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हंसराज खान भूमि पूजन के दिन क्यों बने हंसराज राम, राजस्थान के गाँव में “घर वापसी”

फोन पर कुछ मिनट बात करने के बाद उत्साहित हंसराज राम ने वॉट्सैप वीडियो कॉल का निवेदन किया। “मैं अपनी पत्नी, बच्चे, घर और हमारे मंदिर में विराजे देवताओं को दिखाना चाहता हूँ।”, 60 वर्षीय हंसराज ने कहा।

उनके 25 वर्षीय पोते मग्गा राम ने फोन पकड़ा हुआ था जब हंसराज अपनी राजस्थानी पगड़ी, अपनी कलाई पर बंधी राखी, चूड़ा और अपनी पत्नी के गले का हार, अपने चचेरे भाई की घनी मूँछें और अपने मंदिर में विराजी देवी सरस्वती एवं भगवान परशुराम को दिखा रहे थे। वे अपने चचेरे भाई के घर ले जाकर छोटे-से मंदिर के प्रवेश पर लिखा हुआ “शुभ लाभ” भी दिखाते हैं।

हंसराज के चचेरे भाई के घर का मंदिर

“हमारे नाम ही सिर्फ मुस्लिमों के थे लेकिन हम किसी भी तरह यहाँ के हिंदुओं से अलग नहीं थे।”, यह कहते-कहते वे हँस देते हैं। सभी पहचान-पत्रों जैसे आधार कार्ड, बैंक पासबुक, राशन रार्ड, भामाशाह कार्ड, मनरेगा कार्ड और खेत के कागज़ों पर हंसराज राम का नाम हंसराज खान ही है और जहाँ धर्म का खाना होता है, वहाँ मुस्लिम लिखा गया है।

5 अगस्त को जब राम मंदिर का भूमि पूजन हुआ तो उन्होंने इसे भी बदल दिया। हंसराज खान ने अपने परिवार के साथ “घर वापसी” करके हिंदू धर्म को “पुनः” अपना लिया। (स्थानीय मीडिया रिपोर्ट यहाँ और यहाँ देखें। चित्र नीचे संलग्न।)

उनका परिवार “कंचन” समाज के उन 40 मुस्लिम परिवारों में से एक था जिन्होंने राजस्थान के बाड़मेर जिले की पायला कल्ला पंचायत के मोतीसरा गाँव में एक हवन आयोजित कर जनेऊ धारण किया। इस गाँव में दूसरी जातियों के मुस्लिम परिवार भी हैं लेकिन वे इस आयोजन में सम्मिलित नहीं हुए।

हंसराज का कहना है कि पहचान-पत्रों पर खान उपनाम के अलावा 40 कंचन मुसलमान परिवारों और क्षेत्र के लगभग 200 कंचन हिंदू परिवारों में कोई सांस्कृतिक या पारंपरिक अंतर नहीं है।

सिर्फ मुस्लिम विवाह की जगह निकाह करते थे और दुल्हे के सर पर मौड़ को थोड़ा अलग तरीके से बांधते थे। मौड़ एक कपड़ा होता है जिसे दुल्हे के मुख के एक तरफ बांधा जाता है ताकि सीधे दुल्हन का चेहरा न दिखे, उन्होंने समझाया।

इस समारोह के भागीदार बने उनके पड़ोसी गोविंद राठौड़ के अनुसार गाँव में लगभग 600 परिवार हैं, अधिकांश खत्री या ब्राह्मण हैं। “ये परिवार बस नाम से मुस्लिम थे।”, दोहराते हुए वे कहते हैं कि पाकिस्तान सीमा पर स्थित इस गाँव में हमेशा सांप्रदायिक सद्भाव बना रहा है।

इस आयोजन के पीछे गोविंद किसी विशेष संस्था या व्यक्ति का नाम नहीं बताते हैं और कहते हैं कि यह गाँव के ही सामूहिक प्रयास के तहत हुआ है।

अपने चचेरे भाइयों के साथ हंसराज (बाएँ)

