राजनीति
वोटों का कितना ध्रुवीकरण कर पाएगा SC-ST एक्ट?
एससी-एसटी एक्ट

चुनावों के पास आते ही देश सभी पार्टियों ने कमर कस ली है। इस बार ऐसा हो रहा है कि विधान सभा और लोक सभा के चुनावों के बीच समय का ज्यादा अंतर नहीं है। सारी जुगत इसी में लगी हुई है कि दूसरे पक्ष के वोट कैसे अपने पाले में किए जाएँ। देश की सभी पार्टियों ने चुनावी पैंतरें खेलने शुरू कर दिया है। बीजेपी ने तो ऐसा दाव खेला है जिससे उसकी चहूंओर आलोचना हो रही है। पार्टी ने SC-ST एक्ट में संशोधन कर दलितों को लुभाने की कोशिश की है। बीजेपी को ऐसा लग रहा है कि उसका यह दाव खाली नहीं जाएगा।

हमारे देश में SC-ST एक्ट बहुत बड़ा वोट बैंक है। या यूं कहें कि यह एक पका हुआ वोट बैंक है, और इसे पता है कि उसे किस पार्टी की तरफ जाना है, किसको अपना अमूल्य वोट देना है, तो गलत नहीं होगा। ऐसा माना जा रहा है कि जो नेता या पार्टियां इस वोट बैंक को पिछले 50 साल से कब्जाए बैठीं थी, उनका हक खत्म करने के लिए नरेंद्र मोदी ने SC-ST एक्ट में संशोधन किया है। हालांकि बीजेपी के इस कदम से सवर्ण एकजुट हो रहे हैं, और उन्होने बीजेपी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। इस एक्ट को वापस लेने की लगातार अपील की जा रही है।

यह बात तो साफ है कि सावर्णों का वोट बैंक हमेशा से ही विभाजित रहा है। इनका कभी एक पार्टी की तरफ झुकाव नहीं रहा। यही कारण है कि सवर्णों को किसी भी पार्टी ने तवज्जो नहीं दी, और इनके लिए कोई खास योजनाएँ भी नहीं बनाई गईं। ऐसा माना जाता रहा कि सवर्णों को किसी विशेष उत्थान की  आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह पहले से ही समृद्ध हैं। लेकिन यह बात सच्चाई से बहुत दूर है। इस अनिश्चित्ता के साथ बीजेपी ने एससीटी/एसटी वोट बैंक को अपनी ओर खींचने के लिए यह दाव खेला है। ऐसा माना जा रहा है कि इस कदम से मायावती के भक्तों का रुझान बीजेपी की तरफ होगा, जो लोकसभा चुनावों में परिणामों को निश्चित तौर पर प्रभावित करेगा।

अगर बात करें विधान सभा चुनावों की तो यह बीजेपी का यह कदम तीन राज्यों, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश को बड़े स्तर पर प्रभावित करेगा क्योंकि इन तीनों राज्यों में बड़ी तादाद में SC-ST वोट बैंक है। पिछले कुछ सालों से देश में दो ऐसे मामले हुए जिसमें दलितों पर हुए अत्याचार से कई राज्यों में पार्टी बैकफुट पर चली गयी। पहला मामला था हैदरबाद विश्वविध्यालय के छात्र रोहित वेमुला की हत्या का। दूसरे मामले में गुजरात के ऊना शहर में दलितों के गुट को गौरक्षकों के द्वारा पीटा जाना। इन मामलों पर मरहम लगाते हुए कि कहीं दलित वोट बैंक हाथ से ना फिसल जाये, बीजेपी ने यह दाव खेला है।

इससे पहले इसी साल सर्वोच्च न्यायालय ने 20 मार्च को यह दिशा-निर्देश दिये थे कि SC-ST एक्ट में तुरंत गिरफ्तारी नहीं होगी, साथ ही गिरफ्तारी से पहले आरोपों की जांच ज़रूरी है। इसमें गिरफ्तारी से पहले जमानत भी दी जा सकने की बात कही गयी थी। आपको बता दें कि SC-ST एक्ट 1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार ने लागू किया था, लेकिन इसमें तुरंत गिरफ्तारी और जांच नहीं होने का प्रावधान नहीं था। इसके बाद भी यूपी और बिहार में कई मामले सामने आए। पिछले मार्च में सर्वोच्च न्यायालय ने SC-ST एक्ट को लेकर कहा कि हमें चिंता एक्ट के दुरुपयोग की है। उसने SC-ST एक्ट में केस दर्ज करने के लिए प्रारम्भिक जांच की अनिवार्यता और बिना जांच के गिरफ्तारी नहीं होने को सही माना था। जिसे बीजेपी की सरकार ने पलटते हुए वोट की राजनीति के लिए एक्ट में संशोधन कर दिया। विधान सभा और लोक सभा चुनावों में यह बात तो तय है कि 27 प्रतिशत कोटा का वोट इसका भविष्य तय करेगा, जो निश्चित रूप से चोंकाने वाला होगा।