राजनीति
#SayNoToCowardice- जिहादी आतंकवाद से लड़ने में गांधी का संदर्भ तर्कहीन

आशुचित्र- 

  • अपनी पूर्वाभिरुचि को देश का स्वभाविक चयनित विकल्प बनाना गांधी की नैतिक गलती थी।
  • एक राष्ट्र की तरह उठने के लिए हमें इसे पीछे छोड़ना होगा।

कल (27 फरवरी को) #SayNoToWar (युद्ध को ना कहें) हैशटैग ट्रेंड कर रहा था, निस्संदेह यह उन लोगों द्वारा प्रचारित किया गया था जो देश को विभाजित कर जैश-ए-मोहम्मद के बालाकोट स्थित आतंकी शिविर पर भारत के पूर्व-रिक्तिपूर्व (प्री-एम्प्टिव) हमले की प्रतिक्रिया में पाकिस्तान के हमले का जवाब देने के देश के संकल्प को तोड़ना चाहते हैं।

विंग कमांडर अभिनंदन वर्तामान के लिए मगरमच्छ के आँसू भी बहाए गए थे जिनका मिग21 क्रैश होने के बाद पाकिस्तान में जा गिरा। यही समूह अभिनंदन के बंदी बनाए जाने पर रोना भी रोने लगा जबकि वीडियो में वे स्वयं गर्व के साथ खड़े दिख रहे थे। अपेक्षाकृत पुराने मिग21 के माध्यम से पाकिस्तान के आधुनिक एफ16 को गिराने के बाद उनका विमान पाकिस्तान में जा गिरा। उनके शौर्य का सम्मान करने की बजाय हम उन्हें घृणित रूप से छाती से लगाए रखना चाहते हैं।

हैशटैग #SayNoToWar बड़ी चतुराई से चुना गया था क्योंकि जो लोग इसका विरोध करेंगे, उनपर आसानी से आरोप लगाया जा सकता है कि वे युद्ध चाहते हैं। भारत का समर्थन करने वालों को युद्ध फैलाने वालों की तरह दिखाने का यह ज़बरदस्त प्रयास था। इस भ्रमित करने वाले हैशटैग के विरोध में #SayNoToJihad, #SayNoTozDhimmitude या सरल रूप से #SayNoToCowardice जैसे ट्वीट स्वाभाविक थे। जब आतंकवादी लगातार आप पर हमला कर रहे हों, और आपने बहुत संयम बरता हो, यहाँ तक कि तीन दशकों से कोई प्रतिशोध भी नहीं लिया हो तो सरल रूप से कहा जाए तो आप कायर हैं। दूसरा गाल आगे बढ़ा देना हज़ारों सैनिकों का अपमान है जिन्होंने देश की रक्षा में प्राण न्यौच्छावर किए हैं। विंग कमांडर अभिनंदन के नाम पर रोना भी वैसा ही है। वे सम्मान सहित वापस लौटेंगे।

जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी शिविर पर भारत के पूर्व-रिक्तिपूर्व हमले को कलंकित करने के प्रयासों से समझ आ गया कि वे पाकिस्तानी खेल खेल रहे हैं। उन्होंने कीबोर्ड लड़ाकों और युद्ध बेचने वाले टीवी चैनलों की निंदा की लेकिन वे स्वयं भी कीबोर्ड पीसनिक (शांति बेचने वाले) ही हैं। यही लोग हैं जो अर्बन नक्सल पदवी से चिढ़ते हैं और सैन्य बलों की निंदा करते रहते हैं, वे इस समय में सेना का समर्थन करने वालों पर यह लेबल चिपकाकर उनकी महत्ता कम करना चाहते हैं।

एक पत्रकार द्वारा एक ट्वीट ने सबको सलाह दी, “ज़रा सोचें कि महात्मा गांधी क्या कहते… #SayNoToWar”

यह मूर्खतापूर्ण है। पहली बात तो यह कि गांधी स्वयं एक सतत शांतिवादी नहीं थे- दक्षिण अफ्रीका के द्वितीय बोअर (किसान) युद्ध में अंग्रेज़ों की ओर से लड़ने के लिए उन्हें मेडल मिला था लेकिन मुद्दा यह है कि क्या हर परिस्थिति में गांधी के परिप्रेक्ष्य से ही सोचा जाना चाहिए या जिहादियों से खुद को बचाने का प्रयास भी करना चाहिए। क्यों न यहाँ पर हम शिवाजी, नेताजी बोस, खुदीराम बोस, भगत सिंह और चंद्रशेकर आज़ाद से प्रेरणा लें। जब शत्रु द्वार पर खड़ा हो तब आप रणभेरी बजाएँगे या भजन गाएँगे?

