राजनीति
स्मृति बनाम राहुल के बीच चुनावी युद्ध नए और पुराने भारत के बीच की है लड़ाई

आशुचित्र- स्मृति ईरानी नए भारत का प्रतिनिधित्व करती हैं, एक ऐसा भारत जो किसी प्राधिकारी से नहीं डरता, एक ऐसा भारत जो परिश्रम से सफलता चाहता है, न कि जन्म के आधार पर।

पिछले हफ्ते, जब भारतीय जनता पार्टी ने आगामी लोकसभा चुनावों के लिए उम्मीदवारों की पहली सूची निकाली तो उसे देखकर कोई भी हैरान नहीं हुआ कि पार्टी ने केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी को चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के सामने अमेठी में उतारा है, जो कि गांधी परिवार की जागीर माना जाता है।

यह दूसरी बार होगा जब स्मृति ईरानी राहुल गांधी को अमेठी में टक्कर देंगी। पिछली बार 2014 में ईरानी ने उत्तरप्रदेश में कोई भी राजनीतिक इतिहास ना होने पर भी एक बहादुर बाहरी के समान, उस व्यक्ति के खिलाफ लड़ी जो कि कांग्रेस की तरफ से प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार था। स्मृति ईरानी हालाँकि अमेठी में एक लाख मतों से हारी पर फिर भी यह गांधी के लिए कांटे की टक्कर थी। इससे गांधी का जीत अंतर दो लाख मतों से कम हो गया।

अमेठी गांधी परिवार का हमेशा से गढ़ माना गया है। इस चुनावी क्षेत्र से पहले संजय गांधी 1980 में सांसद चुने गए, फिर संजय गांधी की असामयिक मौत के बाद उनके भाई राजीव गांधी ने 1991 तक अपने अंतिम दिनों तक अमेठी का प्रतिनिधित्व किया।

राजीव गांधी की मौत के बाद अमेठी ने सतीश शर्मा को चुना, जिन्हें राजीव गांधी के करीब के दोस्त माना जाता है। 1999 में अमेठी से सोनिया गांधी ने जीत हासिल की, फिर सोनिया गांधी ने इंदिरा गांधी के भूतपूर्व चुनाव क्षेत्र में प्रवेश लेने से पहले अमेठी को अपने बेटे राहुल गांधी के लिए छोड़ दिया, जो 2004 से अमेठी का प्रतिनिधित्व।

इस चुनावी इतिहास से यह साफ़ है कि गांधी परिवार के लिए अमेठी लगभग पिछले चार दशकों से एक सुरक्षित सीट रही है। पर 2014 में इस सुरक्षित सीट को झटका स्मृति ईरानी ने दिया, जो कि एक स्व-निर्मित और पहली पीढ़ी की राजनेता है।

2014 में जब भाजपा ने स्मृति ईरानी को गांधी के खिलाफ अमेठी में उतारा, तब कोई भी ईरानी को एक भी मौका नहीं दे रहा था। वह एक अकेली ऐसी राजनेता थीं जिनका कोई भी जन आधार नहीं था और कोई चुनावी क्षेत्र निश्चित नहीं था। उनकी चुनावी लड़ाई उस समय खत्म सी थी जब वह चांदनी चौक क्षेत्र से कांग्रेस के दमदार नेता कपिल सिब्बल से हारी थीं।

उत्तर प्रदेश एक जटिल राज्य है, जहाँ जाति और सामुदायिक राजनीति चुनाव के दिनों में अहम भूमिका निभाती है। पर स्मृति ईरानी ने अमेठी से चुनाव लड़ने पर हामी भरकर उनकी लड़ने की क्षमता को दर्शाया। चाहे वह 2014 में अमेठी से हार गई थीं पर अमेठी के लोगों पर अपनी छाप छोड़ गईं और उनकी भाषण-संबंधी कलाओं के बारें में भी अमेठी के लोगों को पता है।

2014 चुनावों में हारने के बाद सभी लगा कि ईरानी अमेठी को छोड़ देंगी, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। जब राहुल गांधी ने अमेठी को हलके में लिया, उस समय ईरानी ने इस चुनावी क्षेत्र में लगातार सभाएँ कीं और अपनी मेहनत से अमेठी को सींचा और 2019 के लिए तैयार किया, और बताया कि किस तरह गांधी परिवार ने अमेठी से दशकों तक जीतने के बाद इसको नज़रअंदाज़ किया है।

