राजनीति
एससी/एसटी एक्ट : एक वर्ग के लिए सुरक्षा, दूसरे वर्ग के लिए भय

प्रसंग
  • देश में विकास करने के लिए सत्ता में आने की जरूरत तो होती है लेकिन समाज के एक बड़े वर्ग की अपेक्षाओं को ताक पर रखकर नहीं

मैं मानता हूँ कि विश्व में कमजोर वर्गों की उपेक्षा होती रही है, चाहे यह किसी एक व्यक्ति, परिवार, समाज, समुदाय या किसी देश के ही संदर्भ में क्यों न हो। हर शक्तिशाली वर्ग अपने आस-पास के निर्बल वर्गों को अपने वश में रखना चाहता है। दास प्रथा इन्हीं उपेक्षाओं का एक उदाहरण रही है, हालांकि अब यह समाप्त हो चुकी है। छोटा पिंड हमेशा बड़े पिंड के चारों ओर घूमता है। हालात के मारे लोग सत्ता के लोगों के आगे अपनी फरियादों के लिए घुटने टेकते हैं, बाहुबलियों के बीच में एक कमजोर परिवार कैसे दुबक कर रहता है, किसी क्षेत्र में संख्या बल में छोटा समाज कैसे अपने से बड़े समाज की अवहेलना नहीं करता है, कैसे एक बहुसंख्यक समुदाय (यदि उदारवादी न हो तो) एक अल्पसंख्यक समुदाय को सिर उठाने नहीं देता और सबसे बड़ा उदाहरण है कि इतिहास कमजोर राष्ट्रों पर शक्तिशाली राष्ट्रों द्वारा आक्रमणों का साक्षी रहा है।

वर्ण व्यवस्था जब शुरू हुई थी तो इसे कर्मों के आधार पर लागू किया गया था। कालांतर में यह धीरे-धीरे जन्म के आधार पर महज एक पहचान के रूप में परिणत होती चली गयी। अतः मेरे अनुसार यहाँ इसका अस्तित्व अब समाप्त होता है। अब बात करते हैं वर्तमान परिवेश की और शोषित पीड़ित लोगों की। शोषित और पीड़ित वही लोग हैं जो आर्थिक रूप से या राजनीतिक रूप से या संख्या बल में कमजोर हैं। कोई कह सकता है कि अशिक्षा भी शोषण का एक बड़ा कारक है। चूंकि यदि कोई व्यक्ति गरीब और अशिक्षित है एवं आय का कोई माध्यम उसके पास नहीं है तो अक्सर हम उसे मजदूरी करते हुए, फुटपाथों पर रहते हुए, होटलों में काम करते हुए, अमीर घरानों के टुकड़ों पर पलते हुए एक दयनीय अवस्था में देखते हैं। और संवेदनशील लोग उनके लिए अपनी संवेदनाएं व्यक्त करते हुए आगे बढ़ जाते हैं। प्रथमदृष्ट्या यह भी शोषण प्रतीत होता है लेकिन यह है नहीं। यह एक परिस्थिति मात्र है और आखिर इस स्थिति का जिम्मेदार कौन है, समाज, सरकार या वे स्वयं। समाज दोषी हो सकता है और नहीं भी, चूंकि ऐसा लगता है कि समाज के लोग उन अशिक्षित व्यक्तियों के साथ उचित व्यवहार नहीं करते, लेकिन समाज के बल पर ही वे जैसी भी जिंदगी है, जी पा रहे होते हैं। सरकारें इसलिए दोषी हैं क्योंकि आज़ादी के 72 वर्षों के बाद भी ये देश की गरीब जनता के लिए सस्ती या निःशुल्क और गुणवत्तायुक्त शिक्षा एवं रोजगार तक पहुँच मुहैया कराने में असफल रही हैं। मैं माफी चाहूँगा लेकिन कहना चाहूँगा अपनी इन स्थितियों के लिए वे लोग स्वयं भी कुछ हद तक दोषी हैं, क्योंकि महान दार्शनिक अरस्तू ने कहा था, “यदि आप गरीब पैदा होते हैं तो इसमें आपका कोई दोष नहीं, लेकिन यदि आप गरीब ही मर जाते हैं तो इसमें आपका दोष है।”

