राजनीति
लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद लिबरल बौद्धिकों का रंज

दिल्ली के अधिकांश बड़े अंग्रेज़ीदाँ लिबरल बौद्धिकों को चुनाव परिणामों से इतना धक्का लगा है कि वे अपनी भी आलोचना कर रहे हैं कि उन में बड़ा अहंकार था, व समय और समाज को समझ नहीं पाए, लोग अंग्रेज़ीदाँ बौद्धिकों के दबदबे से बाहर हो रहे हैं, आदि। लेकिन कहना कठिन है कि उन्होंने सचमुच अपने जड़वामपंथी-लिबरल विचारों की सच्ची समीक्षा शुरू की है।

दूसरे बड़े बौद्धिकों ने अपनी टेक पर अड़े रहकर इस परिणाम की लानत-मलानत की है। मोदी और भाजपा पर अपनी खीज निकाली है। प्रतापभानु मेहता के अनुसार इस चुनाव का विश्लेषण दो शब्दों में हैः नरेंद्र मोदी। मोदी ने मतदाताओं को कायल कर लिया है कि वह भारत का नया भाग्य लिख सकते हैं। और मतदाताओं ने भी खुशी-खुशी अपना भाग्य उन के हाथों में दे दिया है। एक नेता की देवता जैसी भक्ति शुरू हो गई है, और सारी सत्ता उस में केंद्रित हो रही है। हर सवाल का जबाव, और हर समस्या का समाधान उस व्यक्ति में देखा जा रहा है।

उनके अनुसार, मोदी ने भी कुछ बातें पकड़ ली है। एक, वे ही राजनीति को सर्वोत्म समझते हैं। राजनीति कोई बनी-बनाई चीज नहीं होती, बल्कि उसे बनाया जाता है। दूसरे, भयंकर बुराई (ईवल) में भी यदि बड़े लक्ष्य की आशा दिखा दी जाए तो वह आकर्षक हो जाती है। तीसरे, मोदी ने हर जगह अपने को ही दिखाते रहने का तरीका खोज लिया है। कई नेता इसलिए जीतते हैं क्योंकि लोगों को विकल्प नहीं दिखता। मोदी ने किसी और विकल्प के बारे में सोचना ही असंभव बना दिया है। मोदी देश में ऐसी भावना फैलाने में सफल हुए कि उस की योजनाओं ने अधिकाधिक लोगों के जीवन को छुआ है। लेकिन उन की जीत आर्थिक सफलताओं के कारण नहीं, बल्कि विफलताओं के बावजूद हुई। लोग मानो मोदी को फिर वोट देने का बहाना ढूँढ रहे थे, और राष्ट्रवाद वह बहाना बन गया। इस चुनाव में भविष्य के लिए किन्हीं आर्थिक आशाओं की चर्चा न थी। चुनाव अभियान पूरी तरह नकारात्मक था जिस में झूठ और घृणा का जमकर प्रयोग हुआ

लेकिन विपक्ष के पास भी कोई आकर्षक विचार नहीं था। वह जीतने के लायक नहीं था। मेहता के अनुसार, कांग्रेस में सज्जनता-भद्रता है जो आज दुर्लभ हो गई है। पर भयंकर राष्ट्रीय संकट में भी विपक्षियों का एक साथ न आ पाना उन की क्षुद्रता और अदूरदर्शिता का प्रमाण है। कांग्रेस जानती थी कि उसे परिवारवाद और भ्रष्टाचार के आरोपों से पीटा जा रहा है, पर वह अपने नेतृत्व का चेहरा नहीं बदल सकी। मोदी ने जम कर प्रचार किया कि सपा, बसपा से लेकर कांग्रेस तक सभी अन्य पार्टियाँ भ्रष्ट परिवारवादी कंपनियाँ हैं।

मेहता के विचार से यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक डरावना क्षण है। आधुनिक भारतीय इतिहास में जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी समेत किसी के पास इतनी शक्ति संक्रेंद्रित नहीं हुई थी। कुछ सामाजिक संगठन देश के हर कोने में हर संस्था पर नियंत्रण करने को तैयार हैं। भारत ने अपनी राजनीति का मूल विचार ही छोड़ दिया, इस पर इस चुनावी जीत ने मानो मुहर लगा दी है। यह सीधे-सीधे चुनावी तानाशाही और बहुसंख्यकवाद की जीत है। यह एक भ्रम की, अवास्तविकता की जीत है। यह भय और घृणा की राजनीति की जीत है। इस के बाद हिंदुत्व का सांस्कृतिक प्रभुत्व जमाने और अल्पसंख्यकों को खुलेआम किनारे करने की इच्छा दिख रही है। अब व्यापार, उद्योग और धार्मिक संस्थानों की शक्तियाँ भी एक व्यक्ति के गिर्द घूमेगी।

