राजनीति
पूर्वांचल की वास्तविकता योगी के कार्यकाल में ‘मिर्ज़ापुर’ की पटकथा से भिन्न होती जा रही

मिर्ज़ापुर वेब सीरीज़ से पूर्वांचल की “वाइल्ड ईस्ट”, “जंगलराज” की छवि प्रस्तुत की गई है। इस वेब सीरीज़ को देखकर ऐसा लगता है जैसे उत्तर प्रदेश के इस पूर्वी क्षेत्र पर बाहुबलियों का राज है, कानून-व्यवस्था एकदम लाचार है।

आज का पूर्वांचल “मिर्ज़ापुर” से काफ़ी अलग है। अभी भी पिछड़ा है। अपराध भी एकदम खत्म नहीं हुए हैं। लेकिन अब बदलाव की बयार यहाँ बह रही है। खासतौर पर मार्च 2017 के बाद यहाँ हुए परिवर्तनों को महसूस भी किया जा सकता है।

इसका एक उदाहरण है उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का देश-विदेश के शिक्षाविदों, विशेषज्ञों, नीति निर्धारकों और राजनेताओं के साथ डीडीयू गोरखपुर विश्वविद्यालय और उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित तीन-दिवसीय मेगा संगोष्ठी में पूर्वांचल के सतत विकास पर गहन मंथन करने की योजना।

10-12 दिसंबर को आयोजित संगोष्ठी का उद्देश्य पूर्वांचल की समस्याओं की पहचान करना है और इसके निवारण के लिए एक ठोस नीतिगत कार्ययोजना का खाका तैयार करना है। यह जमावड़ा वर्तमान सरकार के कार्यों की समीक्षा करने के साथ पूर्वांचल के विकास की दिशा भी तय करेगा।

पूर्वांचल की यह विडंबना रही है कि उपजाऊ भूमि और विशाल प्राकृतिक संसाधनों से लैस होने के बाद भी विकास में यह क्षेत्र उत्तर प्रदेश ही नहीं पूरे देश में पिछड़ा माना जाता रहा है। राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बावजूद भी यह क्षेत्र उपेक्षा का शिकार रहा है।

इस क्षेत्र ने देश को पूर्व में छह प्रधानमंत्री दिए हैं- जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, वीपी सिंह और चंद्रशेखर। प्रदेश के चार मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी, वीपी सिंह, राजनाथ सिंह और वर्तमान में योगी आदित्यनाथ भी इसी क्षेत्र से हैं। लेकिन फिर भी पूर्वांचल पिछड़ा ही रह गया क्योंकि अशिक्षा और जागरूकता की कमी की वजह से यहाँ चुनावी मुद्दा विकास के बजाय जातिगत राजनीति ही रहा है।

2014 के बाद नीतिनिर्धारकों की निगाह इस पिछड़े क्षेत्र की तरफ पड़ी और मार्च 2017 से इन क्षेत्र की किस्मत करवट लेने लगी। पूर्वांचल के विकास को लेकर ज़मीनी स्तर पर काम तेजी से शुरू हुआ। मोदी-योगी की जोड़ी ने इस क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित किया।

इसका एक प्रमुख कारण है कि उत्तर प्रदेश के 28 जिलों से बना यह क्षेत्र लोकसभा के 23 सदस्यों को संसद भेजता है। जो कि केरल (20) और ओडिशा (21) राज्यों की लोकसभा सीटों से अधिक है और आंध्र प्रदेश (24), राजस्थान (25) और गुजरात (26) जैसे राज्यों के निकट है। अगर प्रदेश की राजनीति पर नज़र डालें तो यह क्षेत्र 403 सदस्यों की विधान सभा में 123 विधायक भेजता है। वर्तमान में सत्तारूढ़ भाजपा के 312 विधायक हैं। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2022 में होने वाले हैं।

इस पूर्वी उत्तर प्रदेश को प्रदेश और देश से जोड़ना योगी सरकार की प्रमुख पहल है। पूर्वांचल एक्सप्रेसवे जिसे इस क्षेत्र के विकास की जीवन रेखा के रूप में जाना जा रहा है, इस परियोजना पर तेज़ी से कार्य चल रहा है।

गोरखपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, और आज़मगढ़ जैसे शहरों के बुनियादी ढाँचे को और अधिक मज़बूत बनाने हेतु हज़ारों करोड़ रुपये की विकास की विभिन्न योजनाएँ इन क्षेत्रों में संचालित हैं। एक लिंक रोड पर भी तेज़ी से कार्य जारी है जो गोरखपुर को पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के साथ जोड़ेगा।

योगी ने पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के साथ औद्योगिक गलियारों की घोषणा की है। पूर्वांचल के अछूते इलाकों तक रेल नेटवर्क फैलाने की भी कोशिश जारी है। केंद्र और राज्य दोनों सरकारें हवाई संपर्क सुनिश्चित करने के लिए भी उत्सुक हैं। कुशीनगर में नया अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा बन रहा है, गोरखपुर एयरपोर्ट को उन्नत किया जा रहा है, वहीं आजमगढ़ को संयोजकता प्रदान की जा रही है। अयोध्या में एक नया हवाई अड्डा बनाया जा रहा है।

