राजनीति
प्रस्तावना पढ़ने वाले उपहास के पात्र हो सकते हैं, पहले समझ लें इसका इतिहास और स्थान

नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरोधियों ने भारतीय संविधान की प्रस्तावना खोज निकाली है और विश्वास कर रहे हैं कि यह अधियनियम संविधान के मूल के विरुद्ध है। उन्हें थोड़ी शिक्षा की आवश्यकता है। क्योंकि हो सकता है इन सबमें वे ही उपहास का पात्र हों।

पहला, प्रस्तावना संविधान का भाग और इसका मार्गदर्शक सिद्धांत है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के अनुसार यह संविधान का भाग है तो इसे संशोधित भी किया जा सकता है। 1976 में जब देश में आपातकाल लगा था और विपक्षी नेता जेल में थे, तब प्रस्तावना को संशोधित करके दो विवादास्पद शब्दों- पंथनिरपेक्ष और समाजवादी को जोड़ा गया था।

इसलिए सीएए-विरोधी समूहों द्वारा जो प्रस्तावना का उपयोग किया जा रहा है, वह प्रस्तावना वह नहीं है जो हमने 1950 में स्वयं को अर्पित की थी। इसका अर्थ यह हुआ कि भले ही प्रस्तावना को पवित्र और 1947 के बाद के भारत की मूल अवधारणा के रूप में माना जाता है लेकिन यह स्थाई नहीं है व संशोधित किया जा सकता है।

अगर पंथनिरपेक्ष और समाजवादी शब्दों को अनुच्छेद 368 के अधीन संवैधानिक संशोधन से डाला जा सकता है तो उन्हें या किसी और बाग को हटाया भी जा सकता है। भविष्य में यह भी हो सकता है कि धर्म और राम-राज्य जैसे भारतीय मूल के शब्द संशोधित प्रस्तावना का हिस्सा हों। ये दोनों विचार भारत के लिए महात्मा गांधी के विचारों से मेल खाते हैं।

दूसरा, प्रस्तावना संविधान लिखे जाने के बाद का विचार है। इसकी रूपरेखा और इसपर चर्चा तब हुई जब संवैधानिक सभा ने पूरे संविधान के प्रथम प्रारूप का अध्ययन शुरू कर दिया था। सभा द्वारा संपूर्ण संविधान को स्वीकार करने के कुछ दिनों पहले ही अक्टूबर-नवंबर 1949 में इसे संविधान का भाग बनाया गया था। इसपर अंत में चर्चा हुई थी और इसे संविधान में पहला स्थान मिला।

तीसरा, प्रस्तावना का सौंदर्य इसकी सरलता में है। हालाँकि सरल होने के कारण इसका अर्थ निकालने के लिए काफी क्षेत्र बच जाता है। प्रस्तावना की कोई बात सुनिश्चित नहीं करती है कि इसमें कहे गए सिद्धांतों को मार्गदर्शक सिद्धांतों के रूप में माना जाएगा।

संविधान की प्रस्तावना कुछ इस प्रकार है-

हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को:

सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय,

विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता, प्राप्त कराने के लिए,

तथा उन सब में, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए

दृढ़ संकल्पित होकर अपनी इस संविधान सभा में आज दिनांक 26 नवंबर 1949 ईस्वी (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत 2006 विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

ये सिद्धांत बनाए गए कानूनों और संविधान के लागू होने पर निर्भर करते हैं, न कि स्वयं इन शब्दों पर आधारित हैं।

उदाहरण देखें, सामाजिक समारोहों में जब विशिष्ट व्यक्तियों से विशेष व्यवहार किया जाता है, जब सरकार पदक्रमों से चलती है, जब न्याय प्रणाली मानती है कि कानून बनाने में यह कार्यकारिणी और विधान-मंडल से ऊपर है तो वास्तविकता में समानता कहाँ है?