इस चुनाव परिणाम से उन लोगों को फिर धक्का लगा है जो जाति और क्षेत्रीयता की ताकत का भ्रम पालते थे। वह सब पहचान टूट रही है और हिंदुत्व के बड़े अभियान के लिए तैयार हो रही है। भाजपा की विचारधारा में विषैले पुरुषवाद के बावजूद मोदी ने जेंडर राजनीति को नए तरह से प्रभावित कर डाला है। सो, हिंदुत्व अभियान में अब कोई बाधा नहीं रह गई है। मोदी के साथ भारत ने अपने को जोड़ लिया है।

कुछ बौद्धिकों के अनुसार तो इस चुनाव के बाद भारत हिंदू राष्ट्र बन चुका है। क्रिस्टोफ जेफरलो के अनुसार भारत अब देसी लोकतंत्र बन रहा है जिस में सेक्यूलरवाद केवल कागज पर रहेगा और वास्तव में अल्पसंख्यक दूसरे दर्जे के नागरिक बन जाएँगे। अमर्त्य सेन के विचार से भाजपा ने मुसलमानों के विरुद्ध घृणा फैला कर ही जीत हासिल की है। प्रो. जोया हसन के अनुसार उग्र राष्ट्रवाद के सहारे हिंदुत्व एकता बनाकर मोदी ने यह बहुसंख्यकवादी जीत पाई है। भारत में अब नेहरूवादी विचारों, आदतों और दावों का समय जा चुका, यह बात तवलीन सिंह, शोभा डे तथा कुछ अन्य लोगों ने भी कही है।  

कम्युनिस्ट विचारों के कांग्रेस नेता मणि शंकर अय्यर ने इस चुनाव परिणाम को जिन्ना के विचारों की जीत बताया है। उनके अनुसार मोदी के आने तक भारत ने उस सेक्यूलर विचार को जिंदा बचाए रखा जिस से स्वतंत्र भारत का संविधान बना था। लेकिन मोदी की इस जीत ने जिन्ना को सही साबित कर दिया है। अय्यर का रोचक निष्कर्ष है कि विपक्षी दलों ने इस चुनाव में सेक्यूलरिज्म शब्द का प्रयोग ही नहीं किया, इसीलिए वे हार गए। जबकि तमिलनाडु में एम. के. स्टालिन ने अपने मोर्चे का नाम सेक्यूलर प्रगतिशील मोर्चा कर दिया, और जीत गए।

अय्यर के अनुसार इस चुनाव से यह चुनौती सामने आई है कि हिंदुत्व और हिंदुत्व -विरोधी शक्तियों के बीच पिछले 100 साल से चल रहे संघर्ष में अब सेक्यूलरवाद के प्रयोग को बेलाग तीखी धार देनी है या फिर सेक्यूलरवादियों को हार मानकर हिंदुत्व में ही अपनी कोई राजनीतिक जगह खोजनी है? अय्यर के हिसाब से अब पवित्र आशाएँ पालने का समय नहीं रहा, बल्कि सेक्यूलर उग्रवाद (सेक्यूलर फंडामेंटलिज्म) का बिगुल बजाने का समय आ गया है। वे यहाँ तक कहते हैं जो भारत सेक्यूलर न रहे, उसे जीवित बचने का कोई अधिकार नहीं है’!

लिबरल बौद्धिकों की तमाम उपर्युक्त बातों से झलकता है कि यहाँ बौद्धिक संघर्ष का नया युग आ गया है। जिस में सेक्यूलरवादी बौद्धिक और राजनीतिक अपनी टेक बचाने के लिए जद्दो-जहद कर रहे हैं। उन की शक्ति खास नहीं घटी है, केवल भाजपा सत्ता होने से उन के साधन कम हो गए हैं। परन्तु शैक्षिक, बौद्धिक परिदृश्य में उन की स्थिति ध्वस्त होने से काफी दूर है। यहाँ चुनाव परिणाम संयोग दुर्योग, प्राकृतिक, आकस्मिक आपदा, आदि कई चीजों से प्रभावित होते रहे हैं। फिर, भाजपा विरोधी वोटों का प्रतिशत अभी भी काफी बड़ा है। अतः अगले चुनाव की कोई गारंटी नहीं की जा सकती है।

