राजनीति
पश्चिम बंगाल में अतिवाद की राजनीति के बीच चुनाव उपरांत भी जारी है ‘खेला होबे’

21 जून को मीडिया के माध्यम से एक ऐसे समाचार पर मेरी निगाह पड़ी जहाँ एक राजनीतिक दल की अति अमानवीय सोच का स्वरूप मूर्तमान हो रहा था। समाचार में दिखाया जा रहा था कि लगभग 150 भाजपा कार्यकर्ता टीएमसी में शामिल हो रहे थे और उस प्रक्रिया के दौरान उनपर सैनिटाइज़र छिड़का जा रहा था।

बंगाल में जब चुनाव और कोविड-19 महामारी दोनों अपने चरम पर थे, तब तो यह सब कहीं देखने को नहीं मिला था। परंतु चुनाव के बाद करीब दो महीने से अधिक का समय बीत चुका है और लोग चुनाव और बंगाल की प्रतिष्ठा की क्षति दोनों को भूलना चाहते हैं।

तब भी रह-रहकर राजनीतिक दुर्भावना और हिंसा के जरिए ऐसी दर्दनाक टीसों की निरंतरता बनी हुई है। 2021 में बंगाल में शुरू होने वाली दमनात्मक राजनीति का यह खेला आज भी दुर्दांत रूप से बदस्तूर जारी है।

पश्चिम बंगाल के निवासी, जनपद अभियंता और टीएमसी के समर्थक देवांशु भट्टाचार्य ने राज्य के विधान सभा चुनाव के लिए जिस सूत्र शब्द ’खेला होबे’ को लेकर एक रैप लिखा, वह आज एक मुहावरा बन चुका है।

दरअसल इस रैप की जन्मभूमि बंगाल का ही पुराना हिस्सा रहा बांग्लादेश है; जिसने स्वतंत्रता के बाद अपने नए धार्मिक और राजनीतिक मुहावरे गढ़े हैं। सबसे पहले बांग्लादेश के नारायणगंज के सांसद शमीम उस्मान ने अपनी एक सभा में सन् 1917 में यह नारा उछाला था जिसे तुरंत टीएमसी के अनुव्रत मंडल ने लपक लिया था।

तब अनुव्रत मंडल टीएमसी के बीरभूम जिले के उपाध्यक्ष थे। यह जिला पश्चिम बंगाल में पड़ता है। उन्होंने एक कार्यक्रम में सबसे पहले टीएमसी की ओर से कहा खेला होबे, भयंकर खेला होबे। अर्थात् खेल होगा और खतरनाक खेल होगा।

इन्हीं शब्दों को लेकर लिखा गया गाना बंगलादेश में सन् 1917 में क्रिकेट चैंपियनशिप ट्रॉफी के दौरान बांग्लादेश की क्रिकेट टीम के लिए भी गाया गया था। किंतु लगता है कि तृणमूल कांग्रेस पार्टी ने इन दो शब्दों पर अपना तन, मन, धन, विवेक, धैर्य सब कुछ वार दिया है।

चुनाव से पहले तो था ही पर चुनाव जीतने के बाद भी आक्रामक रूप से इस हिंसक अर्थ का संदेश देनेवाला शब्द द्वय का जुनून उनपर सवार है। चुनाव प्रारंभ होने से पहले भी बंगाल में छिटपुट घटनाएँ, राजनीतिक हत्या ,हिंसा या अन्य दुखद खबरें मीडिया में आती रहती थीं।

परंतु चुनाव समाप्त होते ही पश्चिम बंगाल में बदले की राजनीतिक भावना इतनी तेज़ हो गई कि हर दिन भयावह हिंसा शुरू हुई। वीभत्सता की हदें पार की गईं। मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच लगातार वाद-विवाद की परंपरा शुरू हुई।

भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ-साथ उन्हें वोट देने वाले मतदताओं को भी लक्ष्य बनाया गया। लोगों को घर में घुसकर, खोज-खोजकर और सड़क पर दौड़ा-दौड़ाकर पीटा गया। महिलाओं, बच्चों और बूढ़ों तक को नहीं छोड़ा गया।