गोरखपुर, जो कि सीएम योगी का गढ़ है, को क्षेत्र के अन्य हिस्सों को ‘पीएम गंगा ऊर्जा’ योजना के तहत गैस पाइपलाइन ग्रिड से जोड़ा जा रहा है, जिसके कारण औद्योगीकरण को गति मिलने की उम्मीद है। योगी ने अपने गृह क्षेत्र में 10,000 एकड़ में औद्योगीकरण के लिए एक भूमि बैंक के एकत्रीकरण पर भी काम किया है। योगी ने काफी समय से बंद पड़े उर्वरक संयंत्र और दो चीनी मिलों को भी पुनर्जीवित किया है।

यहाँ यह भी उल्लेख किया जाना आवश्यक है कि बुनियादी ढांचे में सुधार और औद्योगीकरण पर जोर कृषि की कीमत पर बिल्कुल नहीं है, जो कि सबसे बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार देता है। ‘मोदी-योगी’ की टीम इस क्षेत्र की उपजाऊ भूमि की विशाल पटरियों को खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों के केंद्र में बदलने के लिए उत्सुक है।

पर्यटन एक और क्षेत्र है जिसे बढ़ावा देने की कोशिश लगातार जारी है। पूर्वांचल पर्यटन सर्किट पर बहुत प्रमुखता से दिखाई नहीं देता, इस तथ्य के बावजूद कि यह कई तीर्थस्थलों का दावा कर सकता है; इनमें से कुछ अयोध्या, श्रावस्ती, गोरक्षनाथ पीठ, कुशीनगर, सारनाथ, विंध्यवासिनी, इलाहाबाद और वाराणसी हैं।

पड़ोसी राज्य, बिहार और देश, नेपाल में भी बैजनाथ, बोधगया और कपिलवस्तु जैसे तीर्थस्थल हैं, जिनमें से कई पूर्वांचल के केंद्रों के साथ-साथ नए सर्किट बन सकते हैं। केंद्र और राज्य सरकारें पूर्वांचल ही नहीं, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी पर्यटन को बढ़ावा देने की योजनाओं को आगे बढ़ा रही हैं।

एमएसएमई सेक्टर को बढ़ावा देने के लिये सस्ते ऋण दिए जा रहे हैं। ‘लोकल’ को बढ़ावा देने के लिये एक जिला, एक उत्पाद जैसी योजना चल रही है। आज पूर्वांचल इंसेफेलाइटिस के अभिशाप से मुक्त हो रहा है। गोरखपुर में एम्स और वाराणसी में देश का सबसे बड़ा कैंसर हॉस्पिटल शुरू हो गया है। स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में काफ़ी कार्य हुए हैं और काफी कार्य तेजी के साथ जारी हैं।

यह प्रश्न वाजिब है कि राजनेता किसी अन्य क्षेत्र के लिए भी ऐसी घोषणाएँ करते हैं। समान दावे किए जाते हैं, समान योजनाएँ बनाई जाती हैं। तो, मोदी-योगी की जोड़ी क्या नया कर रही है?

सबसे पहले मोदी और योगी की विकास की गति से जाति के तत्व को दबाए रखने में राजनीतिक रुचि है। हिंदुत्व की राजनीति की सफलता जातिगत और कोटा-उन्मुख राजनीति की विफलता पर ही निर्भर है और जाति, जैसा कि हमने पहले उल्लेख किया है, पूर्वांचल की राजनीति का अभिशाप है। यह और बात है कि कई शिक्षाविदों ने इसे ‘सोशल इंजीनियरिंग’ कहकर जातिगत राजनीति को सम्मान दिया है। लेकिन नाम कुछ भी हो बुराई तो बुराई ही है।

दूसरा, इस क्षेत्र के कई अन्य प्रमुख राजनेताओं के विपरीत, मोदी-योगी की जोड़ी समाजवाद से मोहित नहीं हैं। हालाँकि मोदी और योगी पूर्णतया बाज़ार व्यवस्था के चैंपियन नहीं हैं, लेकिन साथ ही उन्हें कमांड अर्थव्यवस्था के साथ भी कोई विशेष आकर्षण नहीं है। इसलिए निवेशकों को आकर्षित करने में वे हिचकते नहीं हैं जिसमें बहुराष्ट्रीय निगम (एमएनसी), बड़े कॉरपोरेट घराने शामिल हैं।

आखिरकार यह पहली बार है जब पूर्वांचल में विकास को लेकर राजनीतिक वर्ग गंभीर हुआ है। यह याद किया जा सकता है कि हाल के दिनों में बुंदेलखंड के पिछड़ेपन के बारे में एक बड़ी बात कही गई थी, लेकिन पूर्वांचल किसी भी तरह राजनेताओं का ध्यान आकर्षित नहीं कर सका। यह अब बदल गया है, शायद इसलिए क्योंकि मुख्यमंत्री भी पूर्वांचल से ही हैं। आज का पूर्वांचल “मिर्जापुर” के पूर्वांचल से काफी आगे निकल गया है और अब विकास की नई उड़ान के लिए तैयार है।

महेंद्र कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार रहे है और वर्तमान में डीडीयू गोरखपुर विश्वविद्यालय में राजनीतिक विज्ञान विभाग में सहायक आचार्य हैं।