राजनीति
राज्य चुनाव 2018 – बसपा ने क्यों छोड़ा कांग्रेस का साथ, यह कोई दूसरी चाल तो नहीं?
कांग्रेस बसपा गठबंधन

प्रसंग
  • मायावती अब उत्तर प्रदेश के बाहर अन्य राज्यों में पार्टी विनिर्माण के लिए अपने बड़े सहयोगियों के वोट बैंक का फायदा उठाकर क्षेत्रीय स्तर के गठबंधन पर पूरा ध्यान दे रही हैं।

बहुजन समाजवादी पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने साफ़ कर दिया कि मध्य प्रदेश और राजस्थान में उनकी पार्टी अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ेगी, इन दोनों राज्यों में अगले महीने चुनाव होने हैं। मायावती, जिन्होंने 3 अक्टूबर को एक प्रेस कॉन्फ्रेस में अपने इस फैसले की जानकारी दी, ने छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी की पार्टी के साथ पहले ही गठबंधन कर लिया है। इस फैसले से महीनों से चली आ रही अचकलें खत्म हो गई हैं, जिसमें कहा जा रहा था कि इन राज्यों में भी भाजपा को हराने के लिए उत्तर प्रदेश की तरह ही महागठबंधन किया जाएगा।

कई विश्लेषकों और समाचार चैनलों का कहना है कि मायावती कांग्रेस को छोड़ रहीं हैं और राज्य चुनावों में अपनी संभावनाओं को बड़ा झटका दे रही हैं, जिसे लोकसभा चुनावों का सेमीफाइनल माना जाता है। हालांकि, यह एक दूसरा दौर है। कांग्रेस के रणनीतिकारों ने पहले मायावती के साथ गठबंधन करने का विचार किया था क्योंकि इससे उनको अनुसूचित जाति के वोट मिल सकते थे। हालांकि, पूरी तरह से विचार-विमर्श करने के बाद इस पर आगे कुछ फैसला नहीं लिया गया।

गठबंधन के पक्ष में कारक

उत्तर प्रदेश के इन तीनों सीमावर्ती राज्यों में बसपा का बोलबाला है (2013 राज्य चुनावों में 4 प्रतिशत से 6 प्रतिशत का वोट शेयर था)।

  • अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश के बाहर कई अन्य राज्यों में भाजपा और कांग्रेस के समर्थन लेने के बाद जाहिर है कि बसपा एक राष्ट्रीय स्तर की पार्टी है।
  • यह एकमात्र ऐसी क्षेत्रीय पार्टी है जिसने 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के बाहर 31 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। इस हिसाब से यह अन्य क्षेत्रीय दलों से 95 प्रतिशत से भी ज्यादा आगे है।
  • भाजपा और कांग्रेस के बाद अपने वोट शेयर द्वारा बसपा अभी भी तीसरी सबसे सफल पार्टी है।
  • राजनेता राम विलास पासवान और रामदास आठवले (दोनों के मंत्री होने के बावजूद) जैसे दलित नेताओं की अपेक्षा मायावती अब भी देश की सबसे बड़ी दलित नेता हैं।
  • बसपा ने अपनी गठबंधन सहयोगी पार्टी को वोट स्थानांतरित करने की कई बार अपनी क्षमता दिखाई है।
पार्टी राज्य कुल वोट गृह राज्य में वोट गृह राज्य में वोट प्रतिशत
एआईएडीएमके तमिलनाडु 1,81,15,825 1,79,83,168 99%
टीएमसी पश्चिम बंगाल 2,12,59,681 2,03,13,280 96%
सीपीआई-एम केरल और पश्चिम बंगाल 1,79,86,773 1,56,01,652 87%
सपा उत्तर प्रदेश 1,86,72,916 1,79,88,792 96%
बसपा उत्तर प्रदेश 2,29,46,182 1,59,14,019 69%

(लोकसभा 2014 में बड़े क्षेत्रीय दलों के वोट, स्त्रोतः  www.indiavotes.com)

इन तीन बड़ी वजहों से कांग्रेस ने बसपा के साथ नहीं किया गठबंधन –

  1. तीनों राज्यों में उच्च जातियों का आंदोलन

सवर्ण आंदोलन ने तीनों राज्य के राजनीतिक दलों को आश्चर्यचकित कर दिया है। उच्चतम न्यायालय के आदेश के खिलाफ केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा लाए गए अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) कानून (एससी/एसटी क़ानून) में संशोधन को लेकर इन राज्यों में सवर्ण आंदोलन किया गया था। उच्चतम न्यायालय ने इस अधिनियम के तहत गिरफ्तारी के प्रावधानों को और हल्का कर दिया था। इन राज्यों में उच्च जातियों का करीब 15 से 20 प्रतिशत वोट शेयर है जो काफी मायने रखता है। उच्च जातियाँ भाजपा और कांग्रेस दोनों को लेकर खासा नाराज हैं। उच्च जाति के सरकारी अधिकारियों का प्रतिनिधित्व करने वाले निकाय सपाक्स ने भी महात्मा गांधी की जयंती पर मध्य प्रदेश में अपनी पार्टी बना ली है और इसने सभी 230 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है।  कांग्रेस बसपा के साथ गठबंधन करके कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती है क्योंकि इससे राज्य की उच्च जातियों द्वारा कांग्रेस को दलितों का पक्षधर ही माना जाएगा। कांग्रेस इन राज्यों में उच्च जातियों की निराशा का फायदा उठाना चाहती है। इसीलिए, राज्य के उच्च जाति के मतदाताओं को लुभाने के लिए यह गायों की बात कर रही है और राहुल गांधी शिव-भक्त तथा राम-भक्त बन रहे हैं।

