राजनीति
शाहीनबाग निर्णय लूट्यन्स गिरोह को तमाचा- “शांतिपूर्ण” प्रदर्शन का अर्थ वैधानिक नहीं

सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने माना कि शाहीनबाग में मुस्लिम प्रदर्शनकारियों द्वारा लंबे समय तक सार्वजनिक स्थल पर कब्ज़ा करना अस्वीकार्य था। लेकिन कानून जानने वालों को इस निर्णय पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। सिर्फ एजेंडा से चलने वाले बौद्धिक दावा कर सकते हैं कि दीर्घावधि तक सार्वजनिक स्थलों को छेककर रखना लोकतांत्रिक प्रदर्शन है।

यह निर्णय लूट्यन्स के अभिजात वर्ग पर तमाचा है जिन्होंने निरंतर इन प्रदर्शनों को शांतिपूर्ण दिखाने का प्रयास किया जबकि इस मंच से हर प्रकार के भड़काऊ भाषण दिए गए थे।

कल आए निर्णय में न्यायाधीश संजय किशन कौल के नेतृत्व वाली पीठ ने माना कि प्रदर्शन करना संवैधानिक अधिकार है लेकिन उसके लिए “सार्वजनिक मार्गों और स्थलों को बाधित नहीं किया जा सकता, वह भी अनिश्चितकाल के लिए। लोकतंत्र और विरोध साथ-साथ चलते हैं लेकिन विरोध प्रदर्शन तय स्थलों पर ही होना चाहिए।”

नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 भारत के तीन पड़ोसी इस्लामी देशों में प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को तेज़ी से नागरिकता देने की बात करता है जिससे किसी भी भारतीय नागरिक के अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता लेकिन इसका विरोध करने वालों ने दर्शाया कि शाहीनबाग की जो दादियाँ रास्ता रोककर बैठी हैं, वे शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रही हैं।

वे हमें भ्रमित कर रहे थे क्योंकि शांतिपूर्ण होने का अर्थ यह नहीं कि उनकी गतिविधियाँ वैधानिक थीं। आप मेरे घर में घुसकर नहीं कह सकते कि आप मेरे राजनीतिक विचारों के विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हैं क्योंकि आपने मेरे निजी क्षेत्र पर कब्ज़ा किया है।

ऐसा ही सार्वजनिक स्थलों को लिए भी है जहाँ आम नागरिकों के अधिकार किसी कानून का विरोध करने वाले एक छोटे समूह के अधिकारों से ऊपर हैं। न्यायालय ने सही कहा कि प्रदर्शन निर्धारित स्थलों पर ही किया जाना चाहिए।

दिल्ली में ये स्थल जंतर-मंतर या रामलीला मैदान हो सकते हैं लेकिन यहाँ एक प्रश्न रह जाता है- क्या हो जब दूसरे प्रदर्शनकारी भी उन तय स्थलों पर प्रदर्शन करना चाहेंगे? क्या सभी प्रदर्शनकारियों को अलग-अलग निर्धारित स्थल दिए जाएँगे ताकि आपसी तनाव न हो? या फिर प्रदर्शन के लिए निर्धारित स्थलों की बुकिंग के लिए कोई टोकन प्रणाली होगी?

सर्वोच्च न्यायालय ने एक और महत्त्वपूर्ण बिंदु रखा- प्रदर्शनकारियों से उचित व्यवहार और बातचीत करने वाली पुलिस को न्यायालय की अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी यदि वे आम लोगों को समस्या से बचाने के लिए इन प्रदर्शनकारियों को हटाने चाहते हैं तो। निर्णय में कहा गया, “न्यायालय कार्रवाइयों की वैधता पर निर्णय लेती है लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि प्रशासन न्यायालय के कंधे पर बंदूक रखकर चलाए।”

इससे एक और प्रश्न उठता है- क्या हो जब पुलिस की बातचीत के बाद भी प्रदर्शनकारी सार्वजनिक स्थलों को खाली न करें? क्यों हो यदि हिंसक प्रदर्शनकारी वृद्ध महिलाओं के कंधे पर रखकर बंदूक चलाना चाहते हों? क्या न्यायालय मानेगा कि बल से लोगों को हटाने में पुलिस सदा गलत होती है यदि किसी प्रदर्शनकारी को चोट आ जाए तो?

निर्णय में कहा गया कि वैधानिक बल प्रयोग किया जा सकता है। क्या तब न्यायालय पुलिस के साथ खड़ा रहेगा या कहेगा कि आवश्यकता से अधिक बल का उपयोग किया गया, वह भी तब जब किस प्रकार के प्रदर्शनकारियों के लिए कितना बल उपयोग किया जाना चाहिए, यह तय करने का अधिकार न्यायालय का नहीं है। और तब क्या हो जब प्रदर्शनकारी सशस्त्र हों या प्रदर्शन के माध्यम से सांप्रदायिक दंगा भड़काने में सक्षम हों?

