राजनीति
तर्कसंगत चर्चा- सोशल मीडिया के आने से मिथ्या समाचार बढ़ा है या घटा है?

आशुचित्र- तर्कसंगत वार्ता से परिचय। अल्प में आज के मुख्य मुद्दे पर प्रकाश डालने का प्रयास।

हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहाँ ध्यान का अभाव है, ऐसे में समसामायिक गतिविधियों पर छोटे-छोटे विचार और अवलोकनों को साझा करना उचित है जिसे समझने में पाठकों को अधिक समय भी नहीं लगेगा।

मैं रोज़गार के लिए अर्थशास्त्र पढ़ता हूँ और इसलिए नैसर्गिक रूप से मैं अधिकांश परिस्थितियों को तर्क, लाभ और रणनीतिक नज़रिये से देखता हूँ। और इसलिए यह तर्कसंगत चर्चा है। आइए देखें।

एक प्रश्न है जिसपर मैंने कई बार विचार किया- सोशल मीडिया के दौर में परंपरागत मीडिया ज़्यादा मिथ्या समाचार फैलाती है या कम? यह मुख्य रूप से एक प्रयोगसिद्ध प्रश्न है। इसके दो प्रभाव हैं।

सोशल मीडिया से पूर्व कई समाचार पत्रों द्वारा बनाई गई खबरें बिना चुनौती के निकल जाया करती थीं। सोशल मीडिया के आने के बाद कई ‘प्रसिद्ध’ लोगों का खुलासा हुआ कि वे गलत समाचार फैला रहे थे और इसलिए अपनी गरिमा बनाए रखने के लिए उनपर सही समाचार प्रसारित करने का दबाव बना।

लेकिन फिर सोशल मीडिया और इंटरनेट ने पाठकों के समक्ष कई सारे विकल्प प्रस्तुत किए। कई कट्टर अखबारों को यह महंगा पड़ा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की किसी सफल योजना का उल्लेख एक मोदी-विरोधी पाठक को उस समाचार-पत्र से दूसरे मोदी-विरोधी समाचार-पत्र की ओर मोड़ देगा।

दूसरी ओर झूठ बोलना महंगा नहीं पड़ेगा क्योंकि जो लोग उस झूठ को उजागर कर रहे हैं, वे वैसै भी उस समाचार-पत्र को नहीं पढ़ते हैं।

विडंबना यह है कि सोशल मीडिया से पूर्व सच बोलने से पाठक खोने का खतरा नहीं था। निष्कर्ष यह निकलता है कि सोशल मीडिया के युग में समाचार-पत्र अधिक झूठ बोलने लगे हैं।

संभवतः हमें जाने-माने टेलीविज़न न्यूज़ एंकरों से पूछना चाहिए कि उनके द्वारा मिथ्या समाचार फैलाया जाना बढ़ा है यह उतना ही रहा है।