राजनीति
धर्मो रक्षति रक्षितः – न्यायालय को केंद्रीय विद्यालय में धर्म का समर्थन करना चाहिए

आशुचित्र

  • सर्वोच्च न्यायालय को अपना उद्देश्य समझना चाहिए और केंद्रीय विद्यालय प्रार्थना मामले में अनावश्यक रूप से हस्तक्षेप करके धर्म को नष्ट नहीं करना चाहिए।
  • सबरीमाला मामले में भी उच्चतम न्यायालय ने यह गलती की और यह मूर्खता दोहराना धर्मो रक्षिता रक्षितः जैसे आदर्श वाक्य की अवहेलना होगी।

हिंदू विरासत और लोकाचार पर हमला जारी है। उच्चतम न्यायालय ने 28 जनवरी को केंद्रीय विद्यालयों में उपनिषद् के कुछ श्लोकों के पाठ पर प्रतिबंध लगाने वाली याचिका पर एक फैसला लेने हेतु पाँच न्यायाधीशों की बेंच बैठाई। राज्य द्वारा संचालित स्कूलों में धर्मनिरपेक्षता की भावना को ठेस पहुँचाने वाले श्लोकों में असतो मा सद्गमय (हमें असत्य से सत्य की ओर ले जाना), और ओम सहाना वावतु (भगवान हमारी रक्षा करें और भोजन प्रदान करें) को सम्मिलित किया गया।

ऐसे श्लोक जो किसी भगवान से जुड़े हुए नहीं हैं और जिनमें सच एवं सामान्य कल्याण का विचार निहित है उन्हें धर्मनिरपेक्षता पर प्रहार समझना एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। भारत में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो सार्वजनिक हित याचिका का दुरुपयोग कर उच्चतम न्यायालय के ज़रिये सामाजिक विभाजन करवाना चाहते हैं। कुछ युवा वकीलों ने सबरीमाला में महिलाओं पर लगे प्रतिबंध के बारे में उच्चतम न्यायालय के सामने चर्चा की और परिणामी अदालत के फैसले ने आदिवासियों और हिंदू परंपरा को नुकसान पहुँचाया। एक और उद्देश्यहीन मुकदमेबाजी केंद्रीय विद्यालयों को युद्ध का मैदान बना सकती है।

यदि यह युद्ध हिंदुओं से डरने वाले लोगों द्वारा जीत लिया जाता है तो अगला लक्ष्य तार्किक रूप से भारतीय राज्य प्रतीक होगा, जिसमें उपनिषद वाक्यांश सत्यमेव जयते शामिल है। और यह बात उच्चतम न्यायालय को झुलसा सकती है जिसका उद्देश्य यतो धर्मस्ततो जयः (जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है) है। इन शब्दों को गांधारी ने वेद व्यास के महाभारत में उच्चरित किया था जब पांडवों ने उनकी संतानों का वध कर दिया था।

केंद्रीय विद्यालय जनहित याचिका (पीआईएल) विनायक शाह नाम के एक मध्य प्रदेश निवासी द्वारा दायर की गई थी, जिसने दावा किया था कि हिंदू धर्मग्रंथों के इन श्लोकों को गाने से अल्पसंख्यकों, नास्तिकों, अज्ञेयवादियों, संशयवादियों, तर्कवादियों के अधिकारों का उल्लंघन होता है। इसके अलावा, पीआईएल ने आरोप लगाया कि ये श्लोक युवा छात्रों के दिमाग के विकास और उनकी तार्किक शक्तियों को बाधित करते हैं।

यह आश्चर्य की बात है कि असत्य को दूर करने या सभी की समृद्धि की मांग करने के लिए एक मात्र आह्वान, बिना किसी अपवाद के युवा मन के वैज्ञानिक स्वभाव को कैसे नुकसान पहुँचाएगा।

यह जानकर कोई भी भयभीत हो जाएगा कि जिन दो न्यायाधीशों ने प्रारंभिक याचिका पर सुनवाई की, उनमें रोहिंटन नरीमन और विनीत सरन ने मामले को “मौलिक महत्व” के रूप में देखा। ऐसे लगता है कि अगला निशाना हमारे सरल अनुष्ठानों पर साधा जाएगा जैसे कि राज्य कार्यों में देवताओं के आशीर्वाद के लिए दीप जलाना और प्रार्थना गीत गाना।

हर देश चाहे वह धर्मनिरपेक्ष हो या न हो, उसका इतिहास किसी न किसी संस्कृति से जुड़ा होता है और अमेरिका जैसे राष्ट्र भी अपने नोटों पर ‘इन गॉड वी ट्रस्ट’ छपवाते हैं और ये पंक्ति किसी भी नास्तिक को प्रभावित नहीं करती और न ही किसी की तार्किक शक्ति पर बुरा असर डालती है। और अगर श्लोकों को धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध देखा जा रहा है तो यह धर्मनिरपेक्षता पर प्रहार है। अगर हर हिंदू सूत्र या चिह्न को भारत से मिट दिया जाए तो इसे सांस्कृतिक गुंडागर्दी माना जाएगा।

यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय ने जब 2011 में इस तरह के मामले का सामना किया तब न्यायालाय ने परंपरा के पक्ष में फैसला सुनाया। कुछ गैर-कैथोलिकों ने स्पष्ट रूप से राज्य द्वारा संचालित स्कूलों में क्रौस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इससे उनकी धार्मिक संवेदनाएँ आहत होती हैं।

लेकिन अदालत ने फैसला सुनाया कि महाद्वीप के राज्य के स्कूलों में क्रौस स्वीकार्य हैं क्योंकि वे बिना किसी धार्मिक महत्व के “अनिवार्य रूप से निष्क्रिय प्रतीक” थे। और लोगों पर किसी तरह का धार्मिक दवाब नहीं डाला जा रहा था।  

यही बात श्लोकों पर भी लागू होती है एवं उच्चतम न्यायालाय के आदर्श वाक्य- यतो धर्मस्ततो जयः पर भी लागू होती है और यहाँ धर्म का मतलब हिंदू धर्म से नहीं है।

सर्वोच्च न्यायालय की बेंच को अपने आदर्श वाक्य के सही अर्थ को समझना चाहिए और केन्द्रीय विद्यालय प्रार्थना मामले में अनावश्यक रूप से हस्तक्षेप करके धर्म को नष्ट नहीं करना चाहिए। न्यायालाय को एक और श्लोक, धर्मो रक्षति रक्षिता: को याद करना चाहिए, जिसे नेशनल लॉ स्कूल ने बेंगलुरु में अपना आदर्श वाक्य माना है। इसका अर्थ है कि धर्म उन लोगों की रक्षा करता है जो धर्म की रक्षा करते हैं।

अगर सर्वोच्च न्यायालय अपने धार्मिक कर्तव्यों को भूलकर फैसला सुनाती है तो उसकी प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिला दिया जाएगा। सबरीमाला मामले में भी उच्चतम न्यायालय ने यह गलती की और यह मूर्खता दोहराना धर्मो रक्षिता रक्षितः जैसे आदर्श वाक्य की अवहेलना होगी।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।