लोगों की हत्याएँ हुईं, उनकी दुकानें लूट ली गईं, उनके घर जला दिए गए। उनके लोगों को डरा-धमकाकर भगाया गया। बाद में घर वापस आने की शर्त के रूप में उन्हें अपने घर के मान से समझौता करना पड़ा। उनकी बेटियों और पत्नियों की मांग की गई। उनका अपमान हुआ। मार खानी पड़ी, पैसे देने पड़े, नेताओं के पाँव पकड़ने पड़े।

सबके सामने सामाजिक रूप से अपमानित होना पड़ा, ऐसे समाचारों से हर दिन हमारा सामना हो रहा है। कुछ लोग बंगाल छोड़कर अन्य राज्यों को भाग गए, विशेषकर असम में पलायन हुआ। पलायन कर चुके लोगों की एक बड़ी खेप आज भी असम में निर्वासित जीवन बिता रही है।

इसके अलावा झारखंड, ओडिशा जैसे राज्यों में भी यहाँ के लोग अपनी जान बचाने के लिए पलायन कर गए। आज तक किसी भी टीएमसी के नेता ने न ही इन घटनाओं को स्वीकार किया है और न ही पुरजोर तरीके से इसकी भर्त्सना की है।

न कोई कोई बड़ा नेता, मुख्यमंत्री और न ही वहाँ के प्रभावशाली व्यक्ति या सामाजिक कार्यकर्ता ने समय की मांग के अनुसार कार्य किया ।फिल्मी हस्तियाँ, खिलाड़ी या जो जाने-माने व्यक्तित्व होते हैं, किसी ने भी सामने आकर पुरजोर तरीके से इस हिंसा को रोकने की बात नहीं की, बल्कि सरेआम इन बातों को नकारा भी गया।

कहा गया कि राजनीतिक हिंसा नहीं हो रही है। हाथ कंगन को आरसी क्या? जो कुछ हो रहा था या जो कुछ आज भी हो रहा है, वह आज भी बहुश्रुत और बहु दृष्टिगत है। लोगों के द्वारा बातें संपूर्ण रूप से न सही, पर बातें तो सामने आ ही रहीं हैं। मीडिया के द्वारा भी वहाँ की दुर्भावनापूर्ण अधिकांश बातें सामने आ रहीं हैं।

सैकड़ों सेवानिवृत्त सरकारी प्रशासकीय अधिकारी, न्यायाधीश, सैन्य अधिकारी, तथा लेखकों आदि ने राष्ट्रपति/सर्वोच्च न्यायालय को ज्ञापन सौंपा है ताकि किसी तरह से इस दुर्भावनापूर्ण राजनीतिक हिंसा को बंद किया जाए, इसका अंत हो।

परंतु दुखद बात है कि इतने दिनों के बाद भी सत्ताधारी पार्टी समर्थित गुंडों द्वारा अत्याचार हो रहे हैं। विपक्षी कार्यकर्ताओं, भाजपा समर्थकों, यहाँ तक कि मतदाताओं और विशेषकर वहाँ के रहने वाले अन्य प्रदेशों या उत्तर भारतीय मतदाताओं को निशाने पर रखा जा रहा है। उनमें आज भी भय व्याप्त है।

दबाव और हिंसा का सिलसिला आज भी अनवरत जारी है। वहाँ किसी न किसी रूप में किसी न किसी मुखौटे के पीछे से सत्ता समर्थकों का आक्रामक रवैया बरकरार है। पलायन के बाद लोगों को उनके टूटे फूटे, जलाए हुए घरों में वापस लाने की प्रक्रिया की शुरुआत बहु धीमी गति से हो रही है और उनसे माफिया के द्वारा इसकी कीमत वसूली जा रही है।

समाचार सुनने पर तो ऐसा लगता है जैसे कुछ लोगों का टीएमसी समर्थक या मतदाता न होना उनके जीवन का सबसे बड़ा अपराध है। एक ओर टीएमसी को बंगाली और पश्चिम बंगाल का पर्याय बनाने की कोशिश की गई है या फिर कोशिश की जा रही है।

