राजनीति
एनआरसी का प्रकाशन पर्याप्त नहीं, असली चुनौती आगे है

प्रसंग
  • एनआरसी अद्यतन प्रक्रिया को इसके तार्किक निष्कर्ष और बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों और भारत में मौजूद अन्य सभी देशों के लोगों को पहचानने, मताघिकार से वंचित करने और जहां भी संभव हो, निर्वासित या उनके देश में छोड़ने की आवश्यकता है।

आज सुबह असम के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) का अंतिम मसौदा आखिरकार प्रकाशित किया गया है और 3.29 करोड़ लोगों, जिन्होंने एनआरसी में अपना नाम शामिल करने के लिए आवेदन किया था, में से 40 लाख से अधिक लोगों को इसमें से बाहर कर दिया गया है।बेशक, यह उनके लिए एक अंतिम फैसला नहीं है और उनके पास अपने दावों को जमा करने का एक और मौका है, जिसमें इस वर्ष के अंत से पहले, अंतिम एनआरसी प्रकाशित होने से पहले, एक बार फिर से जांच की जाएगी।

एनआरसी को अपडेट करना, जिसे अंतिम बार 1961 में प्रकाशित किया गया था, बांग्लादेश के लाखों अवैध प्रवासियों, जो कई दशकों से असम में प्रवेश हो रहे है और बस गए हैं, का पता लगाने के लिए एक विशाल और अत्यधिक आवश्यक प्रक्रिया का हिस्सा है। एक बार अंतिम एनआरसी प्रकाशित हो जाएऔर उन सभी दावों(नामों को शामिल करने के लिए) को खारिज कर दिया जाए, उन सभी को वंचित करने का कार्य जिनके नाम अंतिम एनआरसी में नहीं आते हैं। लेकिन इससे पहले, एक बड़ा निर्णय लेने की जरूरत है: उन लोगों के साथ क्या करना है जिनके नाम अंतिम एनआरसी में नहीं हैं?

यह एक बहुमूल्य प्रश्न है और किसी को दिल्ली से दिसपुर (असम की राजधानी) में इस पर  चर्चा करनी चाहिए। उन सभी के भाग्य के बारे में जो भी निर्णय लिया जाता है, जिनके नाम अंतिम एनआरसी में नहीं आते हैं, इससे बहुत बड़ा अंतरराष्ट्रीय प्रभाव होगा। बांग्लादेश के अवैध प्रवासियों को वापस लेने की संभावना नहीं है क्योंकि इसने इस तथ्य को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है कि इसके लाखों गरीब नागरिक अवैध रूप से उच्च छिद्रपूर्ण भारत-बांग्लादेश सीमा के माध्यम से असम में आ गए हैं। यदि बांग्लादेश अपने नागरिकों को वापस लेने से इंकार कर देता है, तो इन अवैध प्रवासियों के साथ क्या होगा?

कुछ ने सुझाव दिया है कि जिनके नाम एनआरसी में नहीं आते हैं – वे स्पष्ट रूप से वंचित हो जाएंगे और भारत के नागरिकों के रूप में उनके अधिकार (मूल मानवाधिकारों को छोड़कर) खो देंगे – और उनको वर्क परमिट दिए जाएंगे। इस सुझाव को समझने की जरूरत है। इससे पहले लेकिन एक बार फिर, उन्हें देश के सभी हिस्सों में स्थानांतरित किया जाना है। इन अवैध और राज्यविहीन प्रवासियों का बोझ सिर्फ़ असम को ही नहीं सहना चाहिए। विदेशियों की उपस्थिति की समस्या (अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों) केवल अकेले असम की ही समस्या नहीं है यह एक राष्ट्रीय समस्या है। देश के कई हिस्सों, राजस्थान और हरियाणा के शुष्क क्षेत्रों और मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र में कम आबादी वाले जंगल और घाटियां, जहां 40 लाख लोगों को (यह मानते हुए कि एनआरसी से बाहर किए गए लोगों द्वारा दायर किए गए अधिकांश दावों को अभी तक नहीं रखा गया है) आसानी से फैल कर बसा सकते हैं।

