राजनीति
राम जन्मभूमि निर्णय में देरी सर्वोच्च न्यायालय की सबसे बड़ी भूल

सभी की निगाहें सर्वोच्च न्यायालय पर टिकी थीं क्योंकि कल राम जन्मभूमि मामले पर सुनवाई होने वाली थी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय पर चर्चा होनी थी जिसमें यह कहा गया था कि राम जन्मभूमि स्थल का तीन हिस्सों में बँटवारा होगा। सभी समाचार संवाददाता अपने कान गड़ाए बैठे थे और अयोध्या में भी बहुत लोग इकट्ठा हो गए थे यह सोचकर कि आज वह बहुप्रतीक्षित निर्णय सुनाया जाएगा जिसने इस देश की राजनीति को पिछले 25 सालों में प्रभावित किया है। लेकिन इस दिवाली भी राम वनवास से नहीं लौट सके क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय जनवरी 2019 तक स्थगित कर दिया।

सर्वोच्च न्यायालय को संविधान का संरक्षक माना जाता है जो नागरिकों के मौलिक व संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करता है। पिछले कुछ महीनों में न्यायालय ने अपनी मर्यादा लाँघकर हिंदुओं की धर्म परंपरा में भी हस्तक्षेप किया है और वह भी इस आधार पर कि इस मामले पर तत्कालिक कदम उठाने की आवश्यकता है। सबरीमाला निर्णय निस्संदेह विवादास्पद है और अधिकांश लोगों की भावनाओं को आहत करता है। धार्मिक स्वतंत्रता का सिद्धांत इस बात का समर्थन करता है कि एक व्यक्ति और समुदाय को, निजी अथवा सार्वजनिक रूप से, अपने धर्म अथवा अपनी सीखों, प्रथाओं, पूजा और मान्यताओं का पालन करने का अधिकार बिना सरकार के प्रभाव या हस्तक्षेप के होना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने कई निर्णयों में जैसे द कमिशनर, हिंदू धार्मिक धर्मस्व बनाम लक्ष्मीन्द्रा स्वामियार, जगन्नाथ रामानुज दास बनाम उड़ीसा राज्य और सरदार सैफुद्दीन बनाम बॉम्बे राज्य में यह सिद्ध किया कि अनुच्छेद 25 के अंतर्गत प्रार्थना और प्रार्थना के साधनों का अधिकार सुरक्षित है। ऐसे भी केस देखने को मिले जिसमें निर्णय हुआ कि प्रार्थना का अधिकार हर स्थान पर लागू नहीं होता। परंतु इस्माइल फारूक़ी बनाम भारतीय संघ के मामले में न्यायालय ने यह माना कि इस्लाम में इबादत के लिए मस्जिद आवश्यक और अभिन्न अंग नहीं है लेकिन फिर भी किसी धर्म में यदि किसी जगह का विशेष महत्त्व है तो प्रार्थना के लिए उस स्थान में प्रवेश का अधिकार अनुच्छेद 25 के अधीन सुरक्षित होगा।

इस्माइल फारूक़ी से परे सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले को विवादास्पद माना और बहुसंख्यक हिंदुओं के धार्मिक विश्वास को नज़रअंदाज़ कर दिया। निर्णय में देरी से मुद्दे का अनावश्यक राजनीतीकरण होगा और सरकार को कोई कदम उठाने पर मजबूर करेगा लेकिन यह सही समाधान नहीं होगा क्योंकि इससे देश में शांति और कानून व्यवस्था बिगड़ सकती है। ऑर्डिनेंस का रास्ता या विधान का हस्तक्षेप न्याय प्रणाली पर से लोगों का विश्वास भंग करेगा और लोकतंत्र के तीन स्तंभों में आपसी संघर्ष उत्पन्न करेगा जिससे देश में आपातकाल जैसी स्थिति भी हो सकती है। यह विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए परीक्षा का समय है।

लोकतंत्र के निर्विघ्न और सफल क्रियान्वयन के लिए तीनों स्तंभों में समन्वय अति आवश्यक है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 123 राष्ट्रपति को अधिकार देता है कि जिस समय सदन कार्यरत नहीं है, वह ऑर्डिनेंस घोषित कर सकते हैं। तत्काल कदम की आवश्यकता के आधार पर ऑर्डिनेंस को इन तीन आवश्यकताओं की पूर्ति करनी होती है-

  1. इस दावे के पीछे क्या कोई ठोस वस्तु है?
  2. क्या यह प्रासंगिक है?
  3. कहीं अधिकार का प्रयोग असद्भाव से तो नहीं किया जा रहा?

तीसरा बिंदू अकेला ही काफी है जिसपर इस ऑर्डिनेंस का विरोध किया जा सके और फिर सर्वोच्च न्यायालय ही आखिरकार निर्णायक भूमिका में होगा।

ऑर्डिनेंस का भार राज्य के कार्यकारी मुखिया पर है, वर्तमान में इसे पास करना आसान होगा परंतु इसकी संवैधानिक उपयुक्तता पर सवाल उठाया जा सकता है और यदि बाद में ऑर्डिनेंस पर रोक लगाई गई, यह देश में कानून व्यवस्था को हानि पहुँचा सकता है। इस देश की धर्मनिरपेक्षता को तब ही बचाकर रखा जा सकता है जब न्यायालय इसपर जल्द से जल्द निर्णय सुनाए। न्यायालय का नाज़ुक रवैया केवल इस समस्या को बड़ा ही करेगा क्योंकि देरी दर्शाती है कि इतने महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर न्यायालय कितना अप्रतिबद्ध है। सर्वोच्च न्यायालय को यह समझना होगा कि भारतीय संविधान मानवाधिकार की सार्वभौम घोषणा और बिल ऑफ़ राइट्स का दत्तक नहीं है बल्कि देश की प्रकृति और संस्कृति का भी कानून में बहुत बड़ा योगदान है। सर्वोच्च न्यायालय को संविधान का उच्चतम व्याख्याता होने के नाते इसे इस मामले पर जल्द से जल्द समाधान देना चाहिए क्योंकि यहाँ न्याय में देरी सबसे बड़ा अन्याय करेगी।