भारती / राजनीति
निजी क्षेत्र पर कीचड़ उछालने का यह समय नहीं है लेकिन विरोधी कुछ और ही कर रहे हैं

भारत वह देश है जिसने पिछले वर्ष मई में व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण (पीपीई) का उत्पादन शून्य से बढ़कर औसत रूप से प्रतिदिन 1.5 लाख इकाइयों तक होते हुए देखा, वह भी जब राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन अपने शिखर पर था। इसके बावजूद टीका अभियान में लगे भारत के शोध एवं विकास कार्य के साथ-साथ देश के अन्य निजी उद्यमों पर कीचड़ उछाला जा रहा है।

ये कीचड़ उछालने वाले कोई और नहीं बल्कि भारत के ही विपक्षी नेता और कुछ पत्रकार हैं जो ऐसा क्यों कर रहे हैं, वह समझ से परे है लेकिन सीधे तौर पर कहा जाए तो यह मूर्खतापूर्ण है। भारत में जबसे कोरोनावायरस की दूसरी लहर ने उत्पात मचाना शुरू किया है, तब से हम देख रहे हैं कि भारत में बनी या भारत में बनाई जा सकने वाली हर चीज़ के विरुद्ध घृणा का वातावरण खड़ा किया जा रहा है।

टीका मूल्य से टीका विनिर्माण, इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च से इंडियन प्रीमियर लीग, सभी को निशाना बनाया जा रहा है। इसमें वह घटना भी जोड़ लें जिसमें न्यायपालिका ने तमिलनाडु सरकार को आदेश दिया एक संयंत्र को अपने अधीन करके मेडिकल ऑक्सीजन का विनिर्माण करे, जिसमें इस संयंत्र का स्वामित्व रखने वाली कंपनी की कोई भूमिका नहीं होगी।

यह दर्शाता है कि भारत का राजनीतिक परिदृश्य कैसा है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली नरेंद्र मोदी सरकार पर कांग्रेस की तरह समाजवादी होने का आरोप लगाया जा सकता है लेकिन कम से कम सरकार ने निजीकरण, ईज़ ऑफ डुइंग बिज़नेस (व्यापार सहजता) और निजी उद्यमों के प्रोत्साहन के प्रति प्रतिबद्धता दिखाई है।

वहीं दूसरी ओर, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस, जिसमें राहुल गांधी बढ़-चढ़कर बोल रहे हैं, ने हर क्षेत्र से जुड़े निजी उद्यमों पर कीचड़ उछाला है। नरेंद्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में उनका निशाना सरकार थी जिसमें ‘सूट-बूट की सरकार’ का तंज कसा जाता था। राफेल विवाद के समय भी यही आरोप लगाया गया कि सरकार एक उद्यमी की सहायता कर रही है।

किसान आंदोलन हुए और विपक्ष के निशाने का पूरा केंद्र बन गए अडानी और अंबानी जो तथाकथित रूप से किसानों की भूमि हड़पना चाहते हैं, छोटे-बड़े निजी निगम अन्नदाताओं का स्थान ले लेंगे व ऐसी ही निराधार तर्कहीन बातें फैलाई गईं। अब जब टीका अभियान चल रहा है तो सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (एसआईआई) और भारत बायोटेक उनके निशाने पर आ गए हैं।

टीका मूल्य से लेकर मुनाफाखोरी के आरोपों तक उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। असम के वित्त एवं स्वास्थ्य मंत्री हिमंता सरमा बिस्वा ने राहुल गांधी के इस पाखंड का अच्छा जवाब केंद्र द्वारा 2008 में निकाले एक आदेश के उद्धरण से दिया।

2008 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन के बाद कसौली स्थित केंद्रीय शोध संस्थान, कुन्नूर स्थित भारतीय पाश्चर संस्थान और चेन्नई स्थित बीसीजी वैक्सीन लैब को निलंबित कर दिया गया था। इन इकाइयों का उपयोग डीपीटी, मीज़ल्स, पोलियो और बीसीजी के टीकों के विनिर्माण के लिए होता था।

2009 में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र यानी यूपीए 2.0 की सरकार को इन इकाइयों के बंद होने के विषय पर एक नोटिस जारी किया था। टीका मूल्य संबंधित घटनाक्रम भी लज्जाजनक रहा।

प्राणरक्षक टीके के मूल्य के विषय में जब सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़े, वह भी एक वैश्विक महामारी के बीच, तो ‘मेक इन इंडिया’ के विरुद्ध भड़काई जा रही तिरस्कार की भावनाओं पर बात करना आवश्यक है। केंद्र ने न्यायालय को स्पष्टीकरण दिया कि टीका मूल्य कैसे तय किया गया है।