लेकिन इसके लिए, केंद्र सरकार को बहुत साहस और राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। विपक्षी, राजनीतिक दलों से विरोध प्रदर्शन करने के लिए बाध्य हैं – सोमवार सुबह संसद में हंगामा सिर्फ एक परेड थी – अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार निकाय, कुछ पश्चिमी देश, कम्युनिस्ट और कई अन्य। लेकिन दिल्ली को इस तरह के विरोधों से इन विदेशियों, जो अवैध रूप से अपने तार्किक निष्कर्ष पर देश में आ गए हैं, की पहचान करने का कार्य नहीं करना चाहिए। अगर उन्हें निर्वासित नहीं किया जा सकता है, तो उन्हें या तो अपने देश में जो भी देश उन्हें चाहिए या जो भी देश की वे मांग कर रहे हैं, वहां से दूर कर दिया जाए या भारत में बिना नागरिकता के रूप में रहने दिया जाए। वे कहाँ रहना चाहते हैं, यह फैसला दिल्ली द्वारा उन सभी राज्यों के परामर्श से तय किया जाएगा, जो उन्हें शरणार्थी बनाने के इच्छुक हैं। जैसा कि पहले बताया गया है, कि यह केवल असम की ही नहीं बल्कि पूरे देश की समस्या है, इसलिए दिल्ली को अन्य राज्यों के साथ मिलकर इसमें हिस्सा लेना चाहिए। यह कार्य आसान नहीं होगा, लेकिन इसे जारी रखने और लाखों अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की मौजूदगी, जिनमें से अधिकांश को हमारी धरती पर नागरिकता दस्तावेज प्राप्त हैं, को सहन करने के लिए कोई बहाना नहीं होना चाहिए।

एनआरसी को अद्यतित और प्रकाशित करने में ऐसी सक्रिय भूमिका निभाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की सराहना की जानी चाहिए। अगर यह सर्वोच्च न्यायालय, जिसने अद्यतन प्रक्रिया का आदेश दिया और पूरी प्रक्रिया के लिए सख्त समय सीमा तय की, के लिए नहीं होता तो असम के लिए एनआरसी शायद कभी प्रकाशित नहीं किया जाता। अब सभी राज्यों को अपनी एनआरसी अपडेट करने के लिए आदेश देना सुप्रीम कोर्ट के लिए अनिवार्य है। एनआरसी अद्यतन प्रक्रिया एक राष्ट्रव्यापी प्रभावी और पूरी तरह से प्रासंगिक बनने वाला होना चाहिए। कारण बहुत आसान है: जिनके नाम अंतिम एनआरसी में नहीं हैं वे असम से बाहर जा सकते हैं, अन्य राज्यों में राशन कार्ड, पासपोर्ट और मतदाता पहचान पत्र जैसे दस्तावेज प्राप्त कर सकते हैं और कपटपूर्वक भारतीय नागरिक बन सकते हैं। संपूर्ण देश के कई राज्यों में हजारों अवैध बांग्लादेशी पहले से ही ऐसा कर चुके हैं और उनकी पहचान करने तथा उनके नाम और अन्य व्यक्तिगत विवरण का आधिकारिक रिकॉर्ड बनाए जाने की आवश्यकता है।

बांग्लादेश (या उस मामले में किसी अन्य देश ) से आकर भारत में रहने वाले सभी अवैध प्रवासियों की  पहचान करने का एकमात्र तरीका 1951 की जनगणना ही है, जो स्वतंत्रता के बाद पहली बार आयोजित की गई थी। एनआरसी में केवल उनके ही नाम शामिल होने चाहिए जो 1951 की जनगणना में थे, और जो साबित कर सकते हैं कि उनके माता-पिता या दादा-दादी के नाम 1951 की जनगणना के आधार पर नागरिकों की सूची में थे।

