राजनीति
सर्वोच्च न्यायालय के राम जन्मभूमि निर्णय में भारत के लिए क्या अर्थ छुपे हैं

दशकों एवं सदियों की धैर्यपूर्ण प्रतीक्षा के उपरांत राम जन्मभूमि का निर्णय आया। एक पक्ष की ज़िद और दूसरे पक्ष के अडिग विश्वास के मध्य से निर्णय आया जिसमें एक स्वस्थ, तथ्यपरक अनुसंधान के पश्चात सर्वोच्च न्यायालय की पाँच माननीय न्यायाधीशों की पीठ ने जन्मभूमि के पूर्ण क्षेत्र पर हिंदुओं का अधिकार माना और मंदिर निर्माण के निर्देश दिए। 

साथ ही सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष को सरकार द्वारा 5 एकड़ भूमि प्रदान करने का निर्देश दिया। भारत के हिंदुओं एवं मुसलामानों के लिए यह एक तरह से धार्मिक उन्माद के रक्तरंजित इतिहास का पटाक्षेप हुआ जिसके पश्चात भारतीय के रूप में हम एक साझे भविष्य की ओ चल सकें। 

यह भी एक संजोग रहा कि धर्म के नाम पर चलाए गए इस कम्युनिस्ट कुचक्र से मुक्ति का माध्यम एक मुस्लिम पुरातत्ववेत्ता केएम मोहम्मद का साक्ष्य प्रमाण बना। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्ष्यता में जस्टिस एस बोबदे, चंद्रचूड़, अशोक भूषण एवं एस अब्दुल नज़ीर की बेंच के इस निर्णय का विरोध, जन सामान्य से नहीं वरन वामपंथियों की ओ से आया है।  एकआध छुटपुट दल के छुटभैया मुस्लिम नेता को छोड़ दें तो मुखर विरोध तीन दिशाओं से आता दिखता हैविदेशी मीडिया, वामपंथी और पाकिस्तान।  

यदि हम देखें तो स्वतंत्रता के उपरांत इस मुद्दे पर समाधान के मार्ग में सर्वाधिक कठिनाई हिंदुओं एवं मुसलमानों ने नहीं, वरन वामपंथी विचारकों और बाद के समय में वामपंथ के प्रभाव में आई कांग्रेस ने उत्पन्न की। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के फैसले को बिगाड़ने के बाद, उन्होंने ने ही इसे आगे सर्वोच्च न्यायलय तक ले जाने की मांग की, और कभी चुनाव तो कभी किसी और वजह से निर्णय टालने का प्रयास किया। 

अनिर्णय की स्थिति उन्हें मुफीद आती थी क्योंकि भारत के विध्वंस के माओवादी उद्देश्य के लिए सिपाही निर्धन मुसलमानों के अंदर असंतोष भर के ही आते थे। नास्तिक वामपंथी तत्काल ही इस्लामपरस्त हो जाते थे ताकि भारत के हिंदुओं और मुसलमानों के साझा अतीत तक उन्हें न पहुँचने दिया जाए।

इसी कारण मरे हुए वामपंथी इस विषय को आज भी मरे हुए बंदर की भाँति सीने से चिपटाए घूम रहे हैं और भारतीय जनमानस का परिपक्व व्यवहार न उन्हें समझ आ रहा है न ही स्वीकार हो पा रहा है।

आम भारतीयों के लिए सरयू के पवित्र जल ने आज प्रवाह पाया है, जिसके स्वच्छ प्रतिबिंब में हिंदू और मुसलमान अपना साझा अतीत भी देख रहे हैं जहाँ विदेशी आतततियों ने कुछ का धर्म बदल दिया और कुछ की दिशा।

विभिन्न दिशाओं की ओर मुड़ गई वृक्ष की शाखाएँ आज अपनी सैंकड़ों साल पुरानी जुड़ी हुई जड़ों को देख पा रही हैं। इन्हें ये पहले देख लेती तो शायद यह निर्णय अदालत के हस्तक्षेप के बिना भी संभव हो सका होता।

