राजनीति
राष्ट्रीय एकता दिवस विशेष- व्यक्तिवादी राजनीति का शिकार हुए सरदार वल्लभ भाई पटेल को श्रद्धांजलि

जब एक जनतंत्र निजी संपत्ति से निजी विरासत बन जाए तो एक परिवार के अतिरिक्त किसी अन्य के लिए कोई स्थान नहीं बचता। ऐतिहासिक नायक जब वर्तमान राजनीति की गिरफ्त में फँसते हैं तो परिणाम आदर्शों का क्षरण ही होता है।

लौह पुरुष वल्लभ भाई पटेल कांग्रेस की व्यक्तिवादी राजनीति के अपने जीवन में एवं उसके उपरांत भी शिकार रहे। जिस कांग्रेस का प्रारम्भ विभिन्न विचारों के वार्षिक समागम के रूप में हुआ, समय के साथ वह गाँधीजी के व्यक्तिगत आश्रम और नेहरू परिवार की व्यक्तिगत संपत्ति में परिवर्तित हो गई। समय-समय पर कांग्रेस ने अपने शीर्ष नेताओं जैसे तिलक, बोस, बिपिनचंद्र पाल को पार्टी से बाहर जाते हुए देखा। यह सरदार पटेल का बड़प्पन और स्वार्थ-रहित व्यक्तित्व ही था जिसने कांग्रेस के मूल स्वाभाव (पट्टाभिसी तारमैया के अनुसार एक वेदान्तिक भारतीयता) को पार्टी में जीवित रखा।

यह एक विडम्बना ही रही कि जिस व्यक्ति ने पाँच सौ से अधिक राजसी रियासतों को जोड़कर भारत का निर्माण किया, वह स्वयं एक नव-निर्मित नेहरू राजवंश की प्रतिछाया में कहीं खोता चला गया। यह हमारा दुर्भाग्य और व्यक्तिपूजक राजनीतिक सोच का ही परिणाम रहा कि जिस व्यक्ति ने भारतीय राष्ट्र को रूप दिया, उन वल्लभ भाई पटेल को सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान भारत रत्न 1991 में मृत्यु के चालीस वर्ष पश्चात उस शासन में प्राप्त हुआ जो कुछ अवधि के लिए गाँधी परिवार के लिए पी.वी. नरसिम्हाराव के नेतृत्व में मुक्त हुआ। यह अपने आप में उन लोगों की मानसिक लघुता रही जो अपने ही दल के उन महानायकों को वह उचित सम्मान भी न दे सके जो उनके सहयोगी भी रहे एवं इन बौद्धिक महामानवों के निस्वार्थ कर्मठता के लाभार्थी भी। व्यथित राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद जी भी भावुक होकर अपने 13 मई 1959 को दिए भाषण में कहते हैं कि जिस भारत पर आज चर्चा एवं विचार वैश्विक परिप्रेक्ष्य में होता है, उसका सर्वाधिक श्रेय सरदार पटेल को जाता है और उन्हें हम भुला चुके हैं।

सरदार पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को नडियाद में हुआ और एक बँटे हुए परतंत्र राष्ट्र को विश्व के सबसे बड़े गणतंत्र में बदलकर सरदार पटेल ने राष्ट्र से 15 दिसंबर 1950 को विदा ली। नेहरू की पश्चिमी आधुनिकता के झंझावात में स्थिर-प्रज्ञ पटेल के सोमनाथ के जीर्णोद्धार के रूप में सनातन को दी गई भेंट को भुलाया नहीं जा सकता। संविधान एवं सनातन के संतुलन के प्रतीक पटेल स्वतंत्र भारत में भारतीय भाव के प्रथम संरक्षक सिद्ध हुए।

सोमनाथ के पुनर्निमाण के सन्दर्भ में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने प्राण-प्रतिष्ठा में राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू की उपस्थिति का विरोध इस आधार पर किया कि सरदार ने यह कार्य बिना मंत्रिमण्डल को सूचित किया। श्री वी.एन. गाडगिल ने मंत्रिमण्डल की रिपोर्ट कन्हैया लाल मुंशी जी को देकर इस आरोप का खंडन किया। मौलाना आज़ाद और बाबू जगजीवनराम ने इसका अनुमोदन किया। श्री गाडगिल ने कहा “हम आम मूर्तिपूजक हिंदू हैं और नेहरू की भाँति बुद्धिजीवी नहीं हैं। जब सरकार हज़ारों मस्जिदों और मक़बरों को धन दे सकती है तो एक मंदिर को क्यों नहीं?” राजेंद्र बाबू ने समारोह में भाग लिया।

पटेल अपने उपनाम लौहपुरुष के अनुरूप विचारों में दृढ़ एवं संवाद में स्पष्ट थे। जब नेहरू के साम्यवाद की आंधी में देश उड़ रहा था, पटेल अपने विचारों पर अडिग एवं समाजवादियों की आलोचना में मुखर थे। स्टेफेन डेविड को 2 अक्टूबर 1948 को दिए साक्षात्कार में पटेल बिना लाग-लपेट के कहते हैं- “…यह सच है कि कम्युनिस्ट संगठन कट्टर युवाओं का संगठित समूह है। युद्ध में उन्होंने विदेशी सत्ता का समर्थन किया और उसी की मदद से ये आगे बढ़े। …भारत में उनका कोई भविष्य नहीं है क्योंकि उन्होंने स्वतंत्रता संघर्ष में सहयोग नहीं किया और बिना उनके सहयोग के प्राप्त हुए स्वराज्य का लाभ उठाने का प्रयास किया।”

