राजनीति
राहुल गाँधी ने क्यों की ISIS को जायज़ ठहराने की कोशिश?

प्रसंग
  • वैश्विक इस्लामिक आतंकवाद आज बौद्धिक, सामाजिक और राजनीतिक धंधा है, न कि इसमें विश्वास रखने वाले बेरोजगार और अशिक्षित इस्लामवादियों की विचारधारा

हैम्बर्ग, जर्मनी के बूसेरियस समर स्कूल में कल अपने एक भाषण में राहुल गांधी ने कहा कि “21वीं शताब्दी में लोगों को यदि आप कोई नज़रिया नहीं देंगे तो कोई और देगा और यह आबादी के एक बड़े हिस्से को विकास प्रक्रिया से दूर रखने के लिए खतरा है।” अपनी बात को जारी रखते हुए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए रोजगार पर तवज्जो न देकर विद्रोह के लिए रास्ता तैयार कर दिया है। उन्होंने अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए आतंकी समूह, इस्लामिक स्टेट ऑफ ईराक एंड सीरिया (आईएसआईएस), की उत्पत्ति का उदाहरण तक दे डाला।

हालाँकि उन्होंने मोदी सरकार द्वारा विकास में अल्पसंख्यकों को तवज्जो न देने वाले अपने दावे का कोई स्रोत नहीं दिया जिससे उनका यह दावा अपने आप में संदिग्ध लगता है, और एक अलग लेख का विषय है।

यहाँ पर चिंता का विषय यह है कि राहुल गांधी का यह समझते हैं कि आईएसआईएस का जन्म इसलिए हुआ क्योंकि इसके सदस्यों को विकास प्रक्रिया में आने का मौका नहीं मिला। यहाँ भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी के अध्यक्ष ने इस्लामिक आतंकवाद को जायज ठहराने की कोशिश की है।

ऐसे में वे सवालों के घेरे में आ सकते हैं।

क्या आतंकवाद वास्तव में उन लोगों द्वारा फैलाया जातक है जिनके पास वास्तव में खोने के लिए कुछ भी नहीं होता है? आतंकवाद को नास्तिकता के रूप में देखना और समझना ज्यादा उचित है। लेकिन आतंकवाद वास्तव में स्पष्ट तरीकों, रणनीतियों और उद्देश्यों के साथ राजनीतिक है। यही कारण है कि आतंकवाद द्वारा गरीबों, अशिक्षितों और बेरोजगारों को पनाह दी जाती है, कट्टरपंथी इस्लामवादी या नक्सल विचारधाराएं केवल अव्यवहारिक ही नहीं बल्कि कपटपूर्ण भी हैं। ऐसा माना जाता है की ऐसे लोगो को बरगलाना आसान है

इसलिए शिक्षा की कमी इसका एक कारक हो सकता है। लेकिन, दोनों मामलों में, विचारधाराएं केवल स्वच्छंदतावाद से ऊपर उठ पाई हैं और बौद्धिक न्यायसंगत लक्ष्य बन गई हैं। शिक्षा अब उग्रवाद के लिए बाधा नहीं है लेकिन शायद यह इंसान को बौद्धिक तथा सामान्य बनाने में सक्षम है, जिसकी मांग एक चरमपंथी विचारधारा करती है।

कुछ प्रकार के राज्य शिक्षा के कई पाठ्यक्रमों और चरमपंथी व्यवहार का अनुसरण जानबूझकर करते हुए नैतिकता को ताक पर रख देते हैं । वास्तव में, सबसे कुख्यात आतंकवादियों में से कुछ को सरसरी निगाह से देखिए जिससे यह पता चल जाएगा कि इस्लामवादी कट्टरपंथीकरण को रोकने के लिए शिक्षा की कोई भूमिका ही नहीं है। ओसामा बिन लादेन पेशे से केमिकल इंजीनियर था। आईएसआईएस का नेता, अबू बकर अल बगदादी ने इस्लामी पाठ्यक्रम में पीएचडी की हुई है। 9/11 का मास्टरमाइंड, अयमान अल-जवाहिरी और चैपमैन कैंप आत्मघाती हमलावर, हुमाम-खलील अल-बालावी, दोनों डॉक्टर थे। ‘टाइम्स स्क्वायर’ पर बम बरसाने वाला, पाकिस्तान निवासी फैसल शेहजाद, एमबीए था और डेनियल पर्ल का हत्यारा उमर सईद शेख, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में सांख्यिकी का अध्ययन कर रहा था।

2016 में, जब आईएसआईएस तबाही के चरम पर था तब आईएसआईएस के लीक किए गए आंतरिक अभिलेखों के आधार पर एक विश्व बैंक के अध्ययन में पाया गया कि इस समूह में भर्ती लोग, उच्च शिक्षित और आत्मघाती हमलावरों के साथ तुलनात्मक रूप से अमीर थे। इस संगठन के 3800 से भी ज्यादा लोगों में सिर्फ 15 प्रतिशत से भी कम ने  हाईस्कूल से पहले स्कूल छोड दिया था । रिपोर्ट से निष्कर्ष निकाला गया है कि ‘हिंसक चरमपंथ में भर्ती होने के लिए असमानता और गरीबी के आधार पर भर्तियाँ नहीं हुई थीं ।

शिक्षा और धन विशेषाधिकार लाता है, जो लोगों को आर्थिक जीविका की चिंताओं से आजाद करता है और उन्हे किसी भी आतंकवादी चरमपंथी संगठन के लिए पूरी तरह से समर्पित और प्रतिबद्ध होने की छूट प्रदान करता है। यहाँ कोबाद गांधी और अनुराधा गांधी के ही मामले को देखे सकते हैं। दोनों बहुत ही धनी और शिक्षित थे और महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में सशस्त्र माओवादी संघर्ष का नेतृत्व करने के लिए गए।

भारत में इस्लामिक आतंकवाद और नक्सली गतिविधियों को रोकना बेहद जटिल काम है और इन्हें सैनिकों की बजाय पेशेवर लोगों के बौद्धिक या खूफिया तंत्र द्वारा मनाया या समझाया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, वैश्विक स्तर पर कश्मीर में हो रहा इस्लामिक आंदोलन उससे बिल्कुल अलग नहीं है। गरीबी या जागरूकता की कमी का ऐसी राजनीति से कोई लेना देना नहीं। वास्तव में, जागरूकता की तीव्र भावना और लक्ष्यों की बौद्धिक वैधता आतंकवादी गतिविधियों की दिशा में अधिक शिक्षित युवाओं को प्रेरित कर सकती है। जरा सोचिये कि राहुल गांधी जानबूझ कर या अनजाने में क्या कर रहे हैं, वह ‘भारत तेरे तुकड़े होंगे’ नारे को न्यायसंगत ठहरा रहे हैं।

जैसा कि 2010 की शुरुआत में ‘इकोनॉमिस्ट’ की एक रिपोर्ट में कहा गया था, “कलम तलवार से ज्यादा ताकतवर होती है।”

मई 2018 को इस भाग का एक पूर्व संस्करण ‘मुझे मत बताओ कि यह’ शिक्षा और अवसर की कमी है जो आतंकवादियों को बनाता है’ के रूप में प्रकाशित किया गया था ।

प्रत्याशा राथ सामाजिक विकास और राजनीतिक क्षेत्र के सलाहकार हैं।