विशेषकर इसलिए, कि भाजपा ने जीत के साथ ही जो संकेत दिए हैं उस में सांस्कृतिक और बुनियादी मुद्दों पर सदा की तरह ही चुप रहना तय लग रहा है। सब का विश्वास जीतने के जैसे विकास कार्यक्रम घोषित हो रहे हैं, उस में कांग्रेसी विचारों का ही दुहराव है। इसलिए, लिबरल बौद्धिकों-राजनीतिकों की बुनियादी धारणाओं को कोई कड़ी चुनौती नहीं मिलने जा रही है। चाहे उन की अनेक बातें अतिरंजना या सीधे-सीधे गलत हैं। लेकिन यदि गलत धारणाओं के विरुद्ध कोई सीधा, सशक्त प्रतिवाद न हो, तो उन बौद्धिकों के साथ-साथ लाखों लोगों के बीच भी वे गलत धारणाएं जमी रहेंगी।

विचारों की लड़ाई चुनाव से नहीं, बल्कि विचारों से लड़ी जाती है। लेकिन दुर्भाग्य से भाजपा ने इस मोर्चे को अपने हाल पर छोड़ दिया है। लिहाजा हिंदू विचारों, आशाओं के प्रतिनिधि या पक्षधर लोग जहाँ-तहाँ स्वतंत्र रूप से जैसे उन से बन पड़ता है, यह लड़ाई लड़ रहे हैं। अर्थात्, इस बौद्धिक-शैक्षिक लड़ाई में उस सत्ता का कोई सहयोग या भागीदारी नहीं है, जिसे हिंदुत्ववादी कह कर तरह-तरह से कोसा जा रहा है! यह एक कड़वी विडंबना है।

इसलिए, लिबरल-वामपंथी बौद्धिकों को पराजित मान लेना उचित नहीं। वे नए-नए मुहावरों से अपनी पुरानी लड़ाई लड़ रहे हैं। उनके द्वारा अब प्रयुक्त नया शब्द बहुसंख्यकवाद (‘मेजोरिटेरियनिज्म’) वस्तुतः ‘हिंदू कम्युनलिज्म’ का ही छद्म संकेत और आक्षेप है। इस में ‘बहुमत’ को इसलिए नीचा मान लिया गया है, क्योंकि इस से एक अल्पसंख्यक विशेष के विशेषाधिकारों को खतरा हो सकता है। यह आक्षेप जन-विरोधी, और तानाशाही की चाह भी है, क्योंकि इस में बहुसंख्यक को नकारने और अल्पसंख्यक को निर्णायक बनाने जैसी बात है।

चुनाव परिणामों से मायूस होने के बाद भी वे अपने हिन्दू-विरोधी विमर्श के अन्याय पर पुनर्विचार के बदले उसी को फिर जमाने के लिए मेहनत कर रहे हैं। हिंदू जनता की भावना का औचित्य समझने के बदले उसे लांछित कर रहे हैं। जबकि ‘अल्पसंख्यक’ से उन्हें कोई शिकायत नहीं। मानो कश्मीर पर चुप्पी रखने, संविधान की खुली अवहेलना कर शरीयत पर बल देने, राष्ट्रगान वंदे-मातरम् के विरुद्ध फतवे, आदि से लेकर लेकर महान हिन्दू श्रद्धा-स्थलों पर अनुचित कब्जा किए रखने तक, किसी बात के लिए उन्हें कुछ नहीं कहना चाहिए! इस खुली इस्लाम-परस्ती को ही वे ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ कहते हैं, जिस के न रहने पर भारत को बचे रहने का कोई अधिकार नहीं।   

इन बौद्धिकों को सारी शिकायत ‘बहुमत’ से है। समाज के विभिन्न समूहों, दलों के लिए इन्होंने दोहरे पैमाने बना रखे हैं। इन बौद्धिकों को मध्य-वर्गीय सुशिक्षित लोगों द्वारा भी ठुकरा दिए जाने के बावजूद ये अपनी झक पर संदेह नहीं करते। कि इन जैसे विद्वानों के आग्रह को देश के अधिकांश लोग क्यों नहीं मान रहे? चुनाव में प्रकाश राज और कन्हैया कुमार जैसे इन के नायकों की जमानत जब्त हो जाने पर भी इन्हें कभी लोगों से सच्चा संवाद करना जरूरी नहीं लगता।

