राजनीति
सुषमा और पाकिस्तान की ट्विटर बहस दर्शाती है भारत की हिंदुओं के लिए मुखरता

आशुचित्र- अगर सुषमा और चौधरी की तू-तू मैं-मैं में भारत और पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों की अधिक समीक्षा होती है तो हमें इसका स्वागत करना चाहिए। जब तक कि यह एक तरफा न हो।

सिंध में दो नाबालिग लड़कियों के अपहरण और जबरन धर्मांतरण के संदर्भ में भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और पाकिस्तान के सूचना एवं प्रसारण मंत्री फवाद चौधरी के बीच ट्विटर पर हुए शब्द युद्ध का स्वागत करना चाहिए। कारण- विभाजन के 70 से अधिक वर्षों में शायद ही किसी भारतीय सरकार ने पाकिस्तान में हिंदुओं के अधिकारों की बात की है।

भारत के संकीर्ण धर्मनिर्पेक्षतावाद के कारण हम अपने इस्लामी पड़ोसियों जैसे पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के सामने इस प्रकार के मुद्दे नहीं उठाते ताकि देश के हिंदू आक्रोशित न हों। लेकिन यह संयम हमेशा एक तरफा रहा है क्योंकि पाकिस्तान भारतीय मुसलमानों की अवस्था पर प्रश्न खड़ा करता रहा है। यहाँ तक कि इसने 2002 गुजरात दंगों और भीड़ द्वारा हत्या की बात उठाकर भी भारतीय मुसलमानों को देश के विरुद्ध करने का प्रयास किया है।

यह बहस तब शुरू हुई जब स्वराज ने ट्वीट कर कहा कि इस्लामाबाद के भारतीय आलाकमान से उन्होंने दो लड़कियों के अपहरण की जानकारी मांगी है। इसपर पाकिस्तान के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने जवाब दिया कि यह पाकिस्तान का आंतरिक मामला है, हालाँकि चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह मोदी का भारत नहीं है जहाँ अल्पसंख्यकों पर अत्याचार किया जाता है। “यह इमरान खान का नया पाक है जहाँ ध्वज का सफेद रंग भी हमें प्रिय है। हम उम्मीद करते हैं कि जब भारतीय अल्पसंख्यकों की बात होगी तब भी आप इतनी ही रुचि दिखाएँगी।”, मंत्री ने कहा।

इसपर स्वराज ने प्रतिक्रिया दी, “मंत्री जी, मैंने इस्लामाबाद में भारतीय आलाकमान से दो नाबालिग हिंदू लड़कियों के अपहरण और इस्लाम कबूल करवाने के मामले में रिपोर्ट। आप इससे ही चिढ़ गए। यह दर्शाता है कि आपकी अंतरात्मा खुद को दोषी समझती है।”

इस पर फवाद ने प्रतिक्रिया दी, “मंत्री जी मुझे यह जानकर प्रसन्नता हुई कि भारतीय प्रशासन में ऐसे लोग हैं जो दूसरे देशों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की चिंता करते हैं। मैं आशा करता हूँ कि आपकी अंतरात्मा आपको अपने घर में भी अल्पसंख्यकों के लिए खड़ा होने की शक्ति दे। गुजरात और जम्मू का भार आपके कंधों पर होना चाहिए।”

यहाँ पर चौधरी हँसी के पात्र हो सकते हैं यदि वे जम्मू कहकर जम्मू-कश्मीर की बात नहीं करह रहे थे क्योंकि केवल जम्मू का उल्लेख करना दर्शाता है कि वे कश्मीर घाटी से पंडितों को खदेड़ने में सफलता मानते हैं जिसके लिए पाकिस्तान ही ज़िम्मेदार है।

पाकिस्तानी प्रतिक्रिया के रक्षात्मक रवैये के अलावा स्वराज द्वारा अपहरण का उल्लेख ही बंधनों को तोड़ने के लिए काफी है। पाकिस्तान या अन्य किसी जगह पर प्रताड़ित किए जा रहे हिंदुओं के लिए चुप्पी तोड़ना स्वागत योग्य है। लोकसभा में पारित हुए नागरिकता संशोधन अधिनियम में भी इसी प्रकार का प्रयास देखा गया था। इस विधेयक में तीन पड़ोसी इस्लामी देशों के प्रताड़ित हिंदुओं, जैनों, सिखों, ईसाइयों और बौद्धों को त्वरित नागरिकता देने का प्रावधान है।

