राजनीति
भारत-विरोधी अकादमिक लेखन करने वाली रोमिला थापर के लिए मीडिया की नाहक चिंता
शंकर शरण - 10th September 2019

हाल में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) द्वारा वहाँ की एक ‘एमिरिटस’ (ताउम्र) प्रोफेसर रोमिला थापर से बायोडॉटा मांगने पर हमारे अंग्रेज़ी मीडिया में बड़ी चिंता प्रकट की गई।

विश्वविद्यालय के अनुसार, नियमों के अनुरूप 75 वर्ष की आयु के बाद हरेक ऐसे प्रोफेसर से ऐसी सूचनाएँ ली जाती हैं। लेकिन अनेक बौद्धिकों को यह बहुत बुरा लगा। मानो, यह प्रोफेसर महोदया का अपमान करना हुआ!

एक समाचार-पत्र ने तो दुनिया के विभिन्न विश्वविद्यालयों में एमिरिटस प्रोफेसरों के लिए बने नियमों पर शोध ही शुरू कर दिया। केवल इस दृष्टि से जिसमें विश्वविद्यालय प्रशासन को नीचा दिखाना हो। 

लेकिन इन्हीं अखबारों ने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में सुब्रह्मण्यम स्वामी को विज़िटिंग प्रोफेसर पद से हटाने पर कोई आपत्ति नहीं की थी। बल्कि, कई ने खुशी मनाई थी।

यही नहीं, रोमिला जैसे कम्युनिस्टों के राज में जेएनयू में अज्ञेय, गिरिलाल जैन, सीताराम गोयल से लेकर अरुण शौरी, डेविड फॉले, सुब्रह्मण्यम स्वामी, जैसे किसी बड़े राष्ट्रवादी विद्वान या नेता को प्रासंगिक विषयों पर भी कभी आमंत्रित न करना चिंताजनक नहीं बना। मानो विश्वविद्यालय के सामाजिक अध्ययन को राष्ट्र-विरोधी, हिंदू-विरोधी प्रचार विभागों में बदल देना भी कम्युनिस्टों का अधिकार था!

हमारे अंग्रेज़ी मीडिया में यह जिम्मी मानसिकता आज भी जमी है। जन-भावना या देशहित से भी बढ़कर इसके लिए हर तरह के वामपंथी, इस्लामी, मिशनरी मतवादियों की नाहक इज्ज़त करना अधिक महत्वपूर्ण है। वरना, वे कभी यह भी देखते कि ऐसे लोगों ने शिक्षा की आड़ में हमारी अनेक पीढ़ियों के होनहारों का क्या सत्यानाश किया।

रोमिला थापर वैसी ही एक सत्यानाशी रही हैं। उनका ऊँचा पद वैसा ही है जैसे इस्लामी देशों में उलेमा, ईमामों का होता है। या स्तालिनवादी रूस और माओवादी चीन में ‘अकादमीशियनों’ का होता था। यानी, ऊँचे पदों पर शुद्ध पार्टी-प्रचारक।   

रोमिला खुद अपने को ‘जेएनयू का डायनासोर’ कहती हैं! बड़ा आकार और छोटी बुद्धि वाले अर्थ में यह संज्ञा सटीक है। आखिर वे यहाँ ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ की प्रिय यूँ ही नहीं हैं। उन्होंने कई बार भारत के टूटने की भविष्यवाणियाँ की हैं।

फ्रांस के प्रसिद्ध अखबार ल मोंद  को 1993 में एक इंटरव्यू में रोमिला ने प्रसन्नतापूर्वक भविष्यवाणी की थी कि भारत एक नहीं रहेगा। 1997-98 के लगभग भाजपा के सत्तासीन होने की संभावना पर उन्होंने रिडिफ डॉट कॉम  पर ऐसी ही भयावह परिणति की भविष्यवाणी की थी। मानो वे इतिहासकार नहीं, वरन नजूमी, माओवादी या जिहादी सरदार हों।

ऐसी बुद्धि यदि क्षुद्र नहीं तो और क्या है, जिसे 1947 में भारत के टूटने और कश्मीर को दोबारा तोड़ने की कोशिशों के भयावह अमानवीय हश्र की भी समझ नहीं! ऐसे मतवादी को ऊँची पद-प्रतिष्ठा का अधिकारी मानना आत्मघाती है। 

रोमिला थापर के लेखन-वाचन-कर्म का आधार मोटे तौर पर मार्क्सवाद-लेनिनवाद रहा है। जिसमें देशभक्ति एक मूर्खता और राष्ट्रवाद एक गाली है! सारी दुनिया में किसी मार्क्सवादी का देशभक्त होना उस का ‘डेवियेशन’ माना जाता रहा है। अतः नोट करें कि रोमिला के लेखन, वाचन में ऐसा कोई भटकाव नहीं। वे पक्के पुराने कम्युनिस्टों की तरह भारत से हिंदू धर्म-समाज का नाश चाहती हैं। इसके लिए देश टूटे तो टूटे। 