फलतः ऐसे बुद्धिजीवी अपने ही बनाए दुष्चक्र में फँस गए हैं। उन्होंने अपनी कुछ मनमानी, काल्पनिक मान्यताओं को जड़-सूत्र बना लिया है। जिसे वास्तविक जीवन द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाने पर भी वे उसी को परम-सत्य माने बैठे हैं। मानो किसी मान्यता की परख कर, उस में सुधार करने से इन की प्रतिष्ठा गिर जाएगी। इसलिए भारत में प्रचलित खोटे सेक्यूलरिज्म की विफलता पर सोचने के बदले वे जनता को ही दोषी बताना चाहते हैं! ‘मेजोरिटेरियनिज्म’ वाला आपेक्ष यही है।

ऐसे विद्वान सच्चाई देख कर भी नहीं देखना चाहते! एक ओर मानते हैं कि भारतीय जनता में कोई गहरा आलोड़न चल रहा है। परंतु उसके विस्तार में जाना, आँकड़े और तफसील इकट्ठा करना, और उस से समुचित निष्कर्ष निकालना नहीं चाहते- जो इनका प्रधान कर्तव्य था। इसके बदले दलीय राजनीति में लिप्त होकर उस आलोड़न को ही खारिज करना चाहते हैं। मानो, जनता को इन बौद्धिकों से पूछ-पूछ कर अपनी राय बनानी चाहिए। अपनी ज़िद के कारण वे बौद्धिक यह भी नहीं समझते कि क्यों इस चुनाव से लोगों की आशाएँ कम थीं? मध्यवर्गीय लोगों ने तटस्थ भाव से भी फिर भाजपा को ही सत्ता में क्यों देखना चाहा, चाहे उन में पाँच साल पहले वाला उत्साह नहीं था? प्रताप भानु मेहता की अनेक बातें अतिरंजना हैं। लोगों के एक हिस्से ने मोदी को विकल्पहीनता का लाभ भी दिया है।

यदि वे सही, और ठोस आँकलन करते तो उन्हें पता चल जाता कि लंबे समय से चल रहे सेक्यूलर-लिबरल दोहरेपन ने ही लोगों को क्षुब्ध किया है। भाजपा को मिलता, बढ़ता समर्थन मूलतः उसी की प्रतिक्रिया है, जिस का मुख्य जिम्मेदार प्रभावी लिबरल बुद्धिजीवी वर्ग है। यदि वे अपनी वैचारिक झक से हट कर परखते तो देख सकते कि भाजपा ने केंद्र और राज्यों में दशकों सत्ता में रह कर भी ऐसा एक भी काम नहीं किया, जो कांग्रेस नहीं कर सकती थी। अर्थात्, भाजपा ने वही काम किए, वही नीतियाँ रखीं, जो कांग्रेस की हैं। तब ये बुद्धिजीवी किस चीज़ को भाजपा की विषैली, ‘इविल’ विचारधारा कह रहे हैं, जिस ने मध्यवर्ग और राष्ट्रीय संस्थाओं को भी ‘प्रभावित’ कर दिया है?

दरअसल, हमारे अधिकांश बुद्धिजीवी मानसिक आलस्य के भी शिकार हैं। उन्होंने कुछ मान्यताएँौ अपने गले बाँध ली हैं, जो सहज न्याय और लोकतांत्रिक भावना, दोनों कसौटियों पर अनुचित हैं। भारत की धर्म-चेतना से तो अनर्गल हैं ही। यहाँ जनता में हो रहा मौन, गहरा आलोड़न देश-विदेश के घटनाक्रम के लंबे अनुभव, अवलोकन से पैदा हुआ है। अब हर व्यक्ति तक संसार भर के मीडिया की मुफ्त पहुँच के कारण यह संभव हुआ कि लोग यूरोप, अरब, अमेरिका, नाइजीरिया, सूडान तक की घटनाओं का प्रत्यक्ष विवरण स्वयं देख, सुन सकते हैं। उस पर हमारे बौद्धिकों की प्रस्थापनाओं की परवाह नहीं करते। इसलिए और भी, क्योंकि प्रायः वे तथ्यों के बजाए अपने रेडीमेड निष्कर्ष थोपने के आग्रही रहे हैं। यह पहले चलता रहा, पर आज संभव नहीं रह गया है।