राजनीति
राहुल गांधी की न्यूनतम आय योजना का साथ नहीं दे सकेगा वित्तीय गणित

आशुचित्र

  • राहुल गांधी का आय गारंटी का प्रस्ताव सिर्फ महंगा ही नहीं पड़ेगा, बल्कि उनके अन्य वादों के साथ उनका वित्त प्रबंधन भी नहीं हो पाएगा।
  • इस आय योजना के पहले तीन प्रश्नों का उत्तर मिलना आवश्यक है।

इस बात पर संदेह है कि कल (28 जनवरी को) राहुल गांधी ने गरीबों को न्यूनतम आय की बात इसलिए कही क्योंकि उन्हें लगता है कि 1 फरवरी को अपने अंतिम बजट में एनडीए सरकार इस प्रकार की किसी योजना की घोषणा कर सकती है।

राहुल ने कहा, “कांग्रेस ने एक ऐतिहासिक फैसला लेने का निर्णय लिया है- न्यूनतम आय की गारंटी देने का। इसका मतलब यह कि भारत के हर गरीब की एक न्यूनतम आय होगी। इसका मतलब भारत मेें कोई भूखा, कोई गरीब नहीं रहेगा।”

मध्य प्रदेश की रैली में किया गया यह वादा संभवतः उन खाली वादों में से है जो नेता आम तौर पर चुनावों के दौरान करते हैं। किसी विवरण की आवश्यकता नहीं है। इसका विवरण चुनाव पत्र में मिलेगा जो बाद में सार्वजनिक किया जाएगा, जब कोई इस बात पर ध्यान नहीं देगा कि इसके लिए निधि कहाँ से आएगी।

पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने इसकी स्पष्टता में चुटकी भर जानकारी जोड़ते हुए कहा है कि निश्चित आय की योजना लक्षित होगी। इसका मतलब कांग्रेस की योजना सबके लिए मूल आय के उस विचार से कोसों दूर है जिसकी बात 2017 में मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमणियन ने आर्थिक सर्वेक्षण में की थी।

सीएनबीसी टीवी18 पर एक साक्षात्कार में चिदंबरम बारीकियों को लेकर अस्पष्ट थे और उन्होंने कुछ मनगढ़ंत संख्याओं का उल्लेख किया था। “मान लें कि 20 प्रतिशत भारत गरीब है और हमें एक तरीका निकालना होगा जिससे इन 20 प्रतिशत परिवारों को न्यूनतम आय पहुँचाई जा सके, जिससे उनके पास पर्याप्त भोजन, कपड़े, आश्रय है, वे अपने बच्चों को विद्यालय भेज सकें व स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ ले सकें। एक सभ्य समाज में यह न्यूनतम आवश्यकता है।”

इसका गणित तब बैठाया जा सकता है जब सरकार अन्य सब्सिडी योजनाओं और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार सुरक्षा अधिनियम (मनरेगा) को झटककर इसके लिए निधि एकत्रित करे।

आय योजना के वित्तीय ढाँचे को लेकर सुनिश्चित होने के लिए ये प्रश्न पूछे जाने आवश्यक हैं।

पहला, किसे इसका लाभ उठाने योग्य समझा जाएगा? हमें पहले गरीबों को लक्षित करने के लिए एक तरीका निकालना होगा। जो गरीबी रेखा से नीचे हैं (बीपीएल कार्ड धारक), वे निश्चित ही लाभार्थी होंगे जिनकी संख्या 2011 में वर्ल्ड बैंक के अनुसार 27.6 करोड़ से अधिक थी। 2015 में यह संख्या 17.2 करोड़ हो गई थी।

अगर चिदंबरम मानते हैं कि 20 प्रतिशत भारत गरीब है, इसका मतलब कि पाँच करोड़ परिवार गरीब हैं- यानि कि 25 करोड़ लोग। सुरेश तेंदुलकर की गरीबी रेखा के अनुसार गरीबी से ऊपर उठकर जीवन जीने के लिए प्रति व्यक्ति को साल में न्यूनतम 7,620 रुपये की आवश्यकता होती है। लेकिन यह रेखा कई सालों पहले तय की थी तो वर्तमान के अनुसार इसे 10,000 रुपये मान लेते हैं। 25 करोड़ लोगों के लिए साल में 2.5 लाख करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी। 2018-19 की हमारी अनुमानित जीडीपी 188 लाख करोड़ रुपये है, यानि जीडीपी का 1.3 प्रतिशत इस योजना में लगाया जाएगा। राजकोष, जिसकी रक्षा करने का वादा चिदंबरम ने किया था, को बर्बाद किए बिना यह किया जाना असंभव है।