वहीं दूसरी ओर रवींद्रनाथ टैगोर के जन गण मन वाली सोच और भद्र बंगाली समाज एवं उनकी अंतर-राष्ट्रीयतावादी छवि को आज अपूर्ण क्षति पहुँची है। विद्यासागर, विवेकानंद, राममोहन राय, सुभाष चंद्र बोस आदि के बंगाल को आज पर्याप्त रूप से क्षति पहुँचाई गई है।

आज इस बात की दरकार है कि जल्दी से जल्दी सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर राज्य और केंद्र सरकारों द्वारा ऐसे कदम उठाए जाएँ जो तत्काल इस विकराल समस्या का समाधान प्रस्तुत करें। एक के बाद एक जो अनेक सूचनाएँ सामने आती जा रही हैं, वे सत्ता और अराजक तत्वों के घृणित स्वरूप को उजागर कर रही हैं, यह सब तत्काल प्रभाव से बंद होना चाहिए।

आज मुकुल रॉय सरीखे दलबदलू नेता हैं जो कांग्रेस से टीएमसी, टीएमसी से भाजपा और पुनः भाजपा से टीएमसी की गाड़ी पकड़ चुके हैं। अंततः अपने सुपुत्र समेत तथा कुछ और कार्यकर्ताओं के साथ उनकी टीएमसी में वापसी हुई है।

वापसी की यह शुरुआत कुछ और दल के कार्यकर्ताओं ने भी की है। उनका भी टीएमसी में आने का सिलसिला जारी है। इसके पीछे कई प्रत्यक्ष और परोक्ष कारण हैं। धन, पैसा, राजनीतिक कैरियर या फिर आने वाले पाँच वर्षों तक किसी तरह से जीवन यापन करने का उद्देश्य हो सकता है।

घर वापसी की तरह शुद्धीकरण भी एक शब्द है जो छुआछूत की परंपरा की याद दिलाता है। पुनः वही बात मेरे मन में आती है कि जिन लोगों को पार्टी में वापस सैनिटाइज़र वाली घृणित प्रक्रिया के तहत लाया जा रहा है, वह कितनी भर्त्सना की बात है।

भाजपा से वापस आने वाले नेताओं को शांडिल्य गोत्र वाली श्रेष्ठ ब्राह्मण ममता बनर्जी की पार्टी में तब तक तो कोई जगह नहीं मिलेगी जब तक उनकी पूर्ण रूप से शुद्धि नहीं हो जाती। अवसरवाद, राजनीतिक नेताओं की तो जानी-पहचानी शब्दावली है।

परंतु जो मतदाता हैं या जिनका कोई अपराध नहीं, कोई गलती नहीं है, जो दो वक्त की रोटी पर अपना जीवन बिताने वाले लोग हैं, वे भी आने वाले भयानक दृश्य को झेलने के लिए मजबूर हैं।

धन्य हैं ममता- जब टूटे हुए पैर से इतना बड़ा खेला पश्चिम बंगाल में किया तो स्वस्थ रूप से तो आप अपने शुद्ध शांडिल्य गोत्र के सहारे पूरे ज़ोर-शोर से पूरे भारतवर्ष का हिसाब-किताब कर सकती हैं। ममता की बंगाल विजय के बाद अब शायद वही फॉर्मूला मोदी-विरोध के लिए अपनाया जाए।

मुझे पूरा विश्वास हो गया है कि अगर विपक्षियों की राजनीति में यह कहकर ममता को इसी तरह मशाल पकड़ा दी गई कि आप ही सर्वदलीय नेता हैं, आप भाजपा या मोदी के विपक्ष में शक्तिमान हैं, तो आप निश्चित रूप से भारत का हिसाब करने में सक्षम होंगी।

तब भयानक खेला खेलने की आपकी यह राजनीतिक शुरुआत पता नहीं भारत को किस परिणति तक ले जाएगी। आश्चर्य की बात है कि समूचा कांग्रेसी कुनबा चुनावी हिंसा की इन घटनाओं के दौरान पूरी तरह से चुप रहा। उनकी चिड़िया (ट्विटर) भी बंगाल की हिंसा पर कुछ नहीं बोलती। न ही अभी कुछ बोलेगी।