आज जब न्यायिक चक्र को पूरा करके यह संभव हुआ है तो न किसी को प्राप्ति के लिया अपराधबोध होना चाहिए न किसी को अप्राप्ति के लिए दुःख। दो भाइयों में एक को यदि इन्सुलीन की आवश्यकता थी, दूसरे की जेब में उसे रखकर, मूँछ के प्रश्न इसे देने से इंकार करने के लिए बाध्य करने के वामपंथी इतिहास में सदा याद किये जाएँगे।

यह दुर्भाग्य था कि दो भाई उस दवा के लिए सदियों लड़े जो एक के लिए औषधि थी दूसरे के लिए सिर्फ एक निरर्थक मीठी गोली। एक अन्य वर्ग नास्तिकों का रहा जिन्हें इस सबसे कोई अर्थ नहीं था परंतु धर्म के नाम पर इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सत्य की प्राप्ति का विरोध करते रहे। 

जो हाशिये पर खड़ा व्यक्ति है, साधनहीन और वाणीविहीन है, उसका एकमात्र मित्र ईश्वर है। शक्तिसंपन्न व्यक्ति का यह कोई अधिकार नहीं है कि आप हाशिये पर खड़े व्यक्ति के विश्वास के अधिकार को केवल इस लिए छीन लें कि आपके पास कलम है उसके पास नहीं।

जैसे-जैसे वामपंथ की पैठ कांग्रेस में और कांग्रेस की पैठ व्यवस्था में बढ़ी, धर्म में विश्वासी वर्ग को लज्जित करने का प्रयास बढ़ता गया और उसे कोने में धकेल दिया गया। इसमें अधिकांश वह बुद्धिजीवी रहे जो पश्चिमपरस्त रहे। वे हिंदू आस्था पर, राम मंदिर के संघर्ष को एक मंदिर की लड़ाई बताकर तो कटाक्ष करते रहे परंतु इस पर कभी न बोल सके कि वैटिकन तो पूरा देश लेकर खड़ा भारत में भी सबसे अधिक भू-स्वामित्व रखता है।

आज इस निर्णय के विरोध में यह वामपंथी बुद्धिजीवी वर्ग वही स्वर खड़े कर रहा है जिनका अपना सत्य न्यायालय के सामने संदेह के घेरे में आ चुका है। इसी उद्देश्य से वह वही तथाकथित विशेषज्ञ या ज्ञानी दोबारा रीसाइकल कर रहा है जो अखबारों में भड़काने को और कामरेड अतिवादी पैदा करने के लिए बेहिचक झूठ बोलते हैं और न्यायालय की परिधि में पहुँचते ही कानून के भय से सत्य बोलने को बाध्य हो जाते है। 

इलाहाबाद हाई कोर्ट में मुस्लिम पक्ष के विशेषज्ञ सुरेश चंद्र मिश्रा की दिलचस्प गवाही है। वे बुद्धिजीवी-सुलभ मिथ्या विश्वास के साथ कहते हैं कि मस्जिद मीर बक़ी के द्वारा बनवाई गई थी, पर वह जानते हैं कि उसे किसी मंदिर को तोड़कर नहीं बनाया गया।

आगे जब उनसे प्रश्न पूछे जाते हैं तो महानुभाव कहते हैं कि उनका निष्कर्ष कई पुस्तकों के अध्ययन पर आधारित है। मज़े की बात यह है कि यह पुस्तकें ऐतिहासिक न होकर, उनके ही सहयोगियों द्वारा 1990 के बाद लिखी गई हैं।

इनकी बौद्धिक निष्ठा स्पष्ट हो जाती है जब वे कहते हैं, “मैंने जज़िया का नाम सुना है परंतु मुझे याद नहीं आ रहा है कि यह किसपर और क्यों लगाया जाता था।” यह कहते हैं कि इनकी जानकारी के अनुसार काशी में कोई विश्वनाथ मंदिर 100 वर्ष पूर्व नहीं था जिसे औरंगज़ेब ने तोड़ा हो। वे आगे कहते हैं, “मैंने इस विषय पर 1989 के बाद से कई पुस्तकें पढ़ी हैं परंतु मुझे इनका नाम याद नहीं है।” 