गांधी परिवार दशकों से अमेठी का प्रतिनिधित्व करता आ रहा है, पर इसके बावजूद भी वहाँ साधारण सुविधाओं की कमी है, जैसे कि अच्छी सड़क या बिजली। बहुत सारी परियोजनाओं की घोषणा अमेठी के लिए की गई पर उनमें से कुछ पर ही काम किया गया। पर वहीं स्मृति ईरानी ने इस दौर को बदल दिया और अमेठी के लिए बहुत सारी रोज़गार संबंधित योजनाओं को शुरू करवाया। अचार के कारखानों से लेकर हथियार और बारूद के कारखानों तक सभी स्मृति ईरानी के नेतृत्व में पिछले पाँच सालों में किया गया है।

नतीजे सभी के सामने आने बाकी हैं। कांग्रेस ने कहा कि राहुल गांधी इस बार चुनाव दो जगहों से लड़ेंगे, एक तो अमेठी जो उनकी सुरक्षित सीट है दूसरी वायनाड, केरल से। यह साफ़ है कि ईरानी के कारण कांग्रेस चिंतित है। वह एक नए भारत का प्रतिनिधित्व करती हैं, वह भारत जो कि विकास का स्वाद मेहनत से लेना चाहता है ना कि जन्म के आधार पर।

बहुत सारे तरीकों से यह चुनाव स्मृति ईरानी और राहुल गांधी के बीच नए भारत और पुराने भारत के बीच लड़ाई का होगा। राहुल गांधी पुराने भारत को संबोधित करते हैं और सामंतवाद की पलना करते हैं। आज वे किसी पद पर हैं तो वह अपनी जाति और अपने पारिवारिक इतिहास के कारण हैं। वे एक बड़े बाप के बेटे हैं, जो सोचते हैं कि उन्हें यह ताकतें सिर्फ एक राजनीतिक परिवार में पैदा होने से मिली हैं।

दूसरी तरफ ईरानी हैं जो कि एक पहली पीढ़ी की राजनेत्री हैं। एक मध्यम वर्गीय परिवार में पैदा होने के बाद, उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक अभिनेत्री से की, जिसमें उन्होंने बहुत महारथ हासिल की है और उसके बाद राजनीति में कदम रखा। उन्होंने अपनी क्षमता का परिचय राजनीति में भी भाजपा में बहुत सारे पदों पर रह कर बखूबी ढंग से दिया।

स्मृति ईरानी अपने चुनावी प्रतिद्वंद्वी राहुल गांधी से उम्र में लगभग 10 साल तक छोटी हैं। उन्होंने तीन महत्वपूर्ण मंत्रिस्तरीय विभागों को भी बहुत बेहतरीन ढंग से संभाला है, और वह किसी भी ऐरे-गैरे राजनेता के रूप में नहीं जानी जाती हैं। उनके ऊपर कांग्रेस के सांसदों संजय निरुपम और तहसीन पूनावाला की तरफ से लिंग भेदक टिप्पणियाँ भी की गईं। 

और दूसरी तरफ राहुल गांधी हैं जो कि 50 साल के हैं पर फिर भी बहुसंख्यक पत्रकारों द्वारा युवा चेहरा बताए जाते हैं। अपने चुनावी करियर की शुरुआत उन्होंने कांग्रेस पार्टी के महासचिव के रूप में की। उन्होंने किसी भी सरकार के समय किसी भी प्रशासनिक पद को नहीं संभाला और एक सांसद के रूप में भी उनका रिकॉर्ड बहुत निम्न सा है। दरअसल उनका आकर्षण उनके गालों के डिम्पल और उनके वंश के नाम के कारण ही है।

राहुल गांधी पुराने भारत की सामंती पितृसत्तात्मक मानसिकता को दर्शाते हैं और दूसरी तरफ स्मृति ईरानी एक नई दावेदार हैं, जो कि एक छोटे से शहर से आने वाली एक स्व-निर्मित राजनेत्री हैं। 

2019 चुनावों के परिणाम निर्धारित करेंगे कि इस अभिजात वर्ग की राजनीति के स्थान पर योग्यता अपनी जगह बना पाएगी या नहीं। तब तक सभी की आँखें अमेठी पर टिकी हैं।

शेफाली वैद्य पुणे आधारित स्वतंत्र लेखिका व स्तंभकार हैं।