कंचन समाज मुख्य रूप से शाकाहारी है। हंसराज ने बताया कि मांस खाने वाले या शराब पीने वाले किसी व्यक्ति को वे अपने घर में घुसने नहीं देते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि उनके शाकाहारी होने का संबंध हिंदू धर्म से नहीं है। “अधिकांश मांसाहारी हिंदू ही होते हैं। मांस के कारण हम हिंदुओं से अलग नहीं थे। मेरे समाज के कुछ लोग भी मांस खाते हैं।”, हंसराज ने कहा।

यह जाति, मृतकों को दफनाती ही है, चाहे वे किसी भी धर्म को मानते हों। एक ही कब्रिस्तान है। हंसराज ने बताया कि किसी मुस्लिम परिवार को नमाज़ पढ़नी नहीं आती। “सुन्नत हमने काफी वर्षों पहले छोड़ दी थी।”, उन्होंने आगे कहा।

उनके बेटों का नाम केसर और मुंगेर है, पत्नी का नाम सूफी व बेटी का सोनू है। “कंचन हिंदुओं के साथ हमारा रोटे-बेटी का संबंध है।”, उन्होंने बताया।

हंसराज की पत्नी सूफी

उनके पोते मग्गा के अनुसार इन 40 परिवारों के “40-50 प्रतिशत” वयस्क पुरुषों का खतना हुआ है। लेकिन किशोरों में यह संख्या काफी कम है। “संभवतः 10 प्रतिशत”, 12 वीं तक पढ़कर खेती में परिवार की सहायता करने वाले मग्गा ने कहा।

“इस पीढ़ी से उस प्रथा का भी अंत हो गया।”, मग्गा ने आगे कहा लेकिन इसका कोई विशेष कारण नहीं बताया। हंसराज ने बताया क्योंकि “यह समाज दशक भर से घर वापसी का विचार कर रहा था।”

हंसराज का घर

उन्होंने बताया कि इस जाति के लोग आसपास के आठ गाँवों में बसे हैं और उनमें से पाँच गाँवों के मुस्लिम घर वापस कर चुके हैं। जब उनसे पूछा गया कि इतने वर्षों तक उन्होंने विचार क्यों किया तो उन्होंने बताया कि वे यह नहीं सोच पा रहे थे कि प्रक्रिया कैसी हो। “कोई मार्गदर्शन नहीं था।”, उन्होंने कहा।

हंसराज ने बताया कि ये परिवार “हमेशा से जानते” थे कि मुगल शासन में उन्हें “ज़बरदस्ती” मुस्लिम बनाया गया था, “संभवतः अकबर के अधीन”। हालाँकि हाल ही में ग्रामीणों ने औपचारिक रूप से घर वापसी का प्रस्ताव रखा।

“जब उन्होंने भूमि पूजन का दिन तय किया तो मेरा हृदय उल्लास से भर गया और सहसा ही मैंने हाथ जोड़ लिए। मैंने कहा, बस यही चाहिए था।”, हंसराज ने बताया। अपने धर्मांतरण को पूरा करने के लिए ये परिवार जिल मजिस्ट्रेट को जल्द ही नाम बदलने के आवेदन देंगे, उन्होंने कहा।

वार्तालाप की समाप्ति की ओर हंसराज ने एक और निवेदन किया, “कृपया जाति का नाम सही से लिखिएगा, कंचन नाम है, ढाढी नहीं, कुछ समाचार-पत्रों ने गलत लिख दिया है।… कंचन मूल रूप से जाट हैं जो गाँवों की पारिवारिक वंशावली का रिकॉर्ड रखते हैं। ढाढी गाने-बजाने वाले होते हैं।”

“मेरा पोता आपको हमारी जाति के गोत्रों की सूची भेजेगा। कृपया उसे भी प्रकाशित कीजिएगा।”, कहकर उन्होंने बात समाप्त की।

सभी चित्र मग्गा द्वारा खींचे और भेजे गए।

स्वाति गोयल शर्मा स्वराज्य में वरिष्ठ संपादक हैं और वे @swati_gs के माध्यम से ट्वीट करती हैं।