एक अन्य ऐतिहासिक एवं पुरातत्ववेत्ता डीएन झा हैं जिनका तीन प्रख्यात इतिहासकारों, आरएस शर्मा, प्रो अतहर अली और प्रो सूरज भान के साथ मिलकर लिखा हुआ नोट उच्च न्यायालय में मुस्लिम पक्ष की और से प्रस्तुत हुआ था।

प्रो सूरजभान ने स्वतः अपने दस्तावेज़ के पुरातात्विक भाग की ज़िम्मेदारी ली थी। वे कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में प्राचीन भारतीय पुरातत्व के प्रोफेसर थे। प्रो सूरजभान दिल्ली विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र, अंग्रेजी एवं संस्कृत के स्नातक हैं। सूरजभान जी भद्र व्यक्ति हैं और उन्होंने माना कि वे संस्कृत पढ़ लिख नहीं सकते हैं, रामायण उन्होंने कुछ-कुछ पढ़ी है और वेदों के विषय में उतना ही पढ़ा था जितना उनके पाठ्यक्रम में था।

सिंधु घाटी की खोज कब हुई यह बताने में इतिहास विशेषज्ञ ने स्वयं को असमर्थ पाया क्योंकि उनके अनुसार यह भूगोल का विषय था। अंत में विशेषज्ञ के रूप में मंदिर के विरोध में स्वयं को प्रस्तुत करने वाले सूरजभान कहते हैं कि उन्हें अन्वेषण का ज्ञान नहीं है, और वे विशेषज्ञ नहीं हैं। 

सुविरा जायसवाल कुछ अधिक आत्मविश्वास से प्रारंभ करती हैं और कहती हैं कि वे प्राचीन इतिहास की विशेषज्ञ हैं और उनके अनुसार विवादित स्थल पर कोई मंदिर नहीं था। आगे वे कहती हैं की यह उनका निजी विचार है और मंदिर के न होने का दस्तावेज़ वे अपने अध्ययन और ज्ञान के आधार पर प्रस्तुत न करके अपनी राय के आधार पर कर रही हैं। विवादित स्थान के विषय में मेरी जानकारी अखबार के आधार पर है।

इन सभी विशेषज्ञों में यह बात मार्के की रही कि अधिकांश ने न तो की आवश्यकता समझी न वास्तविक उत्खनन के विषय में जानने का प्रयास किया। एक-दूसरे का संदर्भ लेकर एक-दूसरे की बात कही। इन्होंने झूठ के आधार पर समाज को बांटने का जो काम किया उस षड्यंत्र के उच्च न्यायालय में उधड़ जाने के बाद भी आज सर्वोच्च न्यायलय के तथ्यात्मक अन्वेषण के पश्चात आये निर्णय के बाद जैसे आडंबरी इतिहासकार पुनः खड़े किए जा रहे हैं, और हो रहे हैं, इनकी कम्युनिस्ट रेड कार्ड के प्रति निष्ठा और निर्लज्ज आत्मविशास को नमन है। 

आशा है सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय राष्ट्र को न सिर्फ अपने साझा इतिहास और संस्कृति के प्रति जागरूक करे वरन ऐसे मिथ्याभाषी समाज तोड़ने वाले बुद्धिजीवियों के प्रति भी सजग रखे। हिंदू हो या मुस्लमान, अपने इतिहास और जड़ों से कटा व्यक्ति एक अधूरे भविष्य के लिए अभिशप्त होगा। आवश्यक है कि हम समझें की इस मंदिर के निर्णय में हमारी जय साझा है जिसमे राष्ट्रविरोधी षड्यंत्रकारी पराजित हुए हैं। राम से उनका भेद यूँ ही है या रामायण में निहित एकता के सन्देश के कारण है, यह अलग से चिंतन विषय है।