8 फरवरी 2009 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने कांग्रेसी नेताओं- प्रियंका गांधी वाड्रा, केंद्रीय मंत्री शरद यादव, प्रफुल्ल पटेल, वहाँ के उप-मुख्यमंत्री छगन भुजबल की उपस्थिति में भगवान गौतम बुद्ध की लगभग 325 फीट ऊँची प्रतिमा को देश के लिए समर्पित किया तब एक बात कही।

उन्होंने अपने भाषण में कहा कि शांति की स्थापना के लिए अतिवाद से बचना चाहिए। यह अतिवाद से बचने की अपील क्या सिर्फ दूसरों से थी? कांग्रेस पार्टी जो वहाँ शासन कर रही थी, वही देश में भी शासन कर रही थी। क्या उसने इससे सबक नहीं लिया था?

हमेशा अहिंसा की कसम खाने वाली, अहिंसा के रास्ते पर चलने वाली कांग्रेस पार्टी को क्या यह सब दिखाई नहीं देता? क्या इस बात के लिए वह देश का प्रमुख विपक्षी दल नहीं बनना चाहती? पहले कांग्रेस को शायद अति या अतिवाद से परहेज रहा होगा इसलिए अपने आपको मध्यमार्गी पार्टी कहती थी।

अब उसे दक्षिणपंथी, राष्ट्रवादी, हिंदूवादी पार्टियों से घृणा या वामपंथियों से दूरी की ज़रूरत नहीं रही क्योंकि बंगाल में वामपंथियों के साथ गठजोड़ और महाराष्ट्र में शिवसेना जैसी हिंदुत्व की पार्टियों के साथ सरकार चलाना, कांग्रेस के मध्यमार्ग की विचारधारा को कहीं का नहीं छोड़ती।

इसीलिए वह भी अन्य दलों की तरह सिर्फ और सिर्फ अवसरवादी, पाखंडी और दोहरे मापदंड की पार्टी बन चुकी है। भ्रष्टाचार के मामले में तो कोई भी उसका सानी नहीं रहा है। नाम बड़े और दर्शन छोटे वाली बात आज इस पार्टी पर पूर्णत चरितार्थ होती है।

बंगाल का राजनीतिक इतिहास

राजनीतिक रूप से पश्चिम बंगाल भारतीय राजनीति के सर्व प्रमुख राज्यों में एक है। स्वतंत्रता से पूर्व भी और आज भी देश की राजनीति में बंगाल का अपना महत्वपूर्ण स्थान रहा है। कोलकाता ईस्ट इंडिया कंपनी का केंद्र रहा है। वह ब्रिटिश राज्य की राजधानी हुआ करता था।

तत्कालीन दलबदल की राजनीति के प्रतीकों में हम मीर जाफर और मोहम्मद बिन कासिम को भी ले सकते हैं। इन्होंने भी तो आखिर अंग्रेज़ों के पक्ष में अपना समर्थन जताया था और सिर्फ और सिर्फ सत्ता पाने के लिए। पश्चिम बंगाल विभाजन के पूर्व और उत्तरोत्तर राजनीतिक रूप से सदैव हलचल का केंद्र रहा है।

उत्तर वैदिक काल में बंगाल की धरती पर सुहमा राजाओं का राज हुआ करता था। इस बात का उल्लेख महाभारत के भीष्म, पांडु और अर्जुन के युद्ध से भी होता है। तब से लेकर आज तक बंगाल की राजनीति के इतिहास में नंद, मौर्य, सुंग, गुप्त, बर्मन, गौड़ीय, पाल आदि कई प्राचीन भारतीय शासकों के आलावा आक्रांता इस्लामी शासन तथा उपनिवेशवादी ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश साम्राज्य के साथ-साथ और भी कई शासकों ने बंगाल की धरती पर राज किया।

सन् 1947 में बंगाल की स्वतंत्रता प्राप्ति और भारत के बटवारे के साथ अंग्रेज़ों के बंगाल प्रांत का पश्चिमी हिस्सा भारत को मिला। जो कि आज पश्चिम बंगाल है। तब से लेकर आज तक पश्चिम बंगाल को आठ मुख्यमंत्री मिल चुके हैं-  प्रफुल्ल चंद्र घोष , विधान चंद्र रॉय , प्रफुल्ल चंद्र सेन  अजय कुमार मुखर्जी, सिद्धार्थ शंकर राय, ज्योति बसु , बुद्धदेव भट्टाचार्य और ममता बनर्जी।

