राजनीति
राफेल सौदे पर सर्वोच्च न्यायालय का अतिक्रमण राष्ट्रीय सुरक्षा और संस्थाओं के स्वावलंबन के लिए खतरा

प्रसंग
  • यदि मोदी सरकार में आत्म-सम्मान है तो इसे न्यायालय को कहना चाहिए कि राफेल सौदे की जानकारी यह एक सील बंद लिफ़ाफ़े में नहीं दे सकती

 

अगली बार जब सेना प्रमुख एक युद्ध की तैयारी करें तो उन्हें अपनी रणनीति को एक सील बंद लिफ़ाफ़े में मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए जिससे देश को अपनी रक्षा से पहले पारदर्शिता मिले। आखिरकार एक ऐसे लोकतंत्र, जिसका निर्णय काले वस्त्र वाले लोगों से होता है में पारदर्शिता से बेहतर और क्या हो सकता है?

अगर आप सोचते हैं कि यह कथन किसी बाहरी व्यक्ति जैसा है तो समझ लें कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राफेल विमान सौदे के मूल्यों की माँग का तर्कसंगत परिणाम यही होने वाला है। कल (31 अक्टूबर) की सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायाधीश यू.यू.ललित और के.एम.जोसेफ की बेंच ने कहा, “न्यायालय राफेल सौदे से लाभ के संदर्भ में मूल्यों के विषय में जानकारी चाहेगा जो सरकार द्वारा कोर्ट के समक्ष एक सील बंद लिफ़ाफ़े में प्रस्तुत की जाए।”

सील बंद में जमा की गई हास्यास्पद सामग्रियों के बारे में हम बाद में जानेंगे लेकिन पहले यह देखें कि न्यायालय ने एक ऐसे तकनीकी निर्णय में खुद को डाला है जिसका क्रय देश अपनी रक्षा के लिए कर रहा था, अब न्यायालय देखेगा कि इसकी कितनी कीमत होनी चाहिए और जितना मूल्य दिया गया है वह उपयुक्त है या नहीं।

10 अक्टूबर को बेंच मात्र यह जानना चाहता था कि सरकार ने कैसे निर्णय लिया कि राफेल सौदा डसॉल्ट के साथ किया जाएगा और सरकार ने इसका पालन करते हुए अपनी निर्णय प्रक्रिया एक सील बंद लिफ़ाफ़े में 26 अक्टूबर को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर दी। अब न्यायालय सिर्फ यह नहीं जानना चाहता कि सौदा कैसे हुआ बल्कि इस बात का निर्धारण भी करेगा कि यह निर्णय सही था या नहीं।

इस मामले में न्यायालय की भूमिका कहाँ से आई? क्या यह ऐसा करने में सक्षम भी है? चलो मान लेते हैं कि कल सरकार इसे एक और सील बंद लिफ़ाफ़ा दे देगी जिसमें लिखा होगा हर राफेल विमान का मूल्य फलां है और विमान के हर शस्त्र, रडार और उपकरणों के लाभों का विवरण एक अनुच्छेद में होगा। क्या इसका विश्लेषण कर इस पर राय बनाने की क्षमता न्यायालय में है?

शून्य।

औग अगर यह शून्य है और कोर्ट जानना चाहता है कि मूल्य सही था या नहीं, उपकरण सही हैं या नहीं और एक पूर्ण राफेल विमान और आम विमान में मूल्यों का अंतर और जो सौदा पहले किया जा रहा था वह सही था या नहीं, इसे एक विशेषज्ञ पैनल की आवश्यकता पड़ेगी जिससे यह अपना दृष्टिकोण स्पष्ट कर सके। या फिर यह राहुल गांधी, अरुण शौरी और यशवंत सिंहा की सहायता माँगेगा यह जानने के लिए कि सौदा ठीक था या नहीं?

और अगर विशेषज्ञों की राय ली गई तो एक रक्षा सौदे की गोपनीयता का क्या, जिसके हनन से देश की सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न होगा?

फिर मेरा यह कहना कि युद्धनीतियाँ भी कोर्ट को दी जानी चाहिए, एक बाहरी व्यक्ति जैसा कथन कैसे हुआ?