राज्य सरकारों और ट्विटर के आर्मचेयर एक्टिविस्ट्स के दबाव में केंद्र सरकार ने इसी सप्ताह एसआईआई और भारत बायोटेक से टीका मूल्य पर मोलभाव किया। अंततः टीका मूल्य को कम किया गया लेकिन इससे भी राज्य सरकारें संतुष्ट नहीं हुईं क्योंकि वे चाहती हैं या तो केंद्र उन्हें मुफ्त में टीका दे दे या विनिर्माताओं से न्यूनतम संभावित मूल्य पर बिकवाए।

कुछ माह पूर्व की ही बात है कि टीका को कम से कम मूल्य पर उपलब्ध कराने के पक्ष में जो लोग हैं, वे किसानों के लिए एक उच्चतर तथा अनिवार्य न्यूनतम समर्थन मूल्य की माँग कर रहे थे। स्पष्ट रूप से नीति, लाभ और निजी उद्यम से ऊपर उनकी राजनीति आती है।

ट्विटर पर टीका मूल्य की शिकायत करने वाले अधिकांश लोग, विशेषकर ब्लू टिक वाले तथाकथित ट्विटर सेलेब अपनी एक दिन की कॉफी पर टीका के निर्धारित मूल्य से अधिक खर्च कर देते होंगे। कुछ ने तो एक कदम आगे बढ़कर भारत में बनने वाली वैक्सीन को नीचा भी दिखाया।

उन्होंने सरकार पर प्रश्न उठाया कि फाइज़र एवं अन्य विदेशी टीकों को क्यों कोविड-19 टीके के रूप में आपातकाल उपयोग की स्वीकृति नहीं दी गई। देश की न्यायपालिका भी भारत में निर्मित या निर्मित होने वाली वस्तुओं पर कीचड़ उछालने के अभियान में पीछे नहीं रही।

सर्वोच्च न्यायालय ने तमिलनाडु सरकार को स्टरलाइट तांबा संयंत्र को अपने अधीन करके मेडिकल ऑक्सीजन के विनिर्माण का आदेश दिया जिसे एक बेतुके आदेश के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। जैसी अपेक्षा थी, वेदांता ने इस आदेश का भरपूर विरोध किया और कहा कि वे इस मामले में विशेषज्ञ हैं एवं संयंत्र चलाने में विशेषज्ञता प्राप्त व्यावसायिकों की आवश्यकता है।

अब अगला निशाना स्पष्ट रूप से इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) होने वाला है। विश्व की सबसे बड़ी खेल लीगों में से एक और क्रिकेट विश्व को भारत का सबसे बड़ा योगदान आईपीएल अब निशाने पर इसलिए है क्योंकि कुछ लोग मानते हैं कि महामारी के समय एक खेल लीग को चलने देना अनैतिक है।

यह विरोध इस तथ्य के बावजूद हो रहा है कि आईपीएल सहस्रों को रोजगार देता है और लॉकडाउन से प्रभावित उद्योगों को फिर से उठ खड़ा होने का अवसर देता है। साथ ही श्मशान के बाहर से असंवेदनशील समाचार कवरेज के स्थान पर दर्शकों के पास मनोरंजन के एक साधन का विकल्प होता है।

कुल मिलाकर बात यह है कि माना जाने लगा है कि जो भी भारत में होगा, वह अनैतिक होगा। अब जब राज्य एसआईआई से टीका प्राप्त करने के लिए तैयार हैं तो यह बात समझ ली जानी चाहिए कि भारत में हुए शोध एवं विकास कार्य के कारण ही यह संभव हो पा रहा है कि भारत किसी देश के आगे वैक्सीन की भीख नहीं माँग रहा है।

साथ ही, पिछले वर्ष पीपीई किट और अन्य चिकित्सकीय उपकरणों में निवेश तथा उत्पादन क्षमता बढ़ा सकने के हमारे निजी क्षेत्र के सामर्थ्य के कारण ही हो पा रहा कि देश बढ़ती माँग को पूरा कर पाया और इन आवश्यक वस्तुओं के लिए हमें दूसरों पर आश्रित नहीं होना पड़ा।

कोविड से हमारी लड़ाई हमें स्पष्ट रूप से सिखाती है कि निजी क्षेत्र और निजी उद्यमों का सम्मान करें और इस बात को स्वीकार कर लें कि सरकार हर चीज़ में हमारी पालनहार बनकर नहीं रह सकती।

आज बात वैक्सीन की है, कल यह बात 5जी एवं आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की होगी और भविष्य में बात 50 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था की होगी। हमारे ये सभी प्रयास निजी क्षेत्र की भागीदारी के बिना अधूरे रहेंगे। समय आ गया है कि हम भारत में निर्मित वस्तुओं के प्रति घृणा को त्याग दें।