1960-70 के दशक के दौरान से ही पश्चिम बंगाल का शासन कई बार राजनीतिक अस्थिरता के मध्य आगे बढ़ता रहा। प्रफुल्ल चंद्र घोष, विधान चंद्र रॉय और प्रफुल्ल चंद्र सेन के कार्यकाल की समाप्ति के बाद सन् 1967 में चौथी विधानसभा के चुनाव के बाद पहली बार गैर-कांग्रेसी नेता बांग्ला कांग्रेस के अजय मुखर्जी जब मुख्यमंत्री बने तब से लेकर सन् 1972 तक बंगाल की राजनीति भीषण परिवर्तन की ओर बढ़ी।

इस दौरान बंगाल को चार राष्ट्रपति शासन और चार गठबंधन की सरकारें देखनी पड़ी। इसके बाद सिद्धार्थ शंकर रॉय के शासन के काल में ही पश्चिम बंगाल के साथ-साथ पूरे देश को कांग्रेस पार्टी की इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा आपातकाल के काले दिनों का सामना करना पड़ा।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में सबसे बड़ा मोड़ या यूँ कहें कि भूचाल तब आया जब 1977 में भारतीय मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ज्योति बसु 23 वर्षों के लिए मुख्यमंत्री बने। बाकी वर्ष  2011 तक उनके सहयोगी बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री रहे। इस तरह 1977 से 2011 तक वामपंथियों का बंगाल पर एकछत्र राज रहा।

आठवें विधान सभा चुनाव से 14वें चुनाव तक उनके सामने किसी भी पार्टी की एक न चली। तब सिर्फ और सिर्फ वामपंथियों का मेरी मर्जी वाला अतिवादी शासन चला, तब कांग्रेस की भी नहीं चली। उसके बाद आया ममता बनर्जी का शासन काल, जो आज तक निर्बाध गति से कायम है ।

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का इतिहास

वामपंथी राजनीति से होते हुए ममता बनर्जी के आज तक, पश्चिम बंगाल की जनता ने कई तरह के खेल देखे। वामपंथियों से लोहा लेने के नाम पर विरोधियों के खिलाफ टीएमसी  की तरफ से राजनीतिक रूप से और हिंसक रूप से उनके  कार्यकर्ताओं व नेताओं ने प्रत्यक्ष रूप से या परोक्ष रूप से कई भयानक खेल खेले।

उसके बाद ’जस को तस’ की राजनीति की परंपरा अपनाने के बाद बंगाल में भयानक हिंसा और राजनीतिक हिंसा का दौर जारी रहा। इस तरह वामपंथियों के बाद ममता बनर्जी के भी भयानक खेल को बंगाल की जनता ने देखा, समझा और इस दुखद परिस्थिति के साक्षी बनी।

इन्हीं घटना प्रवाहों के दौरान या यूँ कहें कि इन्हीं घटनाओं का एक हिस्सा रहा नक्सलवाद, उसका आरंभ भी हुआ। इसका मूल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन में खोजा जा सकता है। यह बात पते की है कि बंगाल में जब चारू मजूमदार, कानू सान्याल, जंगल संथाल आदि ने मई 1967 को नक्सलबाड़ी से नक्सलवाद की शुरुआत की तब बंगाल की राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुज़र रही थी।

कम्युनिस्टों के सत्ता से बाहर होने के बाद बंगाल में राजनीतिक प्रतिद्वंदिता की आंधी में जिस तरह से विपक्षियों को या अन्य पार्टी के कार्यकर्ताओं को या मतदाताओं को जो विपक्ष के लिए वोट करते हो, या जो वामपंथी विचारों के पक्षधर रहे हों, या भाजपाई हों या अन्य पार्टी के रहे हों, उनपर घात-प्रतिघात, हिंसा-प्रतिहिंसा की गई वह काफी भयानक थी, और आज भी जारी है।

