राजनीति
प्रधानमंत्री को मीडिया की चुनौती स्वीकारनी चाहिए, इससे प्रेस का सच सामने आएगा

आशुचित्र- 

  • प्रधानमंत्री से प्रेस वार्ता की मांग उचित हैं लेकिन यह अधिकांश समय संदेहास्पद रहता है कि इस प्रकार के आयोजनों से कुछ भी निष्कर्ष निकलेगा। 
  • मोदी को प्रेस वार्ताएँ करनी चाहिए और वे पाएँगे कि यह उनकी कमियों की बजाय मीडिया का दंतहीन स्वभाव प्रदर्शित करेगा।

प्रधानमंत्री को प्रेस वार्ता करनी चाहिए या नहीं एक बड़ा मुद्दा बन जाना भारत में तथा मीडिया में राजनीतिक वार्ता की गुणवत्ता दिखाता है। वहीं यदि वे किसी को साक्षात्कार देते हैं तो उस पत्रकार को कमज़ोर करार दिया जाता है।

केवल राहुल गांधी ही नहीं है जिन्होंने एएनआई संपादक स्मिता प्रकाश द्वारा लिए गए प्रधानमंत्री के साक्षात्कार की आलोचना की अपितु शिवसेना सहित कुछ अन्य सहयोगी दलों ने भी मोदी के कार्यकाल में प्रेस वार्ता न होना एक कलंक जैसा बताया।

राहुल गांधी ने ट्वीट के माध्यम से मोदी को ताना दिया था (“1,654 दिनों से आप प्रधानमंत्री हैं और अभी तक प्रेस वार्ता नहीं की”) वहीं शत्रुघ्न सिन्हा ने ट्वीट किया था , “हम सभी ने सोमवार शाम को आपके सुनियोजित, अच्छी पटकथा वाला, अच्छे से अनुसंधान और अभ्यास किया हुआ साक्षात्कार देखा। स्मिता प्रकाश को आदर, क्या यह सही वक़्त नहीं है कि आप तात्कालिक प्रश्नों का उत्तर दे एक काबिल नेता की तरह छवि प्रस्तुत करें।”

10 वर्षों के कार्यकाल में बहुत कम प्रेस वार्ताएँ करने वाले मनमोहन सिंह ने भी कहा, “लोग कहते हैं कि मैं मौन प्रधानमंत्री था। मैं सोचता हूँ ये भाग (उनकी किताब “चेंजिंग इंडिया”) खुद कुछ कहते हैं। मैं एक ऐसा प्रधानमंत्री नहीं था जो प्रेस से बात करने में डरे। मैं प्रेस से नियमित रूप से मिला और अपनी प्रत्येक विदेश यात्रा के बाद मिला। वहाँ से वापस लौटते समय भी हवाई जहाज में प्रेस वार्ता की थी।”

सबसे पहले भारत के संदर्भ में प्रेस वार्ता के असली मूल्य पर बात करना उचित होगा। जब पार्टियों के प्रवक्ता तथा उनके शीर्ष नेतृत्व के लोग लगभग रोज प्रेस वार्ता करते हैं जो अधिकतर कुछ बयानों से शुरू होते हैं और प्रश्न केवल उन मुद्दों तक सीमित रहते हैं जिन्हें पार्टी दिखाना चाहती है। वहीं पत्रकारों का स्वरूप ऐसा होता है कि किसी भी प्रकार की उत्तेजनापूर्ण और दृढ़ प्रश्नावली संभव नहीं हो सकती। जब 50-60 पत्रकार मौजूद होते हैं तब प्रत्येक पत्रकार केवल एक या अधिकतम दो प्रश्न ही पूछ पाता है। तो किसी भी पत्रकार द्वारा उत्तेजित अथवा असहज प्रश्न करने की बात कहाँ गई? कठिन प्रश्नों को मज़ाक, ध्यान भटकाकर, और अर्थहीन उत्तर देकर टालना राजनेताओं के लिए बहुत आसान कार्य है। एकल साक्षात्कार भले ही किसी मंच पर किए जाएँ, अधिक जानकारी देते हैं।

प्रेस वार्ता किसी भी तरह से प्रधानमंत्री को परखने का पैमाना नहीं है। उनसे प्रेस वार्ता की मांग करना उचित है लेकिन यह सोचना अधिकांश समय संदेहास्पद रहता है कि इससे कुछ भी महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकलेगा। ये केवल जानकारी देने के आयोजन होते हैं।

राहुल गांधी इन वार्ताओं को मज़ा बताते हैं लेकिन किस प्रेस वार्ता में उन्हें राफेल सौदे पर, ओतावियो क्वात्रोच्चि से संबंध पर, अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले पर या नेशनल हेराल्ड घोटाले पर उत्तेजित प्रश्न किए गए?