ब्रिटिश वाइसरॉय माउंट बैटन के शब्दों में जहाँ नेहरू का मस्तिष्क आकाश में था, पटेल के पैर ज़मीन पर। दोनों के मध्य वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक ही था, और रहा भी चाहे मामला कश्मीर का हो या तिब्बत का। इन मतभेदों और नेहरू की पार्टीगत राजनीती से दुखी पटेल ने 13 जनवरी 1948 को इस्तीफ़ा देने की इच्छा बापू को लिखे पत्र में व्यक्त की। किन्तु नेहरू संभवत: पटेल की स्वतंत्रता पूर्व लोकप्रियता के लिए उन्हें कभी क्षमा नहीं कर पाए जब कांग्रेस ने लगभग सर्व-सम्मति से पटेल को अध्यक्ष चुना किन्तु कार्यकारी समिति ने गाँधी की ज़िद पर पार्टी संविधान के विरुद्ध जाकर नेहरू को अध्यक्ष बनाया। इसके लिए पटेल को गाँधी के कहने पर अपना नामांकन वापस लेना पड़ा। 15 में से 12 कांग्रेस राज्य कमिटी ने नेहरू के पक्ष में गांधीजी के स्पष्ट रूप से आने के बाद भी पटेल के पक्ष में ही मत दिया था, एवं तीन प्रदेश इकाइयों ने चुनाव से बाहर रहने का निर्णय लिया, तब यह स्थापित ही हुआ था कि कांग्रेस तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष ही स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री होंगे। 1947 में नेहरू 53 वर्ष के थे और पटेल 71 वर्ष के वरिष्ठतम नेता थे। आधुनिक इतिहासकार नेहरू-पटेल द्वय का वर्णन इस प्रकार करते हैं जैसे दोनों हमउम्र एवं समकक्ष रहे हों।

अपने से योग्य व्यक्ति का नेता बन जाने की असुरक्षा भी उनके मध्य कटुता को जन्म देती रही। एक अनुशासित सैनिक की भाँति न्यायोचित अधिकार से वंचित होकर भी पटेल नेहरू का सहयोग करते रहे और जैसा वे स्वयं राजगोपालाचारी जी को13 अक्टूबर 1950 के पत्र में लिखते हैं, दुर्व्यवहार सहते रहे। पटेल कहते हैं, “इस मानसिक प्रताड़ना को और अधिक लंबित करना अत्यधिक दुखदाई है और संबंधों में सुधार की अब कोई आशा नहीं है।” संभवतः इसी असुरक्षा की भावना तब भी नेहरू के मन में थी जब उन्होंने अपने मंत्रियों को व्यस्तता का कारण देकर पटेल की अंतिम यात्रा में भाग लेने से बचने का निर्देश दिया।

यही व्यक्तिवाद का वैमनस्य पटेल को राष्ट्रीय स्मृति से मिटाने में कार्य करता रहा। जिस भारत की राजधानी में नेहरू एवं उनके परिवारजनों के स्मारकों की भरमार है, एक बिखरे हुए भूमिखंड को राष्ट्ररूप देने वाले सरदार पटेल का कोई स्मरण-स्थल भी नहीं। जाति, धर्म एवं क्षेत्रवाद की राजनीति से इतर इस महान व्यक्तित्व के लिए परिवारवाद द्वारा पोषित भारतीय राजनीति में कोई स्थान न रहा। नेहरू परिवार की राजनीतिक प्रतिस्पर्धा एवं प्रतिशोध का पिशाच ऐसा छाया रहा कि आज 182 मीटर ऊँची पटेल की स्मारक मूर्ति भी उसकी काली छाया से निकल नहीं पा रही है। जो सावरकर की राष्ट्रीयता पर प्रश्न उठाते रहे हैं, आज पटेल पर भी उठा रहे हैं। 1946 में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना आज़ाद ने नेहरू का समर्थन किया, किन्तु अत्यंत खेद के साथ अपनी 1959 में प्रकाशित आत्मकथा में लिखते हैं, “मैंने अपने विवेक के अनुसार सर्वोत्तम निर्णय लिया (नेहरू के समर्थन का) किन्तु यह मेरे राजनैतिक जीवन की सबसे बड़ी भूल साबित हुई। मैंने सरदार पटेल का समर्थन नहीं किया। पटेल वे गलतियाँ कभी नहीं करते जो नेहरू ने दस वर्षों में की। मैं अपने इस अपराध के लिए स्वयं को कभी क्षमा नहीं कर पाता हूँ जब मैं सोचता हूँ कि इन गलतियों से मुक्त विगत दस वर्षों का इतिहास ही कुछ अलग होता।

दोषी राजनेता ही नहीं, मातृभूमि के महान पुत्र की उपेक्षा करके, इस परिवारवाद की प्रतिशोध-पूर्ण राजनीति का मौन समर्थन हमने भी किया है जिसका प्रायश्चित हमें ही करना है। आरम्भ उन अतीत के पन्नों को जोड़कर ही करें जिसमें पहली बार लोकतंत्र पर निर्वाचित नेता को विस्थापित करके एक चयनित प्रधानमंत्री थोपा गया था।