  1. बसपा ने 2013 के बाद अपनी ताकत खोई है

चूँकि, बसपा अपने 2013 के प्रदर्शन के आधार पर सीटों की मांग कर रही थी, लेकिन उत्तर प्रदेश में हार सहित चुनाव वाले इन तीनों राज्यों में इसने अपना महत्वपूर्ण वोट शेयर खो दिया है। गैर-जाटव मतदाता पार्टी नेतृत्व से काफी मायूस हैं क्योंकि उनको न तो पार्टी में कोई प्रमुख पद दिया गया है और न ही आरक्षण का लाभ। बसपा अब 2013 के जितनी ताकवर नहीं रह गई है। सीटों के बंटवारे को लेकर होने वाली बातचीत से कोई नतीजा न निकला क्योंकि दोनों पार्टियों एकमत नहीं हो पायीं थीं I

 राज्य चुनाव 2018

  1. तीन राज्यों में बसपा का वर्चस्व नहीं

2013 के चुनावों में बसपा ने मध्यप्रदेश में 6.4 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 4.4 प्रतिशत और राजस्थान में 3.4 प्रतिशत वोटों की साझेदारी की थी। राजस्थान में हर पांचवें साल सरकार बदलती है और इस बार कांग्रेस मायावती के समर्थन की आवश्यकता के बिना अकेले ही यहाँ पर जीत हासिल करने की उम्मीद कर रही है। छत्तीसगढ़ में बसपा के समर्थन के बिना भी कांग्रेस की स्थिति बहुत ही अच्छी रही है। तीन राज्यों में मध्य प्रदेश ही एक ऐसा राज्य है जहां उनको (मायावती को) सबसे अच्छा समर्थन प्राप्त है और कांग्रेस को उनके समर्थन से एक कठिन लड़ाई शुरू करने में मदद मिल सकती है। ऊंची जातियों के वोटों के नुकसान का डर (मध्य प्रदेश में सवर्ण आन्दोलन सबसे शक्तिशाली है), बसपा की ताकत पर मतभेद और कुछ नेताओं का पार्टी छोड़ना आदि कारकों के संयोजन ने प्रक्रिया को पटरी से बाहर कर दिया।

मायावती को करारा झटका

मायावती की बसपा पार्टी अब छह साल से भी अधिक समय से सत्ता में नहीं है। उत्तर प्रदेश में करारी हार और 2022 तक कोई अन्य मौका न होने के कारण उन्होंने अपनी रणनीति में बदलाव किया है। अब उनका ध्यान यूपी से बाहर के राज्यों में बड़े सहभागी के वोट बैंक का समर्थन प्राप्त करके हरियाणा में भारतीय राष्ट्रीय लोक दल के साथ और कर्नाटक में जनता दल (सेक्युलर) के साथ क्षेत्रीय स्तर के गठबंधन पर है। बसपा ने कर्नाटक में एक सीट जीती और मंत्रालय में शामिल हो गई। उन्हें उम्मीद थी कि अगर गठबंधन विरोधी लहर से जीत गया तो उन्हें काफी सीटें मिल सकती है, कुछ जीत सकती हैं और मंत्रालय में शामिल हो सकती हैं। हालाँकि अब उनकी सभी उम्मीदें टूट गई हैं। यही कारण है कि वह 3 अक्टूबर को आयोजित हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट रूप से कांग्रेस के खिलाफ नजर आईं।

अपने वोट बैंक को सन्देश देते हुए एक दूसरे की खिलाफत कर रहे हैं

जब दिग्विजय सिंह ने भाजपा से केंद्रीय जांच ब्यूरो / प्रवर्तन निदेशालय के दबाव के कारण मायावती पर गठबंधन वार्ता से अलग होने का आरोप लगाया, तो मायावती ने दिग्विजय सिंह को भाजपा एजेंट कहा। यह उनके वोट बैंक को बरकरार रखने के लिए दोनों तरफ से प्रदर्शन के अलावा कुछ भी नहीं है।

वह जानती हैं कि गठबंधन वार्ता की विफलता के बाद अब इन राज्यों में दलित वोट बैंक पर पकड़ मजबूत करना मुश्किल होगा। दलितों ने बसपा को वोट क्यों दिए जिसके पास जीतने की कोई उम्मीद नहीं है? इस वर्ग को कांग्रेस या भाजपा, जो उन्हें एससी-एसटी अधिनियम (अत्याचार रोकथाम) में संशोधन करके आकर्षित कर रही है, का समर्थन करने के लिए लालच दिया जा सकता है। मायावती को देश और राज्य स्तर पर भविष्य में और गिरावट देखनी पड़ सकती है

दोनों पक्षों ने 2019 लोकसभा गठबंधन के लिए या तो पृथक रूप से या महागठबंधन के हिस्से के रूप में विकल्प स्पष्ट किया है। त्रिशंकू संसद के मामले में मायावती को लगता है कि उन्हें प्रधानमंत्री बनने के लिए काफी सांसदों की जरूरत है लेकिन इस सब के लिए उन्हें किसी मददगार की जरूरत है। यह ध्यान देने योग्य है कि बसपा ने सभी पार्टियों- भाजपा, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी को शिकस्त देने के लिए यूपी में वोट समर्थन हासिल किया, जिसके साथ इसने किसी समय गठबंधन किया था।

अमिताभ तिवारी एक पूर्व कॉर्पोरेट और निवेश बैंकर हैं जो अब राजनीति और चुनावों में विशेष रुचि ले रहे हैं। उपरोक्त विचार उनके व्यक्तिगत हैं। इनका ट्विटर हैंडल @politicalbaaba है।