बंगाल में हिंसा राजनीति का अभिन्न अंग बन गई है। पहले कम थी परंतु अब अक्सर राजनीतिक हत्याओं को समाचार में जगह पाना एक आम बात हो गई है। वह कहते हैं न कि लोहा ही लोहे को काटता है। इसीलिए तृणमूल कांग्रेस ने भी वामपंथियों के खिलाफ आक्रामकता/अतिवाद को ही अपनाया था और इसी को अपनी राजनीति का मूलमंत्र बना लिया।

अब यह बात उन से छुड़ाए भी नहीं छूट रही है। पहले तो उनका दृष्टिकोण ’अटैक इज़ द बेस्ट डिफेंस’ जैसा था और अब तो 10 साल की सत्ता का स्वाद लेने के बाद ’अटैक इज़ द बेस्ट पॉलिसी’ बन गया है। अन्यथा चुनावी मंच से स्वयं मुख्यमंत्री के मुख से चुनाव के दौरान वोट न देने वालों को ’देख लेने’ की बात क्यों निकलती?

चुनाव से पहले, उसके दौरान और उसके बाद भी खेला होबे के नारे से बार-बार डराने की बू क्यों आती है? मतदाताओं को घर छोड़ने तथा व्यवसाय छोड़ने  पर मजबूर किया जाता है। उनके घरों की महिलाओं के साथ दुष्कर्म किए जाते हैं। क्यों बच्चों के साथ बर्बरता होती है? उनके घरों को जला दिया जाता है। उनकी हत्याएँ होती हैं।

अन्य पार्टी के समर्थक, पार्टी के मतदाता या अन्य पार्टी के प्रार्थी पर जानलेवा हमले क्यों होते हैं? यह सब सत्ताधारी पार्टी को छोड़कर बाकी के ऊपर ही क्यों होता है? और इसके बार-बार प्रयास क्यों होते हैं ? क्या धुआँ बिना आग के ही निकलता है?

सत्ता के दंभ से जिस शक्ति प्रदर्शन के कुत्सित प्रयास किए जा रहे हैं या जो निरंतर जारी हैं, उसे सत्ता की मदमाती सरकार क्यों नहीं देख पा रही है? क्यों नहीं सुन पा रही है? या यूँ कहें कि क्यों देखना या सुनना नहीं चाह रही है?  इस हिंसा के पीछे भयावह स्थिति यह है कि पुलिस प्रशासन का भी अधिकांश हिस्सा अपनी जिम्मेदारी से हाथ धो बैठा है।

वामपंथियों के शासनकाल में अनगिनत राजनीतिक हत्याओं की तरह टीएमसी सरकार भी इन हत्याओं से आँख मूंद लेना लेना चाहती है। राजनीति की यह परंपरा बंगाल को आने वाले वर्षों में कहाँ तक ले जाएगी? सच्चाई यह है कि सत्ता ही इनका अंतिम लक्ष्य है।

या फिर इसका अर्थ यह लगाया जाए कि अतिवाद की पराकाष्ठा के बाद जिस तरह वामपंथी पार्टियाँ पश्चिम बंगाल से अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्षरत हैं, ठीक उसी तरह से 2026 के चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस पार्टी की भी सदा के लिए कांग्रेस पार्टी या वामपंथियों के जैसी हालत होने वाली है।

भविष्य अनिश्चित है। परंतु एक निश्चित राजनीतिक विचारधारा और उसके तंत्र की नकारात्मक पराकाष्ठा एक निश्चित भूमि ही तैयार करेगी।  आज तो ’जिसकी लाठी उसकी भैंस’ की बात लालू यादव के जंगलराज की तरह भारत के कई राज्यों में व्याप्त मिलती है परंतु पश्चिम बंगाल कहीं सर्व प्रमुख न हो जाए। कहीं बिहार को भी पीछे न छोड़ दे।

जो भी हो आज तो सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस पार्टी या दीदीवाद से खुद की पार्टी लोगों के अलावा अन्य पार्टी के कार्यकर्ताओं, नेताओं व लोगों में भय पूरी तरह से भरा हुआ है। विशेषकर प्रमुख विपक्षी दल के नेता और कैडर इसी डर से टीएमसी की शरण में जा रहे हैं।

