राजनीति
महागठबंधन से मुलायम का असंतोष अकारण नहीं था, परिणामों के गणित से समझें

उत्तर प्रदेश में महागठबंधन से कई अपेक्षाएँ की जा रही थीं क्योंकि इस राज्य में पारंपरिक रूप से जाति गणित के आधार पर मतदान होता है और इस अनुसार सपा-बसपा-रालोद का महागठबंधन खरा उतरता है। एक्ज़िट पोल में जहाँ इसके द्वारा अधिकतम 40 और न्यूनतम 20 सीटों के जीतने का अनुमान लगाया था, वहीं यह इसके औसत से आधी यानी कि 15 सीटें जीत पाया। केवल टुडेज़ चाणक्य  ने 13 सीटों और स्वराज्य में 13-15 सीटों पर जीत की बात कही गई थी।

महागठबंधन का प्रदर्शन भले ही अपेक्षाओं पर खरा न उतरा हो लेकिन इसने मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को पुनः जीवित किया है। जहाँ यह पार्टी 2014 लोकसभा चुनावों में अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी, वहाँ यह इस चुनाव में 10 सीटें जीतने में सफल हुई है। वहीं दूसरी ओर समाजवादी पार्टी (सपा) पाँच सीटों के साथ संख्यानुसार न लाभ में है, न हानि में (2014 लोकसभा चुनावों में भी पाँच सीटें जीती थी) लेकिन अगर और गहराई में जाकर समझा जाए तो घाटा स्पष्ट दिखता है।

सपा जिन पाँच सीटों पर जीती है, वे हैं- मैनपुरी, आज़मगढ़, मुरादाबाद, रामपुर और संभल। इनमें से मैनपुरी और आज़मगढ़ पर पार्टी ने 2014 में भी जीत दर्ज की थी। लेकिन 2014 में जीतने वाली तीन सीटों- फिरोज़ाबाद, बदायूँ और कन्नौज- पर यह हार गई है। बदायूँ में यह 2014 में 4.9 लाख वोट जीती थी, इस बार भी यही आँकड़ा रहा, यानी सपा को महागठबंधन का लाभ नहीं मिल पाया। वहीं फिरोज़ाबाद में भले ही इसको मिलने वाले मत 4.2 लाख से बढ़कर 4.6 लाख और कन्नौज में 4.8 लाख से बढ़कर 5.5 लाख हो गए हैं लेकिन यहाँ भाजपा बाज़ी मार गई। अगर मत स्थानांतरण 100 प्रतिशत सटीक होता तो फिरोज़ाबाद में यह 5.3 लाख मत और कन्नौज में लाख मत हासिल करके सपा भाजपा को हरा पाती। दरअसल 100 प्रतिशत मत स्थानांतरण की भी आवश्यकता नहीं थी, फिरोज़ाबाद और कन्नौज में भाजपा को क्रमशः- 4.9 लाख और 5.6 लाख मत मिले हैं।

जो तीन नई सीटें- मुरादाबाद, रामपुर और संभाल- सपा ने जीती हैं, वहाँ भले ही मत स्थानांतरण हुआ हो लोकिन इन सभी सीटों पर अधिकांश योगदान स्वयं सपा के मतों का ही था। साथ ही 2014 के दोनों के मतों के योग से अधिक मत भी पार्टी ने जीते हैं।

इसके विपरीत बसपा ने जो सीटें जीती हैं, उसमें आधी से ज़्यादा जगहों पर सपा के अधिक मतों ने बसपा को जीत दिलाई है। बसपा द्वारी जीती गई 10 सीटों- सहारनपुर, बिजनौर, नगीना, अमरोहा, लालगंज, घोसी, जौनपुर, गाज़ीपुर, अंबेडकर नगर और श्रावस्ती- का आँकड़ा देखें।

10 में से नौ जगहों पर बसपा ने 100 प्रतिशत मत स्थानांतरण से भी अधिक मत पाया है जिसका श्रेय पार्टी को ही मिलना चाहिए। लेकिन जिसे सपा की गलती माना जा सकता है, वह यह है कि इन 10 में से छह जगहों पर 2014 में सपा को बसपा से अधिक मत मिले थे और 2019 में इसका लाभ उठाने की बजाय सपा ने इन सीटों को मायावती की झोली में डाल दिया।

सपा को महागठबंधन की समस्याएँ परिणामों के बाद ही नहीं दिखी है, अपितु सीट बँटवारे के समय से ही पार्टी में असंतोष था। स्वयं 38 सीटों पर चुनाव लड़कर और सपा को 37 सीटें देकर मायावती ने अपना रौब दिखाया था, साथ ही कांग्रेस को गठबंधन से दूर रखना भी संभवतः मायावती का ही निर्णय था। सपा जिन सीटों पर जीत सकती थी, वे मायावती के खाते में चली गईं और सपा को वे सीटें मिली जिनमें से कुछ पर उसने कभी जीत दर्ज ही नहीं की थी।

महागठबंधन के बाद मुलायम सिंह ने कहा था कि भाजपा हमसे बेहतर स्थिति में है। नरेंद्र मोदी को पुनः प्रधानमंत्री के रूप में देखने की उनकी इच्छा भी पूरी हुई। परिणामों के बाद पार्टी के प्रदर्शन पर मुलायम सिंह ने कार्यालय में असंतोष व्यक्त किया, साथ ही महागठबंधन पर भी नाराज़गी व्यक्त की। महागठबंधन के पक्ष में नेताजी पहले भी नहीं थे और उन्होंने संरक्षक के रूप में अपनी मजबूरी व्यक्त की थी।

इन चुनावों के बाद यह तो स्पष्ट हो गया है कि महागठबंधन का साथ इतना ही था। अखिलेश यादव सपा को संगठनात्मक रूप से मज़बूत करने में जुट गए हैं। 2022 में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए सपा को उन मतों को वापस जीतना होगा जो बसपा को स्थानांतरित हो गए थे।

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।