राजनीति
क्या “मामा” शिवराज अपने विकास कार्यों के दम पर सत्ता में रह पाएंगे कायम?
मध्यप्रदेश स्टार्टअप कॉन्क्लेव

प्रसंग
  • ग्रामीण विशेषज्ञ होने का मतलब यह नहीं कि एक राजनेता नये विचारों को जीवन का अभिन्न अंग नहीं बना सकता, इस विषय पर मामाजी का विशेष ध्यान रहा है।

2003 के विधान सभा चुनाव में बी एस पी यानि कि बिजली, सड़क और पानी के मुद्दों पर जब मध्य प्रदेश में भाजपा की एतिहासिक विजय हुई थी। 229 में से 173 सीटों पर भाजपा का परचम लहराया था। दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस ने केवल 38 सीटें जीती थीं और उसमे एक थी राघोगढ़।

दिग्विजय सिंह की स्वतः विजय हुई थी तत्कालीन विदिशा सांसद शिवराज सिंह चौहान के विरुद्ध। नियति का खेल ऐसा कि अपने राजनैतिक जीवन में केवल इसी एक हार का सामना करने वाले शिवराज को दो वर्ष बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई। इसके पहले चौहान बुधनी से 1990 में विधायक और 1991, 1996, 1998 और 1999 में विदिशा से सांसद रह चुके थे। नवम्बर 2005 में उन्होंने राज्य की कमान संभाली और पुनः बुधनी से चुन कर आए।

ग्रामीण क्षेत्रों में पले बढ़े शिवराज ने बी एस पी के मुद्दों पर ही ध्यान लगाया। मध्य प्रदेश की अर्थव्यवस्था खेती पर निर्भर थी। चौहान ने ग्रामीण सड़कें बनायीं, बिजली उत्पादन में राज्य को आत्मनिर्भर बनाया और राज्य के कृषकों को आशा की किरण दिखाई। चौहान दिग्विजय से चुनाव तो हारे थे, लेकिन हार कर भी बाजी़गर की तरह जीते।

चौहान ने जनता का विश्वास और एक संवेदनशील मुख्यमंत्री की छबि जीती। 2007 में प्रदेश की बेटियों के लिए लाड़ली लक्ष्मी योजना के प्रमोचन के बाद चौहान ने मामाजी की पदवी भी जीती। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि जनता के इस प्यार को मामाजी ने 2008 में वोटों में भी बदला और 145 सीटें जीतीं।

कृषि क्षेत्र के विकास को आधार बना कर जनता का विश्वास जीतना मामाजी की विशेषता बन गई। दूसरी पारी में चौहान ने कृषि के लिए अलग से बजट बनाया। मां नर्मदा के नाम से बनाए गए नर्मदापुरम विभाग को देश के गेहूं उत्पादन में सर्वोच्च स्थान दिलाया। प्रदेश ने 2011 में जो कृषिकर्मण पुरस्कार जीतना आरंभ किया, तो वह अनुक्रम आज भी चला आ रहा है। 2013 में अपनी छबि और मोदी लहर के चलते 165 सीटें जीत कर भाजपा की लगातार तीसरी बार सरकार बनी।

राजनीति में छबि तभी तक अच्छी होती है जब तक वह रूढ़िबद्ध धारणा का स्वरूप ना ले। शिवराज सिंह चौहान आज एक कृषि विशेषज्ञ राजनेता तो हैं लेकिन क्या वो इस छबि से सीमित हो रहे हैं? 2018 के चुनाव प्रचार में मामाजी ने इस परिसीमन से बाहर जाने का बहुत ही जागरुक प्रयत्न किया है।

सर्वप्रथम मामाजी सोशल मीडिया के उपयोग में देश के दिग्गज राजनेता के तौर पर उभरे हैं। जिस कुशलता से उन्होंने ट्विटर और फेसबुक का उपयोग किया है, अन्य मुख्यमंत्रियों के लिए एक सबक है। चाहे बात राहुल गांधी पर तंज कसने की हो या अपनी रैलियों के जीवंत प्रसारण की, मामाजी ने स्वयं को एक प्रगतिशील राजनेता की तरह स्थापित किया है। ग्रामीण विशेषज्ञ होने का मतलब यह नहीं कि एक राजनेता नये विचारों को जीवन का अभिन्न अंग नहीं बना सकता, इस विषय पर मामाजी का विशेष ध्यान रहा है।

इंदौर और भोपाल देश के बीस सबसे बड़े शहरों में गिने जाते हैं। इस चुनाव में मामाजी ने नगरीय विकास के लिए विशेष प्रतिबद्धता दर्शायी है। स्वच्छ भारत अभियान में इंदौर और भोपाल ने दो वर्षो से अपना डंका बजाया हुआ है। स्वच्छता की बात को चुनावी नेपथ्य में बताने में मामाजी पीछे नहीं रहे हैं। इस प्रचार में उनका अथक प्रयास रहा है कि मध्य प्रदेश को नगरीय विकास में भी अग्रिम पंक्ति में खड़ा दिखाया जाए।

इंदौर और भोपाल दोनों ही शहरों को चुनावों के ठीक पहले मेट्रो की भी सौगात दी गई है। केंद्र एवं राज्य सरकारों ने मिल कर तीन वर्षो में दोनों शहरों में मेट्रो चलाने का प्रयोजन किया है। तीव्र गति से बढ़ते इन शहरों के लिए मेट्रो भविष्य के नियोजन में महत्वपूर्ण भूमिका तो निभाएगा ही, मामाजी को भी एक प्रगतिशील मुख्यमंत्री की तरह प्रस्तुत करेगा। इंदौर के सुपर कॉरिडोर को तो मामाजी पहले ही वॉशिंग्टन की सड़कों से भी अच्छी सड़क बता चुके हैं।

भोपाल में ही मध्यप्रदेश सरकार ने प्रदेश को एक स्टार्ट अप मित्रवत स्वरुप में प्रस्तुत किया। नीति आयोग के अध्यक्ष अमिताभ कांत को बुला कर प्रदेश में नए उद्योगों के विकास के लिए सरकारी प्रयासों की बात की गयी।

यह प्रयत्न दर्शाता है कि मामाजी केवल कृषि संबंधित वचनों से 2018 का चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। वह यह समझते हैं कि प्रदेश के युवाओं की आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए सर्विस एवं उद्योग क्षेत्र का विकास आवश्यक है। शहरी क्षेत्र भाजपा का स्वाभाविक गढ़ रहे हैं और मामाजी का पूर्ण प्रयत्न है कि कांग्रेस इस गढ़ में सेंध ना लगा पाए।

प्रदेश की जनता शिवराज सिंह चौहान के इस विस्तृत स्वरूप को अपनाती है या नहीं यह 11 दिसम्बर को ही पता चलेगा। किंतु अपने मूलभूत संदेश से आगे बढ़ कर विविधता को स्वीकार करना मुख्यमंत्री के राजनैतिक यथार्थवाद का संकेत है।

यह भाजपा के संगठन पर निर्भर करता है कि पार्टी कितनी प्रभावशीलता से इस बदलते संदेश से वोटरों को उत्साहित कर पाती है।