लेकिन राष्ट्रवादियों और सच्चे देशभक्तों को नीचा दिखाने के लिए एक सेक्युलर प्रयास किया गया जिसमें भगत सिंह की लेनिन और कम्युनिज़्म में रुचि और नेताजी की आज़ाद फौज के स्थान पर उनकी समाजवादी (सोशलिस्ट) साख का गान किया जाता है। कोई यह नहीं कहेगा कि गांधी दोनों के ही विरोधी थे। अहिंसा को न स्वीकारने के इनके उदाहरण को कभी प्रस्तुत नहीं किया जाएगा। जब गांधी का यहाँ कोई संबंध नहीं है तब भी उनका नाम लेकर जिहादी हिंसा से लड़ने के भारत के संकल्प को खंडित करने के लिए कोई बेहतर औजार नहीं हो सकता। स्वतंत्रता पाने के लिए हिंसा के मार्ग को चुनने वाले सेनानियों का नाम न लेना भारतीयों के उत्साह को खंडित करने का सर्वश्रेष्ठ उपाय है।

रही बात गांधी की तो सेक्युलरों द्वारा उनका नाम इन तीन चीज़ों के लिए कभी नहीं लिया जाएगा जिसपर वे आजीवन विश्वास करते रहे- गौरक्षा, राम राज्य और धर्मांतरण पर रोक।

बात करें अहिंसा की तो ऐसा नहीं है कि गांधी ने इसे सभी परिस्थितियों के लिए सुझाया था। उनके ये दो कथन हैं जो अलग बात कहते हैं।

गांधी ने कहा, “पूरी नस्ल को निर्बल होने से बचाने के लिए मैं हज़ार बार भी हिंसा का जोखिम उठा सकता हूँ।” यदि संयम के नाम पर हमने जिहादियों को इतनी छूट दे दी है तो अवश्य ही हम “पूरी नस्ल की निर्बलता” के गांधी के भय को भूल गए हैं।

गांधी ने यह भी कहा था, “मैं मानता हूँ कि जहाँ कायरता और हिंसा में चुनना होगा तो मैं हिंसा को चुनूंगा। अपने मान को बचाने के लिए मैं भारत के हथियार उठाने का समर्थन करूंगा बजाय इसके कि वह कायरतापूर्ण अपने अपमान को देखता रहे। लेकिन मेरा मानना है कि अहिंसा हिंसा से कई ऊपर है, माफी सज़ा से ऊपर है। क्षमाशीलता एक सैनिक को विभूषित करती है… लेकिन संयम माफी तब ही है जब दंडित करने की शक्ति हो, यह अर्थहीन है यदि यह एक निर्बल जीव से आती है।

इस कथन में जहाँ गांधी ने अहिंसा का भरपूर समर्थन किया है,वहीं उन्होंने यह भी कहा है कि दंडित करने की क्षमता रखने वाले ही माफ करने की क्षमता रखते हैं, न कि वे जो जिहादी आतंक से डरे हुए हों। पिछले तीन दशकों में जब पाकिस्तान ने कम लागत पर भारत को क्षति पहुँचाने के लिए जिहादियों को भेजना शुरू किया, तब भारत का वर्णन करने के लिए गांधी के इस कथन से बेहतर कुछ नहीं है- “अपने ही अपमान का निर्बल साक्षी।”

लेकिन इसके बावजूद कि कायरता से बचने के लिए गांधी ने हिंसा अपनाने की थोड़ी छूट दी है, हम फिर भी कहेंगे कि गांधी गलत थे। निष्क्रियता, अहिंसा और दूसरा गाल आगे करना व्यक्तिगत मूल्यों की बात है। अहिंसा को अपनाकर आप व्यक्तिगत रूप से मृत्यु और भावनाहीन हिंसा को चुन सकते हैं। लेकिन आप अपने इस चयन को पूरे देश पर नहीं थोप सकते हैं, जो बकबक करता धिम्मियों का समूह मात्र बन जाएगा।

जिहादी आतंक से लड़ने के लिए गांधीगिरी सबसे गलत हथियार है। इसने खुद गांधी को असफल किया है। उन्होंने खिलाफत आंदोलन का पूरा समर्थन किया लेकिन जिन्होंने आंदोलन के समय उनका नेतृत्व स्वीकार, उन्होंने ही लक्ष्य प्राप्ति के बाद उन्हें दरकिनार कर दिया। खिलाफत की राख से ही अलग होने के लिए नया जिहाद पनपा और 1947 का विभाजन हुआ। हमें पुनः यह गलती नहीं दोहरानी चाहिए।

अपनी पूर्वाभिरुचि को देश का स्वभाविक चयनित विकल्प बनाना गांधी की नैतिक गलती थी। एक राष्ट्र की तरह उठने के लिए हमें इसे पीछे छोड़ना होगा।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।