उन्हें लगता है कि ’जान बची तो लाखों पाए’। ऐसे मौका परस्त लोगों की घर वापसी के पीछे और भी कई कारण हैं। अन्य राजनीतिक पार्टियों के आने वाले लोग पाँच साल तक इसलिए भी सत्ताधारी पार्टी से मिल जाना चाहते हैं क्योंकि यह बात उनके स्वार्थ को और उनके लोभ का संवरण करती है।

जिन-जिन नेताओं या कार्यकर्ताओं के ऊपर न्यायिक केस मुकदमे हैं (जो कि कई भारतीय नेताओं के ऊपर होते हैं), उन्हें फँसने का डर है और जिन पर नहीं है उन्हें केस मुकदमे में ज़बरदस्ती फँसाए जाने का डर सता रहा है।

इसके अलावा कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जो घुसपैठिए बांग्लादेशियों के अलावा वहाँ के आंचलिक वर्ग विशेष की बढ़ती जनसंख्या भी कारण है। एनएचआरसी की रिपोर्ट में भी जनसांख्यिकी परिवर्तन को हिंसा के एक कारण के रूप मे माना गया है।

पता नहीं क्यों बंगाल में विपक्षी पार्टियों को विरोधी न मानकर सत्ताधारी पार्टी के समर्थक या लोग उन्हें शत्रु मान लेते हैं। आज वहाँ विपक्ष को  पूरी तरह से मटियामेट कर देने की भावना बढ़ती जा रही है। एक पार्टी छोड़कर दूसरी में आने-जाने वाली बात किसी भी पार्टी के लिए बहुत बड़ी परेशानी का सबब नहीं होती है।

परंतु यह बात निश्चित है कि जब कोई पार्टी किसी राज्य में हारती है तो निचले स्तर के कार्यकर्ताओं या चिह्नित मतदाताओं की न सिर्फ उम्मीद मरती है बल्कि उनका सुख, चैन, शांति, नौकरी, धंधा-पानी और कार्य के अवसर तथा व्यवसाय, सब पर सवाल खड़ा हो जाता है।

उन्हें यह भी डर है कि आने वाली सरकारी मदद भी कहीं षड्यंत्र के तहत उन्हें मिलना बंद न हो जाए। आज बंगाल में मतदाताओं की जीविका और जीवन रक्षा का प्रश्न प्रमुख हो गया है। गणतंत्र में परिवर्तन की उम्मीद कभी नहीं मरती, परंतु परिवर्तन इतना भयानक होगा शायद वहाँ के लोगों ने ऐसा नहीं सोचा था।

परिवर्तन के भरोसे आज बंगाल के विधान सभा चुनाव का प्रताड़ित नागरिक अन्य प्रांतों में तथा बंगाल में छुप छुपा कर बचते हुए समय काट रहा है। जीने के नाम पर जीवित उन सभी परिवारों को न्याय दिलाना राज्य व केंद्र सरकारों की जिम्मेदारी है। यह ज़िम्मेदारी बंगाल के निवासियों की भी है।

सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ताओं की जो असहिष्णुता देखी गई है, वह समाप्त होनी चाहिए। अन्यथा कुछ वर्षों बाद वहाँ सत्ता में आने वाला परिवर्तन भी प्रति हिंसा और असहिष्णुता का रूप न ले ले। इसे ध्यान में रखना होगा कि अगर इस तरह क्रिया प्रतिक्रिया का खेल जारी रहेगा तो किसी न किसी पार्टी की राजनीतिक जीत तो ज़रूर होती रहेगी परंतु पश्चिम बंगाल सदैव हारता रहेगा।

यह सब इसलिए भी आवश्यक है कि लोग वही होंगे, स्थान वही रहेंगे, राजनीतिक पार्टियाँ वही होंगी, सभी विधान सभा की सीटें भी वही और कमोबेश उनके नेता भी वही रहेंगे जो आज हैं। फैसला सभी को लेना है, मिलकर लेना है।

शासन व्यवस्था, न्यायिक व्यवस्था, वहाँ के बुद्धिजीवी वर्ग और सर्व समाज को ही निर्णय करना होगा कि उन्हें कैसा बंगाल चाहिए। काश आज की बदहाल स्थिति के ज़िम्मेदार लोगों के अंतर्मन भी सैनिटाइज़ हो पाते।

