भारती / राजनीति
राज्य क्या अब कोविड महामारी से लड़ने की कृपा करेंगे?

कोविड वैश्विक महामारी की दूसरी लहर से भारत लड़ रहा है। हालाँकि समस्या इस बात से है कि कुछ राज्य महामारी के इस चरण से लड़ने के लिए कैसा व्यवहार अपना रहे हैं या आत्मसमर्पण कर दे रहे हैं। कई राज्य सरकारें अपनी अयोग्यता प्रदर्शित कर रही हैं और इसे ढँकने के लिए आरोप-प्रत्यारोप कर रही हैं।

जब बात संसाधनों की माँग करने की आती है तो ये सरकारें कभी विराम नहीं लेतीं लेकिन जब बात उत्तरदायी बनने की होती है तो वे मौन साध लेती हैं।

तैयारी के लिए राज्यों को पर्याप्त रूप से सामधान किया गया था लेकिन फिर भी वे इससे नहीं चेते

हम सबने देखा कि किस तरह से छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भारत में आने वाली दूसरी लहर के प्रति केंद्र सरकार द्वारा सावधान न किए जाने का राग अलापा। यह भी कहा कि यदि सामधान किए जाते तो राज्य दूसरी लहर से निपटने के लिए बेहतर रूप से तैयार होते।

कांग्रेस का भाग होने या मोदी-विरोधी भाव रखने से सच्चाई को अनदेखा करने की छूट मिल जाती है, यह बात सोचने योग्य है। लेकिन एक बात जो सत्य है वह यह कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री अपने राज्य के लोगों को निराश कर रहे हैं, विशेषकर ऐसी परिस्थिति में जब कोविड की दूसरी लहर को रोकने के लिए कई बार राज्य सरकारों को याद दिलाया गया था।

7 जनवरी 2021 को केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव ने महाराष्ट्र, केरल, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल को पत्र लिखकर ‘सख्त निगरानी’ रखने और बढ़ते मामलों के लिए कदम उठाने के लिए कहा था।

7 जनवरी 2021

बता दें कि 17 मार्च 2021 को भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों से वार्ता कर कोविड-19 परिस्थिति की आकलन किया था। उन्होंने विशेष रूप से कुछ राज्यों का नाम लिया जिन्हें दूसरी लहर रोकने के लिए शीघ्र कदम उठाने चाहिए। क्या आप जानते हैं उस बैठक में कौन उपस्थित नहीं था? भूपेश बघेल।

परिस्थिति से इस प्रकार के व्यवहार को क्या क्षमा किया जा सकता है? इसी कारण से यह पूछना भी अनिवार्य है कि क्या कांग्रेस पार्टी डॉ मनमोहन सिंह द्वारा प्रधनमंत्री को लिखे पत्र को पढ़ेगी और उनकी ‘सलाह’ मानेगी? या कुछ करने से अधिक सरल केवल सलाह देना ही होता है?

राज्यों को इंफ्रास्ट्रक्चर योजना या किसी भी आकस्मिकता के लिए तैयारी करने से किसने रोका था?

कई मोर्चों पर राज्य सरकारें आराम करती हुई दिखाई दीं, चाहे वह टेस्टिंग हो या ऑक्सीजन आपूर्ति। दवाइयों की कालाबाज़ारी को रोकना कानून व्यवस्था का विषय है जो कि पूर्ण रूप से राज्यों के अधीन आता है। इसके बावजूद भारी कालाबाज़ारी और दवाइयों के अभाव के समाचार रुक नहीं रहे हैं।

कोविड महामारी की पहली लहर के समय भी महाराष्ट्र ने ऑक्सीजन की कमी का सामना किया था। क्या राज्य सरकार ने उससे कोई सीख ली और जब महामारी न्यूनतम स्तर पर थी तब इस दिशा में कोई काम किया? ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

आज ऑक्सीजन आपूर्ति को लेकर दिल्ली सरकार पर दिल्ली उच्च न्यायालय लगातार नकेल कस रहा है। जब अस्पतालों में ऑक्सीजन की किल्लत है, उस समय दिल्ली सरकार राज्य को आवंटित ऑक्सीजन लाने के लिए टैंकर भी नहीं दे पा रही है।

दिल्ली के अस्पताल में पहुँचता ऑक्सीजन टैंकर

यदि यह बुरी स्थिति पर्याप्त नहींं थी तो मुंबई में क्वारन्टाइन घोटाला भी सामने आ गया जहाँ रिश्वत देकर लोगों को क्वारन्टाइन से भागने दिया जा रहा है। जिस समय हम कोई गलती नहीं सह सकते, उसी समय मुनाफाखोरी और भ्रष्टाचार देखने को मिल रहा है लेकिन राज्य की सरकार अपनी आपसी समस्या से निपटने में व्यस्त है।

वैक्सीन को लेकर गैर-ज़िम्मेदाराना व्यवहार राष्ट्र के लिए लज्जाजनक

सब भली-भाँति जानते हैं कि छत्तीसगढ़ा, केरल और पंजाब की राज्य सरकारों ने सार्वजनिक रूप से कोवैक्सीन पर प्रश्न खड़े किए थे जबकि इसे समवर्तियों की समीक्षा, वैज्ञानिक अध्ययन और क्लिनिकल ट्रायल के डाटा का समर्थन प्राप्त था।

इसके पीछे के तर्क को समाजवादी पार्टी के नेता और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने मुखर रूप से कहा था- हम टीका नहीं ले सकते हैं क्योंकि यह ‘भाजपा की वैक्सीन’ है। पंजाब ने तो यहाँ तक कहा कि उनके पास पर्याप्त कोविशील्ड वैक्सीन है।

अब ये राज्य ही टीका के अभाव की बात कर रहे हैं। तथाकथित उत्तरदायी लोगों द्वारा बोए गए भ्रम के कारण ही महाराष्ट्र, दिल्ली और पंजाब जैसे राज्यों में टीकाकरण दर राष्ट्रीय औसत से कम था। पहली लहर की अच्छाइयों-बुराइयों को केंद्र के माथे मढ़ दिया गया था।

पिछले वर्ष भारत नहीं जानता था कि किस चीज़ से मुकाबला है इसलिए एक समन्वित कार्यशैली, बड़े स्तर पर संसाधन आवंटन आवश्यक थे जो कि केंद्र सरकार ही कर सकती थी। उससे राज्यों को सीखना था और दूसरी लहर की आशंका होने पर कम से कम आधारभूत चीज़ें करनी थीं।

स्वास्थ्य राज्य की सूची में आता है और जिस भी चीज़ के लिए आम आदमी संघर्ष कर रहा है- दवाइयाँ, ऑक्सीजन और बेड- उनका प्रबंधन राज्य कर सकते थे यदि वे इससे सही से निपटते।