राजनीति
राजस्थान चुनाव- करणी सेना का क्या प्रभाव होगा राजपूत वोटों पर?

आशुचित्र- पद्मावत के लगभग एक साल बाद, राजस्थान की भूमि पर राजपूत करणी सेना का कितना बल है?

इस वर्ष की शुरुआत में एक फिल्म के कारण राजस्थान में कोलाहल था। जिस बात की पहले कानाफूसी हो रही थी, बाद में इसे ऊँची आवाज़ में भी कहा जा रहा था कि पद्मावत ने राजपूत मान को आहत किया है। सड़को पर प्रदर्शन से अभिनेता-अभिनेत्री को धमकी देने तक राजपूतों ने उत्तर और पश्चिमी भारत में अपना आक्रोश व्यक्त किया।

राज्य में राजपूतों की जनसंख्या 10-12 प्रतिशत है और 200 में से कम-से-कम 30 संवैधानिक क्षेत्रों में तो उनका वर्चस्व है, विशेषकर मारवाड़ क्षेत्र में। पारंपरिक रूप से वे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के समर्थक रहे हैं और जाट कांग्रेस को वोट देने के लिए जाने जाते हैं। इसलिए किसी भी चुनाव में राजपूतों का रुझान दोनों प्रमुख पार्टियों के लिए महत्त्वपूर्ण माना जाता है। पिछल दो वर्षों में प्रदेश की गतिविधियों को देखते हुए राजपूत वोट की महत्ता और बढ़ जाती है।

2018 की राजनीति को परिभाषित करने वाली सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से एक था कि कम जानी जाने वाली करणी सेना पूरे घटनाक्रम में मुख्य भूमिका में आ गई। राजस्थान चुनावों से पहले यह देखना आवश्यक है कि क्या पद्मावत विरोध, करणी सेना और राजपुत असंतोष का राज्य में कोई प्रभाव है।

कमलप्रीत सिंह ने करणी सेना पर एक विस्तृत लेख लिखा था। करणी सेना 2006 में स्थापित हुई थी जब इसके वर्तमान नेता लोकेंद्र सिंह कलवी ने भाजपा छोड़ दी थी। गिल लिखते हैं कि करणी सेना के गठन का उद्देश्य था, “राजपूतों को प्रणाली के विरुद्ध जागरुक करना जो कि शतकों से उनके विरुद्ध हो गई थी।”

जनवरी में, कलवी ही इस घटना के प्रणेता थे, वे पद्मावत का प्रयोग राजनीतिक लाभों के लिए करना चाहते थे। फरवरी में कलवी ने अजमेर, अलवार और मांडलगढ़ के बाईपोल चुनाव में कांग्रेस की जीत मनाई थी और कहा था कि भाजपा ने पद्मावत के प्रतिबंध पर कड़े कदम न उठाकर अपने लिए फजीहत कर ली है। चुनाव के आसपास तलवी ने घोषणा की थी कि वो और 50 लाख करणी सैनिक इन चुनावों में भाजपा को हराने के लिए संकल्पबद्ध हैं। वे राज्य भर के स्वाभिमान सम्मेलनों में तीव्र ध्वनि में भाजपा के विरुद्ध भेजते हैं और पद्मावत विरोध से राजपूत आरक्षण की माँग तक भाजपा के अल्प समर्थन की निंदा करते हैं।

दो सप्ताह पूर्व करणी सेना मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के संवैधानिक क्षेत्र झालरापाटन तक यह लड़ाई लेकर गई। मानवेंद्र सिंह जो भाजपा छोड़कर कांग्रेस में सम्मिलित हो गए हैं, के समर्थन में खड़े होकर उन्होंने कहा कि झालरापाटन में यह लड़ाई एक सच्चे राजपूत और एक गैर-राजपूत के बीच है।

स्वराज्य  ने जन की बात  के राजनीतिक समीक्षक और विश्लेषक प्रदीप भंडारी से बात करके यह जानने का प्रयास किया कि करणी सेना का राजपूत समुदाय के मत पर किता प्रभाव होगा। भंडारी का कहना था कि सेना की ताकत मीडिया प्रचार (हाईप) में है और ज़मीनी स्तर पर वे इतने प्रभावी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि जहाँ करणी सेना ने एक प्रकार की सामाजिक गति प्रदान की है, लेकिन यह आवश्यक नहीं कि इसका प्रभाव राजपूत समुदाय के मत स्वरूप पड़े।

भंडारी ने कहा कि भाजपा के विरुद्ध राजपूत समुदाय का जो भी असंतोष है, वह संवैधानिक क्षेत्रों के स्तर पर देखा जा सकता है और प्रदेश भर में इसका विस्तार नहीं है। राज्य में राजपूत को गति देने का सबसे बड़ा मुद्दा नागौर के रावण राजपूर, आनंद पाल सिंह की हत्या है। एक जानेमाने बदमाश सिंह की मृत्यु पर सीबीआई पूछताछ की माँग करते हुए राजपूत सड़कों पर उतर आए थे क्योंकि उन्हें लगा था कि यह एक बनावटी एनकाउंटर था। मारवाड़ के कुछ संवैधानिक क्षेत्रों, विशेषकर कि नागौर और बाड़मेर में आनंद पाल सिंह की मौत का असर हो सकता है लेकिन औरों, विशेषकर की युवाओं के लिए यह विवादास्पद विषय ही है।

दूसरा मुद्दा जो चुनावों के साथ गरमा गया है, वह है राजपूत आरक्षण की माँग। गिरिराज सिंह लोतवाड़ा के नेतृत्व में राजपूत संघर्ष समिति की राजस्थान के कई शहरों में बैठक हुई थी जिसके माध्यम से वे अपनी माँग उठा सकें।

कल राजस्थान मतदान करने जा रहा है, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि राजपूत कारक का क्या प्रभाव होता है और 2019 के महासमर के लिए यह क्या संदेश छोड़ता है।

प्रत्याशा रथ सामाजिक विकास और राजनीतिक क्षेत्र में कार्य कर रही एक सलाहकार हैं। वे @pratyasharath से ट्वीट करती हैं।