राजनीति
राफेल सौदे पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय सही लेकिन यह पहले ही हो सकता था

आशुचित्र- राजनैतिक वाद-विवादों में हस्तक्षेप करने से न्यायालयों को सावधान रहना चाहिए तथा यही उम्मीद भी रखी जाती है कि सर्वोच्च न्यायालय इस तरह के प्रयासों को प्राथमिक दौर में ही रोक देगा।

राफेल सौदे की जाँच करने के लिए विशेष समिति की नियुक्ति की माँग करती जनहित याचिका को सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया है।

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायाधीश संजय किशन कौल तथा के एम जोसफ़ की बेंच ने माना कि याचिकाकर्ताओं की तीनों माँग, डसॉल्ट के साथ किए गए 36 विमानों के सौदे, उनकी कीमत तथा सहयोगी के अधिष्ठापन के निर्णयों में न्यायालय के हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है।

बता दें कि अनिल अंबानी की रिलायंस एयरोसट्रक्चर को राफेल सौदे में एक ऑफसेट सहयोगी बनाया गया था, चूँकि रिलायंस को रक्षा संबंधित विनिर्माण का कोई अनुभव नहीं था, इस कारण इस सौदे पर सवाल खड़े हो गए थे। पहले फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने कहा था कि भारत सरकार की सहायता से रिलायंस को सहयोगी बनाया गया है। उनके इस बयान ने सवालों को और बढ़ावा दे दिया था। हालाँकि डसॉल्ट ने सहयोगी के निर्णय में किसी भी प्रकार का दबाव होने से मना किया था। लेकिन रिलायंस एयरोस्पेस का डसॉल्ट का सहयोगी बनना यह सवाल भी खड़ा करता है कि क्या इस सौदे में अनुभव केवल इतना महत्व रखता है।

निश्चित रूप से यह सभी बिंदु सर्वोच्च न्यायालय की बेंच के समक्ष रहे होंगे जब आज (14 दिसंबर) को बेंच ने कहा कि अदालत को “राफेल सौदे, विमानों की कीमत तथा ऑफसेट सहयोगी के चयन में हस्तक्षेप करने के लिए पर्याप्त बातें नहीं मिली।” इस निर्णय से नरेंद्र मोदी सरकार को बड़ी राहत मिली है अन्यथा यह मामला 2019 लोकसभा चुनावों के प्रचार के दौरान प्रमुख मसला बन सकता था तथा भाजपा को इससे हानि झेलनी पड़ सकती थी।

याचिका, प्रशांत भूषण, पूर्व में एनडीए गठबंधन में मंत्री रहे अरुण शौरी तथा यशवंत सिन्हा, आम आदमी पार्टी नेता संजय सिंह तथा दो वकीलों, एम एल शर्मा तथा विनीत ढांडा द्वारा दायर की गई थी। इस मामले में याचिका खारिज करने के लिए अदालत द्वारा दिए गए कारण सर्वाधिक महत्त्व रखते हैं।

बेंच ने कहा, “एक अपील करने वाली संस्था के रूप में कार्य करना तथा सौदे की कीमत तथा सारे बिंदुओं की जाँच करना अदालत के लिए ठीक नहीं हैं।” अदालत ने कहा कि इस मामले के हर पक्ष की जाँच करना उसके लिए उचित नहीं है। साथ ही कीमतों का तुलनात्मक विश्लेषण करना अदालत का कार्य नहीं है। इन कारणों से “राफेल सौदे की जाँच करने की आवश्यकता नहीं है।”

निर्णय में सुनिश्चित किया गया कि देश की रक्षा, तथा संविधान के अंतर्गत आने वाली स्वतंत्र संस्थाएँ तथा समस्त सरकारी योजनाओं और सौदों की जाँच करने वाले नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक को किसी भी प्रकार की क्षति न पहुँचे। भ्रष्टाचार निरोधी तथा जाँच संस्थाएँ जैसे सीबीआई, पुलिस और सतर्कता आयोग के कार्यक्षेत्र में कुछ असाधारण मामलों को छोड़कर हस्तक्षेप करना अदालत का कार्य नहीं है।

निर्णय में दी गई इन प्रतिक्रियाओं को देखकर आश्चर्य होता है कि अदालत ने क्यों इस याचिका को महत्त्व दिया जब वो नियंत्रक तथा महालेखापरीक्षक को इस मामले में हस्तक्षेप करने का तथा अपनी जाँच जल्द से जल्द प्रस्तुत करने का आदेश दे सकती थी। न्यायालय को क्या आवश्यकता थी कि वह सौदे की प्रक्रिया के साथ-साथ लिफ़ाफ़ा बंद तरीके से मूल्य विवरण भी माँगे?

हो सकता है कि मामले में पक्षपात अथवा गड़बड़ी की आशंका हो- हालाँकि अदालत ने निर्णय में स्पष्ट रूप से कहा, “उसे किसी भी निजी संस्था के लिए किए गए किसी भी पक्षपात का कोई सबूत नहीं मिला है।” लेकिन मसला हल करने की सही प्रक्रिया सबूतों की खोज, एफआईआर तथा जाँच आरंभ करना था, फिर उससे जो परिणाम आता उसे देखा जाता।

राजनीति के स्तर पर कांग्रेस मामले की जाँच के लिए संयुक्त संसदीय समिति की माँग कर सकती है लेकिन सरकार को इस पर कृतज्ञता दिखाने की आवश्यकता नहीं है। विपक्ष तो राफेल को चुनावी मुद्दा बनाएगा ही।

सवाल यह है कि ऐसा क्या गलत था कि मामले में अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा जबकि इन मामलों की जाँच के लिए संविधान के अंतर्गत अलग संस्थाएँ हैं।

यह ज़ाहिर है कि मोदी सरकार के लिए विरोधपूर्ण भावना तथा अपने निहित राजनैतिक लाभ के लिए  न्यायतंत्र का सहारा लिया जा रहा है। तथा इस वक़्त सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इन तरीकों को रोकने का प्रयास आवश्यक है।

राजनेताओं तथा उग्र वकीलों को न्यायतंत्र का इस्तेमाल एक छोटे रास्ते की तर्ज पर करने की सोच नहीं रखनी चाहिए। जबकि सबूत एकत्रित करना, एफआईआर करना, मामले को राजनैतिक मंच पर उजागर करना ही एक सही प्रक्रिया है।

अदालतों को राजनैतिक वाद-विवादों में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए तथा उम्मीद की जाती है कि सर्वोच्च न्यायालय ऐसे मामलों को प्राथमिक स्तर पर ही रोक देगा। लेकिन यहाँ अनावश्यक रूप से सर्वोच्च न्यायालय ने प्रश्न उठाए कि क्या प्रक्रिया सही थी, क्या कीमतें उचित थीं, देश को 36 राफेल खरीदने थे या 126 खरीदने थे। इस बार तो सर्वोच्च न्यायालय हस्तक्षेप करने सेपीछे हट गया लेकिन आगे से उसे स्वयं को इनसे दूर रखना चाहिए अन्यथा राजनैतिक ताकतें इसके कंधे पर रखकर बंदूक चलाएँगी। हम लगातार स्वराज्य में बताते आए हैं कि यदि यही हाल रहा तो देश न्यायाधीशों के हुक़्म पर चलने लगेगा।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।