हमारे अंग्रेज़ी अखबार भूल गए हैं कि इस्लाम की तरह मार्क्सवाद भी स्वघोषित रूप से अंतर्राष्ट्रीयतावादी है। रूसी कम्युनिस्ट लेनिन ने प्रथम विश्व-युद्ध के समय अपने देश के दुश्मन जर्मनी से आर्थिक, भौतिक मदद लेकर अपनी राजनीति बढ़ाई थी।

भारतीय मार्क्सवादियों ने भी द्वितीय विश्व-युद्ध के समय कांग्रेस के विरुद्ध अंग्रेज़ों का साथ दिया था। फिर भारत को तोड़ने में 1946-47 के दौरान मुस्लिम लीग की उत्साहपूर्वक मदद की थी। आगे 1962 में चीनी आक्रमण पर अनेक मार्क्सवादियों ने भारत को ही दोषी बताया, आदि। 

उसी क्रम में, तीन साल पहले जेएनयू में आतंकी मुहम्मद अफज़ल की पूजा और ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे, इन्शाअल्लाह!’ वाली घटना पर रोमिला थापर टुकड़े-टुकड़े गैंग की ओर से ही बचाव में उतरी थीं। उन्होंने वैसी बयानबाजी की औपचारिक भर्त्सना भी नहीं की।

वस्तुतः अपने कथित विद्वत लेखन में भी उन्होंने भारत को तोड़ने-मरोड़ने, नीचा दिखाने का ही काम किया है। इसकी गवाही खुद उनकी भाभी, और प्रसिद्ध विदुषी राज थापर ने दी है जो प्रसिद्ध अंग्रेजी मासिक सेमिनार  की संस्थापक, संपादक थीं। 

राज ने अपनी आत्मकथा ‘ऑल दीज़ इयर्स’ में 1980 की एक घटना का उल्लेख किया है। जब कांग्रेस नेता डॉ कर्ण सिंह ने अपने मित्र रोमेश थापर से शिकायत की कि उनकी बहन रोमिला “अपने इतिहास-लेखन से भारत को नष्ट कर रही है”।

इसपर कर्ण सिंह की रोमेश से तकरार भी हो गई। राज थापर ने यह प्रत्यक्षदर्शी वर्णन लिखते हुए रोमिला का कोई बचाव नहीं किया। उलटे अपने पति रोमेश को ही झड़प में कमजोर पाया जो ‘केवल भाई’ के रूप में कर्ण सिंह से उलझ पड़े थे। 

इसलिए, न केवल रोमिला की राजनीतिक बयानबाज़ियाँ और एक्टिविज़्म, बल्कि अकादमिक लेखन भी भारत-विरोधी रहा है। उनके लेखन, भाषण, अध्यापन और प्रचार का मुख्य स्वर सदैव हिंदू-निंदा और इस्लाम-परस्ती रहा। इसी का उदाहरण अयोध्या आंदोलन में उनका सक्रिय हस्तक्षेप भी था। 

रोमिला के नेतृत्व में 1989 में 25 कम्युनिस्ट व सहयोगी प्रोफेसरों ने एक संयुक्त पुस्तिका प्रकाशित की- पोलिटिकल एब्यूज ऑफ हिस्टरी। उसे देश भर में उसे बँटवाया। उसके प्रकाशक में बाकायदा सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज़, जेएनयू तथा कम्युनिस्ट पार्टी के प्रेस का नाम लिखा था।

पुस्तिका में अनेक झूठे दावे किए गए थे, जो केवल हिंदू पक्ष को लांछित करने, और मुस्लिम पक्ष को अड़ने के लिए प्रेरित करते थे। उसमें कोई विद्वता न थी, यह इस से भी समझें कि आज उन प्रोफेसरों में से कोई भी उस टेक्स्ट की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता! 

पर उस समय दबदबे का दुरुपयोग कर रोमिला और कॉमरेड कंपनी ने इस्लामी आक्रमणकारियों द्वारा हज़ारों मंदिरों के विध्वंस के सदियों के इतिहास पर पर्दा डालकर अयोध्या पर समझौता रोकने का सफल प्रयास किया।

1989-92 के बीच घटनाक्रम का मामूली शोध भी दिखाता है, कि विवाद को विध्वंस तक पहुँचाने में रोमिला जैसे कम्युनिस्टों की बड़ी भूमिका थी। इस की पुष्टि तब सरकारी समिति के साथ-साथ विभिन्न पार्टियों के नेताओं, जानकारों ने भी की है।

इस प्रकार, आज तक ऊँचे पदों के वज़न का दुरुपयोग करके रोमिला थापर ने मुख्यतः एक हिंदू-विरोधी राजनीतिक एक्टिविज़्म ही चलाया है। उन जैसे विद्वानों के कारण ही जेएनयू हर तरह की देश-विरोधी और हिंदू-द्वेषी राजनीति का व्यवस्थित अड्डा बना।

इस प्रत्यक्ष इतिहास के बावजूद यदि हमारे अंग्रेज़ी अखबार रोमिला थापर की इज्ज़त-आफज़ाई में बिछे रहना चाहते हैं, तो कहना होगा कि भाजपा की सत्ता जमने के बावजूद भारतीय संस्कृति सुरक्षित नहीं हुई है।