वहीं देखा जाए तो भारतीय मुसलमानों की स्थिति की वास्तविकता यह है-

पहला, भारत के कुछ भागों में छोटे-मोटे भेदभावों के अलावा धर्मनिर्पेक्ष भारत में मुस्लिमों की स्थिति पाकिस्तान से अच्छी है, यहाँ तक कि बांग्लादेश से भी। अगर ऐसा नहीं होता तो ये लोग भारत की ओर न आ रहे होते।

दूसरा, दूसरी वास्तविकता यह है कि हम भूल जाते हैं कि कानून भी तथाकथित बहुसंख्यकों के विरुद्ध भेदभाव करता है क्योंकि अल्पसंख्यक संस्थानों को अनुच्छेद 25 से 30 के अंतर्गत संवैधानिक सुरक्षा दी हुई है और वहीं हिंदू शैक्षिक व धार्मिक संस्थानों को राज्य द्वारा निचोड़ा जा रहा है।

तीसरा, जहाँ भारत में इतिहास लेखन और कथात्मक मुस्लिमों की भावनाओं के प्रति अति-संवेदनशील रहा है और आज की पीढ़ियों के सामने भारत में इस्लामी शासन का गलत चित्र प्रस्तुत करता है, वहीं पाकिस्तान के पाठ्यक्रम में हिंदुत्व और भारत के लिए नकारात्मक दृष्टिकोण विद्यमान है। राज्य के संस्थान सिर्फ पाकिस्तान में ही नहीं बांग्लादेश औऱ अफगानिस्तान में भी इस्लामी चरित्र के हैं। अल्पसंख्यकों के विरुद्ध संरचनात्मक भेदभाव इन इस्लामी देशों का अंग है, न कि भारत का।

अल्प में कहें तो भारत में भले ही मुस्लिमों के साथ छोटे स्तर पर भेदभाव किया जाता हो लेकिन यह पत्थर की लकीर नहीं है और कानून के माध्यम से व कदम उठाकर इसे लगातार कम किया जा रहा है। हमारे पड़ोसियों के साथ ऐसा असंभव है।

इस परिस्थिति को देखते हुए पड़ोसी देशों और विश्व और भी कहीं के हिंदुओं के लिए आवाज़ उठाने का भारत को न सिर्फ अधिकार है, बल्कि इसका दायित्व भी है। विश्व के तीसरे सबसे बड़े धर्म का यदि भारत घर है और अधिकांश हिंदू यहीं रहते हैं तो किसी अन्य देश में प्रताड़ित किए जा रहे हिंदुओं के लिए बोलना भारत के लिए तर्कसंगत है। इससे भी अधिक यह कि कोई और देश नहीं है जो इनके लिए बोलेगा।

1950 की नेहरू-लियाक़त संधि को याद करना चाहिए जब दोनों देश इस बात पर राज़ी हुए थे कि वे शरणार्थियों को उनकी छोड़ी हुई संपत्ति का निदान करने के लिए बिना परेशानी के लिए जाने देंगे, अपहरण की हुई महिलाओं को छुड़वाने में मदद करेंगे, बलपूर्वक धर्मांतरण को रोकेंगे और अल्पसंख्यकों के अधिकारों का सम्मान करेंगे।

जहाँ यह संधि मात्र एक मृत पत्र है, वहीं भारत ने अपनी ओर से इसका पालन किया है। 69 वर्षों पूर्व यह संधि करने के बाद भी पाकिस्तान  भयभीत और धमकाए हुए अल्पसंख्यकों को इस्लामी उत्पीड़न का शिकार बना रहा है।

भारत को अल्पसंख्यकों के साथ व्यवहार की समीक्षा के लिए पाकिस्तान और विश्व से तब तक नहीं डरना चाहिए जब तक ऐसी ही समीक्षा के द्वार पाकिस्तान या बांग्लादेश भी खोले। हमें अपने अल्पसंख्यकों और सुरक्षित करने के लिए और भी कुछ करना है लेकिन उन्हें अपने बहुसंख्यकों को हिंदुओं का सम्मान करना सीखाने के लिए बहुत कुछ करना है। अनुग्रहण कभी भी एक तरफा नहीं हो सकता।

अगर सुषमा और चौधरी की तू-तू मैं-मैं में भारत और पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों की अधिक समीक्षा होती है तो हमें इसका स्वागत करना चाहिए। जब तक कि यह एक तरफा न हो।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।