राजनीति
दलितों के अधिकारों पर अतिक्रमण का “अवैध” खेल बिहार के “सुशासन” में

राजनीति में पुराना फैशन है सैद्धांतिक रूप से खुद को दबे-पिछड़े और दलितों-वंचितों की आवाज़ के रूप में प्रायोजित करना और व्यवहार में ठीक उलट कार्य करना। बिहार में फिर से “सुशासन” की सरकार बन गई है और यह इस पाखंड की परंपरा का अपवाद नहीं, बल्कि एक अहम् उदाहरण है।

सत्ताप्रेरित राजनीतिक स्वार्थों के कारण इस सरकार ने पूर्व में भी दलितों को महादलित के रूप में नामित किया जिसपर काफी विवाद भी हुआ था कि यह संविधान-सम्मत है या नहीं। खैर, यहाँ इसकी वैधानिकता पर प्रश्न खड़े करना हमारा उद्देश्य नहीं, बल्कि दलितों के नाम पर राजनीति की दुकान चलाने वालों का ध्यान खींचना मात्र है कि वे उन मुद्दों को भी उठाएँ जिसके कारण दलितों के सामाजिक एवं संवैधानिक अधिकारों का बड़े व्यापक पैमाने पर हनन हो रहा है।

दुर्भाग्य से दलित संगठन, राजनेता, लोक-पदाधिकारी इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं, क्योंकि बिहार की राजनीति को जातीय समीकरण से ऊपर उठकर देखने का इन्होंने कभी प्रयास ही नहीं किया। जातीय-समूह इनके लिए मात्र थोक में वोट पाने का एक सरल स्रोत रहा है। ऐसे मुद्दों पर इन सभी का भयंकर गठजोड़ रहा है।

बिहार में वर्तमान में हज़ारों की संख्या में ऐसे मामले हैं जिसमें दावा किया गया है कि “गैर-अनुसूचित” जातियाँ अनुसूचित जातियों के प्रमाण-पत्रों के सहारे वास्तविक रूप से अनुसूचित जातियों के संवैधानिक विशेषाधिकारों जैसे आरक्षण आदि सुविधाओं पर अतिक्रमण कर रही हैं, लेकिन उनपर विभिन्न शीर्ष सरकारी विभागों में शिकायत दर्ज करने के बावजूद कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

यह “फर्ज़ीवाड़ा” तो इतने बड़े पैमाने पर हो रहा है कि कई जगह अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित सांसद, विधायक, पार्षद, सरपंच, चिकित्सक आदि जिम्मेदार पदों पर भी “फर्ज़ी” अनुसूचित जातियों के लोग आसीन हैं।

इस बात को अभिप्रमाणित करते हुए पटना विश्वविद्यालय के जानेमाने दलित चिंतक व प्राध्यापक डॉ अमित पासवान ने बेबाकी से कहा कि ऐसे मामलों पर शिकायतों के बावजूद भी सरकारी तंत्र की चुप्पी दलितों के प्रति सरकार के दोहरे चरित्र को तो दिखाती ही है साथ ही दलित प्रतिनिधित्व के कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े करती है।

उन्होंने ऐसे दर्जनों मामलों के होने का उदाहरण दिया, साथ ही वर्तमान भारतीय दलित राजनीति के कई वरिष्ठ नेताओं के ऐसे मामले में लिप्त होने का भी ज़ोरदार दावा किया। व्यक्तिगत स्तर पर अगर न भी देखें तो भी पाएँगे कि इसे राज्य के संरक्षण में संस्थागत तरीके से प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसे बिहार सरकार के एक आदेश के आलोक में आसानी से समझा जा सकता है-

वर्ष 2014 में बिहार सरकार ने अपने सामान्य प्रशासन विभाग के एक संकल्प संख्या 6455, दिनांक 16/05/2014 के द्वारा बिहार के ‘खतवे’ जाति को अनुसूचित जाति का प्रमाणपत्र ‘चौपाल’ जाति के नाम पर निर्गत करने का आदेश दिया था, लेकिन अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार ने अपने पत्रांक 12017/7/2018-SCD (R। I। Cell), दिनांक 12/12/2018 के माध्यम से इसे असंवैधानिक और गैर-कानूनी मानते हुए इस पर रोक लगा दिया।

यह निर्विवादित तथ्य है कि संविधान के अनुच्छेद 341(2) के अंतर्गत इस संबंध में किसी भी प्रकार के संशोधन का अधिकार राज्य सूची का मामला ही नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण रूप से केंद्र सूची का विषय है। यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने कई आदेशों में यह स्पष्ट रूप से कहा कि यह मात्र संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है जिसे राष्ट्रपति के आदेश के उपरांत ही स्वीकृत किया जा सकता है।

‘खतवे’ जाति की संवैधानिक स्थिति की बात करें तो राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की वेबसाईट और अन्य सरकारी अभिलेखों में यह एकदम साफ-साफ लिखा हुआ है कि ‘खतवे’ ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ (क्रमांक संख्या 25) और चौपाल अनुसूचित जाति (क्रमांक संख्या 7) में आते हैं, लेकिन इसके बाद भी ऐसी जातीय मिलावट हज़ारों की संख्या में की जा रही है।