कैसे हम स्वयं को पंथनिरपेक्ष कह सकते हैं जब इसका अर्थ है कि राज्य द्वारा सभी धर्मों से समान दूरी व सभी के प्रति समान व्यवहार है और संविधान स्वयं अल्पसंख्यक संस्थानों के लिए विशेष प्रावधान बनाए बैठा है जैसे शैक्षणिक व धार्मिक संस्थान?

कैसे एक पंथनिरपेक्ष संविधान ने राज्य को केवल हिंदू मंदिरों को चलाने की अनुमति दी और शिक्षा के अधिकार का सारा भार केवल बहुसंख्यकों द्वारा चलाए जाने वाले संस्थानों पर डाल दिया? कैसे एक पंथनिरपेक्ष राष्ट्र में अल्पसंख्यकों के लिए विशेष मंत्रालय व उनके अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष फोरम हैं?

समाजवादी शब्द को लें। इस शब्द का सटीक अर्थ क्या है जब राज्य न सिर्फ निजी कंपनियों का राष्ट्रीयकरण करता है बल्कि अपनी मर्ज़ी से उनका निजीकरण भी करता है? समाजवाद का अर्थ धन का समान पुनर्वितरण हो सकता है लेकिन ऐसा करने के भी कई तरीके हैं।

उच्च कर लगाकर पुनर्वितरण किया जा सकता है या निजी दान को बढ़ावा देकर या स्व-रोजगार, उद्यमों और प्रतिस्पर्धा के विस्तार से। समाजवादी शब्द की जगह पूंजीवादी शब्द भी कर दिया जाए तब भी वह सब किया जा सकता था जो राज्य करता है। आखिरकार कल्याण का विचार पूंजीवादी राष्ट्रों में उपजा था, न कि समाजवादी राष्ट्रों में।

जब हम देश की अखंडता की बात भी इस प्रस्तावना में कर रहे हैं तो अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य को आधार बनाकर कैसे टुकड़े-टुकड़े गुट आगे आया? कैसे धार्मिक स्वतंत्रता और मस्जिदों व चर्चों के कॉर्पोरेट अधिकारों के बीच संतुलन बैठता है जब केवल कुछ धर्मों के प्रसार के लिए विदेशों से पूंजी ली जाती है? जिस स्वतंत्रता की बात प्रस्तावना में की गई है, वह व्यक्तियों के लिए है या बड़ी कॉर्पोरेट संस्थाओं के लिए जो विदेशी दान के अरबों डॉलर से वित्तपोषित होती हैं?

यहाँ मुद्दा यह है कि शब्दों का वही अर्थ निकलता है जो हम उसे देते हैं। यदि भविष्य में कभी धर्म और राम-राज्य जैसे भारतीय मूल के शब्द प्रस्तावना में जोड़े भी गए तो उनका अर्थ गैर-सांप्रदायिक ही रहेगा। समाजवाद की जगह अंत्योदय को आसानी से लाया जा सकता है जिसका अर्थ होगा कि विकास के लिए अंतिम व्यक्ति को प्राथमिकता देना, गांधी भी ऐसा ही चाहते थे।

जो लोग प्रस्तावना पढ़कर यह बताना चाह रहे हैं कि सरकार संविधान की आत्मा के अनुकूल काम नहीं कर रही है वे जान लें कि प्रस्तावना इसके अर्थ निकाले जाने और लागू होने से फलीभूत होती है। और प्रस्तावनाओं को बेहतर बनाने के लिए उनमें परिवर्तन भी किया जा सकता है। 1976 में उसे बदतर किया गया था जब भारतीय परिप्रेक्ष्य में अर्थहीन समाजवादी और पंथनिरपेक्ष शब्दों को जोड़ा गया था।

प्रस्तावना पढ़ने वाले ही उपहास का पात्र हो सकते हैं। वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। और हो सकता है कि वे गलत प्रस्तावना पढ़ रहे हों जिसे 1976 में विकृत कर दिया गया था। यह वह नहीं है जो बाबासाहेब अंबेडकर हमारे लिए छोड़कर गए थे और न ही वह जो गांधी हमारे लिए चाहते थे।

आर जगन्नाथन स्वराज्य के संपदकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi से ट्वीट करते हैं।