राजनीति
सोनिया गांधी द्वारा बनाई गई कमेटी क्या स्पष्ट कर पाएगी भ्रमित कांग्रेस का मत?

कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्षा सोनिया गांधी ने मोदी सरकार के महत्वपूर्ण निर्णयों पर पार्टी में एकजुट राय रखने के लिए एक कमेटी का गठन किया है। 21 सदस्यों वाली यह कमेटी पार्टी में सभी मुद्दों पर पार्टी की राय बनाकर उसे जनता के बीच ले जाएगी।

कांग्रेस सूत्रों की मानें तो इस कमेटी में वरिष्ठ नेताओं के अलावा युवा नेताओं को भी जगह दी गई है। इस कमेटी की पहली बैठक 25 अक्टूबर को संभावित है, जिसमें आर्थिक मुद्दों को लेकर रणनीति बनाई जाएगी। कांग्रेस को लगता है कि मोदी सरकार आर्थिक मामलों में कमजोर हो रही है और पार्टी इसे अगर जमीन पर अच्छे से ले गई, तो इसका लाभ आगामी चुनावों में मिल सकती है।

इस कमेटी के गठन का उद्देश्य सभी राज्यों में बिखरी कांग्रेस को एकजुट करने के साथ-साथ विभिन्न मुद्दों पर सबको एकमत करना है।

2014 में करारी शिकस्त के बाद से ही कांग्रेस पार्टी में कई गुट बन गए और समय-समय पर पार्टी के लीक से हटकर बयान देते रहते हैं। पार्टी को लगता है कि 2019 की लोकसभा चुनाव में इसका भारी नुकसान हुआ।

चुनाव में करारी हार के बाद तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस्तीफा दे दिया था। इस्तीफे के पीछे राहुल की नाराज़गी की बात सामने आई, जिसमें कांग्रेस के ही कुछ नेता पार्टी को नुकसान पहुँचाने का काम कर रहे थे।

सोनिया के कार्यभार लेने के साथ ही यह तय था कि पार्टी फिर से एक तरफा चलेगी और पार्टी के भीतर सत्ता का विकेंद्रीकरण नहीं होगा। कमेटी गठित करने का निर्णय इसी रास्ते पर चलने का अगला कदम है।

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के शुरुआती समय में ही सरकार ने कई निर्णय लिये, जिसमें अनुच्छेद 370, तीन तलाक, राष्ट्रीय जाँच एजेंसी पुनर्गठन और भारतीय राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर प्रमुख है।

कांग्रेस पार्टी द्वारा इस फैसले पर न तो संसद में एकजुट होकर विरोध कर पाई और न ही सड़क पर। उल्टा यह हुआ कि जनता के बीच इन मुद्दों को लेकर गलत संदेश चला गया। लोगों को लगा कि कांग्रेस राजनीतिक खेल खेल रही है।

अनुच्छेद 370 का अध्यादेश विधेयक जब राज्यसभा में पेश हुआ तो पार्टी के नेता को इसकी भनक तक नहीं लग पाई, इतना ही नहीं संसद के भीतर पार्टी के नेताओं को पता ही नहीं चला कि कांग्रेस की राय क्या है? परिणाम यह हुआ कि कई नेता इस विधेयक के समर्थन में बोलने लगे।

राहुल गांधी के करीबी और पार्टी के वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अनुच्छेद 370 हटाने का समर्थन करते हुए पार्टी में हलचल मचा दी, जिसके बाद पार्टी की सर्वोच्च इकाई की बैठक हुई। बैठक में भी हिंदीभाषी क्षेत्र के नेताओं ने जनभावनाओं को ध्यान में रखकर अनुच्छेद 370 का समर्थन करने के लिए पार्टी को कहा, लेकिन पार्टी 370 के विरोध में रही। इसके बाद भी कई नेताओं ने अनुच्छेद 370 को हटाने का समर्थन किया।

देश का सबसे संवेदनशील मुद्दे पर गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान पार्टी के मुख्य रणनीतिकार कपिल सिब्बल ने सर्वोच्च न्यायालय में अर्जी दाखिल कर अयोध्या विवाद पर सुनवाई नहीं करने का आग्रह किया, जिसे भाजपा ने चुनाव के दौरान खूब भुनाया। स्थिति यह हो गई कि पार्टी को इससे पल्ला झाड़ना पड़ा और बाद में कपिल सिब्बल के बयान से किनारा कर लिया, लेकिन चुनाव में जो नुकसान होना था, वह पार्टी को हो गया।

उसी तरह सर्जिकल स्ट्राईक पर कई कांग्रेसी नेताओं ने सरकार पर हमला बोलने के साथ-साथ सेना के विरोध में भी बिगुल फूंक दिया, पार्टी को इसका भी नुकसान उठाना पड़ा।

कांग्रेस के लिए आने वाले दिन और भी मुश्किल हैं। पार्टी के पास पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं है। कई नेता यह कहकर पार्टी छोड़ रहे हैं कि आलाकमान कोई ठोस निर्णय नहीं ले पा रही है। इसी बीच अयोध्या विवाद जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर निर्णय आना है।

कांग्रेस के हाईकमान को लगता है कि इस बार अगर चूक हुई तो इसका भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है, इसलिए पार्टी पहले से ही सभी तैयारियाँ पूरी कर रही है।

कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, सोनिया गांधी द्वारा गठित यह कमेटी अगर उद्देश्य के अनुरूप काम करती है तो आने वाले समय में पार्टी कांग्रेस की महत्वपूर्ण इकाई कांग्रेस कार्यसमिति को भंग कर इसी तरह की एक और कमेटी बनाएगी, जो निर्णय लेने के साथ-साथ धरातल पर भी उसे लागू करने का काम करेगी।