ये वार्ताएँ मज़ाक ही हैं (यह, यह, यह और यह) यदि इनमें ऐसे पत्रकार हों जो गांधी वंशज को उत्तेजित करना अपना कार्य न समझें।

वहीं मनमोहन सिंह की प्रेस वार्ता की बात की जाए जो उनकी विदेश यात्रा के दौरान हवाई जहाज़ में हुई थी। ये प्रेस वार्ताएँ कभी अप्रकाशनीय थीं और जब नहीं थीं तब सिंह द्वारा हुए सत्कार के कारण पत्रकार सौम्य प्रश्न ही पूछते थे। इसका कारण है कि जब पत्रकारों को मुफ़्त का सत्कार और प्रधानमंत्री के साथ यात्रा का मौका मिलता था तो उन्हें उत्तेजित प्रश्न करने की अथवा इस वार्ता का नियंत्रण करने वाले पीएमओ के कर्मचारियों के विपरीत जाने में कोई दिलचस्पी नहीं होती थी। केवल मुफ़्त के सत्कार के लिए (मैं भी दो बार इसका हिस्सा रहा था और मुझे पता है कि यह कैसे काम करता है), अधिकतर पत्रकार असहज प्रश्न करने से बचते थे। पत्रकारों को मोदी से बड़ी शिकायत यह है कि उन्होंने इस प्रकार के सत्कार रोक दिए हैं।

यह भी पूछना चाहिए कि सोनिया गांधी ने कब किसी भी पत्रकार के किसी उत्तेजित प्रश्न का सामना किया हो जबकि वे यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (यूपीए) की प्रमुख ताकत थीं? राहुल गांधी के लिए प्रेस वार्ताओं को मजा बताना आसान है क्योंकि उन्होंने कभी किसी जिम्मेदारी को नहीं निभाया है।

यह भी पूछना चाहिए कि इन ताकतवर राज्य स्तरीय नेताओं- मायावती, ममता बैनर्जी, स्व. जयललिता, नवीन पटनायक, के चंद्रशेखर राव, चंद्रबाबू नायडू अथवा पिनाराइ विजयन में से क्या किसी ने कभी असहज प्रश्नों का सामना किया है? इनमें से अधिकतर लोग प्रेस वार्ता केवल ऐलानों के लिए आयोजित करते हैं तथा किसी भी गंभीर प्रश्नावली के लिए नहीं। पी चिदंबरम सीएनबीसी टीवी18 के प्रश्नोत्तर में बजट क्रमांक पूछे जाने पर आयोजन छोड़ कर चले गए थे। ममता बैनर्जी ने भी एक टीवी कार्यक्रम में ऐसा ही किया था जब जनता में बैठे किसी व्यक्ति ने ऐसा प्रश्न किया था जिसके लिए वे तैयार नहीं थीं। नरेंद्र मोदी ने भी करण थापर द्वारा लिए गए साक्षात्कार में भी ऐसा ही किया था।

मीडिया के पास करने को अपना कार्य है भले ही राजनेता उनसे वार्ता करें या नहीं। प्रधानमंत्री अपनी ओर से प्रेस वार्ता के लिए बाध्य नहीं है भले ही यह एक अच्छी प्रक्रिया है। इस समय जब मीडिया प्रभावित राजनीति का दौर है तथा जब छवि सच्चाई से अधिक मायने रखती है ऐसे में शीर्ष राजनेता-कॉर्पोरेट सीईओ की तरह सोचते हैं कि लोगों के सामने उनकी छवि इस पर निर्भर करती है कि पत्रकारों को केवल उनके प्रयोजन सिद्ध करने हेतु ही बुलाया जाए तो कोई बड़ी बात नहीं है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा नियमों में बदलाव के पहले अधिकतर राजनीतिक वार्ताएँ सुनियोजित होती थीं जो पीआर कर्मचारियों द्वारा संभाली जाती थीं और प्रेस वार्ताओं से बहुत कम जानकारियाँ सामने आ पाती थीं।

इनमें से किसी का तात्पर्य यह नहीं है कि नरेंद्र मोदी प्रेस वार्ताओं को टालने लगें। वे समझ सकते हैं कि इन्हें आसानी से संभाला जा सकता है। मुख्य बात है कि प्रधानमंत्री द्वारा प्रेस वार्ता न किए जाने का हवाला देते हुए उनके चरित्र में कमी प्रदर्शित करने का स्वभाव गलत है।

नरेंद्र मोदी को प्रेस वार्ताएँ करनी चाहिए और वे पाएँगे कि यह उनकी कमियों की बजाय मीडिया का दंतहीन स्वभाव प्रदर्शित करेगा।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। उनका ट्वीटर हैंडल @TheJaggi है।