सील बंद लिफ़ाफ़े में सूचना देने का जो स्वांग रचा गया है वह सबको समझ में आता है। सील बंद लिफ़ाफ़ों के सील आसानी से खोले जा सकते हैं और मुख्य न्यायाधीश को तो यह खोलना ही होगा। तो क्या वे खुद निर्णय करेंगे कि सरकार के जवाब वैध हैं या नहीं, विशेषकर कि जब मामला तकनीकी है? क्या वे अपनी धर्मपत्नी से इस विषय पर चर्चा करेंगे या अपने साथी न्यायाधीशों से चर्चा करके निष्कर्ष पर पहुँचेंगे? जब इतने सारे लोग मामले में लिप्त हो जाएँगे तो गोपनीयता कैसे बरकरार रहेगी? और मुख्य न्यायाधीश इन सूचनाओं को उपयोगी कैसे बनाएँगे जब यह उससे पहले ही बाहर हो चुकी होगी? क्या वो पढ़ कर इसे नष्ट कर देंगे? सरकार कैसे मानेगी कि यह सूचनाएँ नष्ट की जा चुकी हैं और किसी गलत हाथ में नहीं पड़ेंगी?

क्या मुख्य न्यायाधीश खुद के लिए एक एफिडेविट दायर करेंगे कि सभी गोपनीय सूचनाएँ उनकी व्यक्तिगत निगरानी में नष्ट की जा चुकी हैं?

यह देखते हुए कि सरकार पर सवाल उठाए जा रहे हैं, विपक्ष न्यायपालिका की जय-जयकार कर रहा है और सरकार व न्यायपालिका के मध्य के संवैधानिक अंतर का फायदा उठाना चाहता है। एक शोर है कि सरकार संस्थाओं को नष्ट कर रही है, जबकि यह न्यायिक अतिक्रमण है जो कार्यकारी और विधान में हस्तक्षेप कर इन संस्थाओं को भ्रष्ट कर रहा है। कार्यकारी एक सजीव संस्था है और संविधान के अनुसार यह भी उतना ही अभिन्न अंग है जितनी न्यायपालिका और सर्वोच्च न्यायालय को इन अधिकारों का सम्मान करना चाहिए और देश को व इसकी सुरक्षा व्यवस्था को अपने न्यायिक आदेशों से चलाने का प्रयास नहीं करना चाहिए।

जब सर्वोच्च न्यायालय कुछ दिनों पहले मात्र राफेल सौदे की निर्णय प्रक्रिया जानना चाह रहा था पर अब इसे मूल्यों का विवरण भी चाहिए जिसमें गोपनीयता का मसला है तो कैसे न्यायालय पर विश्वास किया जाए? एक न्यायालय जिसका मन बदलता रहता है और कार्यकारी के अनुपालन से इसकी माँग बढ़ती जाती है, वह भी संस्थाओं के लिए उतना ही बड़ा खतरा है जितना लोग कार्यकारी के लिए कहते हैं।

और यह पूछा जा सकता है कि उन आठ पूर्व मुख्य न्यायाधीशों का क्या हुआ जिनपर भ्रष्टाचार का आरोप लगा था और जिनका नाम प्रचलित जनहित याचिकाओं के प्रणेता प्रशांत भूषण के पिता शांति भूषण द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को दिया गया था, जो आजकल खुद सील बंद लिफ़ाफ़ों द्वारा गोपनीयता खोलने की माँग कर रहे हैं।

हम न्यायपालिका द्वारा शासन की ओर रुख कर रहे हैं और यह लोकतंत्र के लिए सत्तावादी नेताओं से बड़ा खतरा है। क्योंकि नेता चुने जाते हैं इसलिए उन्हें ठुकराए जाने का भी भय है परंतु न्यायपालिका किसी को जवाबदेह नहीं है। इसे ऐसे क्षेत्रों में कानून बनाने और अनुपालन की माँग करने से बचना चाहिए जो इसके निर्णय क्षेत्र से बाहर हैं।

अगर नरेंद्र मोदी सरकार का कोई आत्म-सम्मान है तो इसे न्यायालय को कहना चाहिए कि राफेल सौदे की जानकारी यह एक सील बंद लिफ़ाफ़े में नहीं दे सकती। न्यायालय को करने दो जो यह कर सकता है। यह क्या करेगा? प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री को जेल भेजेगा?

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादन निदेशक हैं। वे @TheJaggi से ट्वीट करते हैं।