राजनीति
बंगाल में तुष्टिकरण की उल्टी राजनीति
बंगाल में तुष्टिकरण की उल्टी राजनीति

प्रसंग
  • मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बंगाल में सभी सामुदायिक दुर्गा पूजा कमेटियों को 10,000 रुपए अनुदान देने की घोषणा की है। मुस्लिम धर्मगुरूओं और उनके अनुयायियों ने इसके विरोध में रैली निकाली है।
  • किसी भी तरह से 10,000 रुपये के अनुदान से सामुदायिक दुर्गा पूजा पंडालों को कोई फर्क नहीं पड़ता।

बंगाल में सड़कों पर होने वाले विरोध प्रदर्शन से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का संकट गहरा गया है। ममता बनर्जी द्वारा दुर्गा पूजा पंडालों को दिए जाने वाले अनुदान पर विरोध करते हुए मुस्लिम समुदाय बुधवार को कोलकाता में सड़कों पर उतर आया और इमाम की तनख्वाह  को बढ़ाने की मांग करते हुए बनर्जी पर “बहुसंख्यक तुष्टिकरण” का आरोप लगाया।

लंबे समय से ‘अल्पसंख्यक तुष्टिकरण’ का आरोप झेल रही ममता बनर्जी ने इस मामले को संतुलित करने लिए हिन्दुओं को भी सहायता राशि प्रदान करने की पेशकश की थी। इस साल सितंबर के मध्य में उन्होंने प्रत्येक 28,000 सामुदायिक दुर्गा पूजा पंडालों को 10,000 रुपये का नकद अनुदान देने की घोषणा की थी। लेकिन हिन्दुओं को तुष्ट करने के उनके इस फैसले को कई आलोचनाओं का सामना करना पड़ा और कहा गया कि धार्मिक त्योहार का आयोजिन करने के लिए करदाताओं का पैसा क्यों खर्च किया जाना चाहिए।

बुधवार को पश्चिमी बंगाल की राजधानी कोलकाता में मुस्लिम समुदाय के लोगों ने ऑल इंडिया यूथ माइनॉरिटी फोरम के बैनर तले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर ‘बहुसंख्यक तुष्टीकरण’ का आरोप लगाते हुए दुर्गा पूजा पंडालों को दिए गए अनुदान का विरोध किया। बनर्जी के खिलाफ नारे लगाते हुए – हालांकि उन्होंने ऐसा पहली बार किया है – उन्होंने पूछा कि बार-बार मांग के बावजूद भी इमाम और मुअज्जिनों के तनख्वाह को क्यों नजरअंदाज कर दिया जाता है। जब सन् 2011 में ममता बनर्जी सत्ता में आई थीं तो उन्होंने घोषणा की थी कि इमाम को 2,500 और मुअज्जिन को 1,500 रुपये दिए जाएंगे, लेकिन भाजपा द्वारा दायर की गई एक याचिका के आधार पर कलकत्ता हाई कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार दिया था। लेकिन राज्य सरकार ने वक्फ कोष के माध्यम से इस धनराशि को देने का रास्ता खोज निकाला था।

धर्मगुरूओं सहित समुदाय के कई युवाओं ने ममता बनर्जी पर समुदाय के उत्थान के लिए किए गए अपने वादों को पूरा न करने का आरोप लगाया। उन्होंने मांग की कि कोलकाता के पुलिस आयुक्त पद पर एक मुस्लिम अधिकारी को नियुक्त किया जाए और इसके साथ ही जिले के अन्य वरिष्ठ पदों पर भी मुस्लिम अधिकारियों को नियुक्त किया जाए। बंगाल यूथ माइनॉरिटी फोरम के सचिव मोहम्मद कामरुज़मान ने कहा कि “बंगाल पुलिस में मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व बहुत ही कम है और कई मुस्लिम अधिकारी होने के बावजूद भी उनमें से किसी को अभी तक कोलकाता पुलिस आयुक्त के रूप में नियुक्त नहीं किया गया है। हम चाहते हैं कि इस अन्याय को दूर किया जाए और कोलकाता पुलिस कमिश्नर, जो एक मुस्लिम हैं,  समुदाय को मजबूत आश्वासन का सन्देश दें I

बुधवार को निकाली गई रैली एक प्रतिशोध यात्रा थी, पुलिस ने इस रैली की अनुमति देने से इंकार कर दिया था। प्रदर्शनकारियों ने करीब 1000 मदरसों को वित्त पोषित करने की मांग की थी (इस समय करीब 200 मदरसों को धन दिया जाता है) और वक्फ की उन संपत्तियों को छोड़ने की मांग की जिनपर सरकारी विभागों ने कब्जा कर लिया है या उनपर अतिक्रमण कर लिया गया है। उन्होंने तृणमूल नेतृत्व को चेतावनी दी कि यदि बंगाल में मुसलमानों को नजरअंदाज किया जाता है तो वह इसका खामियाजा भुगतने के लिए तैयार रहे।

कांग्रेस नेता असीम चौधरी ने कहा कि “यह तो होना ही था। दान या अनुदान देने से समुदाय का कल्याण नहीं होता है। इमाम या मुअज्जिन को दिए गए अनुदान से मुस्लिम समुदाय को किसी भी तरह से लाभ नहीं होता है। इसी तरह, दुर्गा पूजा को दिया जाने वाला अनुदान भी अनावश्यक है और सार्वजनिक धन की बर्बादी है। सरकार दुर्गा पूजा के लिये धन क्यों दे, जिस पैसे की कोई जरूरत ही नहीं है? दूरदर्शिता के अभाव वाली नीतियों और तुष्टिकरण की राजनीति ने इस गंभीर परिस्थिति को जन्म दिया है।” भाजपा नेताओं ने भी इसी तरह के बयान दिए हैं।

देर से ही, लेकिन बनर्जी ने मुस्लिमों से जो वादे किए थे उनके पूरा न होने पर समुदाय में असंतोष पैदा हो रहा है। दो हफ्ते पहले, 350 से अधिक मुस्लिम बुद्धिजीवियों, धार्मिक नेताओं और समुदाय के प्रमुख व्यक्तियों ने एक बैठक कर राज्य सरकार पर समुदाय को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया था और मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने सहित कई और मांगे की थीं।

बनर्जी अब अपने करीबी सहयोगियों को लेकर असमंजस में हैं। अगर वह मुस्लिमों की मांगों को पूरा करती हैं तो उन पर एक बार फिर से मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लग जाएगा। राज्य में भाजपा की मौजूदगी तेजी से बढ़ रही है, इसलिए अल्पसंख्यकों की मांगों को पूरा करके वह बहुसंख्यक समुदाय के समर्थन को खोना नहीं चाहती हैं। लेकिन वह अल्पसंख्यक समुदाय का समर्थन खोने का जोखिम नहीं उठा सकती हैं। एक समय बनर्जी के करीबी रहे एक प्रमुख वकील का कहना है कि “ऐसा तब होता है जब एक राजनेता दूरदर्शिता के अभाव में किसी समुदाय को इसलिए अनुदान देता कि वह उससे समर्थन हासिल करेगा। अंततः इसकी प्रतिक्रिया उल्टी होती हो जो अब हो रही है।”

जयदीप मजूमदार स्वराज्य में एक सहयोगी संपादक हैं।

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