यह वही है जिसका आवेदन 3.29 करोड़ आवेदकों द्वारा असम में किया गया है। फरवरी 2015 में अद्यतन कार्य शुरू होने के बाद से आवेदकों द्वारा प्रस्तुत लाखों दस्तावेजों की जांच और इन्हें क्रॉस चेक करने के लिए राज्य के कुल 55,000 सरकारी कर्मचारियों द्वारा 3 साल तक कड़ी मेहनत की गई। विरासत आँकडों का प्रकाशन – 1961 एनआरसी जो 1951 की जनगणना पर आधारित था – और आवेदन प्राप्त करने की प्रक्रिया अगस्त 2015 में शुरू हुई। तब तक, पूरे राज्य में 2,500 एनआरसी सेवा केंद्र स्थापित किए गए थे और सरकारी कर्मचारियों ने उन्हें लोगों को नियुक्त किया था। आवेदकों द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज 1961 के विरासत आँकडों से मेल खाते थे। फैमिली ट्री को ट्रेस करके और जटिल विधि का उपयोग करके झूठे अनुरोधों का उपयोग किया गया था। असम ने यह सब सफलतापूर्वक किया है, और इस कार्य को तुरंत देश के अन्य सभी राज्यों में दोहराने की जरूरत है। आखिरकार, पूरे देश के लिए अद्यतन राष्ट्रीय नागरिकों (एनआरसी) को रखने का महत्व अतिरंजित नहीं किया जा सकता।

अगले कुछ दिनों और हफ्तों में, मीडिया में उन लोगों, जिनके नाम एनआरसी से बाहर किए गए हैं, के मामलों पर प्रकाश डालते हुए कई रिपोर्टें होंगी। लेकिन यह प्रक्रिया इतनी विशाल और जटिल है कि इसमें चूक और गलतियाँ होना निश्चित है। लेकिन जैसा कि दिल्ली और दिसपुर द्वारा बार-बार कहा गया है, उन गलतियों को सुधारने की प्रक्रिया अब शुरू होगी, जिनके नाम एनआरसी में नहीं शामिल हैं, उनके पास अपने दावों, जिनकी जाँच इस साल के अंत में अंतिम एनआरसी प्रकाशित होने से पहले बारीकी से की जाएगी, को फिर से जमा करने का मौका है।

दिल्ली और दिसपुर को पूरे एनआरसी अद्यतन प्रक्रिया की सभी निराधार आलोचनाओं और झूठे आरोपों (जैसे ममता बनर्जी द्वारा लगाया गया आरोप) को सहना है और उन्हें बहुत दृढ़ता से अस्वीकार करना है। अवैध प्रवासियों को देश के किसी भी हिस्से में रहने की इजाजत देने का कोई भी मामला नहीं बनाया जा सकता है। यह भली भाँति ज्ञात है कि असम ने आघात पहुँचाया है और लाखों अवैध बांग्लादेशियों की मेजबानी का बोझ उठाया है। आजादी के बाद के दशकों में असम की आबादी में असाधारण वृद्धि हुई है (और इससे पहले भी, लेकिन यह एक ऐसा अध्याय है जिसमें हम नहीं जा रहे हैं) और राज्य के मतदाताओं में परिणामी वृद्धि असम में बांग्लादेशियों की बड़ी उपस्थिति का पर्याप्त प्रमाण प्रदान करती है। यह समस्या इतनी बड़ी है कि असम के स्थानीय लोग अपने ही देश में अल्पसंख्यक बनने की डरावनी संभावना के खतरे में हैं। यह स्पष्ट रूप से अस्वीकार्य है।

इसलिए, एनआरसी अद्यतन की प्रक्रिया को इसके तार्किक निष्कर्ष तक ले जाने की जरूरत है और भारत में मौजूद बांग्लादेश और अन्य सभी देशों के अवैध प्रवासियों की पहचान करने, उन्हें नागरिकता से वंचित करने और जहाँ तक संभव हो, निर्वासित करने या देश छोड़ने के लिए विवश करने की जरूरत है। असम में एनआरसी अद्यतन की आलोचना करने वाले लोग अपने छोटे राजनीतिक और निहित हितों के लिए ऐसा कर रहे हैं और उनकी आलोचनाओं को बहुत दृढ़ता से अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए। आखिरकार, इस तरह के आलोचकों के दिलो-दिमाग में राष्ट्र के बड़े हित नहीं हैं।

जयदीप मजूमदार स्वराज के एक सहयोगी संपादक हैं।