राजनीति
जम्मू-कश्मीर विधानसभा भंग- क्यों सही है राज्यपाल का निर्णय

आशुचित्र-

  • कार्यों में हथकल लगाकर न्यायालय भारत को क्षति पहुँचाएगा।
  • राज्यपाल के पद को प्रभावहीन व अमान्य बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) द्वारा सरकार बनाने का दावा पेश किए जाने के बावजूद राज्यपाल सत्पाल मलिक के विधान सभा भंग करने के निर्णय पर विवाद होना नैसर्गिक है।

यह संभावित है कि कांग्रेस के समर्थन और मुख्य प्रतिस्पर्धी नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) की बाहरी सहायता से पीडीपी की सरकार स्थिर नहीं रह पाती लेकिन फिर भी यह राज्यपाल का कार्य नहीं है कि वे इस बात निर्णय लें। उन्हें बस यह करना था कि जल्द से जल्द विश्वास मत की माँग कर सरकार को चलने देना था।

हालँकि, इसे अपवाद मानने के लिए हमारे पास अच्छे कारण उपस्थित हैं और न्यायालय को सलाह है कि वे राज्यपाल के निर्णय में हस्तक्षेप न करें क्योंकि वे सीमावर्ती हिंसा-प्रवृत्त राज्य की ज़मीनी स्थिति को अच्छी तरह समझते हैं। जैसे न्यायपालिका, राज्यपाल और विधान सभा मुख्य संवैधानिक कृत्यकारियाँ हैं, यह न्यायपालिका को शोभा नहीं देता है कि वे बार-बार अपने अधिकारों से दूसरी संस्थाओं के अधिकारों में हस्तक्षेप करें।

यह नहीं कहना चाह रहा कि राज्यपाल पक्षपातपूर्ण नहीं होते और यह भी नहीं कि वह केंद्र सरकार के प्रभाव में काम नहीं करते। लेकिन यदि राज्यपाल के हर निर्णय पर न्यायालय समीक्षा करने लग जाए तो वे मात्र कठपुतली बनकर रह जाएँगे। जब राज्यपाल संवैधानिक निर्णय लेते हैं कि किस पार्टी को सरकार बनाना चाहिए तो यह न्यायालय का काम नहीं है कि उनके निर्णयों पर संदेह करे। यदि इस प्रकार का अधिकार जम्मू-कश्मीर जैसे संवेदनशील राज्य में राज्यपाल के पास नहीं होगा तो बेहतर यह होगा कि राज्यपाल हो ही ना।

जैसा कि हम जानते हैं कि जम्मू-कश्मीर का मुद्दा विशेष है और बोम्मल निर्णय जिसके अनुसार बहुमत सिर्फ सभा में ही सिद्ध की जा सकती है, राज्यपाल के कक्ष में नहीं, ज़रूरी नहीं कि वह यहाँ लागू हो।

पहला  यह कि दो प्रतिस्पर्धियों की संधि मात्र लोक सभा चुनावों के अल्प समय के लिए इनके चुनावी उद्देश्यों के लिए ही होगी जो कि शासने के लिए बुरी है। वो भी तब, जब आतंकवादी पुलिसकर्मियों और सेना को उनके घर में धमका रहे हैं, सैन्य बलों को एक दृढ़ आदेश और राजनीतिक अधिकार की आवश्यकता है। इस स्थिति में राज्यपाल ही यह आवश्यकता पूरी कर सकता है।

दूसरा  यह कि यह बात स्पष्ट है कि सरकार बनाने का उद्देश्य शासन सेवा प्रदान करना नहीं है। यह महबूबा मुफ्ती की पीडीपी को बिखरने से रोकने की प्रेरणा से उत्पन्न कदम है क्योंकि इसके कुछ विधायक भारतीय जनता पार्टी से जुड़ने के लिए तैयार थे।

तीसरा  यह कि भाजप-विरोधी गठबंधन सुविधाजनक है क्योंकि पीडीपी-कांग्रेस की संधि के साथ एनसी का बाहरी समर्थन कश्मीर घाटी का अच्छा प्रतिनिधि बन सकता था क्योंकि जम्मू में अधिकतर सीटों पर भाजपा जीती थी।

चौथा  यह कि एनसी पिछले पाँच महीनों से विधान सभा भंग करने की माँग कर रही थी तो यह आश्चर्य की बात है कि अब यह इस सरकार को समर्थन क्यों दे रही है जब आम चुनावों में पाँच महीनों का समय ही शेष है।

अगर हम इन कारकों पर विचार करें तो पाएँगे कि राज्यपाल का निर्णय अकारण ही नहीं था, भले ही ऐसा प्रतीत होता है कि यह बहिष्कृत पार्टी भाजपा की अनुकूलता के लिए लिया गया हो।

यह राज्यपाल का सोचा-समझा निर्णय है और इन परिस्थितियों में जो सबसे कम बुरा हो सकता था, मलिक ने उसे ही चुना है। यदि इस निर्णय में न्यायालय हथकल लगाता है तो यह भारत के लिए नुकसानदायक होगा। राज्यपाल के पद को और प्रभावहीन व अमान्य बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं।