राजनीति
तर्कसंगत चर्चा- गठबंधन हो या न हो, केजरीवाल को दोनों ओर से लाभ

आशुचित्र- अगर गठबंधन होता है तो वे जीतेंगे। अगर नहीं तो वे कांग्रेस के खाते कुछ मत अर्जित कर लेंगे, भले ही खुद का कुछ बेस खोना पड़े।

अरविंद केजरीवाल द्वारा कांग्रेस नेतृत्व को बार-बार गठबंधन का प्रस्ताव दिया जाना हास्यास्पद और विडंबनापूर्ण दोनों ही है। एक ऐसा व्यक्ति जिसने भारतीय राजनीति को भ्रष्टाचार मुक्त करने के लिए राजनीति अपनाई हो, उसके द्वारा ऐसा निवेदन किया जाना त्रासद और हास्यास्पद है।

वे लगातार यह कहते आ रहे हैं कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह देश के लिए घातक हैं इसलिए वे राष्ट्र के लिए कुछ समझौता कर रहे हैं। और वे भोली सी सूरत भी बनाए रखते हैं जो किसी को भी उन्हें वोट देने के लिए प्रेरित कर सकता है। लेकिन खुद का मज़ाक उड़वाने के पीछे एक सोची-समझी रणनीति भी हो सकती है।

यह क्या हो सकता है?

संभवतः मेरे पास एक कारण है। कई उम्मीदवारों के खड़े होने के कारण ऐसे उम्मीदवार भी जीत जाते हैं जो आमने-सामने के मुकाबले में हारते। और इसी कारण यह कहना गलत नहीं होगा कि अगर आप और कांग्रेस साथ होकर चुनाव लड़ेंगे तो भाजपा के प्रदर्शन को नुकसान पहुँचेगा। पूर्व में भी कांग्रेस ने खुद की कीमत पर क्षेत्रीय पार्टियों को बढ़ने दिया और ऐसे गठबंधन को प्रोत्साहित किया है।

लेकिन आप ऐसे क्षेत्र में खतरा है जहाँ कांग्रेस पारंपरिक रूप से मज़बूत रही है- नई दिल्ली। इसलिए आप से संधि करना कांग्रेस के लिए लाभदायक नहीं होगा, भले ही इससे अल्प समय के लिए भाजपा को नुकसान पहुँचाया जा सकता है। और यह बात केजरीवाल जानते हैं। वे इस समस्या को सुलझाने के नाम पर थोड़े मत अर्जित करना चाहते हैं।

जब कांग्रेस और आप के मतादात यह बात समझेंगे कि इन पार्टियों को वोट करने से भाजपा को लाभ मिलेगा तो वे प्रयास करेंगे कि इन दोनों में से एक ही पार्टी को वोट किया जाए। यह लगभग वैसा ही है जैसा 2015 के दिल्ली विधान सभा चुनावों में हुआ था। केजरीवाल के ये निवेदन संभवतः मतदाताओं को रिझाने के लिए है ताकि वे मिलकर किसी एक पार्टी को वोट दें।

तब क्या जब वे मिलकर कांग्रेस को वोट देते हैं? केजरीवाल पूरे बसे को खोने का जोखिम क्यों उठाएँगे? पहला यह कि केजरीवाल जानते हैं कि उनके मतदाता आप के कट्टर समर्थक हैं। दूसरा यह कि इस प्रकार की सोच रखने के लिए चतुरता की आवश्यकता होती है।

मेरा अनुमान है कि ऐसी परिस्थितियों में जिस पार्टी का नेता अपने पार्टी समर्थकों की चतुरता पर संदेह करता है, वह ऐसे गठबंधन का प्रयास करता है। अगर गठबंधन होता है तो वे जीतेंगे। अगर नहीं तो वे कांग्रेस के खाते कुछ मत अर्जित कर लेंगे, भले ही खुद का कुछ बेस खोना पड़े।

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