चुनाव के परिणाम के सहारे स्वयं को पाक-साफ साबित करना प्रायः हर राजनीतिक पार्टी की परंपरा रही है। राजनीति में ’अंत साधन को वैध ठहराते हैं’ की परिपाटी ने गलत और सही के अंतर को धुंधला कर दिया है।

आम जनता की कहानी तो ’कोऊ नृप होय हमै का हानी, चेरी छोड़ न होबै रानी’ वाली जैसी है। एक नागरिक के रूप में तो हमे यही समझना होगा  कि पार्टी चाहे जो भी हो बंगाल हमारा था, है और रहेगा। वहाँ रक्तपात होना और दुख का माहौल होना बंगाल के लिए, बंगाल के लोगों के लिए और देश के लोगों के लिए भी ठीक नहीं है।

महान विचारक बट्रेंड रसैल ने एक बार कहा था- सत्ता भ्रष्ट करती है और पूर्ण सत्ता पूर्ण रूप से भ्रष्ट करती है। हम सबको पता है कि फिलहाल पूर्ण सत्ता किसके हाथ में है। आज उसी के कारण सिविल सोसाइटी की तथ्य-खोजी समिति, एनएचआरसी की तथ्य-खोजी समिती और उनके सदस्यों पर भी हमला हुआ।

उन्होंने भी लोगों, कलकत्ता उच्च न्यायालय के सामने तथ्य रखे हैं जो काफी भयानक हैं। उन्होंने भी माना है कि घुसपैठिए प्रायोजित हिंसा में साथ भी थे और वे प्रतीक भी हैं। चुनाव के पूर्व और चुनाव के बाद विपक्षी पार्टियों द्वारा सत्ताधारियों पर आरोप है कि उन्होंने आयोजित रूप से जो कुछ किया वह शीघ्रातिशीघ्र बंद होना चाहिए।

पुनर्वास की बातें या फिर सुरक्षा की बातें अभी तक ठीक से शुरू नहीं की गई हैं। बंगाल में चुनाव के बाद गुंडों को खुली छूट दी गई, समिति का ऐसा मानना है। बांग्लादेशी घुसपैठियों ने जबरदस्त रूप से बंगाल के चुनावी तांडव के दौरान नंगा नाच किया है।

कुछ मीडिया के हवाले से खबर है कि कई जगहों पर पार्टी छोड़ कर गए लोगों के सिर तक मुंडवा डाले गए। अब ‘दाढ़ी गैंग’ वाले लोगों की टिप्पणियाँ नहीं मिलेंगी। वे इस बारे में कुछ नहीं कहेंगे।

सिविल सोसाइटी हो या अन्य दल, या फिर आम आद,मी सभी ने अपनी अपनी रिपोर्ट में बंगाल के सत्ताधारी सरकार की करतूत को सबके समक्ष उजागर किया है। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल का लोगों से मिलने जाना वहाँ की सत्ताधारी पार्टी को रास नहीं आया।

हर छोटे-बड़े स्तर पर प्रयास हो रहे हैं कि वहाँ की स्थिति तुरंत सुधरे। बंगाल का एक राजनीतिक दल कुछ लोगों को माफ करने के पक्ष में नहीं है। वे मानते हैं कि यह उन कुछ लोगों की गलती है जिन्होंने सत्ताधारी पक्ष को वोट नहीं दिया या उन्हें हराने में दूसरों की मदद की या फिर दूसरों को जिताया।

चुनाव का यह भयावह रूप आज हमारे सामने कमोबेश रूप में भारत के हर प्रांत में हर जगह थोड़ा बहुत है, पर इतना नहीं। आशा है आने वाले समय में सभी गणतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाली पार्टियाँ, संस्थाएँ और लोग आगे आएँगे और माहौल को बदलने में सकारात्मक सहयोग करेंगे जिससे आने वाले दिनों में यह दुर्भावना, हिंसा, प्रतिहिंसा या भय का माहौल  समाप्त हो सके।

तब तक त्राहिमाम।

डॉ प्रेम चंद्र युवा लेखक एवं आलोचक हैं। वे हैदराबाद विश्वविद्यालय से हिंदी भाषा एवं साहित्य में डॉक्टरेट हैं।