दूसरा, समय-सीमा। 2.5 करोड़ लाख की राशि एक साल में दिए जाने योग्य नहीं है, यदि पाँच सालों में इसे चरणबद्ध तरीके से विकसित किया जाए जिसमें 1 करोड़ परिवारों को प्रतिवर्ष लक्षित किया जाए और 2024 तक जीडीपी इतनी विकसित हो जाएगी कि सभी पाँच करोड़ परिवारों का भरन-पोषण कर सके। 10 प्रतिशत की वृद्धि के साथ भारत की जीडीपी 2024 में 300 लाख करोड़ रुपए हो जाएगी। तब यह 2.5 लाख करोड़ रुपए का भार उठा सकेगी, यदि दिए जाने वाली राशि में कोई ज़्यादा अंतर नहीं हो तो। अन्य शब्दों में आप सही मायनों में लोगों को कम प्रदान करेंगे और वादे को प्रभावशाली रूप से पूरा नहीं कर पाएँगे। महंगाई के साख न्यूनतम आय भी जीडीपी के अनुपात में भी बढ़ेगी। तो फिर यह एक मुश्किल वित्तीय संरचना होगी।

तीसरा, क्या अन्य सब्सिडियों को कम किया जाएगा? वर्तमान में खाद्य और खाद सब्सिडी 2.4 लाख करोड़ रुपए की लागत मांगते हैं। कृषि सहायता के लिए कम ब्याज दर को जोड़ लिया जाए तो यह 2.5 लाख करोड़ रुपये का आँकड़ा पार कर जाएगी जो कि आय गारंटी योजना के समतुल्य है।

अगर इस राशि को खाद्य और खाद की सब्सिडी की जगह आय के रूप में दिया जाएगा तो यह उन्हीं चीज़ों का विनाश करना होगा जिसे यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (यूपीए) अपनी बड़ी उपलब्धियों की तरह गिनाता है- खाद्य सुरक्षा अधिनियम, न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि और खेती में कम निवेश। इन सब्सिडियों को हटाना आसान नहीं होगा क्योंकि यह इसके लाभार्थी दूसरे हैं। जहाँ खाद्य मूल्य सब्सिडी शहरी गरीबों के लिए है, वहीं आय गारंटी अधिकतर ग्रामीण गरीबों को दी जाएगी। शहरी मध्यमवर्गीय को आय गारंटी से कोई लाभ नहीं मिलेगा, वहीं खाद्यानों के बढ़ते दाम उसे बहुत भारी पड़ेंगे। और यह भी स्पष्ट है कि शहरी लोगों में इन सब्सिडियों के वापस लिए जाने पर बहुत असंतोष भी फैलेगा, वे विरोध भी करेंगे।

आय गारंटी के लिए अतिरिकित वित्तीय स्रोत मनरेगा का बंद होना भी हो सकता है। इससे हुई बचत से 50,000 करोड़ रुपये प्राप्त होंगे। लेकिन इसका मतलब ययूपीए की एक और उपलब्धि को नष्ट करना होगा जो आंशिक पराजय है। यूपीए-3 मनरेगा और खाद्य सुरक्षा को अपनी उपलब्धियों में नहीं गिना पाएगी।

वास्तविक समस्या यह है कि राहुल गांधी का आय गारंटी का प्रस्ताव सिर्फ महंगा ही नहीं पड़ेगा, बल्कि उनके अन्य वादों के साथ उनका वित्त प्रबंधन भी नहीं हो पाएगा। उदाहरण के तौर पर, राहुल गांधी राष्ट्रव्यापी कृषि कर्ज़माफी की बात कर रहे हैं, अन्यथा वे नरेंद्र मोदी को सोने नहीं देंगे। महंगाई के अनुसार देखें तो जहाँ 2008 में केंद्रीय कर्ज़माफी में 60,000 करोड़ रुपये लगे थे, वर्तमान में इसकी कीमत आसानी से 1.5 लाख करोड़ रुपये होगी। इससे आय सुरक्षा योजना की संभावना पूर्णतः नष्ट हो जाएगी।

इसके साथ अवास्तविक राजनीतिक वादाओं को भी पूरा करना है। उदाहरण के तौर पर जब तेल कीमतें चरम पर थीं तब चिदंबरम ने कहा था कि तेल कीमतों में प्रति लीटर 25 रुपये की कटौती की जा सकती है और यदि ऐसा किया जाता है तो इसके लिए कोष से 3 लाख करोड़ रुपये देने होंगे। जो आय सुरक्षा योजना की सभी संभावनाओं को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है। यदि मात्र पेट्रोल की कीमतों में ही कटौती की जाए और डीज़ल पर ज़्यादा छूट न हो, तब भी कम से कम 1.5 लाख करोड़ की कोषीय सहायता की आवश्यकता होगी। और यह वित्तीय रूप से गैर-ज़िम्मेदाराना होगा।

नरेंद्र मोदी पर ऐसे वादे करने का आरोप लगाया जाता है जो पूरे नहीं किए जाते। यह अवस्था कांग्रेस के लिए अधिक सटीक बैठती है और सत्ता में लौटने की इसकी बेचैनी को स्पष्ट रूप से व्यक्त करती है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।