोकतंत्र और हमारे संस्थान हमेशा के लिए जीवंत हैं। भारत की लोकतांत्रिक प्रकृति को ख़त्म नहीं किया जा सकता है।

स्वराज्य: आंतरिक मामलों से, आइए विदेश नीति पर चर्चा करें। आपने दुनिया के अग्रणी नेताओं के साथ एक व्यक्तिगत सामंजस्य बिठाया है जो कि लोकप्रिय है, लेकिन क्या इससे भारत की विदेश नीति को ठोस लाभ हुआ है?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीः एनडीए सरकार की विदेश नीति अद्वितीय परिणामों के साथ अभूतपूर्व रही है। भारत न केवल 125 करोड़ भारतीयों का कल्याण करने के लिए बल्कि हमारी भावी पीढ़ियों के लिए हमारी दुनिया को एक बेहतर स्थान बनाने के लिए भी दुनिया से जुड़ा है।

मेरी विदेश यात्राओं में, एक चीज जिसे मैं हर जगह अनुभव करता हूँ वह यह तथ्य है कि भारत को दुनिया में एक उज्ज्वल स्थान के रूप में देखा जाता है।

भारत के प्रति दुनिया के आकर्षण को समझने के लिए भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या देखें। 2017 में पहली बार भारत में 10 मिलियन से अधिक विदेशी पर्यटकों का आगमन दर्ज किया गया। यह 2014 की तुलना में 33 प्रतिशत अधिक है, और अब तक सबसे ज्यादा है।

हमारा एफडीआई प्रवाह देखें। मई 2014 में भारत में संचयी एफडीआई इक्विटी प्रवाह 222 बिलियन डॉलर था। 2017 के अंत तक, 65 प्रतिशत से अधिक की बढ़त के साथ यह 368 बिलियन डॉलर हो गया। भारत में एफडीआई प्रवाह भी सबसे उच्च स्तर पर है। ‘मेक इन इंडिया’ से ‘स्मार्ट सिटीज’ तक, ‘स्वच्छ गंगा’ से ‘स्वच्छ भारत’ तक और ‘डिजिटल इंडिया’ से ‘स्टार्ट-अप इंडिया’ तक हमने दुनिया भर में अभूतपूर्व साझेदारियां की हैं।

प्रौद्योगिकी, कौशल विकास, कृषि जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं जहाँ हमने दुनिया भर से कई बेहतरीन अभ्यासों को अपनाया है। कई देश पूरे भारत के शहरों की साझेदारी कर रहे हैं और उन्हें ‘स्मार्ट सिटीज’ बनाने की दिशा में उनकी मदद कर रहे हैं।

आज भारत मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था, ऑस्ट्रेलिया समूह और वासेनार व्यवस्था का एक सदस्य है। ये ठोस प्रभावों के साथ दुनिया के लिए बहुत महत्वपूर्ण संगठन हैं और भारत पहली बार इनमें शामिल हुआ है। यह मामला सिर्फ चार साल पहले का नहीं था। बल्कि भारत इन निकायों में शामिल होने के लिए कई वर्षों से कोशिश कर रहा था।

आप देख सकते हैं कि भारत के विचारों पर दुनिया किस तरह से ध्यान दे रही है। भारत का संयुक्त राष्ट्र को 21 जून को योग दिवस के रूप में घोषित करने का प्रस्ताव रिकॉर्ड समय में सर्वसम्मति से स्वीकृत हुआ। अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन बनाने का प्रस्ताव एक नए वैश्विक संधि आधारित संगठन के माध्यम से एक वास्तविकता बन गया है।

काले धन और आतंकवाद का मुकाबला करने के भारत के विचार को जी-20 में व्यापक बल मिला है। हम शंघाई सहयोग संगठन के पूर्ण सदस्य बनने में भी सफल हुए हैं। ब्रिक्स (ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) से राष्ट्रमंडल होते हुए पूर्व एशिया शिखर सम्मेलन तक, भारत की आवाज़ अब मायने रखती है जैसा कि पहले नहीं था।

इस वर्ष भी मैंने चीन और रूस में दो अनौपचारिक शिखर सम्मेलनों में भाग लिया। इन सम्मेलनों ने मुझे राष्ट्रपति शी जिनपिंग और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर विस्तार से बात करने का अवसर दिया। ये शिखर सम्मेलन चीन और रूस के साथ हमारी मित्रता में बड़ी मजबूती प्रदान कर रहे हैं।

भारत जरूरत के समय दुनिया के हर नागरिक की मदद करने के लिए तैयार रहता है। नेपाल द्वारा भूकंप का सामना किए जाने पर, मालदीव में पानी की कमी होने पर या पश्चिम एशिया में लोगों के असहाय होने पर इसे देखा जा सकता है। हम त्रस्त व्यक्ति की राष्ट्रीयता नहीं देखते हैं बल्कि साथी इंसानों की मदद करने के लिए आगे आते हैं। हम दुनिया भर में संकट में फंसे लगभग 90,000 भारतीयों को सुरक्षित बचा कर लाने में सक्षम रहे हैं।

साथ ही मेरी सरकार ने कभी भी इस बात की इज़ाज़त नहीं दी है कि किसी वीआईपी की प्रतीक्षा के कारण विकास परियोजनाओं की शुरुआत या समापन में देरी हो। जो आम प्रवृत्ति थी। लेकिन मैंने स्वयं परियोजनाओं का उद्घाटन करने, आधारशिला रखने, और कभी-कभी विदेशों में श्रोताओं को संबोधित करने के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का उपयोग किया है, चाहे वे श्रोता विदेशी भारतीय समुदाय से हों या फिर विदेशी व्यापारी और भारत में रूचि रखने वाले निवेशक हों।

एक और क्षेत्र जो लोगों को काफी दिलचस्प लगेगा वह है कलाकृतियों का पुनरागमन। 2016 में, वाशिंगटन डीसी के ब्लेयर हाउस में एक विशेष समारोह में, अमेरिका ने 200 ऐतिहासिक कलाकृतियों को लौटाया। भारत में अपनी एक यात्रा के दौरान, चांसलर एंजेला मर्केल ने 10 वीं शताब्दी की दुर्गा जी की एक मूर्ति हमें वापस दी। इसी तरह ऑस्ट्रेलिया ने भी मूल्यवान कलाकृतियां वापस की हैं। यह सुनिश्चित करने का मेरा निरंतर प्रयास है कि हमारे इतिहास के ये महत्वपूर्ण चिह्न भारत वापस आयें एवं और अधिक भारतीय अपनी संस्कृति को बेहतर ढंग से समझने के लिए उन्हें देख सकें।

इस प्रकार, आप देख सकते हैं कि चाहे यह व्यापार हो, प्रौद्योगिकी हो, कौशल प्रशिक्षण हो, आतंकवाद के खिलाफ जंग हो, पिछले चार वर्षों में भारत की विदेश नीति को सारभूत लाभ प्राप्त हुआ है।

पढ़ें- स्वराज्य द्वारा प्रधानमंत्री मोदी का साक्षात्कार – भाग 1: भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi. पर ट्वीट करते हैं।