अनगिनत ऐसे मामलों का दावा किया जा रहा है जिसमें गैर-अनुसूचित जाति के समुदाय अनुसूचित जाति के हक और हुकूक का गंभीर तौर पर अतिक्रमण कर रहे हैं। यहाँ इन अत्यंत ही संवेदनशील आरोपों को दो मामलों के आलोक में देखा जा सकता है।

पहला, दरभंगा जिले के केवटी प्रखंड के माधोपट्टी पंचायत के वर्तमान ग्राम-प्रधान का मामला अविश्वसनीय है। वे मूलतः अन्य पिछड़ा वर्ग ‘खतवे’ जाति से आते हैं, लेकिन इन्होंने ‘चौपाल’ जाति से होने का दावा करते हुए अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित मुखिया सीट पर चुनाव लड़ा और वास्तविक रूप से अनुसूचित जाति के उम्मीदवार को चुनाव में हराते हुए जीत भी गए, जबकि अन्य कई महत्त्वपूर्ण अभिलेखों में वे आज भी ‘खतवे’ जाति के रूप में ही दर्ज हैं।

उसी गाँव के अनुसूचित जाति के एक मुखिया प्रत्याशी ने इस संदर्भ में जिला अधिकारी, ग्राम-पंचायत अधिकारी से लेकर अनुसूचित जाति आयोग तक लिखित शिकायत दर्ज करवाई लेकिन इन तमाम जगहों से कोई सक्रियता नहीं दिखाई गई तब थक-हारकर उन्होंने अपने अधिकार के लिए पटना उच्च न्यायालय में एक वाद भी दायर किया है, लेकिन लॉक-डाउन के कारण इस मामले पर सुनवाई नहीं हो पा रही है।

यह घोर आश्चर्य का विषय है कि इस संदर्भ में राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के सदस्य डॉ योगेंद्र पासवान को दिनांक 21/10/2019 को जब एक शिकायत पत्र लिखा गया तो उन्होंने इसपर किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं दी, यहाँ तक कि जब लोक सूचना अधिकार-2005 के अंतर्गत उनसे इस संदर्भ में पूछा गया तो उसका भी जवाब देना उन्होंने मुनासिब नहीं समझा।

यह बात साबित करती है कि संवैधानिक तंत्र के शीर्ष पर बैठे लोग भी राजनीतिक नफा-नुकसान के वशीभूत होकर ही कार्य करते हैं, उनका कोई जन सरोकार नहीं होता, अगर होता तो वे शिकायतकर्ता की शिकायत पर त्वरित प्रतिक्रिया देते। असल में उनकी चुप्पी शिकायतकर्ता के दावों को ही मजबूत करती प्रतीत होती है।

एक अन्य मामले में समस्तीपुर जिले के धर्मपुर के एक निवासी ने उप-मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी, पटना को शिकायत करते हुए दावा किया कि अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित समस्तीपुर लोकसभा सीट, 23  पर खड़े सांसद उम्मीदवार सूरज कुमार दास मूलतः ‘खतवे’ जाति से हैं जो ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ में आते हैं, लेकिन उन्होंने अनुसूचित जाति का “फर्ज़ी” प्रमाणपत्र का प्रयोग करते हुए अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट का अतिक्रमण किया, अतएव उनके आवेदन को निरस्त करने का आवेदन दिया गया।

उप-मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी, बिहार ने इस शिकायत पत्र (पत्रांक। B1-3-139/2019-71 44, दिनांक 10/09/2019) की गंभीरता को देखते हुए इसे निर्वाचन पदाधिकारी, समस्तीपुर को भेज दिया, लेकिन उसपर अब तक किस प्रकार की कार्रवाई की गई है इसकी सूचना शिकायतकर्ता को भी नहीं है।

इससे एक बात और उभरकर सामने आती है कि नौकरशाही किसी भी महत्त्व के विषय पर निर्णय लेने में हिचकिचाती है और अपने निहित व्यक्तिगत हितों के कारण एक दूसरे पर कार्य को टालकर समुदाय विशेष या राजनीतिक दल विशेष के प्रकोप से बचना चाहती है।

उपरोक्त मामले राज्य सरकार की दलितों के सामाजिक और संवैधानिक हितों व प्रतिबद्धताओं के प्रति गैर-जिम्मेवार रवैये को दिखाने के लिए पर्याप्त है। साथ ही यह इस बात को भी प्रदर्शित करता है कि आधुनिक भारतीय लोकतंत्र में तमाम जातियाँ इस कदर लामबंद हुई हैं कि यह अपनी “अवैधानिक” माँगों के लिए भी लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव बना सकती हैं और संस्थाएँ सब कुछ जानते हुए भी गूंगी-बहरी बनी रह जाती है।

वास्तविक रूप से बहुसंख्यक वंचित और दलित आज भी वंचित और उत्पीड़ित ही हैं और उनके नाम पर “छद्म-दलित” सांवैधानिक विशेषाधिकारों का मज़ा लूट रहें हैं। जनचेतना के प्रतिनिधि कवि धूमिल ने सच ही लिखा था- ‘अपने यहाँ संसद तेल की वह घानी है, जिसमें आधा तेल और आधा पानी है’।

केयूर पाठक सामाजिक विकास परिषद, हैदराबाद से पोस्ट-डॉक्टरेट हैं। चित्तरंजन सुबुद्धि केंद्रीय विश्वविद्यालय तमिलनाडु में सहायक प्राध्यापक हैं।