चूंकि सत्ता की कमान अब लोकतान्त्रिक रूप से चुनी गयी सरकारों के पास है इसलिए सब कुछ व्यवस्थित करने की अंतिम ज़िम्मेदारी उन्हीं की बनती है, हालांकि मैं यह नहीं कहता कि बाकी सब का कोई दायित्व नहीं है। जब भी कोई निर्णय किसी एक पक्ष के पक्ष में लिया जाता है तो जाहिर सी बात है यह दूसरे पक्ष के विरुद्ध भी होता है बस गौर करने वाली बात यह होती है कि दूसरा पक्ष कहाँ तक सही है और कहाँ तक गलत। केंद्र की वर्तमान भाजपा सरकार द्वारा अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम में संशोधन से उभर कर आया न्यायपालिका का नया न्यायविधान कुछ ऐसी ही कहानी बयां करता है।

इस पूरे मसले का मूल है इस अधिनियम के तहत ‘तुरंत गिरफ्तारी’। मैं स्पष्ट कर दूँ कि मैं भारत क्या विश्व के किसी भी समाज या वर्ग के लिए समान अधिकारों और सुरक्षा का पक्षधर हूँ लेकिन वर्तमान भारतीय परिवेश में शासन, प्रशासन, न्यायपालिका और राजनेताओं के “नैतिक मूल्यों के क्षरण” को देखते हुए यह अधिनियम देश के एक बड़े तबके, जिसमें ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों का व्यापक समावेश है, के लिए एक कुठाराघात हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस पर चिंता व्यक्त की थी कि इस अधिनियम का दुरुपयोग किया जा सकता है, जिसके बाद हम दलितों द्वारा एक भीषण हिंसा के प्रत्यक्षदर्शी थे।

मुझे नहीं पता जब मैला सिर पर ढोया जाता था तब क्या हालात थे लेकिन मुझे पता है जब मैला सिर पर नहीं ढोया जाता है, दासप्रथा या बंधुआ मजदूरी जैसी स्थितियाँ नहीं हैं तो क्या हालात हैं। इस अधिनियम के नियमों का शोषण होते हुए कई बार देखा गया है। निर्दोषों को गलत तरीके से फंसाया गया है। उन लोगों के आत्म सम्मान का क्या जो लोग कभी कोर्ट, कचहरी, पुलिस या ऐसे किसी सरकारी झमेले में नहीं फंसे लेकिन एक मौखिक आरोप से ही उन्हें जेल भेज दिया गया और शारीरिक और मानसिक यातनाएं दी गईं। ऐसे लोगों में भय का माहौल पनपता है। लोग कहते हैं कि इश्क और जंग में सब जायज है, लेकिन मानव मूल्य सबसे ज्यादा जहां धाराशयी होते हैं वह है राजनीति। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) जिस नारे को पकड़कर सत्ता पर काबिज हुई थी, वह था “तिलक, तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार”। तिलक ब्राह्मणों का, तराजू वैश्य समाज का और तलवार क्षत्रिय समाज का प्रतीक है। आखिर हम किस ओर जा रहे हैं। एक तरफ यह शिखंडिनी राजनीति देश में एकजुटता और समानता का दंभ भरती है और दूसरी तरफ यह अपने लाभ के लिए समाज में दरार डालकर एकता और समता की बलि भी देती है। दिलचस्प बात यह है कि इसी बसपा सरकार को शीर्ष पर बिठाने में तथाकथित सवर्णों की पार्टी भाजपा की अहम भूमिका थी। अब वही भाजपा सरकार सर्वोच्च न्यायालय की चिंताओं को दरकिनार कर इस अधिनियम को लागू करने की ओर बढ़ चली है, और कारण है -वोट बैंक। ठीक है कि देश में विकास करने के लिए सत्ता में आने की जरूरत तो होती है लेकिन समाज के एक बड़े वर्ग की अपेक्षाओं को ताक पर रखकर नहीं।

देश में सभी को समान सुरक्षा, समान अधिकार मिलें इसके लिए सरकारों द्वारा बनाए जाने वाले नियमों की सराहना होनी चाहिए लेकिन सरकारों को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि इन नियमों से आप का वोट बैंक पक्का हो या न हो लेकिन देश के किसी भी व्यक्ति के साथ ज्यादती नहीं होनी चाहिए।