शाहीनबाग प्रदर्शनकारियों का अनकहा उद्देश्य था कि दिखाया जाए कि भारतीय राज्य विरोध के प्रति असहिष्णु है जिसने “शांतिपूर्ण” प्रदर्शनकारियों के लिए बल प्रयोग किया। वे लोग पुलिस को कार्रवाई के लिए उकसाना चाहते थे और ऐसे चित्र खींचना चाहते थे जिसमें पुलिस किसी वृद्ध दादी के साथ बर्बरता करती दिखाई दे। ऐसा करके वे “पुलिस अत्याचारों” के विरुद्ध हिंसक प्रदर्शन आयोजित कर सकते थे।

दिल्ली पुलिस भले ही शाहीनबाग को खाली कराने में सफल नहीं हुई लेकिन कम से कम इसने गलत नैरेटिव (कथानक) को पनपने नहीं दिया। अब जब न्यायालय ने कह दिया है कि वे कार्रवाई कर सकते हैं तो अगली बार जब इस्लामवादी समूह बूढ़ी महिलाओं का उपयोग अपने एजेंडा के लिए करके हिंसा फैलाना चाहें तो पुलिस बेहतर रूप से तैयार रहेगी।

न्यायालय ने कुछ इस्लामवादी एजेंडों को पनपने से पहले काट दिया है। लेकिन पुलिस को भविष्य में अधिक चतुर होने की आवश्यकता है। वे ये कर सकते हैं-

पहला, वे बॉडी (शरीर में लगे) कैमरों का उपयोग करें जिससे दिखे प्रदर्शनकारी क्या कर रहे हैं, न सिर्फ उनके लाठी बरसाने वाले या महिलाओं को प्रदर्शन स्थल से दूर ले जाने वाले वीडियो रिकॉर्ड होने दें।

अगली बार के प्रदर्शनों में सिर्फ महिलाओं के नहीं बल्कि बच्चों के होने की भी अपेक्षा रखें। शाहीनबाग में भी हमने देखा था कि एक महिला अपने बीमार बच्चे को प्रदर्शन स्थल पर लेकर आई थी और बाद में उस बच्चे की मौत हो गई थी। लेकिन उसकी माँ ने कहा था, “मुझे किसी का डर नहीं। मैंने अपने एक बच्चा खो दिया है। अगर अन्य दो बच्चों की भी इस उद्देश्य के लिए मौत हो तो अफसोस नहीं। मेरा परिवार मुझसे सहमत नहीं होगा लेकिन यह एक बड़े उद्देश्य के लिए है।”

जो इस्लामवादी भारतीय राज्य को पंगु बनाना चाहते हैं, उनके लिए सब एक साधन हैं, बच्चे भी।

दूसरा, पुलिस को ऐसे लोगों का भी उपयोग करना चाहिए जो मीडिया के समक्ष बेहतर तरीके से उनकी बात रख सकें, पुलिसकर्मी अच्छे प्रवक्ता हों, यह आवश्यक नहीं। कई बार पुलिसकर्मी ऐसे बयान देते हैं जिनका आसानी से गलत मतलब निकालकर प्रोपगैंडा के लिए उपयोग किया जा सकता है।

वैसे भी मीडिया को लगता है कि पुलिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता। इस छवि को तब तक नहीं सुधारा जा सकता जब तक कुशल लोग मीडिया से बेहतर वार्ता स्थापित न करें।

तीसरा, नई प्रकार की परिस्थितियों से निपटने के लिए पुलिस को बेहतर प्रशिक्षण की आवश्यकता है। लोगों को लाठी से पीटना, भले ही इसकी आवश्यकता हो, गलत संदेश भेजता है। अर्थात बल प्रयोग के सूक्ष्म तरीकों का उपयोग हो।

शाहीनबाग पुलिस और भारत के लोगों के लिए एक चेतावनी है कि जिन शक्तियों ने पाकिस्तान बनाया वे आज भी भारत में जीवित हैं। विभाजन को हमने अपरिहार्य मानकर स्वीकार कर लिया क्योंकि डाइरेक्ट एक्शन डे और कलकत्ता हत्याओं में हमने जिन्ना की कठोरता देख ली थी।

आज कोई छोटे-जिन्ना अपना कार्य कर रहे हैं और मुस्लिमों के मस्तिष्क में विभाजन मानसिकता की आग को फिर से सुलगाया जा रहा है। भले ही शाहीनबाग पर न्यायालय ने एक समझदार निर्णय दिया है लेकिन वह अधिक कुछ नहीं कर सकता है। नेताओं और भारत के लोगों को भारतीय मुस्लिमों को मुख्यधारा से अलग करने का प्रयास करने वाले छोटे जिन्नाओं को रोकना होगा।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा